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Vibhuti Paada / Attainments / 36
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Vibhuti Paada / Attainments / 36

ततः प्रातिभश्रावणवेदनादर्शास्वादवार्त्ता जायन्ते॥३६॥

Padas Name : Vibhuti Paada / Attainments | Sutra No : 36

In Hindi:

पदपाठ : ततः प्रातिभश्रावणवेदनादर्शास्वादवार्त्ता जायन्ते॥

हिंदी में अर्थ : (ततः) उस स्वार्थज्ञान में संयम से हुए पुरुषज्ञान के पश्चात् (प्रातिभश्रावणवेदनादर्शास्वादवार्त्ता) प्रातिभ, श्रावण, वेदना, आदर्श, आस्वाद और वार्ता नामक सिद्धियाँ (जायन्ते) उत्पन्न होती हैं॥

व्यास भाष्य : प्रातिभात्सूक्ष्मव्यवहितविप्रकृष्टातीतानागतज्ञानम्। श्रावणाद्दिव्यशब्दश्रवणम्। वेदनाद्दिव्यस्पर्शाधिगमः। आदर्शाद्दिव्यरूपसंवित्। आस्वादाद्दिव्यरससंवित्। वार्त्तातो दिव्यगन्धविज्ञानमित्येतानि नित्यं जायन्ते॥

हिंदी में अर्थ : (प्रातिभात्) प्रातिभज्ञान से (सूक्ष्मव्यवहितविप्रकृष्टातीतानागतज्ञानम्) सूक्ष्म विषयों, विषयों का परोक्ष तथा विस्तारित ज्ञान; तथा प्रकृति के सभी विकारों के अतीत एवं अनागत का ज्ञान होता है। (श्रावणात्) श्रावण नामक सिद्धि से (दिव्यशब्दश्रवणम्) दिव्य = सूक्ष्म शब्दों का श्रवण होता है; (वेदनात्) वेदना नामक सिद्धि से (दिव्यस्पर्शाधिगमः) दिव्य = सूक्ष्म स्पर्श की प्राप्ति; (आदर्शात्) आदर्श नामक सिद्धि से (दिव्यरूपसंवित्) दिव्य = सूक्ष्म रूप की उपलब्धि; (आस्वादात्) आस्वाद नामक सिद्धि से (दिव्यरससंवित्) दिव्य = सूक्ष्म रस की अनुभूति; (वार्त्तातः) वार्ता नामक सिद्धि से (दिव्यगन्धविज्ञानम्) दिव्य = सूक्ष्म गन्ध का ज्ञान होता है। (इति एतानि) ये दिव्य = सूक्ष्म अनुभूतियाँ = ज्ञान योगी को (नित्यम्) नित्य (जायन्ते) प्राप्त होते हैं॥

वैदिक योग मीमांसा : स्वार्थ संयम से हुए पुरुष ज्ञान के उपरान्त योगी को प्रातिभ, श्रावण, वेदना, आदर्श, आस्वाद और वार्ता नामक सिद्धियाँ प्राप्त होती हैं। ये सिद्धियाँ निम्न प्रकार से हैं —

१. प्रातिभ — योगी को सूत्र ३.३३ में प्रातिभ ज्ञान से पूर्वोक्त सभी ज्ञानात्मक सिद्धियों के ज्ञान की प्राप्ति को कहा है। प्रातिभज्ञान चित्त की वह योग्यता है, जिससे योगी सूक्ष्म विषयों को, विषयों के परोक्ष और विस्तारित ज्ञान को प्राप्त करता है तथा प्रकृति के सभी विकारों के अतीत और अनागत ज्ञान को भी प्राप्त करता है। इस प्रकार की योग्यता के बल पर ही साधक को योगसूत्र ३.३३ से पूर्व प्रतिपादित की गई ज्ञानप्रधान सिद्धियों की प्राप्ति, पृथक्-पृथक् सूत्रों में कहे संयमों के बिना भी, हो जाती है।

२. श्रावण — श्रवणेन्द्रिय से दिव्य = सूक्ष्म शब्द को सुनने का सामर्थ्य उत्पन्न होता है।

३. वेदना — स्पर्शेन्द्रिय से दिव्य = सूक्ष्म स्पर्शों की अनुभूति का सामर्थ्य प्राप्त होता है।

