In Hindi:
पदपाठ : सत्त्वपुरुषयोः अत्यन्तासङ्कीर्णयोः प्रत्ययाविशेषः भोगः परार्थत्वात् स्वार्थसंयमात् पुरुषज्ञानम्॥
हिंदी में अर्थ : (अत्यन्तासङ्कीर्णयोः) अत्यन्त भिन्न-भिन्न स्वरूप वाले (सत्त्वपुरुषयोः) बुद्धि और पुरुष का (प्रत्ययाविशेषः) अभिन्न रूप से ज्ञान होना = एक रूप से प्रतीति होना (भोगः) भोग है, वह भोग (परार्थत्वात्) बुद्धि के परार्थ = पुरुष के प्रयोजन की सिद्धि के लिए अभिव्यक्त होता है। (स्वार्थसंयमात्) भोग बुद्धि से भिन्न स्वार्थ ज्ञान में संयम करने से (पुरुषज्ञानम्) पुरुष = जीवात्मा का ज्ञान होता है॥
व्यास भाष्य : बुद्धिसत्त्वं प्रख्याशीलं समानसत्त्वोपनिबन्धने रजस्तमसी वशीकृत्य सत्त्वपुरुषान्यताप्रत्ययेन परिणतम्। तस्माच्च सत्त्वात्परिणामिनोत्यन्तविधर्मा विशुद्धोन्यश्चितिमात्ररूपः पुरुषः। तयोरत्यन्तासंकीर्णयोः प्रत्ययाविशेषो भोगः पुरुषस्य दर्शितविषयत्वात्। स भोगप्रत्ययः सत्त्वस्य परार्थत्वात् दृश्यः। यस्तु तस्माद्विशिष्टश्चितिमात्ररूपोऽन्यः पौरुषेयः प्रत्ययस्तत्र संयमात्पुरुषविषया प्रज्ञा जायते। न च पुरुषप्रत्ययेन बुद्धिसत्त्वात्मना पुरुषो दृश्यते। पुरुष एव तं प्रत्ययं स्वात्मावलम्बनं पश्यति। तथा ह्युक्तम्—विज्ञातारमरे केन विजानीयात् (बृ. २।४।१४) इति॥
हिंदी में अर्थ : (बुद्धिसत्त्वम्) बुद्धिसत्त्व = बुद्धिगत सत्त्वगुण (प्रख्याशीलम्) प्रकाश स्वभाव वाला है, वह (समानसत्त्वोपनिबन्धने रजस्तमसी) समान रूप से अविनाभावी सम्बन्ध से साथ रहने वाले रजोगुण और तमोगुण को (वशीकृत्य) वश में करके = उन दोनों को अभिभूत करके (सत्त्वपुरुषान्यताप्रत्ययेन परिणतम्) सत्त्व = बुद्धि और पुरुष के भेद ज्ञान के रूप में परिणत होता है। (च) और (तस्मात् सत्त्वात् परिणामिनः) उस परिणामी सत्त्व = बुद्धि से (अत्यन्तविधर्मा) अत्यन्त विरुद्ध धर्म वाला (विशुद्धः) शुद्धस्वरूप (अन्यः) भिन्न तत्त्व (चितिमात्ररूपः) चेतन मात्र स्वरूप वाला (पुरुषः) पुरुष है। (तयोः अत्यन्तासंकीर्णयोः) उन अत्यन्त भिन्न बुद्धि और पुरुष के (प्रत्ययाविशेषः) ज्ञान का अभिन्न = एकाकार रूप में भासित होना (भोगः) पुरुष का भोग है। क्योंकि (पुरुषस्य दर्शितविषयत्वात्) पुरुष, बुद्धि द्वारा दिखाए गए विषयों को प्रतिसंवेदन करने वाला होता है। (स भोगप्रत्ययः) वह भोगरूप प्रतीति = ज्ञान (सत्त्वस्य) बुद्धि के (परार्थत्वात्) परार्थ = पुरुष के लिए होने से (दृश्यः) पुरुष का दृश्य = भोग है।
