In Hindi:
पदपाठ : स्थूलस्वरूपसूक्ष्मान्वयार्थवत्त्वसंयमात् भूतजयः॥
हिंदी में अर्थ : पृथिवी आदि पञ्च महाभूतों के (स्थूलस्वरूपसूक्ष्मान्वयार्थवत्त्वसंयमात्) स्थूल, स्वरूप, सूक्ष्म, अन्वय और अर्थवत्त्व में संयम करने से (भूतजयः) महाभूतों पर जय प्राप्त होती है॥
व्यास भाष्य : तत्र पार्थिवाद्याः शब्दादयो विशेषाः सहाकारादिभिर्धर्मैः स्थूलशब्देन परिभाषिताः। एतद्भूतानां प्रथमं रूपम्। द्वितीयं रूपं स्वसामान्यं मूर्त्तिर्भूमिः, स्नेहो जलं, बह्निरुष्णता, वायुः प्रणामी, सर्वतोगतिराकाश इत्येतत्स्वरूपशब्देनोच्यते। अस्य सामान्यस्य शब्दादयो विशेषाः। तथा चोक्तम्— एकजातिसमन्वितानामेषां धर्ममात्रव्यावृत्तिरिति। सामान्यविशेषसमुदायोऽत्र द्रव्यम्। द्विष्ठो हि समूहः प्रत्यस्तमितभेदावयवानुगतः शरीरं वृक्षो यूथं वनमिति। शब्देनोपात्तभेदावयवानुगतः समूहः उभये देवमनुष्याः। समूहस्य देवा एको भागो मनुष्या द्वितीयो भागः। ताभ्यामेवाभिधीयते समूहः। स च भेदाभेदविवक्षितः। आम्राणां वनं ब्राह्मणानां संघ आम्रवनं ब्राह्मणसंघ इति।
स पुनर्द्विविधो युतसिद्धावयवोऽयुतसिद्धावयवश्च। युतसिद्धावयवः समूहो वनं संघ इति। अयुतसिद्धावयवः संघातः शरीरं वृक्षः परमाणुरिति। अयुतसिद्धावयवभेदानुगतः समूहो द्रव्यमिति पतञ्जलिः। एतत्स्वरूपमित्युक्तम्।
अथ किमेषां सूक्ष्मरूपम्। तन्मात्रं भूतकारणं, तस्यैकोऽवयवः परमाणुः सामान्यविशेषात्माऽयुत- सिद्धावयवभेदानुगतः समुदाय इत्येवं सर्वतन्मात्राण्येतत्तृतीयम्। अथ भूतानां चतुर्थं रूपं ख्यातिक्रियास्थितिशीला गुणाः कार्यस्वभावानुपातिनोऽन्वयशब्देनोक्ताः। अथैषां पञ्चमं रूपमर्थवत्त्वम्। भोगापवर्गार्थता गुणेष्वेवान्वयिनि, गुणाः तन्मात्रभूतभौतिकेष्विति सर्वमर्थवत्। तेष्विदानीं भूतेषु पञ्चसु पञ्चरूपेषु संयमात्तस्य तस्य रूपस्य स्वरूपदर्शनं जयश्च प्रादुर्भवति। तत्र पञ्च भूतस्वरूपाणि जित्वा भूतजयी भवति। तज्जयाद्वत्सानुसारिण्य इव गावोऽस्य संकल्पानुविधायिन्यो भूतप्रकृतयो भवन्ति॥
हिंदी में अर्थ : (तत्र) उन पाँच रूपों में से (पार्थिवाद्याः) पृथिवी आदि महाभूतों में रहने वाले (आकारादिभिः धर्मैः) आकार आदि धर्मों के (सह) साथ (शब्दादयः विशेषाः) शब्दादि = शब्द, स्पर्श, रूप, रस, गन्ध इनके विशेष = भेद का ज्ञान कराने वाले धर्म (स्थूलशब्देन) स्थूल शब्द से (परिभाषिताः) परिभाषित हैं। (एतत्) यह (भूतानाम्) पञ्च महाभूतों का (प्रथमम् रूपम्) पहला रूप है। (स्वसामान्यम्) इन भूतों का अपना-अपना सामान्य धर्म (द्वितीयम् रूपम्) इनका