In Hindi:
पदपाठ : उदानजयात् जलपङ्ककण्टकादिषु असङ्गः उत्क्रान्तिः च॥
हिंदी में अर्थ : (उदानजयात्) संयम द्वारा उदान प्राण को जीतने पर योगी (जलपङ्ककण्टकादिषु) जल, पङ्क = कीचड़ और कण्टक आदि वाले स्थानों में (असङ्गः) सङ्ग रहित रहता है, (च) और (उत्क्रान्तिः) उसकी मृत्यु समय में उत्क्रान्ति = ऊर्ध्वगति होती है॥
व्यास भाष्य : समस्तेन्द्रियवृत्तिः प्राणादिलक्षणा जीवनम्। तस्य क्रिया पञ्चतयी। प्राणो मुखनासिकागतिराहृदयवृत्तिः। समं नयनात्समानश्चानाभिवृत्तिः। अपनयनादपान आपादतलवृत्तिः। उन्नयनादुदान आशिरोवृतिः। व्यापी व्यान इति। एषां प्रधानं प्राणः। उदानजयाज्जलपङ्ककण्टकादिष्वसङ्ग उत्क्रान्तिश्च प्रयाणकाले भवति। तां वशित्वेन प्रतिपद्यते॥
हिंदी में अर्थ : (समस्तेन्द्रियवृत्तिः) सभी इन्द्रियों की वृत्ति = व्यापार (प्राणादिलक्षणा) प्राण, अपान आदि लक्षणों वाली = प्राण आदि के आश्रय होने वाली, और वह वृत्ति (जीवनम्) जीवन है। (तस्य) उस प्राण की (क्रिया) क्रिया (पञ्चतयी) पाँच प्रकार की है। (मुखनासिकागतिः) मुख और नासिका द्वारा गति करने वाला (आहृदयवृत्तिः) हृदय पर्यन्त संचार करने वाला (प्राणः) प्राण कहा जाता है; (च) और (समम् नयनात्) खाये-पिए अन्न-रस को समान रूप से ले जाने वाला होने से (आनाभिवृत्तिः) हृदय से लेकर नाभि पर्यन्त रहने वाला (समानः) समान कहा जाता है; (अपनयनात्) मल-मूत्र आदि को नीचे की ओर ले जाने वाला होने से (आपादतलवृत्तिः) नाभि से लेकर पाद तल पर्यन्त रहने वाला (अपानः) अपान कहा जाता है; (उन्नयनात्) ऊपर की ओर ले जाने वाला होने से (आशिरोवृतिः) शिर पर्यन्त रहने वाला (उदानः) उदान कहा जाता है; (व्यापी इति) समस्त नाडि़यों में व्याप्त रहने वाला (व्यानः) व्यान कहा जाता है। (एषाम्) इन पाँच प्रकार के प्राणों में (प्राणः) प्राण (प्रधानम्) प्रधान है। (उदानजयात्) उदान प्राण में संयम द्वारा जय करने से योगी को (जलपङ्ककण्टकादिषु) जल, कीचड़ और कण्टकों में (असङ्गः) सङ्ग नहीं होता, (च) और उसकी (प्रायणकाले) मृत्यु के समय में (उत्क्रान्तिः) उत्क्रान्ति = ऊर्ध्वगति (भवति) होती है। (ताम्) उस ऊर्ध्वगति को (वशित्वेन) अपने अधीन (प्रतिपद्यते) कर लेता है॥
वैदिक योग मीमांसा : इस सूत्र में उदान प्राण में संयम द्वारा होने वाले जय का फल कहा है। शरीर की सभी इन्द्रियों के व्यापार = वृत्ति का आधार प्राण है। और यह प्राण पाँच प्रकार से विभक्त होकर शरीर का सञ्चालन करता है। महर्षि व्यास के अनुसार (१) प्राण — मुख नासिका से लेकर हृदय पर्यन्त कार्य करने वाला वाला है; (२) समान — हृदय से लेकर नाभि पर्यन्त रहने वाला और खाए-पिए अन्न-रस को समान रूप से ले जाने वाला है; (३) अपान — नाभि से लेकर पाद तल पर्यन्त रहने वाला, मल-मूत्र आदि को बाहर निकालने वाला है; (४) उदान — कण्ठ से शिर पर्यन्त रहने वाला, ऊर्ध्व गति कराने वाला है; तथा (५) व्यान — शरीर की नाडि़यों में व्याप्त रहने वाला है।
इन प्राणों का वर्णन प्रश्नोपनिषद् में भी किया गया है। प्रश्नोपनिषद् के तृतीय प्रश्न के उत्तर का देते हुए महर्षि पिप्पलाद कहते हैं —
पायुस्थानेऽपानं चक्षुःश्रोत्रे मुखनासिकाभ्यां प्राणः स्वयं प्रातिष्ठते मध्ये तु समानः। ..... प्र० ३.५॥
