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Vibhuti Paada / Attainments / 43
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Vibhuti Paada / Attainments / 43

बहिरकल्पिता वृत्तिर्महाविदेहा ततः प्रकाशावरणक्षयः॥४३॥

Padas Name : Vibhuti Paada / Attainments | Sutra No : 43

In Hindi:

पदपाठ : बहिः अकल्पिता वृत्तिः महाविदेहा ततः प्रकाशावरणक्षयः॥

हिंदी में अर्थ : (बहिः) शरीर से अतिरिक्त = पृथक्, (अकल्पिता) शरीर निरपेक्ष = शरीर-अहंकार से रहित जो (वृत्तिः) चित्त की वृत्ति है, वह (महाविदेहा) महाविदेहा है (ततः) उस से (प्रकाशावरणक्षयः) प्रकाश = ज्ञान के आवरण का क्षय = नाश होता है॥

व्यास भाष्य : शरीराद्बहिर्मनसो वृत्तिलाभो विदेहा नाम धारणा। सा यदि शरीरप्रतिष्ठस्य मनसो बहिर्वृत्तिमात्रेण भवति सा कल्पितेत्युच्यते। या तु शरीरनिरपेक्षा बहिर्भूतस्यैव मनसो बहिर्वृत्तिः सा खल्वकल्पिता। तत्र कल्पितया साधयन्त्यकल्पितां महाविदेहामिति। यया परशरीराण्याविशन्ति योगिनः। ततश्च धारणातः प्रकाशात्मनो बुद्धिसत्त्वस्य यदावरणं क्लेशकर्मविपाकत्रयं रजस्तमोमूलं तस्य च क्षयो भवति॥

हिंदी में अर्थ : (शरीरात्) शरीर से (बहिः) अतिरिक्त अर्थात् ओङ्कार और गायत्री आदि मन्त्रों में (मनसः) मन की (वृत्तिलाभः) वृत्ति का होना (विदेहा नाम धारणा) विदेहा नाम की धारणा कहलाती है। (सा) वह विदेहा धारणा (यदि) यदि (शरीरप्रतिष्ठस्य) शरीर में स्थित (मनसः) मन की (बहिः) बाह्यविषय में (वृत्तिमात्रेण) वृत्ति मात्र द्वारा (भवति) होती है, तो (सा) वह (कल्पिता) कल्पिता (इति उच्यते) कही जाती है; (या तु) और जो (शरीरनिरपेक्षा बहिर्भूतस्य) स्थूल शरीर की अपेक्षा से रहित = शरीर-अंहकार से रहित स्थित हुए (एव) ही (मनसः) मन की (बहिः) बाह्यविषय = ओङ्कार और गायत्री आदि मन्त्रों में (वृत्तिः) वृत्ति है (सा) वह (खलु अकल्पिता) अकल्पिता कही जाती है। (तत्र) उन दोनों प्रकार की वृत्तियों में से योगी (कल्पितया) कल्पिता के द्वारा (अकल्पिताम् महाविदेहाम्) अकल्पिता नामक महाविदेहा वृत्ति को (साधयन्ति इति) सिद्ध करते हैं, (यया) जिसके द्वारा (योगिनः) योगी (परशरीराणि) दूसरे शरीरों में (आविशन्ति) प्रवेश करते हैं।

(च) और (ततः धारणातः) उस महाविदेहा वृत्ति से (प्रकाशात्मनः) प्रकाशस्वरूप (बुद्धिसत्त्वस्य) बुद्धिसत्त्व का (यत्) जो (रजस्तमोमूलम्) रजोगुण और तमोगुण के कारण (क्लेशकर्मविपाकत्रयम्) क्लेश, कर्म और विपाक रूप तीन प्रकार का (आवरणम्) आवरण है (तस्य च क्षयः) उसका क्षय = नाश (भवति) होता है॥

वैदिक योग मीमांसा : इस सूत्र में प्रकाश = ज्ञान के आवरण के क्षय हेतु महाविदेहा वृत्ति का वर्णन किया गया है। महर्षि पतञ्जलि कहते हैं बहिः अकल्पिता वृत्ति महाविदेहा कहलाती है और बहिः शब्द की व्याख्या, महर्षि व्यास और भोज दोनों ने ही, शरीरात् बहिः की है। यहाँ बहिः और अकल्पिता का तात्पर्य निम्न प्रकार से समझना चाहिए—