द्वितीय रूप है, जैसे (मूर्त्तिः) पिण्डरूप (भूमिः) भूमि का सामान्य धर्म है, (स्नेहः जलम्) स्नेह = तरलता जल का सामान्य धर्म है, (बह्निः उष्णता) उष्णता = दाहकता अग्नि का सामान्य धर्म है, (वायुः प्रणामी) वहनशीलता वायु का सामान्य धर्म है, और (सर्वतः गतिः आकाशः) सर्वत्र व्यापक होना आकाश का सामान्य धर्म है। (इति एतत्) ये महाभूतों के सामान्य धर्म (स्वरूपशब्देन) स्वरूप शब्द से (उच्यते) कहे गये हैं। (अस्य सामान्यस्य) इन पृथिवी आदि भूतों के सामान्य के (शब्दादयः) शब्दादि (विशेषाः) विशेष = परस्पर भेद का ज्ञान कराने वाले धर्म हैं। (तथा च उक्तम्) और वैसा कहा भी है — (एकजातिसमन्वितानाम्) एक-एक जाति = सामान्य के अन्तर्गत रहने वाले (एषाम्) इन भूतों की (धर्ममात्रव्यावृत्तिः इति) अपने-अपने शब्दादि धर्ममात्र से भेद = पृथकता है। (अत्र) इस शास्त्र में (सामान्यविशेषसमुदायः) सामान्य और विशेष के समुदाय = समूह को (द्रव्यम्) द्रव्य कहा गया है। (द्विष्ठः हि समूहः) समूह दो प्रकार का होता है, उनमें (१) (प्रत्यस्तमितभेदावयवानुगतः) जिनका भेद = विभाग शब्दों से प्रकट नहीं होता, ऐसे अवयवों में अनुगत समूह, जैसे कि (शरीरम् वृक्षः यूथम् वनम् इति) शरीर, वृक्ष, यूथ = झुण्ड, वन आदि; (२) (शब्देनोपात्तभेदावयवानुगतः) जिनका भेद = विभाग शब्दों से प्रकट है, ऐसे अवयवों में अनुगत (समूहः) समूह जैसे कि (उभये देवमनुष्याः) देव और मनुष्यों का समूह। (समूहस्य) इस समूह का (देवाः एको भागः) देव एक भाग, और (मनुष्याः द्वितीयो भागः) मनुष्य दूसरा भाग हैं। (ताभ्याम् एव) उन दोनों अवयवों, देव और मनुष्य, से अनुगत (समूहः) समूह (अभिधीयते) कहा जाता है। (च) और (सः) वह समूह (भेदाभेदविवक्षितः) भेद और अभेद दो प्रकार की विवक्षा वाला है। जैसे (आम्राणाम् वनम्) आमों का वन, (ब्राह्मणानाम् संघम्) ब्राह्मणों का संघ, भेद की विवक्षा का उदाहरण हैं, (आम्रवनम्) आम्रवृक्ष रूपी वन = आम्रवन, और (ब्राह्मणसंघ इति) ब्राह्मण व्यक्ति रूपी संघ = ब्राह्मणसंघ, अभेद विवक्षा का उदाहरण है। (पुनः) और फिर (सः) वह समूह (द्विविधः) दो प्रकार का है (१) (युतसिद्धावयवः) पृथक् सिद्ध अवयवों वाला समूह, (च) और (२) (अयुतसिद्धावयवः) पृथक् न होने वाले = सम्मिलित अवयवों वाला समूह। उनमें (युतसिद्धावयवः समूहः) पृथक्-पृथक् अवयवों वाला समूह (वनम् संघः इति) वन और संघ हैं; और (अयुतसिद्धावयवः संघातः) सम्मिलित अवयवों वाला समूह (शरीरम् वृक्षः परमाणुः इति) शरीर, वृक्ष और परमाणु हैं। (अयुतसिद्धावयवभेदानुगतः समूहः) अयुतसिद्ध = अपृथक् = सम्मिलित अवयव भेदों में अनुगत = रहने वाला समूह (द्रव्यम्) द्रव्य है (इति) यह (पतञ्जलिः) महर्षि पतञ्ललि मानते हैं। (एतत्) यह पञ्च महाभूतों का (स्वरूपम्) स्वरूप (इति उक्तम्) कहा गया है।
