In Hindi:
पदपाठ : बन्धकारणशैथिल्यात् प्रचारसंवेदनात् च चित्तस्य परशरीरावेशः॥
हिंदी में अर्थ : (बन्धकारणशैथिल्यात्) चित्त के बन्धन के कारण = धर्म-अधर्म रूप कर्म और उनके संस्कारों के समाधि द्वारा शिथिल हो जाने से (च) और (प्रचारसंवेदनात्) चित्त की गति के मार्गों को जानने से (चित्तस्य) चित्त का (परशरीरावेशः) पर = दूसरे शरीर में प्रवेश होता है॥
व्यास भाष्य : लोलीभूतस्य मनसोऽप्रतिष्ठस्य शरीरे कर्माशयवशाद्बन्धः प्रतिष्ठेत्यर्थः। तस्य कर्मणो बन्धकारणस्य शैथिल्यं समाधिबलाद्भवति। प्रचारसंवेदनं च चित्तस्य समाधिजमेव। कर्मबन्धक्षयात्स्वचित्तस्य प्रचारसंवेदनाच्च योगी चित्तं स्वशरीरान्निष्कृष्य शरीरान्तरेषु निक्षिपति। निक्षिप्तं चित्तं चेन्द्रियाण्यनुपतन्ति। यथा मधुकरराजानं मक्षिका उत्पतन्तमनूत्पतन्ति निविशमानमनुनिविशन्ते तथेन्द्रियाणि परशरीरावेशे चित्तमनुविधीयन्त इति॥
हिंदी में अर्थ : (लोलीभूतस्य) चञ्चल स्वभाव वाले (अप्रतिष्ठस्य) अस्थिर (मनसः) मन = चित्त की (कर्माशयवशात्) कर्माशय = धर्माधर्म रूप कर्म संस्कारों के वश से (शरीरे बन्धः) शरीर में बन्धन (प्रतिष्ठाः) प्रतिष्ठा = स्थिति होती है, (इति अर्थः) यह अर्थ है। (तस्य) उन (बन्धकारणस्य कर्मणः) बन्धन के कारण कर्मों और उनके संस्कारों की (समाधिबलात्) सम्प्रज्ञात समाधि के बल से (शैथिल्यम्) शिथिलता (भवति) होती है; (च) और (चित्तस्य) चित्त की (प्रचारसंवेदनम्) प्रचार = गति का ज्ञान भी (समाधिजम् एव) समाधि से ही होता है।
चित्त के (कर्मबन्धक्षयात्) कर्म के बन्धन के क्षय = शिथिल होने से (च) और (स्वचित्तस्य) अपने चित्त की (प्रचारसंवेदनात्) गति का ज्ञान होने से (योगी) योगी (चित्तम्) अपने चित्त को (स्वशरीरात्) अपने शरीर से (निष्कृष्य) निकाल कर (शरीरान्तरेषु) अन्य = दूसरे के शरीर में (निक्षिपति) प्रविष्ट कराता है। (च) और (निक्षिप्तम् चित्तम्) इस प्रकार से दूसरे के शरीर में प्रविष्ट चित्त का (इन्द्रियाणि) इन्द्रियाँ भी (अनुपतन्ति) अनुगमन = अनुसरण करती हैं; (यथा) जैसे (मक्षिकाः) मधुमक्खियाँ (मधुकरराजानम् उत्पतन्तम्) उड़ते हुए मधुकर राजा के (अनूत्पतन्ति) पीछे उड़ती हैं, और (निविशमानम्) छत्ते में प्रवेश करते हुए के (अनुनिविशन्ते) पीछे प्रवेश कर जाती हैं, (तथा) वैसे (इन्द्रियाणि) इन्द्रियाँ भी, (परशरीरावेशे) दूसरे शरीर में प्रवेश करने पर (चित्तम्) चित्त का (अनुविधीयन्ते इति) अनुसरण करती हैं॥
(अथ) इस के पश्चात् (परशरीरप्रविष्टः) दूसरे के शरीर में प्रविष्ट किया हुआ (योगी) योगी (स्वशरीरवत्) अपने शरीर के समान (तेन) उस शरीर से (सर्वम्) सभी (व्यवहरति) व्यवहार करता है। (यतः) जिस कारण (व्यापकयोः) व्यापक (चित्तपुरुषयोः) चित्त और पुरुष के (भोगसङ्कोचे) भोग के संकोच अर्थात् एक शरीर में सीमित होने में (कारणम्) कारण (कर्म) कर्म है, (चेत्) यदि (तत्) वह कर्म (समाधिना) सम्प्रज्ञात समाधि से (क्षिप्तम्) नष्ट हो गया हो (तदा) तब (स्वातन्त्र्यात्) स्वतन्त्रता होने के कारण (सर्वत्र) सभी स्थानों = शरीरों में (एव) ही (भोगनिष्पत्तिः) भोग की प्राप्ति होती है॥