(यः तु) और जो (तस्मात्) उस भोग ज्ञान से (विशिष्टः) विशिष्ट = भिन्न (चितिमात्ररूपः) केवल चेतन स्वरूप (अन्यः पौरुषेयः प्रत्ययः) पुरुष विषयक अन्य अर्थात् परार्थ से विपरीत स्वार्थ = स्वयं के प्रयोजन को सिद्ध करना रूप, ज्ञान है, (तत्र) उसमें (संयमात्) संयम करने से (पुरुषविषया प्रज्ञा) पुरुष विषयक प्रज्ञा (जायते) उत्पन्न होती है। परन्तु (बुद्धिसत्त्वात्मना) बुद्धि सत्त्व के धर्म रूप (पुरुषप्रत्ययेन) पुरुष विषयक ज्ञान के द्वारा (पुरुषः न च दृश्यते) पुरुष (= चेतनस्वरूप आत्मा) नहीं देखा जाता। (पुरुष एव) पुरुष ही (स्वात्मावलम्बनम् तम् प्रत्ययम्) उस ज्ञान को अपने में आलम्बित = आश्रित (पश्यति) देखता है; (तथा हि उक्तम्) ऐसा ही कहा है — “(विज्ञातारम् अरे) अरे उस विज्ञाता = आत्मतत्त्व को (केन) किस साधन से (विजानीयात् इति) जाना जाए”॥
वैदिक योग मीमांसा : (इस सूत्र की व्याख्या को समझने से पूर्व सूत्र २.२० के व्यासभाष्य, उसकी व्याख्या तथा योगसूत्र १.१७ की व्याख्या से अस्मितानुगत सम्प्रज्ञात समाधि के स्वरूप को पुनः चित्तगत कर लें)
इस सूत्र में महर्षि पतञ्जलि पुरुषज्ञान हेतु संयम के विषय “स्वार्थ” को कह रहे हैं। संसार चक्र में लगे हुए पुरुष का बुद्धि के साथ संयोग बना रहता है। बुद्धि और पुरुष दोनों ही सर्वथा भिन्न स्वरूप वाले हैं। योगसूत्र २.१७ की व्याख्या करते हुए हमने पुरुष और प्रकृति के भेदक स्वरूप को कहा है। प्रकृति के प्रथम विकार बुद्धि का पुरुष से भेद, शास्त्रकार और व्याख्याकार ने स्पष्ट रूप से प्रतिपादित किया है। बुद्धि त्रिगुणात्मक, संहत, जड़ = अचेतन तथा परिणामी है; दूसरी ओर पुरुष सत्त्वादि गुणों से रहित, चेतनमात्र रूप वाला, शुद्ध, अपरिणामी है। इस प्रकार के स्पष्ट भेद के उपरान्त भी पुरुष, बुद्धि से सर्वथा भिन्न स्वरूप वाला नहीं है, क्योंकि व्यवहार काल में वह “वृत्तिसारूप्यम्” वृत्तियों के स्वरूप वाला ही होकर भासता है। पुरुष को दर्शितविषयत्वात् अर्थात् बुद्धि द्वारा दिखाए गए विषयों को देखने वाला कहा है। इन्हीं बुद्धिगत विषयों को देखने वाला होने से, बाह्य विषयों की प्राप्ति ही पुरुष का भोग है। और यह तथ्य बुद्धि की परार्थता को प्रतिपादित करता है — क्योंकि इस प्रकार से विषय प्राप्ति और इनके परिणामस्वरूप सुख-दुःख-मोह, बुद्धि के लिए न होकर, चेतन पुरुष को ही प्राप्त होते हैं। अतः बुद्धि परार्थ = दूसरे के अर्थ = प्रयोजन को सिद्ध करने वाली है। दूसरी ओर इससे विपरीत पुरुष की स्वार्थरूपता है, अर्थात् यह भोग प्राप्ति पुरुष के अपने लिए होती है न कि पुरुष को प्राप्त होने वाले भोगों को प्राप्त करने वाला कोई अन्य द्रष्टा पुरुष होता है। इस प्रकार बुद्धि से विपरीत, पुरुष अपने ही प्रयोजन को सिद्ध करता है।
