Donation Appeal Download Our App
Vibhuti Paada / Attainments / 40
Choose Sutra
Vibhuti Paada / Attainments / 40

समानजयाज्ज्वलनम्॥४०॥

Padas Name : Vibhuti Paada / Attainments | Sutra No : 40

In Hindi:

पदपाठ : समानजयात् ज्वलनम्॥

हिंदी में अर्थ : (समानजयात्) संयम द्वारा समान प्राण को जीतने पर योगी (ज्वलनम्) तेज को प्राप्त करता है = उसके शरीर में तेजस्विता आ जाती है॥

व्यास भाष्य : जितसमानस्तेजस उपध्मानं कृत्वा ज्वलति॥

हिंदी में अर्थ : (जितसमानः) संयम द्वारा समान प्राण को जीतने वाला योगी (तेजसः) तेज को (उपध्मानम् कृत्वा) उद्दीप्त = उद्भूत करके (ज्वलति) शरीर से तेजस्वी = दीप्तिमान हो जाता है॥

वैदिक योग मीमांसा : इस सूत्र में समान प्राण में संयम द्वारा जय होने के फल को कहा है। समान प्राण हृदय से नाभि पर्यन्त रहने वाला है जो शरीर में खाए-पिए अन्न-जल के रस को समान रूप से ले जाता है। इसी को प्रश्नोपनिषद् के ऋषि पिप्पलाद ने इस प्रकार कहा है —

मध्ये तु समानः। एष ह्येतद्धुतमन्नं समन्नयति तस्मादेताः सप्तार्चिषो भवन्ति॥ ३.५॥

अर्थात् प्राण और अपान के मध्य में रहने वाला समान प्राण है। यह समान प्राण ही इस खाए हुए अन्न को पचाता हुआ रसादि को निकालकर सभी धातुओं को ठीक-ठीक अवस्थित करता है। उस पचे हुए रसादि धातु रूप अन्न से सात ऋषि (शिर में स्थित दो आँख, दो नाक, दो कान और एक मुख) समर्थ होते हैं।

इसी प्रकार “समानो यज्ञेन कल्पताᳬ स्वाहा” यजु॰ २२.३३ का पदार्थ करते हुए महर्षि दयानन्द लिखते हैं — (अन्न के) रस को समान करने वाला “समान” प्राण यज्ञ-क्रिया एवं योगाभ्यास आदि के साथ समर्पित हो।

इस प्रकार हम देखते हैं कि समान प्राण अन्न-रस को समस्त शरीर में समान रूप से पहुँचाता है। यदि अन्न-रस का सम्यक् विभाग होकर शरीर के कुछ अंगों में पहुँचे और कुछ अंगों में न पहुँचे, तो शरीर के ऐसे अंग-विशेष निर्बल = दीप्तिहीन हो जाते हैं। इस कार्य में प्राण ही अग्नि रूप होता और इसके बिना शरीर का सम्यक् रूप से स्थित रहना भी सम्भव नहीं हो पाता। भोज के अनुसार समान प्राण जाठराग्नि को आवेष्टित किए हुए है, और यदि जाठराग्नि अपना कार्य सम्यक् रूप से नहीं करती तो शरीर की पुष्टि होना सम्भव नहीं होता। इस प्रकार समान प्राण ही, जाठराग्नि को सम्यक् रूप से संचालित कर, शरीर में तेजस्विता को लाने वाला होता है। अतः योगी समान प्राण के इस दिव्य = तेजस्विता वाले गुण को जानता हुआ उसमें संयम द्वारा उसे जय करता हुआ शरीर में तेजस्विता = दीप्ति को प्राप्त करने में समर्थ हो जाता है।