In Hindi:
पदपाठ : कायाकाशयोः सम्बन्धसंयमात् लघुतूलसमापत्तेः च आकाशगमनम्॥
हिंदी में अर्थ : (कायाकाशयोः) शरीर और आकाश के (सम्बन्धसंयमात्) सम्बन्ध में संयम करने से (च) और (लघुतूलसमापत्तेः) लघु = हल्के तूल = रुई आदि पदार्थों में समापत्ति होने से (आकाशगमनम्) योगी को आकाशगमन सिद्धि की प्राप्ति होती है॥
व्यास भाष्य : यत्र कायस्तत्राकाशम्। तस्यावकाशदानात् कायस्य तेन संबन्धः प्राप्तिः। तत्र कृतसंयमो जित्वा तत्सम्बधं लघुषु वा तूलादिष्वापरमाणुभ्यः समापत्तिं लब्ध्वा जितसम्बन्धो लघुर्भवति। लघुत्वाच्च जले पादाभ्यां विहरति। ततस्तूर्णनाभितन्तुमात्रे विहृत्य रश्मिषु विहरति। ततो यथेष्टमाकाशगतिरस्य भवतीति॥
हिंदी में अर्थ : (यत्र) जहाँ (कायः) शरीर है, (तत्र) वहाँ (आकाशम्) आकाश है। आकाश द्वारा (तस्य कायस्य) उस शरीर को (अवकाशदानात्) अवकाश देने से (तेन) उस शरीर का आकाश से (सम्बन्धः) सम्बन्ध (प्राप्तिः) होता है। (तत्र) उस सम्बन्ध में (कृतसंयमः) संयम करने वाला योगी (तत् सम्बन्धम्) उस काया और आकाश के सम्बन्ध को (जित्वा) जीतकर (वा) और (तूलादिषु) रुई आदि (आपरमाणुभ्यः) परमाणु पर्यन्त (लघुषु) हल्के एवं सूक्ष्म पदार्थों में (समापत्तिम् लब्ध्वा) समापत्ति को प्राप्त करके (जितसम्बन्धः) उनके सम्बन्ध को जीत कर (लघुः भवति) लघु = हल्का हो जाता है। (च) और (लघुत्वात्) लघु = हल्का होकर (जले) जल पर (पादाभ्याम्) पैरों से (विहरति) चलता है। (ततः) तत्पश्चात् (तु) तो (ऊर्णनाभितन्तुमात्रे) मकड़ी के जाले के तन्तुओं में (विहृत्य) विचरण कर के (रश्मिषु) सूर्य की रश्मियों = किरणों में (विहरति) विचरण करता है। (ततः) उसके पश्चात् (यथेष्टम्) स्वेच्छा से (आकाशगतिः) आकाश में गति, (अस्य) इस योगी की, (भवति इति) होती है॥
वैदिक योग मीमांसा : इस सूत्र में आकाश गमन सिद्धि का प्रतिपादन किया गया है। काया का आकाश के साथ सम्बन्ध है। आकाश ही समस्त स्थूल और सूक्ष्म पदार्थों को अवकाश देता है; इसी प्रकार शरीर को भी स्थान प्रदान करता है। शरीर = काया की गति का आधार आकाश है। महर्षि पतञ्जलि कहते हैं कि इस आकाश और काया के सम्बन्ध में संयम करने से और लघु = रुई आदि हल्के पदार्थों में समापत्ति से योगी को आकाश गमन की सिद्धि प्राप्त होती है।
किसी मनुष्य के शरीर की गति अथवा स्थिति में उसका किसी ठोस आधार यथा पृथिवी आदि ग्रह से सम्पर्क का कारण उस पृथिवी आदि की जिस शक्ति के कारण होता है, उसे वेद में सूर्य एवं पृथिवी आदि ग्रहों-नक्षत्रों की आकर्षणशक्ति कहा है, जिसे आधुनिक वैज्ञानिकों ने पृथिवी की गुरुत्वाकर्षण शक्ति कहा है। यदि किसी स्थान पर गुरुत्वाकर्षण की शक्ति नहीं हो तो उस स्थान पर, शरीर भार शून्य हो जाने से, गति करने में शरीर को किसी ठोस आधार की आवश्यकता ही नहीं होगी और वह अन्तरिक्ष = आकाश में ऐसे चलेगा जैसे कि भूमि पर चल रहा हो। आधुनिक वैज्ञानिकों ने अन्तरिक्ष में जाकर, जहाँ गुरुत्वाकर्षण की शक्ति नहीं होती, वहाँ आकाश में चल कर इसे सिद्ध किया है। आधुनिक वैज्ञानिक शरीर में तो ऐसी किसी योग्यता को सिद्ध करने में समर्थ नहीं होते, परन्तु वे किसी भी क्षेत्र को उपकरण आदि द्वारा गुरुत्वाकर्षण रहित कर वहाँ ऐसा करने में समर्थ हैं।