(अथ) अब (एषाम्) इन महाभूतों का (सूक्ष्मरूपम् किम्) सूक्ष्म रूप क्या है? (भूतकारणम्) पञ्च महाभूतों का कारण (तन्मात्रम्) तन्मात्रा हैं। (तस्य) उसका (एकः) एक (अवयवः) अवयव (परमाणुः) परमाणु है, जो (सामान्यविशेषात्मा) सामान्य-विशेषात्मक और (अयुतसिद्धावयवभेदानुगतः) पृथक् न होने वाले अवयव भेदों में अनुगत रहने वाला (समुदायः इति) समुदाय = समूह है, (एवम्) इस प्रकार (सर्वतन्मात्राणि) सभी तन्मात्राएँ भी द्रव्य हैं; (एतत्) ये तन्मात्रा रूप सूक्ष्म द्रव्य ही (तृतीयम्) भूतों का “सूक्ष्म” नामक तीसरा रूप हैं।
(अथ) इसके पश्चात् (भूतानाम्) पञ्च महाभूतों का (चतुर्थम् रूपम्) चतुर्थ रूप (ख्यातिक्रियास्थितिशीलाः) ख्याति = प्रकाश, क्रिया, स्थिति स्वभाव वाले (कार्यस्वभावानुपातिनः) अपने कार्यों के स्वभाव में अनुगत रहने वाले (गुणाः) सत्त्व, रज और तम नामक तीन गुण ही (अन्वयशब्देन) “अन्वय” शब्द से (उक्ताः) कहे गए हैं।
(अथ) और अब (एषाम्) इन भूतों का (पञ्चमम् रूपम्) पाँचवाँ रूप (अर्थवत्त्वम्) अर्थवत्त्व है; अर्थात् (गुणेषु एव अन्वयिनी) सत्त्वादि गुणों में अनुगत = वर्त्तमान रहने वाली (भोगापवर्गार्थता) पुरुष के लिए भोग और अपवर्ग का सम्पादन करने की अर्थता = सार्थकता है। (गुणाः) सत्त्वादि गुण ही (तन्मात्रभूतभौतिकेषु) तन्मात्राओं, महाभूतों और भूतों से बने पदार्थों में अनुगत रहते हैं (इति) इस लिए (सर्वम् अर्थवत्) सभी तन्मात्रा, पञ्च महाभूत एवं उनके विकार पदार्थ आदि सार्थक हैं।
(इदानीम्) अब (तेषु पञ्चसु भूतेषु) उन पाँच महाभूतों में विद्यमान (पञ्चरूपेषु) पाँच रूपों में (संयमात्) संयम करने से (तस्य तस्य रूपस्य) उस-उस रूप का (स्वरूपदर्शनम्) स्वरूप साक्षात्कार (च) और (जयः) उन पर जय (प्रादुर्भवति) प्राप्त होती है। (तत्र) उनमें (पञ्च भूतस्वरूपाणि) भूतों के पाँच स्वरूपों को (जित्वा) जीतकर योगी (भूतजयी भवति) भूतजयी हो जाता है। (तत् जयात्) उस भूत जय से, (वत्सानुसारिण्यः) बछड़ों का अनुसरण करने वाली (गावः इव) गौवों के समान, (भूतप्रकृतयः) महाभूतों की प्रकृतियाँ (अस्य) इस योगी के (संकल्पानुविधायिन्यः) संकल्प के अनुसार कार्य करने वाली (भवन्ति) होती हैं॥
