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Vibhuti Paada / Attainments / 32
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Vibhuti Paada / Attainments / 32

मूर्द्धज्योतिषि सिद्धदर्शनम्॥३२॥

Padas Name : Vibhuti Paada / Attainments | Sutra No : 32

In Hindi:

पदपाठ : मूर्द्धज्योतिषि सिद्धदर्शनम्॥

हिंदी में अर्थ : (मूर्द्धज्योतिषि) मूर्धा = मस्तिष्क में स्थित ज्योति में संयम करने पर, योगी को (सिद्धदर्शनम्) सिद्ध = विशिष्ट योग्यता सम्पन्न देव पुरुषों अथवा योग की उच्च भूमियों को प्राप्त किए हुए योगियों का दर्शन = ज्ञान होता है॥

व्यास भाष्य : शिरःकपालेऽन्तश्छिद्रं प्रभास्वरं ज्योतिः। तत्र संयमं कृत्वा सिद्धानां द्यावापृथिव्योरन्तरालचारिणां दर्शनम्॥

हिंदी में अर्थ : (शिरःकपाले) सिर के कपाल के (अन्तश्छिद्रम्) भीतर एक छिद्र है जो (प्रभास्वरम्) अत्यन्त चमकीले (ज्योतिः) प्रकाश वाला है; (तत्र) उसमें (संयमम् कृत्वा) संयम करके योगी को (द्यावापृथिव्योः) द्युलोक और पृथिवी के (अन्तरालचारिणाम्) बीच में विचरण करने वाले (सिद्धानाम्) सिद्ध = विशिष्ट योग्यता सम्पन्न देव पुरुषों अथवा योग की उच्च भूमियों को प्राप्त किए हुए योगियों का (दर्शनम्) दर्शन = ज्ञान होता है॥

वैदिक योग मीमांसा : इस सूत्र में मूर्धाज्योति में संयम से होने वाली सिद्धि को कहा है। ब्रह्मरन्ध्र नामक इस छिद्र में होने वाले प्रकाश में संयम करने से योगी को सिद्ध पुरुषों का दर्शन होता है। महर्षि व्यास लिखते हैं कि इस प्रकार के संयम से योगी को द्युलोक और पृथिवी के मध्य में विचरने वाले सिद्धों का दर्शन होता है।

यहाँ पौराणिक भाष्यकारों ने द्युलोक आदि में विचरण करने वाले सिद्धों से अदृश्यमान दिव्य पुरुषों / देव योनि विशेष को कहा है। परन्तु ऐसा व्याख्यान महर्षि व्यास के भाष्य को न समझने के कारण ही है।

यहाँ द्युलोक और पृथिवी के मध्य में विचरने वाले सिद्ध पुरुष कौन से हैं ? यह जानना चाहिए। कोषकारों ने सिद्धः शब्द का निम्न अर्थ भी किया है —

१. अन्तर्दृष्टि युक्त ऋषि; तथा २. दिव्य गुण सम्पन्न।

अन्तर्दृष्टि युक्त ऋषि का अर्थ तो स्पष्ट ही है। द्युलोक और पृथिवी के मध्य विचरण करने वाले दिव्यगुण सम्पन्न पुरुष कौन से हैं ?

योगसूत्र ३.२६ की व्याख्या में स्पष्ट रूप से प्रतिपादित किया गया है कि पुण्यात्मा, देव आदि पुरुषों की गुणवाचक संज्ञा है ना कि योनि विशेष। अतः सिद्ध का अर्थ हुआ — “विशिष्ट योग्यता / गुण सम्पन्न देव पुरुष अथवा योग की उच्च भूमियों को प्राप्त करने वाला योगी।” ये दोनों प्रकार के पुरुष ही सिद्ध की श्रेणी में आते हैं। पृथिवी पर इन का विचरण तो सामान्य रूप से होता है, और द्युलोक में इनका विचरण भी गुणवाचक जानना चाहिए। शरीर में सिर को द्युलोक कहा जाता है, जिसमें सात प्राण = इन्द्रियाँ उपस्थित हैं। इन इन्द्रियों के दिव्य = सूक्ष्म विषयों के ग्रहण की योग्यता को प्राप्त किए हुए पुरुष, उन्हीं विषयों में तन्मयता को प्राप्त हुआ, जो मानवमात्र के कल्याण हेतु कार्यरत है, वह मानों द्युलोक में ही विचरण कर रहा है।

साधारण पुरुष ऐसे विशिष्ट योग्यता सम्पन्न देव पुरुषों तथा योग की सिद्धियों को प्राप्त किए हुए योगियों को नहीं जान पाते, क्योंकि न तो उनका ऐसा स्तर होता है, और न ही उनमें उन विशिष्ट गुणों और योगसिद्धियों का कोई ज्ञान होता है। दूसरी ओर मूर्धाज्योति में संयम करने वाला साधक ऐसे पुरुषों का ज्ञान उनके गुणों, वृत्तियों तथा योग्यताओं के आश्रय से कर लेता है। भोज ने इससे भी आगे बढ़कर कहा है कि वह उन सिद्ध पुरुषों को देखता और उनसे सम्भाषण भी करता है। इस प्रकार से देखना और सम्भाषण करना भी जीवित देहधारी सिद्ध पुरुषों में घटता है, न कि पौराणिक भाष्यकारों द्वारा कल्पित अदृश्यमान देवयोनि के पुरुषों में।