शरीरात् बहिः — (सामान्य रूप से अर्थ इसका “शरीर से बाहर” किया जाता है। लगभग सभी भाष्यकारों ने इसी अर्थ को मानकर, योगी द्वारा शरीर से बाहर धारणा को कहा और माना है। इन्हीं भाष्यकारों ने योगसूत्र ३.१ की व्याख्या ने बाह्यदेशों में धारणा को स्वीकार किया है, अतः इन्हें इस प्रकार के अर्थ में कोई विसंगति प्रतीत नहीं होती। परन्तु इस प्रकार हुई महाविदेहा वृत्ति के परिणामस्वरूप प्रकाश के आवरण = क्लेश, कर्म आदि का क्षय होना, और शरीर से बाहर किसी पदार्थ विशेष में धारणा, इन दोनों का आपस में कोई सम्बन्ध नहीं है। अतः यह मान्यता दोषपूर्ण होने से इस सूत्र के अभिप्राय को स्पष्ट नहीं करती। योगसूत्र ३.१ की व्याख्या में हमने बाह्यविषय का अभिप्राय स्पष्ट रूप से प्रतिपादित किया है। उसी सन्दर्भ में ही इस सूत्र में कही गयी महाविदेहा वृत्ति को समझने पर इस सूत्र का वास्तविक रहस्य स्पष्ट होगा।)

बहिः का एक अर्थ कोषकारों ने “के अतिरिक्त” किया है; अतः शरीर से बहि का अर्थ है “शरीर से अतिरिक्त”। शरीर से अतिरिक्त बाह्यविषय क्या हैं ? इसको महर्षि दयानन्द ने योगसूत्र ३.१ के सन्दर्भ में कहा है — “बाह्यविषय जैसा कि ओङ्कार वा गायत्री मन्त्र इनमें चित्त लगावे। ...... बाह्यविषय में इनको ही लेना और कोई को नहीं। क्योंकि अन्य प्रमाण कोई नहीं।” (देखें योगसूत्र ३.१ पर महर्षि दयानन्द कृत अर्थ) अतः योगी जब इस प्रकार बाह्य विषय = ओङ्कार वा गायत्री मन्त्र आदि में धारणा करता है तो यह धारणा विदेहा धारणा कहलाती है। इस धारणा में योगी, शरीर के अभिमान से रहित न होता हुआ, वृत्तिमात्र से इस बाह्यविषय में धारणा करता है और यह धारणा शरीर-सापेक्ष = शरीर-अहंकार से युक्त होने से कल्पिता धारणा कही जाती है।

अकल्पिता — जब योगी शरीर निरपेक्ष अर्थात् शरीर-अहंकार से भी रहित होकर पूर्वोक्त प्रकार से बाह्यविषय में धारणा करता है तो वही धारणा अकल्पिता कहलाती है। शरीर-सापेक्ष और शरीर-निरपेक्ष को भोज ने स्पष्ट रूप से क्रमशः “शरीर-अहंकार से युक्त” और “शरीर-अहंकार से रहित” स्थिति कहा है।

योगी द्वारा कल्पिता वृत्ति = धारणा द्वारा अकल्पिता वृत्ति = धारणा का सम्पादन किया जाता है। अर्थात् योगी जब विलोमक्रम से, कार्य प्रकृति से कारण प्रकृति की ओर अग्रसर होता हुआ, अहंकार रूप कार्य को भी अपने मूल कारण बुद्धि = महत्तत्त्व में विलीन कर देता है, तो यह अवस्था अहंकार निवृत्ति की होती है। इस अवस्था में किसी भी प्रकार के अहंकार से रहित होता हुआ, उपरोक्त सत्त्वप्रधान चित्त की अवस्था द्वारा ओङ्कार, गायत्री आदि मन्त्रों में धारणा करता है, तो यह महाविदेहा वृत्ति कहलाती है। और इसी महाविदेहा वृत्ति द्वारा योगी चित्तस्थ प्रकाश के आवरण — अविद्यादि क्लेशों तथा शुभ-अशुभ-मिश्रित कर्मों का क्षय = नाश करने में समर्थ हो पाता है, इससे पूर्व की अन्य किसी स्थिति में नहीं।

यहाँ यह जानना चाहिए कि जब योगी शरीरनिरपेक्ष = शरीरअहंकार से रहित उक्त अवस्था में धारणा करने में समर्थ होता है, तो वह स्थूल भूतों से लेकर अहंकार तक के विकारों को महत्तत्त्व का विकार जानकर उनका परित्याग करता हुआ ही इस अवस्था को प्राप्त करता है, तो ऐसे में उसके लिए धारणा हेतु शरीर से बाहर किसी स्थूल आलम्बन को कहना और मानना, योगी की इस स्थिति के प्रति अनभिज्ञता मात्र ही है। महर्षि व्यास की व्याख्या को वास्तविक रूप से न समझने के कारण ही ऐसी भ्रान्ति हुई है।

महर्षि व्यास सूत्र के भाष्य में यह भी स्पष्ट कर रहे हैं कि परशरीर प्रवेश करने वाले योगी को इस अकल्पिता = शरीर-अहंकार रहित स्थिति का सम्पादन करना होता है, यदि उसकी धारणा शरीर-अहंकार युक्त होगी तो इस वर्त्तमान शरीर में बँधा रहने से, वह परशरीर प्रवेश में असमर्थ रहेगा; और इसी प्रकार यदि वह दूसरे शरीर में प्रवेश कर, उस शरीर के अहंकार से युक्त होगा तो वहाँ से पुनः अपने पूर्व शरीर में नहीं आ सकेगा। अतः परशरीर प्रवेश हेतु शरीर-अहंकार से रहित स्थिति का सम्पादन करना अत्यावश्यक है।