वैदिक योग मीमांसा : इस सूत्र में चित्त के दूसरे शरीर में प्रवेश करने की सिद्धि का वर्णन है। महर्षि व्यास कहते हैं कि चित्त चञ्चल स्वभाव वाला है। ऐसे में उसकी एक शरीर में स्थिति = बन्धन, पुरुष द्वारा कृत धर्म-अधर्म रूप कर्मों और उन कर्मों के संस्कारों के उस चित्त में उपस्थित होने के कारण होती है। उन कर्म बन्धनों की शिथिलता समाधिबल से होती है। यहाँ समाधि का अभिप्राय सम्प्रज्ञात समाधि और वह भी अस्मितानुगत सम्प्रज्ञात समाधि की उच्चावस्था से है; न कि असम्प्रज्ञात समाधि से। इसमें कारण यह है कि महर्षि व्यास ने योगसूत्र १.१ के भाष्य में सम्प्रज्ञात समाधि को कर्म बन्धनों को शिथिल करने वाला कहा है। इसी प्रकार चित्त के प्रचार = गति = गमन-आगमन का ज्ञान भी सम्प्रज्ञात समाधि के बल से ही होता है। इसको स्पष्ट करते हुए भोज ने इस प्रकार कहा है — चित्त का इन्द्रियों के माध्यम से विषयों में संचार हृदय में स्थित नाड़ी के माध्यम से होता है — कि यह नाड़ी शरीर के धातुओं और प्राण आदि के संचार = गमन-आगमन का कार्य न करती हुई विलक्षण है। उस नाड़ी के माध्यम से गति का ज्ञान होने से योगी दूसरे शरीर में प्रवेश की योग्यता को प्राप्त करता है।
इस प्रकार से कर्म के बन्धनों के शिथिल होने पर और चित्त की गति के मार्ग को जान लेने पर योगी अपने चित्त को वर्तमान में उपलब्ध अपने शरीर से निकालकर दूसरे के शरीर में प्रवेश कराने में समर्थ हो जाता है। चित्त सूक्ष्मशरीर का प्रधान अंग है, और इन्द्रियाँ = इन्द्रिय शक्तियाँ भी चित्त = मन में स्थित रहती हैं। अतः चित्त के पीछे-पीछे इन्द्रियाँ भी उस पर शरीर में प्रवेश करती हैं। इसमें महर्षि व्यास ने उदाहरण दिया है कि जैसे मधुमक्खियाँ, मधुकरराजा के उड़ने पर उसके पीछे उड़ती हैं और उसके छत्ते में प्रवेश करने पर पीछे उस छत्ते में प्रवेश भी कर जाती हैं; वैसे ही इन्द्रियाँ भी चित्त का अनुसरण करती हैं। संसार चक्र में लगा हुआ पुरुष = आत्मा सूक्ष्मशरीर से परिवेष्टित रहता है, अर्थात् आत्मा शरीरस्थ भौतिक चित्त में स्थित रहता है, अतः आत्मा = योगी पुरुष भी चित्त के साथ-साथ पर शरीर में प्रवेश करता है।
इस प्रकार से पर-शरीर में प्रवेश का भोज ने दूसरे मृत तथा जीवित दोनों प्रकार के शरीरों में माना है, परन्तु व्यासभाष्य में इसका कोई वर्णन नहीं है। भोज के अनुसार उस दूसरे शरीर में प्रवेश कर योगी उस शरीर से भी, अपने शरीर के समान ही, सभी व्यवहारों को करता है। ऐसे में यहाँ यह प्रश्न उपस्थित होता है कि दूसरे जीवित शरीर में प्रवेश करने पर उस शरीर में पूर्व स्थित आत्मा तथा उसके चित्त आदि की क्या स्थिति होती है, क्योंकि यह योगी उस शरीर से भी, अपने शरीर के समान, व्यवहार करने में समर्थ माना गया है ? क्या उस शरीर में पूर्व उपस्थित जीवात्मा, उस काल में गौण हो जाता है; या फिर उसका उस शरीर से वियोग हो जाता है ? और फिर योगी द्वारा उस दूसरे शरीर से अपने शरीर में लौटने के पश्चात् उस दूसरे शरीर के अधिपति जीवात्मा पुनः उस शरीर के उपभोग में समर्थ होने पर, उसके उस शरीर में रहते हुए दूसरे जीवात्मा अर्थात् योगी द्वारा किए गए कर्मों का उत्तरदायित्व लोक व्यवहार की दृष्टि से किस का होगा ? आदि-आदि प्रश्न उपस्थित होते हैं। दूसरे पक्ष में दूसरे मृत शरीर में योगी द्वारा प्रवेश करने पर इस प्रकार के प्रश्न उपस्थित नहीं होते।
