Donation Appeal Download Our App
Vibhuti Paada / Attainments / 5
Choose Sutra
Vibhuti Paada / Attainments / 5

तज्जयात् प्रज्ञालोकः॥५॥

Padas Name : Vibhuti Paada / Attainments | Sutra No : 5

In Hindi:

पदपाठ : तत् जयात् प्रज्ञालोकः॥

हिंदी में अर्थ : (तत्) उस संयम के (जयात्) जय से (प्रज्ञालोकः) योगी को समाधिप्रज्ञा का आलोक = प्रकाश प्राप्त होता है॥

व्यास भाष्य : तस्य संयमस्य जयात्समाधिप्रज्ञाया भवत्यालोको यथा यथा संयमः स्थिरपदो भवति तथा तथा समाधिप्रज्ञा विशारदी भवति॥

हिंदी में अर्थ : (तस्य) उस (संयमस्य) संयम के (जयात्) जय से = सम्यक् अभ्यास द्वारा परिपक्व होने से (समाधिप्रज्ञायाः) समाधिजन्य प्रज्ञा = बुद्धि का (आलोकः) आलोक = प्रकाश (भवति) हो जाता है। (यथा यथा) जैसे-जैसे (संयमः) संयम = धारणा, ध्यान, समाधि (स्थिरपदः) स्थिरपद = सम्यक् रूप से अभ्यस्त (भवति) होता है (तथा तथा) वैसे-वैसे (समाधिप्रज्ञाः) समाधि जन्य प्रज्ञा (विशारदी) अत्यन्त निर्मल एवं सूक्ष्म विषयों को ग्रहण करने वाली (भवति) होती जाती है॥

वैदिक योग मीमांसा : साधक द्वारा धारणा-ध्यान-समाधि रूपी संयम का सम्यक् अभ्यास करने से उसे समाधिप्रज्ञा की प्राप्ति होती है। उसकी बुद्धि में ध्येय पदार्थ = विषय के साथ तद्रूपता होने से उत्कृष्ट प्रज्ञा अर्थात् विवेकख्याति तक की प्राप्ति होती है। ऐसे साधक की बुद्धि सभी प्रकार के विपर्ययों से रहित होकर ध्येय पदार्थ और विषय का सम्यक् = यथार्थ रूप से ज्ञान कराती है।

योगसूत्र १.४८ में महर्षि पतञ्जलि ने स्पष्ट रूप से कहा है कि निर्विचार समाधि की परिपक्वता होने पर योगी की प्रज्ञा = बुद्धि ऋतम्भरा अर्थात् ऋत् = सत्य को धारण करने वाली होती है। इसी तथ्य को यहाँ इस सूत्र के भाष्य में भी कहा जा रहा है। जैसे-जैसे साधक की संयम की योग्यता = प्रवीणता बढ़ती जाती है, वैसे-वैसे उसकी समाधि जन्य प्रज्ञा विशारदी होती जाती है। ऐसे साधक की बुद्धि अत्यन्त निर्मल होकर पदार्थों के अतीत, वर्त्तमान और अनागत लक्षण परिणामों एवं अवस्था परिणामों को जानने वाली; स्थूल-सूक्ष्म, परोक्ष विषयों को जानने वाली होती है।

इस प्रकार साधक विभिन्न विषयों में संयम करता हुआ उन-उन विषयों का न केवल यथार्थ ज्ञान प्राप्त करता है, किन्तु उन विषयों में संयम से होने वाली सिद्धियों को भी प्राप्त करता है। इस प्रकार से प्राप्त होने वाली समाधिप्रज्ञा साधक को स्वयं ही प्राप्त नहीं हो जाती, किन्तु ईश्वर की व्यवस्था में ही उसे उसके पूर्ण पुरुषार्थ के उपरान्त, उसकी योग्यता के अनुसार ही, प्राप्त होती है। क्योंकि ईश्वर ही अनन्त, निरतिशय ज्ञान का स्रोत है, और ब्रह्माण्ड में सभी प्रकार के, सिद्धान्त और कार्य रूप से उपलब्ध, ज्ञान का कारण ईश्वर ही है। अतः संयम = धारणा-ध्यान-समाधि के सम्यक् अभ्यास के फलस्वरूप समाधिप्रज्ञा रूपी आलोक की प्राप्ति में भी, ईश्वर की व्यवस्था ही कार्य कर रही है। इस प्रकार संयम जय से प्राप्त होने वाली समाधिप्रज्ञा में संयम रूपी कर्म को दृष्टजन्मवेदनीय नियतविपाक वाला कर्म जानना चाहिए जिसका फल ईश्वर द्वारा साधक को वर्त्तमान जन्म में तत्काल ही मिलता है।

साधक को यह जानना चाहिए कि धारणा-ध्यान-समाधि के अभ्यास के साथ पूर्व के अङ्गों यम-नियम आदि का पालन भी अनिवार्य है। इस भाष्य में यह पहले भी स्पष्ट किया गया है कि इस प्रकार के समाधि-जन्य ज्ञान की प्राप्ति से पूर्व वेदादि सत्यशास्त्रों में प्रदत्त उस-उस विषय के शाब्दिक ज्ञान की प्राप्ति अनिवार्य है। अतः स्वाध्याय रूपी नियम के पालन के बिना, मात्र संयम के अभ्यास से, इष्ट प्रज्ञालोक की प्राप्ति सम्भव नहीं हो पायेगी।