वैदिक योग मीमांसा : इस सूत्र में पृथिवी आदि महाभूतों के स्थूल, स्वरूप, सूक्ष्म, अन्वय और अर्थवत्त्व रूपों में संयम से होने वाली भूतजय सिद्धि का वर्णन है। सूत्र में पाँच महाभूतों के पाँचों रूपों में क्रमशः संयम को कहा है। वे पाँच रूप निम्न प्रकार से समझने चाहिए —
१. महाभूतों का स्थूल रूप — महर्षि व्यास ने स्थूल शब्द से महाभूतों के आकार आदि धर्मों के साथ शब्दादि विशेषों का ग्रहण किया है। पृथिवी आदि महाभूतों के आकार आदि धर्मों को वाचस्पति मिश्र और विज्ञानभिक्षु ने अपनी-अपनी व्याख्या में, किसी अनुपलब्ध ग्रन्थ से, उद्धृत किया है, जो निम्न प्रकार से हैं —
आकारो गौरवं रौक्ष्यं वरणं स्थैर्यमेव च।
वृत्तिर्भेदः क्षमा कार्ष्ण्यं काठिन्यं सर्वभोग्यता॥
(आकारः) अवयवों का सन्निवेश विशेष, (गौरवम्) भारीपन, (रौक्ष्यम्) रूखापन, (वरणम्) आच्छादन करना, (स्थैर्यम्) स्थिरता, (वृर्त्तिः) प्राणियों का आधार (भेदः) विदारण (क्षमा) सहनशीलता (काष्णर्यम्) कृष्णता (काठिन्यम्) कठिनता (च) और (सर्वभोग्यता एव) सभी प्राणियों का भोग सम्पादन, पृथिवी के धर्म हैं।
स्नेहः सौक्ष्म्यं प्रभा शौक्ल्यं मार्दवं गौरवं च तत्।
शैत्यं रक्षा पवित्रत्वं संसाधनं चौदका गुणाः॥
(स्नेहः) तरलता (सौक्ष्म्यम्) सूक्ष्मता (प्रभा) प्रभा (शौक्ल्यम्) शुक्लता (मार्दवम्) मृदुता (च) और (गौरवम्) भारीपन, (शैत्यम्) शीतता, (रक्षा) रक्षण (पवित्रत्वम्) पवित्रता (च) और (संसाधनम्) संमेलन (उदका गुणाः) ये दश धर्म जल के हैं।
ऊर्ध्वभाक् पाचकं दग्धृ पावकं लघु भास्वरम्।
प्रध्वंस्योजरिव वै तेजः पूर्वाभ्यां भिन्नलक्षणम्॥
(ऊर्ध्वभाक्) ऊर्ध्व गमनशीलता (पाचकम्) पाचकता (दग्धृ) दाहकता (पावकम्) पवित्रता (लघु) लघुता (भास्वरम्) प्रकाशकता (प्रध्वंसि) प्रध्वंसनशील (ओजस्वि) बलशीलता (वै) ही (पूर्वाभ्याम्) पूर्व के पृथिवी आदि से (भिन्नलक्षणम्) भिन्नलक्षण (तेजः) तेज के हैं।
तिर्यग्यानं पवित्रत्वमोक्षेपो नोदनं बलम्।
चलमच्छायता रौक्ष्यं वायोर्धर्माः पृथग्विधाः॥
(तिर्यग्यानम्) टेढ़ा चलना (पवित्रत्वम्) पवित्रता (आक्षेपः) गिराना (नोदनम्) कम्पन (बलम्) सामर्थ्य (चलम्) चञ्चलता (आच्छायता) आच्छादन का अभाव (रौक्ष्यम्) रूखापन (पृथग्विधाः) पूर्व के तीन से पृथक् (वायोः धर्माः) वायु के धर्म हैं।
सर्वतोगतिरव्यूहोऽविष्टम्भश्चेति ते त्रयः।
आकाशधर्मा व्याख्याताः पूर्वधर्मविलक्षणाः॥
(सर्वतःगतिः) व्यापकता (अव्यूहः) विभाग करना (च) और (अविष्टम्भः) अवकाश प्रदान (इति ते त्रयः) ये तीन (पूर्वधर्मविलक्षणाः) पूर्व के सभी भूतों से विलक्षण (आकाशधर्माः व्याख्याताः) आकाश के धर्म कहे गए हैं।