इस अकल्पिता वृत्ति = धारणा का फल प्रकाश के आवरण अविद्यादि क्लेशों का नाश कहा है, जो कि मात्र बाह्य स्थूल आलम्बनों से सम्भव नहीं होता। वेद में भी बुद्धि के प्रकाशावरण के क्षय हेतु परमात्मा के आलम्बन को ही कहा गया है—

यु॒क्त्वाय॑ सवि॒ता दे॒वान्त्स्व॑र्य्य॒तो धि॒या दिव॑म्।

बृ॒हज्ज्योतिः॑ करिष्य॒तः स॑वि॒ता प्रसु॑वाति॒ तान्॥ यजु॰ ११.३॥

अर्थात् योग के पदार्थों के ज्ञान का करने हारा जब परमात्मा में मन को युक्त करके बुद्धि से विद्या के प्रकाश को, सुख को प्राप्त कराने हारे महान् विज्ञान को जो करेंगे, उन दिव्य गुणों को उत्पन्न करने, उनको अन्य उत्पादक जन उत्पन्न करें॥ (महर्षि दयानन्द वेदभाष्य)

साकमुक्षो मर्जयन्त स्वसारो दश धीरस्य धीतयो धनुत्रीः।

हरिः पर्यद्रवज्जाः सूर्यस्य द्रोणं ननक्षे अत्यो न वाजी॥ साम० १४१८॥

अर्थात् ध्यानी उपासक की जब दश शक्तियाँ — पाँच ज्ञानेन्द्रियाँ और पाँच कर्मेन्द्रियाँ जब मार्जन विधि से शुद्ध हो जाती हैं तथा प्रणव रूपी धनुष की सहायता से सब का त्राण करने लगती हैं, और जब ये बहिनों के सदृश एक मत होकर प्रभु के प्रति अपने ज्ञानों और कर्मों को समर्पित करती हैं, तब आध्यात्मिक सूर्य का जन्मदाता क्लेशों को हरने वाला प्रभु परिद्रवित हो जाता है, और हृदय ग्रह में वेगवान् होकर प्रकट हो जाता है, जैसे कि वेगवान् अश्व उद्दिष्ट स्थान में शीघ्रता से पहुँच जाता है।

यहाँ यह स्पष्ट है कि क्लेशों का क्षय प्रभु की उपासना से ही सम्भव है, अन्य किसी धारणा के विषय अथवा आलम्बन से नहीं। इस सन्दर्भ में योगसूत्र १.३२ की व्याख्या को देखें जहाँ यह स्पष्ट रूप से प्रतिपादन किया है कि चित्त के विक्षेपों और विक्षेपसहभुवों का प्रतिषेध ईश्वर के आलम्बन से ही सम्भव है, अन्य किसी आलम्बन से नहीं। इसी प्रकार मुण्डकोपनिषद् में कहा है —

भिद्यते हृदयग्रन्थिश्छिद्यन्ते सर्वसंशया। क्षीयन्ते चास्य कर्माणि तस्मिन् दृष्टे परावरे॥ मुण्डक० २.२.८॥

पूर्व में ब्रह्मज्ञान का उपाय कहकर इस वचन में ब्रह्मज्ञानी के चिह्न कहते हैं — (तस्मिन्) उन इन्द्रियों से अग्राह्य (परावरे) इन्द्रियों और विषयों से पृथक् ब्रह्म के (दृष्टे) जिज्ञासु पुरुष द्वारा साक्षात् किए जाने पर (अस्य) इस ब्रह्मज्ञानी की (हृदयग्रन्थिः) हृदय में स्थित अविद्या = अज्ञान रूप गाँठ (भिद्यते) खुल जाती है (सर्व संशयाः) सभी संशय (छिद्यन्ते) छिन्न-भिन्न हो जाते (च) और (कर्माणि) शुभ-अशुभ-मिश्रित कर्म (क्षीयन्ते) नष्ट हो जाते हैं।

उपरोक्त विवरण से स्पष्ट है कि इस सूत्र में बहिः शब्द से होने वाली धारणा हेतु — “ओङ्कार और गायत्री आदि मन्त्र रूप” से ही शरीर से अतिरिक्त बाह्यविषय हैं, न कि शरीर से बाहर स्थित कोई अन्य स्थूल या सूक्ष्म विषय; क्योंकि ईश्वर से अतिरिक्त अन्य किसी आलम्बन से अविद्यादि क्लेशों, कर्मों तथा उनके फलों का क्षीण होना सम्भव नहीं है॥