In Hindi:
पदपाठ : ततः अणिमादिप्रादुर्भावः कायसम्पत् तद्धर्मानभिघातः च॥
हिंदी में अर्थ : (ततः) उस भूतजय से (अणिमादिप्रादुर्भावः) अणिमा आदि आठ सिद्धियों का आविर्भाव होता है, (कायसम्पत्) काया = शरीर की सम्पत्ति प्राप्त होती है (च) और (तद्धर्मानभिघातः) महाभूतों के धर्मों से अभिघात = बाधा नहीं होती॥
व्यास भाष्य : तत्राणिमा भवत्यणुः। लघिमा लघुर्भवति। महिमा महान्भवति। प्राप्तिरङ्गुल्यग्रेणापि स्पृशति चन्द्रमसम्। प्राकाम्यमिच्छानभिघातः। भूमावुन्मज्जति निमज्जति यथोदके। वशित्वं भूतभौतिकेषु वशी भवत्यवश्यश्चान्येषाम्। ईशितृत्वं तेषां प्रभवाप्यव्यूहानामीष्टे। यत्र कामावसायित्वं सत्यसंकल्पता यथा संकल्पस्तथा भूतप्रकृतीनामवस्थानम्। न च शक्तोऽपि पदार्थविपर्यासं करोति। कस्मात्? अन्यस्य यत्र कामावसायिनः पूर्वसिद्धस्य तथा भूतेषु संकल्पादिति। एतान्यष्टावैश्वर्याणि।
कायसम्पद्वक्ष्यमाणा। तद्धर्मानभिघातश्च पृथ्वी मूर्त्या न निरुणद्धि योगिनः शरीरादिक्रियां, शिलामप्यनुप्रविशतीति। नापः स्निग्धाः क्लेदयन्ति। नाग्निरुष्णो दहति। न वायुः प्रणामी वहति। अनावरणात्मकेऽप्याकाशे भवत्यावृतकायः सिद्धानामप्यदृश्यो भवति॥
हिंदी में अर्थ : (तत्र) उन अणिमा आदि सिद्धियों में से (अणिमा) अणिमा का अर्थ (अणुः) अणु = सूक्ष्म (भवति) होता है। (लघिमा) लघिमा का अर्थ (लघुः) लघु = हल्का (भवति) होता है। (महिमा) महिमा का अर्थ (महान्) महान = विशाल (भवति) होता है। (प्राप्तिः) प्राप्ति का अर्थ (अङ्गुल्यग्रेण) अङ्गुलि के अग्रभाग से = अङ्गुलि के नाप से (चन्द्रमसम् अपि) चन्द्रमा को भी (स्पृशति) छूता है। (प्राकाम्यम्) प्राकाम्य का अर्थ (इच्छानभिघातः) इच्छा का बाधारहित पूरा होना है; जिससे (भूमौ) भूमि में, वैसे (उन्मज्जति) जाता और (निमज्जति) बाहर आता है, (यथा) जैसे (उदके) जल में। (वशित्वम्) वशित्व का अर्थ (भूतभौतिकेषु) महाभूतों और उनके विकारों पर (वशी भवति) वशी = अधिकारी होता है (च) और (अन्येषाम्) दूसरों के, इन भूतों एवं प्राकृतिक पदार्थों के (अवश्यः) वश में नहीं होता। (ईशितृत्वम्) ईशितृत्व का अर्थ (तेषाम्) उन भौतिक पदार्थों के (प्रभवाप्ययव्यूहानाम्) प्रभव = उत्पत्ति, अप्यय = विनाश और व्यूह = स्थिति को करने में (ईष्टे) समर्थ होता है। (यत्र कामावसायित्वम्) यत्रकामावसायित्व का अर्थ (सत्यसंकल्पता) सत्य संकल्पता है, (यथा संकल्पः) उस योगी का जैसा संकल्प होता है (तथा) वैसा ही (भूतप्रकृतीनाम्) महाभूत और उनकी प्रकृतियों की (अवस्थानम्) व्यवस्था = स्थिति होती है। (च) और = परन्तु (शक्तः अपि) समर्थ होने पर भी (न पदार्थविपर्यासम्) पदार्थों को स्वरूप, गुणादि से विपरीत नहीं (करोति) करता। (कस्मात्?) क्यों नहीं करता या कर सकता ? (यत्र) जिस पदार्थ में (पूर्वसिद्धस्य) सबसे पहले सिद्ध (अन्यस्य कामावसायिनः) सत्यसंकल्प वाले ईश्वर का (भूतेषु) महाभूतों के विषय में (तथा संकल्पात् इति) वैसा संकल्प होने से। (एतानि) ये (अष्टौ) आठ (ऐश्वर्याणि) ऐश्वर्य = सिद्धियाँ हैं।
