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Vibhuti Paada / Attainments / 34
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Vibhuti Paada / Attainments / 34

हृदये चित्तसंवित्॥३४॥

Padas Name : Vibhuti Paada / Attainments | Sutra No : 34

In Hindi:

पदपाठ : हृदये चित्तसंवित्॥

हिंदी में अर्थ : (हृदये) हृदय में संयम करने से (चित्तसंवित्) चित्त का ज्ञान होता है॥

व्यास भाष्य : यदिदमस्मिन्ब्रह्मपुरे दहरं पुण्डरीकं वेश्म तत्र विज्ञानं तस्मिन्संयमाच्चित्तसंवित्॥

हिंदी में अर्थ : (यत् इदम्) जो यह (अस्मिन्) इस (ब्रह्मपुरे) ब्रह्मपुर = हृदय में (दहरम्) अल्प = सूक्ष्म (पुण्डरीकम्) कमल के आकार वाला (वेश्म) स्थान है, (तत्र) वहाँ (विज्ञानम्) सम्यक् एवं विविध ज्ञान के साधन, चित्त का निवास है। (तस्मिन्) उस हृदय में (संयमात्) संयम करने से (चित्तसंवित्) चित्त का ज्ञान होता है॥

वैदिक योग मीमांसा : इस सूत्र में महर्षि पतञ्जलि ने हृदय में संयम का फल कहा है। योगी द्वारा हृदय में संयम करने से हृदयस्थ चित्त का ज्ञान होता है। महर्षि व्यास कहते हैं — ब्रह्मपुरे दहरं पुण्डरीकं वेश्म तत्र विज्ञानम् — यह वाक्य छान्दोग्योपनिषद् ८.१.१ से साम्य रखता है, जोकि इस प्रकार है —

अथ यदिदमस्मिन् ब्रह्मपुरे दहरं पुण्डरीकं वेश्म दहरोऽस्मिन्नन्तराकाशस्तस्मिन् यदन्तस्तद्न्वेष्टव्यं तद्वाव विजिज्ञासितव्यमिति॥ इसका अर्थ करते हुए महर्षि दयानन्द लिखते हैं —

कण्ठ के नीचे, दोनों स्तनों के बीच में और उदर के ऊपर जो हृदय देश है, जिसको ब्रह्मपुर अर्थात् परमेश्वर का नगर कहते हैं, उसके बीच जो गर्त है, उसमें कमल के आकार वेश्म अर्थात् अवकाशरूप एक स्थान है और उसके बीच में जो सर्वशक्तिमान् परमात्मा बाहर और भीतर एक रस होकर भर रहा है, वह आनन्दस्वरूप परमेश्वर उसी प्रकाशित स्थान के बीच में खोज करने से मिल जाता है। दूसरा उसके मिलने का कोई उत्तम स्थान वा मार्ग नहीं है। (ऋ० भू॰ उपासनाविषय)

इस ब्रह्मपुर अर्थात् हृदय में जो गर्त है, उसमें कमलाकार वेश अर्थात् अवकाशरूप स्थान है, उस स्थान में, महर्षि व्यास, विज्ञान को भी कहते हैं। विज्ञान का तात्पर्य यहाँ सम्यक् ज्ञान और विविधज्ञान का साधन चित्त है। और चित्त जीवात्मा के सूक्ष्मशरीर का एक अङ्ग है, जिसमें जीवात्मा परिवेष्टित रहता है। इसी ब्रह्मपुर में जीवात्मा का भी स्थान है। इस में वेदान्त दर्शन का भी प्रमाण है, जहाँ योगभाष्यकार महर्षि व्यास ने — इस शंका पर कि “इस ब्रह्मपुर में ईश्वर के स्थान पर जीवात्मा को ही जानने योग्य क्यों न माना जाए” का समाधान इस प्रकार करते हैं —

इतरपरामर्शात्स इति चेन्नासम्भवात्॥ वेदान्त १.३.१८॥

अर्थात् जीव का परामर्श पाए जाने से वही “दहर” पद का वाच्य अर्थ है, वही उपास्य और जानने योग्य है, यदि ऐसा कहा जाए तो ठीक नहीं, क्योंकि उसमें उक्त अर्थ सम्भव नहीं अर्थात् जो गुण कहे हैं, वे परमात्मा में सम्भव हैं जीवात्मा में नहीं।

