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Vibhuti Paada / Attainments / 41
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Vibhuti Paada / Attainments / 41

श्रोत्राकाशयोः सम्बन्धसंयमाद्दिव्यं श्रोत्रम्॥४१॥

Padas Name : Vibhuti Paada / Attainments | Sutra No : 41

In Hindi:

पदपाठ : श्रोत्राकाशयोः सम्बन्धसंयमात् दिव्यम् श्रोत्रम्॥

हिंदी में अर्थ : (श्रोत्राकाशयोः) श्रोत्र और आकाश के (सम्बन्धसंयमात्) सम्बन्ध में संयम करने से, योगी का (श्रोत्रम्) श्रोत्र (दिव्यम्) दिव्य हो जाता है = सूक्ष्म शब्दों को ग्रहण करने वाला हो जाता है॥

व्यास भाष्य : सर्वश्रोत्राणामाकाशं प्रतिष्ठा सर्वशब्दानां च। यथोक्तम् — तुल्यदेशश्रवणानामेकदेशश्रुतित्वं सर्वेषां भवतीति। तच्चैतदाकाशस्य लिङ्गम्। अनावरणं चोक्तम्। तथाऽमूर्त्तस्यानावरणदर्शनाद्विभुत्वमपि प्रख्यातमाकाशस्य। शब्दग्रहणानुमितं श्रोत्रम्। बधिराबधिरयोरेकः शब्दं गृह्णात्यपरो न गृह्णातीति। तस्माच्छ्रोत्रमेव शब्दविषयम्। श्रोत्राकाशयोः सम्बन्धे कृतसंयमस्य योगिनो दिव्यं श्रोत्रं प्रवर्त्तते॥

हिंदी में अर्थ : (सर्वश्रोत्राणाम्) सभी श्रोत्रेन्द्रियों का (प्रतिष्ठा) आधार (च) और (सर्वशब्दानाम्) सभी शब्दों का आधार (आकाशम्) आकाश है। (यथा उक्तम्) जैसा कि कहा है — (तुल्यदेशश्रवणानाम्) समान देश = स्थान में स्थित श्रोत्रेन्द्रिय वाले (सर्वेषाम्) सभी पुरुषों को (एकदेशश्रुतित्वम्) एक स्थान (=आकाश) वाले शब्दों का श्रवण (भवति इति) होता है। (च) और (तत्) वह (एतत्) एक देश = स्थान के शब्दों का सुनायी पड़ना (आकाशस्य) आकाश का (लिङ्गम्) ज्ञापक चिह्न है। (च) और (अनावरणम् उक्तम्) आवरण रहित होना भी आकाश का चिह्न है। (तथा) इसी प्रकार (अमूर्त्तस्य) अमूर्त = मूर्तिरहित आकाश के (अनावरणदर्शनात्) अनावरण = आवरण रहित दीखने से (आकाशस्य) आकाश का (विभुत्वम्) विभुत्व = व्यापकत्व (अपि) भी (प्रख्यातम्) प्रसिद्ध है।

(शब्दग्रहणानुमित्तम् श्रोत्रम्) शब्दों के ग्रहण में श्रोत्रन्द्रिय का अनुमान होता है। (बधिराबधिरयोः) बधिर = बहरा और अबधिर = जो बहरा नहीं, में से (एकः) एक जो बहरा नहीं है, वह (शब्दम् गृह्णाति) शब्द को सुनता है, (अपरः) दूसरा, जो बहरा है, वह (न) नहीं (गृह्णाति इति) सुन पाता। (तस्मात्) इसलिए (श्रोत्रम्) श्रोत्रेन्द्रिय (एव) ही (शब्दविषयम्) शब्द को विषय बनाने वाली इन्द्रिय है।

(श्रोत्राकाशयोः) श्रोत्र और आकाश के (सम्बन्धे) सम्बन्ध में (कृतसंयमस्य) संयम करने वाले (योगिनः) योगी का (श्रोत्रम्) श्रोत्र (दिव्यम्) दिव्य = सूक्ष्म शब्दों को ग्रहण करने वाला (प्रवर्त्तते) हो जाता है॥

वैदिक योग मीमांसा : इस सूत्र में श्रोत्रेन्द्रिय और आकाश के सम्बन्ध में संयम करने से दिव्य श्रोत्र सिद्धि को कहा है। महर्षि व्यास कहते हैं कि सभी श्रोत्रेन्द्रियों और सभी शब्दों का आधार आकाश है। एक देश में स्थित सभी अबधिर पुरुषों को उस स्थान वाले शब्दों का श्रवण होता है। दूसरी ओर जो बधिर = बहरा है उसको वे शब्द सुनायी नहीं पड़ते।

पुनः शब्दों का आधार आकाश, आवरण रहित होने से व्यापक कहा गया है। महर्षि कणाद ने वैशेषिक दर्शन में आकाश को सत्ता = भाव से एक तत्त्व कहा है अर्थात् आकाश एक व्यक्तिरूप पदार्थ है और इसमें होने वाले घटाकाश आदि व्यवहार औपचारिक ही हैं। आकाश का गुण शब्द कहा गया है। इस आकाश का शब्द गुण समान रूप से और सर्वत्र एकमात्र लिङ्ग उपलब्ध होता है और इसी आधार पर भी आकाश का एकत्व प्रमाणित होता है।