इस योग्यता का वर्णन महर्षि पतञ्जलि और महर्षि व्यास इस सूत्र में कर रहे हैं। योगी पुरुष काया और आकाश के इस सम्बन्ध में संयम कर के और लघु = हल्के अर्थात् रुई से लेकर परमाणु पर्यन्त पदार्थों में समापत्ति = तदाकारिता को प्राप्त करता है। अर्थात् योगी इन लघु = हल्के पदार्थों के समान तदाकार होकर, उनके समान लघुता = हल्कापन प्राप्त करता है। यह योग्यता और कुछ नहीं वरन् पृथिवी आदि ग्रहों की गुरुत्वाकर्षण शक्ति को शून्यवत् करने के समान जाननी चाहिए। इस प्रकार से गुरुत्वाकर्षण शक्ति का प्रभाव न रहने से योगी का शरीर भार रहित हो जाता है और योगी पुरुष सर्वप्रथम जल पर चलता है; फिर मकड़ी के जाले के तन्तुओं पर भी चलने में समर्थ होता है; पुनः सूर्य की किरणों पर गति करता है; और इसी प्रकार अपनी इच्छानुसार आकाश में गति करने में समर्थ होता है। इसमें यह जानना चाहिए कि जहाँ आधुनिक वैज्ञानिक गुरुत्वाकर्षण की शक्ति को शून्य करने हेतु विभिन्न उपकरणों का आश्रय लेते हैं, वहाँ दूसरी ओर महर्षि पतञ्जलि इसे चित्तगत संयम द्वारा शरीरस्थ योग्यता के रूप में मानते हैं।
आधुनिक वैज्ञानिक एक अन्य गैस (हीलियम गैस) के प्रयोग द्वारा भूमि से ऊपर उठकर, बिना किसी सहारे के, गमनादि करने में समर्थ हैं। ऐसा प्रयोग इस आशय को बल देता है कि योगी द्वारा आकाशगमन सम्भव है। जब आधुनिक वैज्ञानिक पदार्थ विज्ञान द्वारा ऐसा कर सकते हैं, तो महर्षि पतञ्जलि द्वारा ऐसा प्रतिपादन करना असम्भव नहीं माना जा सकता।
वेद में आकाशगमन का वर्णन प्राप्त होता है। इसमें निम्न प्रमाण देखें —
पृ॒थि॒व्या ऽ अ॒हमुद॒न्तरि॑क्ष॒मारु॑हम॒न्तरिक्षा॒द्दिव॒मारु॑हम्।
दि॒वो नाक॑स्य पृ॒ष्ठात् स्व॒र्ज्योति॑रगाम॒हम्॥ यजु॰ १७.६७॥
अर्थात् हे मनुष्यों! जैसे योगाङ्गों के अनुष्ठान एवं संयम से सिद्ध योगी मैं पृथिवी से आकाश में आरोहण करूँ, आकाश से प्रकाशमान सूर्य में आरोहण करता हूँ; सुख के निमित्त प्रकाशमान द्युलोक के समीप से सुख और ज्ञान-प्रकाश को मैं प्राप्त करूँ, वैसे तुम भी करो॥ (महर्षि दयानन्द वेदभाष्य)
अयुक्त सूर एतशं पवमानो मनावधि। अन्तरिक्षेण यातवे॥ सामवेद १२१७॥
अर्थात् पवित्र करने वाले परमेश्वर ने अन्तरिक्ष द्वारा जाने-आने के लिए, मनन-निदिध्यासन करने वाले योगी में, योगशक्तिरूपी अश्व को योग साधना द्वारा जोता है, जैसे कि अन्तरिक्ष द्वारा आने-जाने के लिए उस ने मानो सूर्य में अश्व जोत रखा है॥ — यहाँ संयम द्वारा अन्तरिक्ष = आकाश गमन स्पष्ट रूप से प्रतिपादित है।
वायुमा रोह धर्मणा॥ सामवेद १२३५॥
अर्थात् हे उपासक योग के धारणा आदि साधनों द्वारा वायु अर्थात् अन्तरिक्ष में आरोहण आदि सिद्धियों को प्राप्त कर॥
स वायुमिन्द्र मश्विना साकं मदेन गच्छति। रणा यो अस्य धर्मणा ॥ सामवेद ११३४॥
अर्थात् जो उपासक इस परमेश्वर द्वारा प्रोक्त धर्म के सहारे रमण करता है, वह आनन्द विभोर हुआ- हुआ वायु, बिजुली, द्युलोक-पृथिवी लोक, सूर्य, चन्द्र, दिन रात में यथेच्छ विचरता है॥
वेद के इन प्रमाणों से स्पष्ट है कि योगी उपर्युक्त संयम और समापत्ति से आकाश गमन में समर्थ होता है।