अर्थात् गुदा और उपस्थ में विष्टा-मूत्र आदि का त्याग करता हुआ अपान वायु स्थित रहता; मुख और नासिका द्वारा निकलता हुआ आँख और कान में प्राण स्वयं प्रतिष्ठित रहता; और इनके मध्य स्थान में समान वायु स्थित रहता है। आगे व्यान के बारे में कहते हैं —
हृदि ह्येष आत्मा। अत्रैतदेकशतं नाडीनां तासां शतंशतमेकैकस्यां द्वासप्ततिर्द्वासप्ततिः प्रतिशाखानाडी सहस्राणि भवन्त्यासु व्यानश्चरति॥ ३.६॥
अर्थात् हृदय में ही जीवात्मा का स्थान है। इसी हृदय में एक सौ एक नाड़ी हैं। उन सभी नाडि़यों मे से सौ-सौ नाडि़याँ निकलती हैं। उन शाखा नाडि़यों में से एक-एक के बहत्तर-बहत्तर हजार प्रतिशाखा नाडि़याँ होती हैं। इस सभी नाडि़यों, शाखा नाडि़यों और प्रतिशाखा नाडि़यों में व्यापक व्यान प्राण विचरता है। और आगे उदान के विषय में कहा है — अथैकयोर्ध्व उदानः॥ ३.७॥ अर्थात् उन एक सौ एक नाडि़यों में से एक नाड़ी में ऊर्ध्व गति करने वाला उदान है।
इस उदान प्राण में संयम से जय होने पर दो प्रकार के फलों की प्राप्ति होती है —
१. लौकिक फल — अर्थात् योगी जल, पङ्क = कीचड़ और कण्टकादि से असङ्ग अर्थात् सम्बन्ध रहित रहता है। इस का अभिप्राय यह लिया जाता है कि ऊर्ध्व गति करने वाले प्राण में संयम के बल से, योगी का शरीर इतना हलका हो जाता है कि वह जल में डूबता नहीं, कीचड़ में धंसता नहीं और कण्टक आदि से बिधता नहीं। भोज ने इससे भी आगे बढ़कर कहा है कि ऐसा योगी महानदी, विस्तृत कीचड़ और तीक्ष्ण काँटों में भी सम्बन्ध रहित रहता है अर्थात् अत्यन्त हलका होकर इन पर बिना किसी बाधा के गति कर सकता है।
वेद में उदान से बल प्राप्ति का वर्णन मिलता है —
धा॒न्यम᳖सि धिनु॒हि दे॒वान् प्रा॒णाय॑ त्वोदा॒नाय॑ त्वा व्या॒नाय॑ त्वा। (यजु॰ १.२०)
इस मन्त्र में उदानाय का अर्थ महर्षि दयानन्द सरस्वती ने स्फूर्त्तिहेतव ऊर्ध्वमन्यते चेष्ट्यते येन तस्मै उत्क्रमणपराक्रमहेतवे किया है। मंत्र के इस पाद का अर्थ इस प्रकार से है —
अर्थात् — जो यज्ञ से शुद्ध किया हुआ अन्न और जल है वह विद्वान् लोगों और इन्द्रियों को तृप्त करता है। इसलिए जैसे मैं उस अन्न, जल को (प्राणाय) प्राण = जीवन धारण के निमित्त बल के लिए और उसे (उदानाय) उदान = स्फूर्त्ति हेतु तथा उत्क्रमण एवं पराक्रम के लिए ........ धारण करता हूँ।
यहाँ उदान के लिए अर्थात् शरीरिक स्फूर्त्ति तथा पराक्रम की प्राप्ति तथा उत्क्रमण दोनों को महर्षि दयानन्द ने माना है। इसी प्रकार यजुर्वेद २२.३३ में प्राण, अपान, व्यान, उदान और समान का वर्णन आया है। वहाँ “उदानो यज्ञेन कल्पताᳬ स्वाहा” का अर्थ करते हुए महर्षि दयानन्द लिखते हैं —
(उदानः) उदानिति बलयति येन सः (यज्ञेन) योगाभ्यासादिना (कल्पताम्) समर्प्पयतु (स्वाहा) सत्क्रियाया। ...... अर्थात् बल देने वाला उदान यज्ञक्रिया एवं योगाभ्यास आदि के साथ समर्पित हो।