(कायसम्पत्) काया = शरीर की सम्पत्ति (वक्ष्यमाणा) आगे कही जाने वाली है।
(च) और (तद्धर्मानभिघातः) “उन महाभूतों के धर्मों से बाधा न होना” का अभिप्राय है (पृथ्वी) पृथिवी अपने (मूर्त्या) आकार = मूर्त्ति रूप धर्म से (योगिनः) योगी की (शरीरादिक्रियाम्) शरीर आदि की क्रिया को (न निरुणद्धि) बाधित नहीं करती, जिससे वह (शिलाम् अपि) शिला में भी (अनुप्रविशति इति) प्रवेश करता है; (स्निग्धाः आपः) तरल जल (न क्लेदयन्ति) गीला करने, गलाने में समर्थ नहीं होता; (उष्णः अग्निः) उष्ण = दाहक गुण वाली अग्नि (न दहति) जलाती नहीं; (प्रणामी वायुः) वहन शील वायु (न वहति) उड़ाता नहीं; (अनावरणात्मके अपि आकाशे) अनावरण रूपी आकाश में भी (आवृत कायः भवति) आवरण युक्त = गुप्त शरीर वाला होता है (सिद्धानाम् अपि) सिद्धों को भी (अदृश्यः भवति) दृष्टिगोचर नहीं होता।
वैदिक योग मीमांसा : इस सूत्र में भूतजय से होने वाली अणिमा आदि सिद्धियों को कहा है। योगी को भूतजय से अणिमा आदि आठ सिद्धियाँ, काया की सम्पत्ति और उसकी शरीरिक क्रियाओं में महाभूतों के धर्मों से अभिघात नहीं होता।
महर्षि दयानन्द सरस्वती ने अणिमादि सिद्धियों को यजुर्वेद भाष्य में स्पष्ट रूप से स्वीकार किया है। यजु॰ १७.६७ के भावार्थ में वे लिखते हैं — यथा मनुष्यः स्वात्मना सह परमात्मानं युङ्क्ते तदाऽणिमादयः सिद्धियः प्रादुर्भवन्ति, ततोऽव्याहतगत्याभीष्टानि स्थानानि गन्तुं शक्नोति; नान्यथा॥ अर्थात् जब मनुष्य अपने आत्मा के साथ परमात्मा को युक्त करता है तब अणिमादि सिद्धियाँ प्रकट होती हैं, उससे अव्याहत गति से अभीष्ट स्थानों में जा सकता है, अन्यथा नहीं।
यहाँ यह ध्यान रखना चाहिए कि भूतजय से होने वाली सिद्धियाँ ज्ञान प्रधान न होकर क्रिया प्रधान हैं, अतः इनका सम्पादन महाभूतों के धर्मों में संयम से जो साक्षात्कार होता, उस साक्षात् ज्ञान के क्रिया रूप में परिणित होने पर ही पूर्वोक्त सिद्धियाँ होती हैं। इसी तथ्य को महर्षि व्यास ने पूर्व सूत्र की व्याख्या में स्पष्ट रूप से कहा है —“तेष्विदानीं भूतेषु पञ्चसु पञ्चरूपेषु संयमात्तस्य तस्य रूपस्य स्वरूपदर्शनं जयश्च प्रादुर्भवति। तत्र पञ्च भूतस्वरूपाणि जित्वा भूतजयी भवति। अर्थात् अब उन पाँच महाभूतों में विद्यमान पाँच रूपों में संयम करने से उस-उस रूप का स्वरूप साक्षात्कार और उन पर जय प्राप्त