जब तक योगी बुद्धि की इस परार्थरूपता को जानकर भी, पुरुष की स्वार्थरूपता को नहीं जानता, तब तक वह पुरुषज्ञान से दूर रहता है, और संसार में वृत्तियों के रूप वाला होकर वैसा ही व्यवहार भी करता रहता है। चाहे इस अवस्था में रहते हुए, पुरुष को गुरु एवं आप्त पुरुषों से सुनकर अथवा शास्त्रों को पढ़कर, पुरुष विषयक शाब्दिक ज्ञान, प्राप्त क्यों न हो जाए परन्तु यह शाब्दिकज्ञान उसकी उन्नति का कारण नहीं बन पाता।
अतः महर्षि व्यास कहते हैं — उस भोगज्ञान से भिन्न, केवल चेतनस्वरूप पुरुष का स्वार्थ ज्ञान अन्य = दूसरा है। उस ज्ञान में संयम करने से पुरुष विषयक प्रज्ञा उत्पन्न होती है। इसके विषय में भाष्यकार यह स्पष्ट कर रहे हैं कि बुद्धिसत्त्वगत पुरुषविषयक इस ज्ञान से, बुद्धि में पुरुष नहीं देखा जाता, क्योंकि जड़ पदार्थ से चेतन का ज्ञान होना सम्भव नहीं है, बल्कि पुरुष ही उस ज्ञान को अपने में आश्रित देखता है। इस स्थिति को प्रतिपादित करने हेतु महर्षि व्यास ने बृहदारण्यकोपनिषद् २.४.१४ के एक वाक्य का निर्देश किया है कि “उस विज्ञाता को किस साधन से जाना जाए।” अर्थात् वह विज्ञाता अन्य किसी साधन से नहीं जाना जाता, न ही वह पुरुष की अत्यन्त सन्निकट एवं सहयोगी तथा भोगों को प्राप्त कराने वाली बुद्धि के द्वारा, और न ही वह अन्य किसी प्रकार के साधन के द्वारा जाना जाता है। इस तथ्य को मीमांसा दर्शन के भाष्यकार शबरस्वामी निम्न शब्दों में स्पष्ट करते हैं —
स्वसंवेद्यः स भवति, नासावन्येन शक्यते द्रष्टुम्, कथमसौ निदर्श्येतेति? ॥ मीसांसा १.१.५ पर शाबरभाष्य॥
अर्थात् वह जीवात्मा = पुरुष स्वसंवेद्य = अपने से ही जानने योग्य होता है, अन्य से नहीं देखा जा सकता, फिर भला उसे कैसे दिखायें ?
पुरुष-ज्ञान मन आदि इन्द्रियों अथवा बुद्धि से नहीं होता, इस विषय में वेद का प्रमाण है —
अप॑श्यं गो॒पामनि॑पद्यमान॒मा च॒ परा॑ च प॒थिभि॒श्चर॑न्तम्॥ ऋ० १.१६४.३१॥
अर्थात् मैं सब की रक्षा करने वाले मन और इन्द्रियों को न प्राप्त होने वाले, और मार्गो से आगे और पीछे प्राप्त होने वाले परमात्मा और विचरते जीव को देखता हूँ ............ (महर्षि दयानन्द सरस्वती वेदभाष्य) ।
यहाँ स्वार्थ संयम क्या है ? यह महत्त्वपूर्ण प्रश्न है। इसको समझे बिना पुरुषज्ञान होना सम्भव नहीं है। महर्षि व्यास ने भाष्य में बृहदराण्यकोपनिषद के जिस प्रकरण से यह प्रमाण दिया है “विज्ञातरमरे केन विजानीयात्”; उस प्रकरण में “पुरुष की सभी उपलब्धियाँ / प्राप्तियाँ उसके अपने प्रयोजन के हेतु हैं”, इस तथ्य को महर्षि याज्ञवल्क्य अपनी स्त्री मैत्रेयि को स्पष्ट कर रहे हैं। मैत्रेयि का प्रश्न था कि “यदि धनादि से परिपूर्ण यह पृथिवी को पाकर भी मैं अमृत = मोक्ष को प्राप्त नहीं कर सकती तो ऐसे धनादि से क्या लाभ ? जिस वस्तु को जानकर आप सब कुछ त्याग रहे हैं, वह मुझे कहें।” इसके उत्तर में महर्षि याज्ञवल्क्य कहते हैं — “पति