सांख्यदर्शन के सूत्र ५.१२६-१२८ में अनुशयी प्रकरण का अर्थ करते हुए स्वामी ब्रह्ममुनि ने योगी द्वारा परशरीर प्रवेश को अनुशयन कहा है। इस विषय में सूत्र ५.१२६ की व्याख्या में वे लिखते हैं — “उस ऐसे परशरीर में आविष्ट अनुशयी योगी का, उस शरीर में होने वाला कर्म और भोग वहाँ नहीं होता, उस शरीर के कर्म और भोग में वह सम्पृक्त नहीं होता, वहाँ तो उसका योग कौतूहल प्रदर्शन ही है।” इसमें अनुशयी जीव के कर्म एवं भोग के न होने में सूत्रकाल महर्षि कपिल ने दो हेतु दिए हैं —
(१) न बुद्ध्यिादिनित्यत्वमाश्रयविशेषेऽपि वह्निवत्॥ सांख्य ५.१२६॥ उस दूसरे शरीर रूपी आश्रय में बुद्धि आदि का नित्य होना सम्भव नहीं, अर्थात् बुद्धि आदि कारण प्रकट रूप से सम्बन्धित न होकर अप्रकट = अनभिव्यक्त रूप से रहते हैं, अग्नि के समान; तथा
(२) आश्रयासिद्धेश्च॥ सांख्य ५.१२७॥ उस अनुशयी योगी का आश्रय रूप “परदेह” के असिद्ध = सदा के लिए आश्रय न होने से। इसमें अन्य कारण यह है कि उस दूसरे शरीर का अधिष्ठाता = स्वाभिमानी जीव वहाँ पहले से उपस्थित है। अतः महर्षि कपिल द्वारा प्रतिपादित सिद्धान्तानुसार उपर्युक्त प्रकार के प्रश्नों का अवसर उपस्थित नहीं होता।
यहाँ एक और प्रश्न उपस्थित होता है कि दूसरे के शरीर में प्रवेश करने पर योगी का वर्तमान स्थूल शरीर, सूक्ष्मशरीर और पुरुष के अभाव में मृत हो जायेगा तो क्या योगी वापिस अपने उस मृत शरीर में लौट कर आ सकेगा? क्योंकि शास्त्रकारों ने मृतक शरीर के पुनः जीवन धारण को कही नहीं माना है। इसी प्रकार क्या उस दूसरे मृतक शरीर को इस प्रकार से जीवित किया जा सकता है ? इस विषय में महर्षि दयानन्द सरस्वती ने सत्यार्थप्रकाश के तृतीय समुल्लास के अन्तर्गत — “किसी ने मृतक जिलाये .....” रूप मान्यता को असम्भव कहा है।
इस विषय में यह समाधान है कि किसी दूसरे मृतक शरीर को पुनः जीवित करने का प्रश्न तब उत्पन्न होगा जब कोई व्यक्ति अथवा योगी उस दूसरे शरीर में पूर्व स्थित आत्मा को पुनः शरीर में वापिस ला कर जीवित कर दे। यहाँ तो योगी स्वयं अपने चित्त और इन्द्रियों के साथ उस दूसरे शरीर में प्रवेश करता है न कि उस शरीर में पूर्व स्थित जीवात्मा को वापिस लाता है। इसी प्रकार वापिस अपने शरीर में योगी द्वारा लौटना भी किसी दूसरे व्यक्ति द्वारा नहीं कराया जा सकता, यह भी उस योगी की अपनी योगशक्ति के बल पर ही होता है। यजुर्वेद १७.७१ के भावार्थ में महर्षि दयानन्द द्वारा परशरीर प्रवेश को प्रतिपादित करने से, यह परशरीरावेश नामक सिद्धि, मृतक जिलाने की श्रेणी में नहीं मानी जा सकती।
इन प्रश्नों के कारण आर्यजगत् के कुछ भाष्यकारों ने “परशरीर प्रवेश का आशय दूसरे शरीर में न मानकर जन्मान्तर में दूसरे शरीर में प्रवेश माना जा सकता है” कहा है। तथा अन्यों ने इस परशरीरावेश की सिद्धि को या तो माना ही नहीं या फिर लक्षणा वृत्ति से इसका अर्थ किया है।
महर्षि व्यास ने इस सिद्धि का प्रतिपादन योगसूत्र ३.४३ के भाष्य में भी इस प्रकार से किया है — “यया परशरीराण्याविशन्ति योगिनः” अर्थात् जिससे योगी दूसरे शरीरों में प्रवेश करते हैं। इससे इस सिद्धि का प्रतिपादन स्पष्ट रूप से हुआ है।
इसी प्रकार यजुर्वेद १७.७१ के भावार्थ में महर्षि दयानन्द सरस्वती लिखते हैं —
“यो योगी तपादिसाधनैर्योगबलं प्राप्यासंख्यप्राणिशरीराणि प्रविश्यानेकनेत्रादिभिर-ङ्गैर्दर्शनादिकार्याणि कर्त्तुं शक्नोति। ...... ” अर्थात् जो योगी तप आदि साधनों से योगबल को प्राप्त करके असंख्य प्राणियों के शरीरों में प्रविष्ट होकर अनेक नेत्र आदि अङ्गों से दर्शन आदि कार्य कर सकता है। .........