होती है। उनमें से भूतों के पाँच स्वरूपों को जीतकर योगी भूतजयी हो जाता है।” अतः उस स्वरूप-साक्षात्कार और उन पर जय में से भूतों के पाँच रूपों को जीतकर योगी भूतजयी होता है। यदि यहाँ केवल ज्ञानात्मक रूप से जय अपेक्षित होती तो उपरोक्त वाक्य में “जयश्च” शब्द की आवश्यकता ही नहीं थी, केवल मात्र “तस्य तस्य रूपस्य स्वरूपदर्शनं प्रादुर्भवति” इतना कहना ही पर्याप्त था। इसी प्रकार आगे का वाक्य “तत्र पञ्च भूतस्वरूपाणि जित्वा भूतजयी भवति” भी भूतजय सिद्धि को ज्ञानात्मक रूप से आगे क्रियात्मक होने पर बल प्रदान कर रहा है। अर्थात् मात्र स्वरूप-साक्षात्कार से भूतजय सम्भव नहीं उसके लिए इन भूतों पर जय होना आवश्यक है और यह जय पदार्थविद्या के बिना सम्भव नहीं होता। इस विषय में महर्षि दयानन्द यजु॰ ११.२ के भावार्थ में कहते हैं — “यदि मनुष्याः परमेश्वरस्य सृष्टौ समाहिताः सन्तो योगं तत्त्वविद्यां च यथाशक्ति सेवेरन्, तेषु प्रकाशितात्मनः सन्तो योगं पदार्थविज्ञानं चाभ्यस्येयस्तर्हि सिद्धी कथं न प्राप्नुयुः॥ अर्थात् यदि मनुष्य परमेश्वर की सृष्टि में समाधिस्थ होकर योग और तत्त्वविद्या का यथाशक्ति सेवन करें, और वे आत्मप्रकाश युक्त होकर योग और पदार्थविज्ञान का अभ्यास करें, तो सिद्धियाँ कैसे न प्राप्त हों।” अर्थात् समाधि में संयम द्वारा महाभूतों का स्वरूप साक्षात्कार और पदार्थविज्ञान द्वारा उन पर जय, इस स्वारस्य को समझे बिना अणिमादि सिद्धियों को प्राप्त करना असम्भव है। अणिमादि सिद्धियों के विषय में महर्षि दयानन्द अन्यत्र कहते हैं —
“इसमें द्रष्टा से अभिप्राय ईश्वर है। योगी विभूति को शुद्ध करता है, यह योगशास्त्र में लिखा है। अणिमादि विभूतियाँ हैं। ये योगी के चित्त में पैदा होती हैं। सांसारिक लोग यह मानते है कि ये योगी के शरीर में पैदा होती हैं, वह ठीक नहीं है। अणिमा का अर्थ यह है कि (योगी का चित्त) छोटी से छोटी वस्तु का विशेष सूक्ष्म होकर नापने वाला होता है। इसी प्रकार बड़े से बड़े पदार्थ को विशेषतर बड़ा होकर योगी का मन घेर लेता है, उसे गरिमा कहते हैं। ये मन के धर्म हैं, शरीर में इनकी शक्ति नहीं है।.......” (उपदेशमंजरी ११वाँ उपदेश)
इन अणिमादि सिद्धियाँ को महर्षि दयानन्द ने पूना प्रवचन में चित्तगत कहा है, क्योंकि स्थूल शरीर में इन धर्मों का होना सम्भव नहीं है। इस में महर्षि दयानन्द ने अणिमा और महिमा (गरिमा) का स्वरूप स्पष्ट किया है, जो कि स्थूल शरीर में होना तो सम्भव ही नहीं है। महर्षि के इस मन्तव्य में कारण यह है कि महर्षि व्यास ने “यत्रकामावसायित्व” में स्पष्ट रूप से कहा है कि योगी का संकल्प ईश्वर, जो इन महाभूतों का स्रष्टा है और आदिसृष्टि