४. आदर्श — नेत्रेन्द्रिय से दिव्य = सूक्ष्म रूप को ग्रहण करने का सामर्थ्य प्राप्त होता है।

५. आस्वाद — रसनेन्द्रिय से दिव्य = सूक्ष्म रस के आस्वादन का सामर्थ्य प्राप्त होता है।

६. वार्ता — घ्राणेन्द्रिय से दिव्य = सूक्ष्म गन्ध को ग्रहण करने का सामर्थ्य प्राप्त होता है।

उपर्युक्त प्रकार की सिद्धियाँ योगी को नित्य प्राप्त होती रहती हैं। इन योग्यताओं के लिए योगी को विशेष प्रयत्न नहीं करना पड़ता और योगी स्वाभाविक रूप से ही इन सूक्ष्म शब्दादि को ग्रहण करने में समर्थ रहता है।

बहुधा भाष्यकारों ने इन सिद्धियों की प्राप्ति स्वार्थज्ञान में संयम से, पुरुषज्ञान होने से पूर्व, मानी है। परन्तु व्यासभाष्य में इस प्रकार का कोई संकेत नहीं है। इस प्रकार का भाष्य भोजवृत्ति से प्रभावित है, क्योंकि भोज ने इस सूत्र की अवतरणिका में — “अस्यैव संयमस्य फलमाह” कहा है, अर्थात् इस ही संयम के फल को कहते हैं। यहाँ पूर्वोक्त संयम “स्वार्थज्ञान” का है। इसी आधार पर यह भ्रान्ति उत्पन्न हुई प्रतीत होती है। वस्तुतः सूत्र में प्रयुक्त “ततः” पद पूर्वसूत्र में “पुरुषज्ञान” को लक्षित करता है, न कि पुरुषज्ञान के संयम स्वार्थज्ञान को।

“स्वार्थज्ञान” का सम्बन्ध पुरुषज्ञान से है न कि ज्ञानेन्द्रियों / चित्त की विशेष योग्यताओं से। स्वार्थज्ञान में संयम करने से इन सिद्धियों को कहने वाले भाष्यकारों ने “स्वार्थज्ञान” का अभिप्राय ही नहीं समझा। श्रावण से वार्ता पर्यन्त सिद्धियों अर्थात्, इन्द्रियों की सूक्ष्म शब्दादि विषयों के ग्रहण के सामर्थ्य की प्राप्ति का वर्णन योगसूत्र १.३५ में भी किया गया है, जहाँ नासिकाग्र आदि स्थानों में धारणा से दिव्य = सूक्ष्म गन्धादि के ग्रहण का प्रतिपादन किया गया है। योगी के लिए उक्त सूत्र में इन परिकर्मों का निर्देश चित्त की एकाग्रता प्राप्ति हेतु महर्षि पतञ्जलि ने किया है। इन्हीं परिकर्मों के आधार पर साधक चित्त की एकाग्रता का सम्पादन करके, वितर्क आदि सम्प्रज्ञात समाधियों की प्राप्ति में संलग्न होता है।

दूसरी ओर इन्द्रियों से लेकर बुद्धि पर्यन्त प्रकृति के विकारों की परार्थता का अनुभव करने के पश्चात्, इस परार्थज्ञान से भिन्न “स्वार्थज्ञान” में संयम से पुनः ज्ञानेन्द्रियों की विशेष योग्यताओं / उपलब्धियों को मानना किस प्रकार से उचित होगा? यह सत्य है कि स्वार्थज्ञान में संयम से हुए पुरुषज्ञान (जोकि अस्मितानुगत सम्प्रज्ञात समाधि की अवस्था है) के उपरान्त चित्त में ऐसी योग्यता उत्पन्न होती है, जिससे योगी उन-उन ज्ञानेन्द्रियों से ग्रहण होने वाली श्रावण आदि सिद्धियों को प्राप्त कर लेता है। इसी प्रकार यहाँ प्रातिभ ज्ञान की प्राप्ति भी जाननी चाहिए। योगी को यह ध्यान रखना चाहिए कि इस प्रकार का पुरुषज्ञान उसका अन्तिम लक्ष्य नहीं है। ऐसे में स्वार्थज्ञान में संयम से इनकी प्राप्ति को मानना सर्वथा सिद्धान्तविरुद्ध ही है।