Vibhuti Paada / Attainments / 33
प्रातिभाद्वा सर्वम्॥३३॥
Padas Name : Vibhuti Paada / Attainments | Sutra No : 33
In Hindi:
पदपाठ : प्रातिभात् वा सर्वम्॥
हिंदी में अर्थ : (वा) अथवा (प्रातिभात्) प्रातिभज्ञान से योगी (सर्वम्) सर्व = पूर्वोक्त संयमों से होने वाली सभी ज्ञानप्रधान = ज्ञानात्मक सिद्धियों का ज्ञान प्राप्त कर लेता है। यहाँ वा शब्द पूर्वोक्त ज्ञानात्मक सिद्धियों को प्रातिभज्ञान से ही जानने के अभिप्राय से प्रयुक्त हुआ है॥
व्यास भाष्य : प्रातिभं नाम तारकम् । तद्विवेकजस्य ज्ञानस्य पूर्वरूपम्। यथोदये प्रभा भास्करस्य। तेन वा सर्वमेव जानाति योगी प्रातिभस्य ज्ञानस्योत्पत्ताविति॥
हिंदी में अर्थ : (प्रातिभम् नाम तारकम्) प्रातिभ ज्ञान ही तारक ज्ञान कहाता है। (तत्) वह प्रातिभ = तारक ज्ञान (विवेकजस्य ज्ञानस्य) विवेकज ज्ञान का (पूर्वरूपम्) पूर्व रूप = पूर्व लिङ्ग है (यथा) जैसे (भास्करस्य उदये) सूर्य के उदय से पूर्व (प्रभा) उसका ज्ञापक चिह्न प्रभा होती है। (प्रातिभस्य ज्ञानस्य) प्रातिभ ज्ञान की (उत्पत्तौ) उत्पत्ति होने पर (योगी) योगी, (तेन वा) उससे भी (पूर्वोक्त संयमों के विकल्प रूप में) (सर्वम् एव जानाति इति) सभी ज्ञानप्रधान = ज्ञानात्मक सिद्धियों को जान लेता है॥
वैदिक योग मीमांसा : महर्षि पतञ्जलि कहते हैं — “अथवा प्रातिभ ज्ञान से योगी सभी कुछ जान लेता है।” यहाँ वा शब्द विकल्प अर्थ में है जिसका अभिप्राय है पूर्वोक्त में कहे गए संयम के विषयों के विकल्प में। विभूति विषयक सूत्रों में से केवल इसी सूत्र में संयम के विषयों के लिए “वा” का प्रयोग किया गया है। (योगसूत्र ३.२२ में जो “अरिष्टेभ्यो वा” का प्रयोग है वहाँ अरिष्ट संयम के विषय नहीं हैं।) अतः पूर्वोक्त निर्दिष्ट संयम के विषयों का विकल्प यह प्रातिभ-ज्ञान सूत्रकार को अपेक्षित है।
प्रातिभात् का अभिप्राय उस ज्ञान से है, जो विवेकख्याति का पूर्वरूप = ज्ञापक चिह्न होता है जैसे कि सूर्योदय से पूर्व उसका ज्ञापक चिह्न प्रभा होती है, उसी प्रकार विवेकख्याति से पूर्व होने वाला प्रातिभज्ञान होता है। भोज ने इसको स्पष्ट करते हुए कहा है कि किसी निमित्त की अपेक्षा के बिना केवल बुद्धि में उत्पन्न होने वाला संवाद रहित अर्थात् बाह्य उपदेश के बिना, तुरन्त = तत्काल उत्पन्न हुआ ज्ञान प्रातिभ-ज्ञान कहाता है। यहाँ निमित्त से अभिप्राय ज्ञानेन्द्रियों और उनके विषयों आदि को जानना चाहिए। अर्थात् प्रातिभ-ज्ञान बुद्धि में तत्काल होने वाला है, जो बाह्य विषयों और उनके आलम्बनों की अपेक्षा नहीं रखता। इस प्रातिभज्ञान को तारक अर्थात् योगी की अपनी प्रतिभा से उत्पन्न, बिना उपदेश के होने वाला ज्ञान, कहा जाता है। इस प्रातिभज्ञान के स्रोत के बारे में स्वामी सत्यपति जी अपने योगभाष्य में इस सूत्र पर लिखते हैं — “इस जन्म अथवा पूर्वजन्म में जो धर्माचरण, वेदादि शास्त्रों का अध्ययन-अध्यापन, सत्संग, योगाभ्यास अर्थात् अष्टाङ्गयोग का अनुष्ठान किया जाता है। उससे सुसंस्कार उत्पन्न होते हैं। उन सुसंस्कारों से जो ज्ञान उत्पन्न होता है, उसका नाम प्रातिभ ज्ञान है।”
सर्वम् का अभिप्राय है — सर्व = पूर्वोक्त सभी ज्ञानात्मक = ज्ञानप्रधान सिद्धियों का ज्ञान होना। जिस प्रकार प्रातिभज्ञान पूर्व के कहे गए संयम के विषयों का विकल्प है, उसी प्रकार सर्व शब्द से पूर्व कही गई सभी ज्ञानात्मक = ज्ञानप्रधान सिद्धियों का ज्ञान ही यहाँ अपेक्षित है। इसी तथ्य को भोज ने स्पष्ट रूप से कहा है — “तस्मिन् सति संयमान्तरानपेक्षः सर्वं जानाति।” अर्थात् उस प्रातिभ ज्ञान के होने पर अन्य किसी (पूर्व कहे गए) संयम की अपेक्षा के बिना ही सर्व = सभी ज्ञानप्रधान सिद्धियों को योगी जानता है।
अतः कुछ भाष्यकारों द्वारा सर्वम् से ‘सभी कुछ जान लेता है’ का अभिप्राय प्रमाणविरुद्ध है, क्योंकि जीवात्मा स्वभाव से अल्पज्ञ होने से सर्वज्ञ कदापि नहीं हो सकता। इसी पाद में आगे महर्षि पतञ्जलि ने ३.५४ में विवेकज्ञान को सर्वविषयम् = सभी विषयों में होने वाला कहा है। अतः यहाँ सर्वम् शब्द से पूर्वोक्त सभी ज्ञानप्रधान = ज्ञानात्मक सिद्धियों का ग्रहण करना ही प्रसंगानुकूल है।
हिंदी में टिप्पणी : तारक का अभिप्राय योग० ३.५४ की व्याख्या में देखें ॥