की कामना से पति प्रिय नहीं होता, किन्तु निज आत्मा की कामना से पति प्रिय होता है; इसी प्रकार भार्या, पुत्र, वित्त, ब्राह्मण, क्षत्रिय, लोक, देव, भूत, सर्व पदार्थों की कामना के लिए ये प्राणी एवं पदार्थ प्रिय नहीं होते, वरन् निज आत्मा की कामना के लिए ये सभी प्रिय होते हैं। अतः आत्मा ही द्रष्टव्य, श्रोतव्य, मन्तव्य, निदिध्यासितव्य है। निश्चय ही आत्मा के दर्शन से, श्रवण से, मनन से, और विज्ञान से सब विदित होता है।” इस प्रकार जीवात्मा की स्वार्थ = अपने प्रयोजन सिद्धि को कहकर आत्मा को जानने के विषय में कहा है जिसका अन्त निम्न वाक्य के द्वारा है — “येनेदं सर्वं विजानाति तं केन विजानीयाद्विज्ञातारमरे केन विजानीयादिति।” अर्थात् जिससे इस सब पदार्थों को जानता है इसको किससे जानेगा ? अरे मैत्रेयि! विज्ञाता को किससे जानेगा ?”
इस प्रकरण से स्पष्ट है कि जीवात्मा की सभी क्रियायें, ज्ञान, उपलब्धि उसके स्वयं के प्रयोजन को सिद्ध करने वाली हैं, न कि किसी अन्य के प्रयोजन को।
मीमांसा दर्शन १.१.५ के भाष्य में शबरस्वामी उपर्युक्त प्रकरण में आगे कहते हैं कि इस प्रकार वह पुरुष अपने आप का = आत्मा का ग्रहण करता है, अन्य द्रष्टा (तथा मन, बुद्धि और इन्द्रियादि) की उस पुरुष के प्रति दर्शनशक्ति का अभाव होने से। इसमें आगे निम्न प्रमाण देते हैं —
“अथाऽस्मिन्नर्थे ब्राह्मणं भवति — शान्तायां वाचि किंज्योतिरेवायं पुरुषः (इति), आत्मज्योतिः सम्राडिति होवाच (शत० ब्रा॰ १४.७.१.६) इति। परेण नोपलभ्यते इत्यत्रापि ब्राह्मणं भवति — अगृह्यो न हि गृह्यते (शत० ब्रा॰ १४.६.९.२८) इति। परेण न गृह्यते, इत्येतदभिप्रायमेतत्। कुतः ? स्वयञ्ज्योतिष्ट्ववचनात्। अथापि ब्राह्मणं भवति — अत्रायं पुरुषः स्वयञ्ज्योतिर्भवति (शत० ब्रा॰ १४.७.१.१०) इति। केन पुनरुपायेन अयमन्यस्मै कथ्यते इति ? तत्राप्युपाये ब्राह्मणं भवति — स एष नेति नेत्यात्मेति होवाच (शत० १४.६.९.२८) इति। असौ एवंरूपः इति न शक्यते निदर्शयितुम्।”
अर्थात् इस अर्थ = आत्मा स्वसंवेद्य है, में शतपथब्राह्मण का प्रमाण है — “वाणी के शान्त हो जाने पर किस ज्योतिवाला यह पुरुष होता है ? हे सम्राट् ! आत्मज्योति वाला होता है”, ऐसा याज्ञवल्क्य ने कहा। क्योंकि अन्य के द्वारा गृहीत नहीं होता, इस विषय में भी शतपथ ब्राह्मण का प्रमाण है — “(यह आत्मा) अगृह्य है, गृहीत नहीं होता।” दूसरे से गृहीत नहीं होता, इस अभिप्रायवाला यह वचन है। कैसे यह अन्य किसी पुरुष एवं साधन से गृहीत नहीं होता ? स्वयं ज्योतिष्टव = स्वयंप्रकाशकत्व के कथन करने से। इस विषय में भी शतपथ ब्राह्मण का वचन है — “यहां यह पुरुष स्वयं ज्योतिवाला होता है।” किसी उपाय से यह अन्य के लिए कहा जाता है ? इस उपाय के विषय में भी शतपथब्राह्मण का वचन है — “वह यह नहीं है, वह यह नहीं है, आत्मा” ऐसा याज्ञवल्क्य ने कहा।
