In Hindi:
पदपाठ : ते समाधौ उपसर्गाः व्युत्थाने सिद्धयः॥
हिंदी में अर्थ : (ते) वे प्रातिभ, श्रावण आदि सिद्धियाँ (समाधौ) समाधि में (उपसर्गाः) विघ्न हैं, किन्तु (व्युत्थाने) व्युत्थान दशा = व्यवहार दशा में (सिद्धयः) सिद्धियाँ हैं॥
व्यास भाष्य : ते प्रातिभादयः समाहितचित्तस्योत्पद्यमाना उपसर्गाः तद्दर्शनप्रत्यनीकत्वात्। व्युत्थितचित्तस्योत्पद्यमानाः सिद्धयः॥
हिंदी में अर्थ : (ते) वे (प्रातिभादयः) प्रातिभ, श्रावण आदि सिद्धियाँ (उत्पद्यमानाः) उत्पन्न होती हुई, (समाहित चित्तस्य) समाहित = स्थिर चित्त वाले योगी के लिए, (तद्दर्शन) उस पुरुषसाक्षात्कार के (प्रत्यनीकत्वात्) विरोधी होने से, (उपसर्गाः) विघ्न हैं। (व्युत्थितचित्तस्य) व्युत्थित = असमाहित = अस्थिर चित्त वाले पुरुष के लिए ये सभी (उत्पद्यमानाः) उत्पन्न होती हुई (सिद्धयः) सिद्धियाँ हैं॥
वैदिक योग मीमांसा : पुरुष ज्ञान के उपरान्त होने वाली प्रातिभ, श्रावण आदि सिद्धियाँ समाधि में विघ्न = बाधक हैं, जबकि व्युत्थान दशा में = व्यवहार दशा में ये सिद्धियाँ कहलाती हैं। क्योंकि इन सिद्धियों तथा पूर्व कथित अन्य सिद्धियों से होने वाला ज्ञान एवं अनुभूतियाँ बुद्धि / चित्त का ज्ञानविशेष होने से इनका पुरुषदर्शन = आत्मसाक्षात्कार से विरोध है।
सूत्र ३.३५ में स्वार्थसंयम से पुरुषज्ञान का होना कहा है, और वह पुरुष ज्ञान बुद्धि का विषय न होकर पुरुष में अवस्थित रहता है। जबकि इन सिद्धियों से होने वाला ज्ञान चित्त = बुद्धि के आश्रय से ही आत्मा को प्राप्त होता है। अतः पुरुष ज्ञान के पश्चात् की उच्च भूमियों की प्राप्ति हेतु ये सभी सिद्धियाँ विघ्न ही बनती हैं।
पुरुषज्ञान के पश्चात् ही पुरुष दर्शन = पुरुष साक्षात्कार हेतु योगी प्रयत्नशील होता हुआ परवैराग्य का सम्पादन करता है, जिससे वह असम्प्रज्ञात समाधि को प्राप्त करके परमपुरुष परमात्मा का साक्षात्कार कर और उसके आलम्बन से स्वयं का भी साक्षात्कार कर सके। इस सारी प्रक्रिया में योगी को सत्त्वादि गुणों के प्रति भी तृष्णा रहित होना होता है, तभी परवैराग्य की स्थिति की प्राप्ति होती है।
दूसरी ओर इन सिद्धियों से योगी दिव्य = सूक्ष्म शब्द, स्पर्श, गन्ध, रस और रूप आदि प्रकृति के विकारों के स्थूल और सूक्ष्म गुणों ही को प्राप्त करता; और प्रातिभ ज्ञान से प्रकृति के विकारों के अतीत और अनागत ज्ञान में संलग्न होता; तथा सूक्ष्म विषयों तथा विषयों के परोक्ष और विस्तारित ज्ञान में ही उलझा रहता है। यह सारी स्थिति परवैराग्य अर्थात् “गुणवैतृष्ण्यम्” से विपरीत मार्ग पर ही योगी को अग्रसर करती है। अतः इन सिद्धियों को तथा इसी प्रकार से अन्य सिद्धियों को भी पुरुष साक्षात्कार रूपी लक्ष्य हेतु समाधि प्राप्ति में विघ्न ही कहा गया है।
जबकि व्युत्थान दशा में = पुरुष दर्शन = साक्षात्कार रूप लक्ष्य से इतर अवस्था में, ये सभी सिद्धियाँ ही हैं, क्योंकि इनके द्वारा साधक समाज = लोक में प्रतिष्ठा को भी प्राप्त करता तथा विशेष अनुभूतियों के होने से स्वयं भी हर्ष और विस्मय आदि को प्राप्त करता है।
अतः योगी को इन सिद्धियों से सावधान रहते हुए, इन विघ्नों को दूर कर, विवेकख्याति एवं परवैराग्य की प्राप्ति हेतु पुरुषार्थ करना चाहिए। अन्यथा वह, अपने लक्ष्य से च्युत हुआ, अपने क्लिष्ट वृत्ति-संस्कार-वृत्ति चक्र को ही दृढ़ करता हुआ, जन्म-मरण रूपी संसारचक्र में ही लगा रहेगा।