इस विवेचन से स्पष्ट है कि ऋषियों ने इसी हृदय रूपी स्थान में जीवात्मा का भी निवास माना है। और जन्म-मरण के संसार चक्र में जीवात्मा सूक्ष्म शरीर में परिवेष्टित रहता है। अतः हृदय में ही अन्तःकरण (चित्त) भी स्थित है। इसी अभिप्राय को महर्षि व्यास ने “तत्र विज्ञानम्” कह कर स्पष्ट किया है। इस विषय में महर्षि दयानन्द ने यजु॰ २५.२ में चित्त का अर्थ “विज्ञानसाधिकामन्तःकरणवृत्तिम्” किया है; अतः चित्त ही विज्ञान का साधन है। चित्त = मन का हृदय देशस्थ होने में वेद का भी स्पष्ट प्रमाण है —

हृ॒त्प्रति॑ष्ठं॒ यद॑जि॒रं जवि॑ष्ठं॒ तन्मे॒ मनः॑ शि॒वस॑ङ्कल्पमस्तु॥ यजु॰ ३४.६॥

अर्थात् (हृत्प्रतिष्ठम्) हृदि प्रतिष्ठा स्थितिर्यस्य तत् (यत् अजिरम्) विषयादिषु प्रक्षेपकं जराद्यवस्थारहितं वा (जविष्ठम्) अतिशयेन वेगवत्तरम् (तत्) (मे) मम (मनः) (शिवसङ्कल्पम्) (अस्तु) भवति॥ — जो हृदय में स्थित, विषयादि में प्रेरक वा वृद्धादि अवस्थारहित और अत्यन्त वेगवान् है, वह मेरा मन मङ्गलमय नियम में इष्ट होवे॥ (महर्षि दयानन्द वेदभाष्य)

इसी प्रकार ब्राह्मणग्रन्थों में मन का स्थान हृदय कहा है —

मनो हृदये (श्रितम्) ॥ तै॰ ब्रा॰ ३.१०.८.६॥

अर्थात् मन हृदय में स्थित है।

कस्मिन्नु मनः प्रतिष्ठितं भवतीति हृदय इति ॥ शत० ब्रा॰ १४.६.९.२५॥

अर्थात् मन कहाँ प्रतिष्ठित होता है ? हृदय में॥ अस्तु

अतः योगी द्वारा हृदय में संयम करने से उसे अपने चित्त का ज्ञान होता है, अर्थात् चित्त का स्वरूप क्या है? उसकी वृत्तियाँ कैसी हैं ? संस्कार कैसे हैं ? इत्यादि.... इनका बोध योगी को यथावत् होता है।

भोज ने यहाँ अपने के साथ दूसरों के चित्त का भी ज्ञान होना कहा है — अपने चित्त में स्थित सभी वासनाओं का और दूसरों के चित्त में स्थित रागादि का। और कई आधुनिक भाष्यकारों ने उसका अनुसरण कर स्व और पर चित्त का ज्ञान होना कहा है। परन्तु यह मान्यता सिद्धान्तविरुद्ध है। जब योगी अपने हृदय में धारणा, ध्यान और समाधि करता है तो उसे हृदय में स्वचित्त का ज्ञान ही होगा, न कि अन्य किसी हृदय में स्थित चित्त का। योगसूत्र ३.१-३ की व्याख्या में स्पष्ट रूप से कहा गया है कि योगी के संयम का विषय बाह्यदेश नहीं होते अतः किसी दूसरे शरीर में स्थित हृदय, इस योगी के संयम का विषय न होने से परचित्त ज्ञान कहना और मानना सर्वथा असंगत ही है। पर-चित्तज्ञान की विभूति को महर्षि पतञ्जलि योगसूत्र ३.१९ में प्रतिपादित कर चुके हैं, ऐसे में उसको यहाँ भोज द्वारा सूत्र के भाष्य में कहना प्रसंगविरुद्ध और सिद्धान्तविरुद्ध जानना चाहिए।

कुछ विद्वानों ने हृदय का स्थान वक्षःस्थल की अपेक्षा मस्तिष्क में कहा है। परन्तु महर्षि दयानन्द द्वारा छान्दोग्योपनिषद् ८.१.१ की व्याख्या से स्पष्ट है कि हृदय का स्थान वक्षःस्थल है न कि मस्तिष्क। इसी प्रकार महर्षि व्यास ने योगसूत्र ३.३९ की व्याख्या में कहा है — “प्राणो मुखनासिकागतिराहृदयवृत्तिः” अर्थात् मुख, और नासिका से हृदय पर्यन्त गति = संचार करने वाला वायु प्राण है। यहाँ शरीर में प्राण की क्रिया के संचार से ही स्पष्ट है कि हृदय का स्थान वक्षःस्थल है न कि मस्तिष्क। दूसरी ओर हृदय के मस्तिष्कगत होने में शास्त्र का कोई प्रमाण उपलब्ध नहीं होता।