इन आकार आदि धर्मों के साथ शब्दादि जो इनके विशेष = भेद का ज्ञान कराने वाले धर्म भी स्थूल रूप कहलाते हैं। पृथिवी का गन्ध, जल का रस, अग्नि का रूप, वायु का स्पर्श और आकाश का शब्द रूप विशेष गुण, इन पाँच महाभूतों का भेदज्ञान कराते हैं। अर्थात् गन्ध पृथिवी का विशेष धर्म है, यह इसको छोड़कर अन्य भूतों में नहीं पाया जाता; इसी प्रकार रस जल का विशेष धर्म है, यह अग्नि, वायु और आकाश में नहीं पाया जाता; रूप अग्नि का विशेष धर्म है, जो वायु और आकाश में उपलब्ध नहीं होता; स्पर्श वायु का विशेष धर्म है, जो आकाश में उपलब्ध नहीं होता; और शब्द केवल आकाश का ही विशेष धर्म है। इस प्रकार आकार आदि धर्मों के साथ शब्दादि विशेष गुण इन पञ्च महाभूतों का स्थूल रूप है।
२. महाभूतों का स्वरूप रूप — पृथिवी आदि महाभूतों का जो अपना सामान्य रूप है, उसे “सामान्य” रूप से कहा गया है। इन सामान्य धर्मों को महर्षि व्यास ने निम्न प्रकार से कहा है — पृथिवी का सामान्य धर्म पिण्डरूप है; जल का सामान्य धर्म स्नेह = तरलता है; अग्नि का सामान्य धर्म उष्ण्ता = दाहकता है; वायु का सामान्य धर्म वहनशीलता है; और आकाश का सामान्य धर्म सर्वत्र व्यापक होना है। इनके सामान्य धर्म प्रत्येक महाभूत के सभी प्रकार के विकारों में समान रूप से उपलब्ध रहते हैं। इसी आधार पर ही इन सामान्य धर्मों का ”सामान्य” रूप कहा है जो कि संयम का विषय बनता है।
इस सन्दर्भ में द्रव्य के स्वरूप को स्पष्ट किया गया है। यहाँ सामान्यविशेष के समुदाय = समूह को द्रव्य कहा गया है। समूह दो प्रकार का होता है —
(१) ऐसे अवयवों का समूह जिनका भेद शब्दों से प्रकट नहीं होता, जैसे कि शरीर, वृक्ष, झुण्ड, वन आदि। इसमें शरीर को हस्त-पाद आदि समूह नहीं कहा जाता, इसी प्रकार अन्य विषय में भी जानना चाहिए;
(२) ऐसे अवयवों में रहने वाला समूह जिनका भेद शब्दों से प्रकट होता है, जैसे कि देव और मनुष्यों का समूह। इस समूह में देव और मनुष्यों का भेद स्पष्ट रूप से शब्दों से प्रकट होता है। यह समूह भेद विवक्षा और अभेद विवक्षा से दो प्रकार का है। इसमें भेद विवक्षा का उदाहरण है —आमों का वन, ब्राह्मणों का संघ। तथा अभेद विवक्षा का उदाहरण है — आम्रवन और ब्राह्मणसंघ।