में इनके धर्मों का निर्धारण करता है, के संकल्प से विरुद्ध नहीं हो सकता। योगी मात्र अपनी इच्छा अथवा संकल्प से महाभूतों के धर्मों को विपरीत करने में समर्थ नहीं हो सकता। यह तो सम्भव है कि योगी भूतों के पञ्चरूपों को साक्षात् कर, पदार्थविज्ञान से, ऐसे पदार्थों का निर्माण कर ले, जिससे उसके शरीर पर महाभूतों के धर्मों का विपरीत प्रभाव न हो।
योगसूत्र ४.१ की व्याख्या में महर्षि व्यास कहते हैं “मन्त्रैराकाशगमनाणिमादिलाभः” अर्थात् मन्त्र (= विचार) से आकाशगमन और अणिमादि सिद्धियों की प्राप्ति होती है। यहाँ प्रयुक्त “मन्त्र” के अभिप्राय को महर्षि दयानन्द द्वारा सत्यार्थप्रकाश के ग्यारहवें समुल्लास में दिए गए स्पष्टीकरण के सन्दर्भ में समझना चाहिए। महर्षि दयानन्द वहाँ लिखते हैं — “मन्त्र अर्थात् विचार से सब सृष्टि के पदार्थों का प्रथम ज्ञान और पश्चात् क्रिया करने से अनेक प्रकार के पदार्थ और क्रियाकौशल उत्पन्न होते हैं।” अतः यह स्पष्ट है कि यहाँ भूतजय से पदार्थविद्या का क्रियात्मक ज्ञान भी अभिप्रेत है, न कि मात्र चित्तगत संयम।
अब उपर्युक्त विवेचन और पदार्थविज्ञान की योग्यता के सन्दर्भ में अणिमादि सिद्धियों के अभिप्राय को निम्न प्रकार से समझना चाहिए —
१. अणिमा — अणु के समान सूक्ष्म हो जाना। स्थूल शरीर में यह सामर्थ्य नहीं है। चित्त की परमाणु आदि सूक्ष्म पदार्थों में समापत्ति से ऐसा सम्भव है। इस प्रकार चित्त सूक्ष्म = छोटी से छोटी वस्तु को ग्रहण करने, नापने में समर्थ होता है।
२. महिमा — महान् = विशाल हो जाना। स्थूल शरीर में यह सामर्थ्य नहीं है। चित्त की महान् आकाश आदि में समापत्ति से ऐसा सम्भव है। इस प्रकार योगी का चित्त विशाल होकर बड़े से बड़े पदार्थ को घेर लेता है।
३. लघिमा — लघु = हल्का होना। रुई आदि तूल पिण्ड में समापत्ति से लघिमा की प्राप्ति होती। लघिमा की प्राप्ति को योगसूत्र ३.४२ में आकाशगमन सिद्धि के अन्तर्गत स्थूल शरीर में भी माना है।
४. प्राप्ति — महर्षि व्यास के अनुसार चन्द्रमा को अङ्गुली से छूना प्राप्ति है। अर्थात् दूर स्थित वस्तुओं को इन्द्रियों के लिए प्राप्यकारी बनाना। वर्त्तमान काल में पदार्थविज्ञान से वैज्ञानिकों द्वारा ऐसे यानों का निर्माण किया गया, जिसमें मनुष्य चन्द्रमा पर जाकर, वहाँ सैर कर तथा छूकर वापिस पृथिवी पर आ गया है। और इसी प्रकार मानसिक स्तर पर ऐसा स्पर्श सम्भव है। इसका यह अभिप्राय कदापि नहीं है कि योगी का हाथ लाखों किलोमीटर लम्बा होकर चन्द्रमा को स्पर्श करता है।