इस प्रकार से अपने स्वरूप को प्रत्यक्ष करने में — ‘‘न इति’’ वह यह नहीं है ....., अर्थात् शरीर में वर्त्तमान प्रत्येक अवयव, क्रिया = वृत्ति वा रूपादि गुण का प्रतिषेध करते-करते जो बच जाए, वह आत्मा है। यथा शरीर आत्मा नहीं है; स्थूल और सूक्ष्म शरीर का बुद्धि पर्यन्त प्रत्येक अंग, आत्मा नहीं है; इसी प्रकार प्राणादि भी आत्मा नहीं हैं; शरीर के अवयवों और प्राणादि के प्रतिषेध से (क्योंकि ये सभी परार्थ हैं), उनसे भिन्न आत्मा का उपदेश है। इसी प्रकार आत्मा द्वारा ग्रहण होने वाले सुख-दुःख आदि भी आत्मा नहीं हैं। (इससे स्पष्ट है कि सुखादि गुणों को आत्मा का स्वरूप मानने वाले भ्रान्ति में है।)
अतः सभी प्रकार की बुद्धि वृत्तियों एवं विषयों से भिन्न आत्मा ही अपने प्रयोजन को सिद्ध करने वाला है, इस प्रकार से स्वार्थ ज्ञान में संयम करने से योगी को पुरुषज्ञान होता है। स्वार्थ = स्व + अर्थ = अपना प्रयोजन अर्थात् भोग और अपवर्ग रूप प्रयोजन जिसके लिये हैं, वह जीवात्मा = पुरुष है। और इस स्वार्थ संयम से हुए ज्ञान को जानने वाली बुद्धि नहीं होती वरन् यह ज्ञान आत्मा में ही आश्रित होता है। अतः पुरुषज्ञान विषयक प्रज्ञा को शब्द रूप में किसी ग्रन्थ में नहीं कहा गया, क्योंकि यह अशाब्द ज्ञान है। इसे प्राप्त करने वाला स्वयं ही इसका अनुभव करता है, परन्तु दूसरे को नहीं करा सकता। यथा मधुर रस का आस्वादन करने वाला मात्र यही कह सकता है कि मैं मधुर रस का स्वाद ग्रहण कर रहा हूँ परन्तु उस रस की अनुभूति अन्य को नहीं करा सकता।
समाधिपाद की व्याख्या करते हुए हमने अस्मितानुगत सम्प्रज्ञात समाधि के विषय में यह स्पष्ट किया है कि जीवात्मा जब सत्त्वगुण-प्रधान बुद्धि-पुरुष के भेदज्ञान के आश्रय से पुरुष का आलम्बन करता है तो ऐसी सम्प्रज्ञात समाधि में होने वाला पुरुष ज्ञान उसे सत्त्वादि गुणों के प्रति भी वैराग्य की ओर अग्रसर करता है — जिसे परवैराग्य कहा जाता है। इस परवैराग्य की अवस्था के बाद ही, असम्प्रज्ञात समाधि की अवस्था में, आत्मा = पुरुष, प्रकृति के गुणों के प्रति भी विरक्त हुआ = प्रकृति से सर्वथा असम्बद्ध हुआ, आत्मस्वरूप और आत्मा के भी आत्मा परमात्मा का प्रत्यक्ष करता है। और यही साक्षात्कार ही वास्तविक पुरुष साक्षात्कार कहलाता है, न कि इससे पूर्व की कोई अवस्था विशेष। अतः इस सूत्र में वर्णित पुरुषज्ञान अस्मितानुगत सम्प्रज्ञात समाधि की अवस्था में होने वाला ज्ञान जानना चाहिए, जो कि आत्म-साक्षात्कार रूपी अन्तिम लक्ष्य न होकर भी, उस लक्ष्य तक पहुँचने का द्वार खोल देता है।