अब यह समूह युतसिद्धावयव और अयुतसिद्धावयव भेद से भी दो प्रकार का है। युतसिद्धावयव समूह वह है जो पृथक्-पृथक् सिद्ध अवयवों का समूह है, जैसे कि वन, संघ आदि; तथा अयुतसिद्धावयव समूह वह है जो पृथक् न होने वाले अर्थात् सम्मिलित अवयवों वाला समूह है, जैसे कि शरीर, वृक्ष, परमाणु आदि। महर्षि पतञ्जलि अयुतसिद्ध अवयवभेदों में रहने वाले समूह को द्रव्य कहते हैं। और पञ्च महाभूतों का ऐसा मिला हुआ ही द्वितीय रूप है।
३. महाभूतों का सूक्ष्म रूप — पृथिवी आदि महाभूतों का कारण गन्धादि तन्मात्राएँ रूप सूक्ष्म द्रव्य हैं। इन, अंहकार रूपी अपने कारण का कार्य, तन्मात्राओं को भी परमाणु रूप से कहा गया है, जो कि सामान्यविशेषात्मक और अयुतसिद्ध अवयवों का समूह रूप होने से द्रव्य कहाती है। अतः ये तन्मात्रा रूप सूक्ष्म द्रव्य ही भूतों का सूक्ष्म रूप हैं।
४. महाभूतों का अन्वय रूप — पृथिवी आदि महाभूत प्रकृति के अन्तिम कार्य = विकार हैं। प्रकृति के सत्त्व, रज और तमोगुण, जो कि प्रकाश, प्रवृत्ति और स्थिति स्वभाव वाले हैं, ही अपने कार्यों में अनुगत = उपस्थित रहते हैं। ये तीनों गुण ही इन महाभूतों के “अन्वय” रूप कहाते हैं।
५. महाभूतों का अर्थवत्त्व रूप — पृथिवी आदि महाभूतों की अर्थवत्त्वता = प्रयोजनता वही है, जो इनके मूल उपादान कारण सत्त्वादि गुणों का प्रयोजन है। प्रकृति का प्रयोजन पुरुष के भोग और अपवर्ग को सिद्ध करना है। प्रकृति अपने सभी विकारों के माध्यम से इसी प्रयोजन को ही सिद्ध करती है। अतः सत्त्वादि गुणों के अन्तिम विकार महाभूतों का प्रयोजन भी पुरुष के भोग और अपवर्ग का सम्पादन करना है।
इस पाँचों महाभूतों के पाँचों रूपों में क्रमशः संयम करने से योगी उस महाभूत के संयम किए गए रूप का साक्षात्कार = सम्यग्ज्ञान प्राप्त कर उसपर जय प्राप्त करता है। यहाँ यह ध्यान रखना चाहिए कि एक समय में एक भूत के एक ही रूप का संयम सम्भव होता है, न कि पाँचों रूपों का एक साथ। अतः इस प्रकार क्रम से एक-एक भूत के सभी रूपों में संयम करता हुआ योगी उस पर जय प्राप्त करता है। जब वह किसी एक महाभूत के पाँचों रूपों में क्रमशः संयम कर, उनका साक्षात्कार = सम्यग्ज्ञान प्राप्त कर, उन पर विजय प्राप्त कर लेता है तो योगी को उस भूत पर जय रूप सिद्धि की प्राप्ति होती है। इस प्रकार वह पाँचों भूतों पर जय प्राप्त करने से भूतजयी होता है। इस प्रकार भूतजय से महाभूतों की प्रकृतियाँ योगी के संकल्प का अनुसरण करने वाली होती है। परन्तु योगी का कोई भी संकल्प न तो सृष्टि नियमों के विरुद्ध होता है, और न ही महाभूतों की रचना में ईश्वरीय व्यवस्था से विरुद्ध होता है। इस सिद्धान्त = मान्यता को महर्षि व्यास ने अगले सूत्र के भाष्य में स्पष्ट रूप से प्रतिपादित किया है।