यहाँ स्वामी जी ने स्पष्ट रूप से परशरीर प्रवेश की सिद्धि को माना है। इसी प्रकार स्वामी दयानन्द जी की जीवनी से यह सन्दर्भ देखें —
स्वामीजी मेरठ में ठहरे थे। उनसे मिलने कर्नल अलकाट और मैडम ब्लैवस्की आये। उन्होंने कहा कि “उन्हें और मैडम को इस बात में शङ्का है कि स्वामी शङ्कराचार्य ने अपने आत्मा को एक राजा के शरीर में, जो उसी दिन मरा था, प्रविष्ट करा दिया था। स्वामी जी ने कहा कि यह विचित्र बात है कि मैडम के समान योग प्रवीण व्यक्ति को इस विषय में सन्देह हो। फिर उन्होंने कहा कि मैं प्रथम कोटि का योगी नहीं हूँ, केवल मध्यम कोटि का हूँ, परन्तु मैं अपनी चेतना-शक्ति को शरीर के किसी भाग में केन्द्रित कर सकता हूँ, अर्थात् उस भाग को छोड़कर मेरे शरीर के अन्य सब भाग मृतवत् हो जाएँगे। यदि आप यह दृश्य देखना चाहें तो मैं आपको दिखा सकता हूँ। जब मैं मध्यम कोटि का योगी इतना कर सकता हूँ तो यह सम्भव है कि एक उच्च कोटि का योगी इससे एक पद आगे बढ़कर अपने आत्मा को दूसरे शरीर में प्रविष्ट कर सके।” (जीवनी - देवेन्द्रनाथ मुखोपाध्याय, पृष्ट ५३३-५३४)
कुछ विद्वान् उपरोक्त प्रकरण की सत्यता पर प्रश्नचिह्न लगा सकते हैं, परन्तु यजुर्वेद १७.७१ के भावार्थ में तो स्वामी जी ने स्पष्ट रूप से परशरीर प्रवेश को माना है। इसका लक्षणा वृत्ति द्वारा अर्थ कर, महर्षि पतञ्जलि, महर्षि व्यास और महर्षि दयानन्द सरस्वती, तीनों ऋषियों द्वारा प्रतिपादित मान्यता को सिद्धान्तविरुद्ध सिद्ध करना, उचित नहीं माना जा सकता। यदि हम स्वयं उस स्तर तक नहीं पहुँचे हैं, तो सिद्धि को अप्रमाणिक कहना और प्रचारित करना उचित नहीं। महर्षि दयानन्द ने तो उपरोक्त प्रकरण में स्वयं ही कहा है कि मैं अभी उस स्तर का योगी नहीं हूँ, परन्तु फिर भी अपनी चेतना को शरीर के एक केन्द्र स्थित कर सकता हूँ, और एक उच्च कोटि का योगी इससे एक पद आगे बढ़कर अपने आत्मा को दूसरे शरीर प्रवेश करा सकता है।
अतः वेदादि सत्यशास्त्रों के प्रमाणानुसार, योगी द्वारा परशरीर प्रवेश की सिद्धि को सम्भव जानना चाहिए।
हिंदी में टिप्पणी : मनसि हि सर्वे प्राणाः प्रतिष्ठिताः॥ शत० ७.५.२.६॥
मनो वै प्राणानामधिपतिर्मनसि हि सर्वे प्राणाः प्रतिष्ठिता॥ शत० १४.३.२.३॥
प्राणाः इन्द्रियाणि॥ ताण्डयमहाब्राह्मण २.१४.२॥
इनकी व्याख्या योगसूत्र ३.२७ में की गई है।