इस व्यापक एवं एक पदार्थ रूप आकाश और श्रोत्रेन्द्रिय के सम्बन्ध में संयम करने से योगी को दिव्य श्रोत्र की प्राप्ति होती है अर्थात् वह योगी दिव्य = सूक्ष्म, व्यवहित और दूरस्थ शब्दों को ग्रहण करने में समर्थ होता है। ऋग्वेद ३.५५.९ के भावार्थ में महर्षि दयानन्द कहते हैं —“हे मनुष्यों! जो जगदीश्वर योगियों को वायु के वृद्ध दूत के सदृश दूर देश में वर्त्तमान समाचार वा पदार्थ को जनाता है। ...........” यह योगी द्वारा दिव्य श्रोत्र प्राप्ति का ही वर्णन है।

इस सिद्धि के आधार पर विभिन्न भाष्यकारों ने अन्य इन्द्रियों के सम्बन्ध में भी दिव्यता प्राप्ति को कहा है। यथा — त्वचा और वायु के सम्बन्ध में संयम करने से दिव्य त्वचा की प्राप्ति; नेत्र और अग्नि के सम्बन्ध में संयम करने से दिव्य नेत्र की प्राप्ति; रसना और जल के सम्बन्ध में संयम करने से दिव्य रसना की प्राप्ति; और घ्राण और पृथिवी के सम्बन्ध में संयम करने से दिव्य घ्राण की प्राप्ति को माना है। परन्तु इस प्रकार के प्रतिपादन में कोई शब्द प्रमाण उपलब्ध नहीं होता। न तो महर्षि पतञ्जलि, न महर्षि व्यास ने ऐसा कोई संकेत ही किया है, और न ही भोज ने भी इस सम्बन्ध में कुछ कहा है। इस श्रोत्र और आकाश के सम्बन्ध में संयम से होने वाले दिव्य श्रोत्र की प्राप्ति का प्रतिपादन करने हेतु ही, ऊपर वैशेषिक के आधार पर आकाश, श्रोत्र और शब्द के सम्बन्ध को कहा है। यहाँ यह जानना चाहिए कि श्रोत्रेन्द्रिय को आकाश रूप ही माना जाता है, परन्तु आकाश और श्रोत्र का उपादान-उपादेय भाव नहीं है। दूसरी ओर अन्य इन्द्रियों के सम्बन्ध में ऐसा नहीं है। दूसरी इन्द्रियों का जो-जो उपादान द्रव्य है, वह-वह इन्द्रिय उस-उस द्रव्य के विशेष गुण = असाधारण गुण को ग्रहण करती है यथा घ्राण — गन्ध को; चक्षु — रूप को; रसना — रस को; और त्वक् — स्पर्श को ग्रहण करती है। यहाँ यह भी जानना चाहिए कि अन्य इन्द्रियाँ अपने-अपने गन्धादि विषयों को वहीं ग्रहण करने में समर्थ होती है, जिस स्थिति में वे सन्निहित होते हैं, अन्यत्र नहीं। जबकि दूसरी ओर श्रोत्रेन्द्रिय शब्द के उत्त्पति स्थल से अन्यत्र स्थल में भी शब्दसन्तति द्वारा शब्द को ग्रहण करने में समर्थ होती है। उदाहरण के लिए किसी भी घट आदि द्रव्य का श्वेत, रक्त रूप, घट के स्थान में नेत्र द्वारा ग्रहण होगा; न कि वहाँ, जहाँ घट द्रव्य उपलब्ध नहीं होता; जबकि शब्द जहाँ उत्पन्न होता है, वहाँ से दूर भी पुरुषों को सुनायी पड़ता है। जैसे कि ढोल की आवाज, अथवा बादलों में हुआ गर्जन। इसमें व्यापक और एक तत्त्व रूप से सत्तावान् आकाश तत्त्व कारण है। इस प्रकार जो सम्बन्ध शब्द और आकाश के मध्य है, वह सम्बन्ध अन्य रूप, गन्धादि गुणों और तेज, पृथिवी आदि द्रव्यों में स्थापित नहीं किया जा सकता। अतः ऐसी मान्यता प्रत्यक्ष और शब्द प्रमाण से विरुद्ध है।

शंका — आपने योगसूत्र ३.३९ की व्याख्या में सिद्धियों की पुनरुक्ति का निषेध किया है। यहाँ इस सूत्र में श्रोत्र द्वारा दिव्य शब्द के ग्रहण की सिद्धि को पूर्व ३.३६ में श्रावण सिद्धि के रूप में कहा जा चुका है, अतः यह भी पुनरुक्ति हुई।

समाधान — योगसूत्र ३.३६ में कही गई प्रातिभ, श्रावण, वेदना आदि सिद्धियाँ योगी को स्वार्थसंयम से हुए पुरुष ज्ञान के अनन्तर स्वतः ही प्राप्त होती हैं, परन्तु इनकी प्राप्ति में संयम का कोई विषय पृथक् रूप से नहीं कहा गया। दूसरी ओर यहाँ शब्द और आकाश का जो विशिष्ट सम्बन्ध है, और श्रोत्रेन्द्रिय द्वारा जो शब्द को ग्रहण करने का विशिष्ट सामर्थ्य है, उस सामर्थ्य की विशेष रूप से प्राप्ति का अन्य साधन, इस सूत्र द्वारा कहा गया है; और इस प्रकार का कोई भी सम्बन्ध अन्य इन्द्रियों, उनके विषय तथा उपादान द्रव्यों में सिद्ध नहीं होता। इससे यह भी समझना चाहिए कि यह सिद्धि किसी योगी को, स्वार्थसंयम से पुरुष ज्ञान को प्राप्त किए बिना भी, श्रोत्रेन्द्रिय और आकाश के सम्बन्ध में संयम करने से भी प्राप्त हो सकती है।