इसी प्रकार यजु॰ १३.१९ के पदार्थ में उदानाय का अर्थ “उत्कृष्टाय बलाय” = उत्कृष्ट बल के लिए किया है। उपरोक्त प्रमाणों से स्पष्ट है कि योगाभ्यास द्वारा उदान जय से योगी के शरीर में स्फूर्त्ति, उत्कृष्ट बल, पराक्रम आदि की प्राप्ति मानी है। इसी स्फूर्त्ति, बल, पराक्रम के आधार पर ही उपरोक्त सिद्धि के लौकिक फल = जल, कीचड़, कण्टकादि से असङ्गता को जानना और समझना चाहिए। देखो, वर्तमाल काल में तथाकथित धार्मिक अनुष्ठान, ईष्ट देवता के प्रति निष्ठा / विश्वास प्रकट करते हुए, अथवा किसी लौकिक मनोकामना की प्राप्ति हेतु लोग, बिना किसी योगसाधना के, पैरों में औषधीय लेप लगाकर , जलते हुए अंगारों पर चलते हुए देखे जाते हैं और किसी विशेष प्रकार की हानि भी नहीं होती। यहाँ अंगारों से बहुत अंशों तक असंगता बनी रहती है। इसी प्रकार से विशेष बल, पराक्रम, स्फूर्ति से भी उपर्युक्त प्रकार की असंगता सम्भव होती है।
यदि महर्षि व्यास और भोज के कथनानुसार योगी को जल, कीचड़ और कण्टकादि से असङ्गता का तात्पर्य यह हो कि योगी ऊर्ध्व गति होकर इन पर चलता हुआ भी इनसे सम्बन्धित नहीं होता तो इसका तात्पर्य हुआ कि वह इन पदार्थों को स्पर्श न करता हुआ चलता है। ऐसा मानना योगसूत्र ३.४२ के अनुसार आकाशगमन की समकक्षता हुई। और यदि ऐसा माना जाए कि योगी का शरीर रुई आदि के समान हलका हो जाता है कि जिससे कि योगी इन पर चलता हुआ भी डूबता / बिधता नहीं है तो यह शरीर में लघिमा नामक सिद्धि हुई जिसका प्रतिपादन योगसूत्र ३.४५ में किया गया है। इस प्रकार की शारीरिक योग्यता, किसी नई सिद्धि के रूप में सिद्ध नहीं हो पाती। ऐसा प्रतीत होता है कि भोज ने योगसूत्र ३.४२ अथवा ३.४५ तथा ३.३९ की सिद्धियों का मिश्रण सा कर दिया है। यदि महर्षि पतञ्जलि और महर्षि व्यास का यही तात्पर्य होता जो पृथक् रूप से इस सिद्धि से लौकिक फल का प्रतिपादन न करते हुए केवल पारलौकिक फल को अर्थात् मरण समय में उत्क्रमण को ही कहते। अतः उदान जय से हुए शारीरिक स्फूर्त्ति, बल, पराक्रम आदि की प्राप्ति से समन्वय करते हुए लौकिक फल को समझना चाहिए।
२. पारलौकिक फल — मरण काल में योगी की ऊर्ध्वगति होती है। इस पर शास्त्रकार एक मत हैं। महर्षि दयानन्द ने यजु॰ १.२० में उदान से उत्क्रमण को कहा है। प्रश्नोपनिषद् के तृतीय प्रश्न के उत्तर में महर्षि पिप्पलाद स्पष्ट रूप से कहते हैं —
अथैकयोर्ध्व उदानः पुण्येन पुण्यं लोकं नयति॥ ३.७॥
अर्थात् यह उदान नाम का प्राण, जो प्रश्नो॰ ३.६ में १०१ नाड़ी कही गई हैं, उनमें सौ से ऊपर जो एक सुषुम्णा नामक नाड़ी है उसके साथ नाभि से ऊपर से उठता हुआ पुण्य कर्म से जीवात्मा को पुण्य लोक को प्राप्त कराता है। इसी प्रकार प्रश्नोपनिषद् ४.४ में उदान से सुषुप्ति अवस्था में ब्रह्मप्राप्ति का वर्णन है। इसी सुषुम्णा नाड़ी में स्थित उदान प्राण से ऊर्ध्व गति को कठोपनिषद् में भी कहा है —
शतं चैका च हृदयस्य नाड्यस्तासाम्मूर्द्धानमभिनिः सृतैका।
तयोर्ध्वमायन्नमृतत्वमेति विष्वङ्ङन्या उत्क्रमणे भवन्ति॥ कठो॰ ६.१६॥
अर्थात् हृदय में ठहरने वाली सौ और एक नाडि़याँ हैं, उनमें से एक सुषुम्णा नाड़ी हृदय से चलके ब्रह्मरन्ध्र में जाकर निकली हुई है, उस नाड़ी के साथ शरीर के ऊर्ध्व देश ब्रह्मरन्ध्र से मरण समय में निकलता हुआ योगी पुरुष मोक्षपद को प्राप्त करता है। और उस नाड़ी से दूसरी सौ नाडि़यों विपरीत फल देने वाली अर्थात् नाना प्रकार के शरीर धारण की हेतु होती हैं अर्थात् अन्य नाड़ी द्वारा निकलने से प्राणी संसारचक्र में ही घूमता रहता है।
इसी सुषुम्णा नामक नाड़ी में उदान वायु विचरता हे। अतः उदान जय से इस नाड़ी द्वारा उत्क्रमण = ऊर्ध्वगति ऋषियों द्वारा प्रतिपादित है।