५. प्राकाम्य — इच्छा का बाधा रहित पूरा होना। यह सिद्धि भी भूतजय अर्थात् पदार्थविज्ञान से सम्भव कोटि की इच्छाओं में सम्भव है। इसमें महर्षि व्यास ने उदाहरण दिया है कि योगी भूमि में, जल के समान, जाकर बाहर आ जाता है। पदार्थविज्ञान द्वारा यान्त्रिक विधि से भूमि में मार्ग आदि का निर्माण कर, योगी एवं सामान्यजन भूमि में गमन आदि क्रियाओं को कर सकते हैं, यथा वर्त्तमान काल में कोयले की खानों, भूमिगत सुरंगों में गमन सामान्य रूप से होता है।
६. वशित्व — महाभूतों और उनके विकारों पर वशी = अधिकारी होना, और स्वयं उनके वश में न होना। यह सिद्धि भी पदार्थविज्ञान पर आधारित है। योगी इन सभी की भोग-अपवर्ग प्रयोजनता को जानकर इनके वश में नहीं होता।
७. ईशित्व — महाभूतों के धर्मपरिणाम रूप इनके विकारों = भौतिक पदार्थों की उत्पत्ति, स्थिति और विनाश का सामर्थ्य होना। यह सिद्धि भी पदार्थ विज्ञान पर आधारित है। भोज के अनुसार शरीर और अन्तःकरण का वश में होना ईशित्व है।
८. यत्रकामावसायित्व — सत्य संकल्पों का होना। योगी के सत्य संकल्पों के अनुसार भूत प्रकृतियों का होना। इस विषय में महर्षि व्यास ने स्पष्ट रूप से कहा है कि योगी, ईश्वर के संकल्प का अतिक्रमण नहीं कर सकता अर्थात् वह भूतों के धर्मों, गुणों, स्वरूपों में अपने संकल्प के अनुसार कोई परिवर्तन नहीं कर सकता।
शंका — एक ओर आप महर्षि दयानन्द द्वारा उपदेशमञ्जरी के सन्दर्भ से अणिमा आदि सिद्धियों को चित्तगत कहते हैं, दूसरी ओर लघिमा आदि सिद्धियों को शरीरपरक भी सिद्ध करते हैं ? अतः अणिमादि सिद्धियों की वास्तविकता को किस प्रकार से माना जाए, चित्तगत या स्थूलशरीरगत ?
समाधान — महर्षि दयानन्द ने पूना में हुए अपने प्रवचनों में अणिमा आदि को चित्तगत कहते हुए केवल अणिमा और गरिमा के चित्तगत होने का स्पष्ट रूप से प्रतिपादन करते हुए कहा है कि ये मन के धर्म हैं, शरीर में इनकी शक्ति नहीं है। इस विषय में निम्न तथ्यों का ध्यान रखना चाहिए —
१. योगभाष्य की अन्तःसाक्षी से लघिमा का प्रमाणिक होना सिद्ध होता है। योगसूत्र ३.४२ में महर्षि पतञ्जलि और महर्षि व्यास दोनों ने ही लघुतूलसमापत्ति को माना है, और यह स्थूल शरीर में सिद्ध है।
२. महर्षि दयानन्द ने यजु॰ ११.२ के भावार्थ में योग और पदार्थविज्ञान के अभ्यास से, योगसिद्धियों की प्राप्ति को माना है। इस प्रकार योग और पदार्थविज्ञान से होने वाली सिद्धियाँ स्थूल शरीर में सम्भव हैं। इसका वर्णन हमने ऊपर अणिमा आदि की व्याख्या में तथा आगे इसी सूत्र के अन्तर्गत तद्धर्मानभिघातः की व्याख्या में किया है।
३. महर्षि के इन प्रवचनों को, जो कि १८७५ में पुणे में हुए थे, अन्य व्यक्तियों द्वारा लिपिबद्ध कर प्रथम मराठी और गुजराती में छपवाया गया था। किसी भी जीवनीकार, तथा महादेव गोविन्द रानाडे अथवा श्रीगणेश जनार्दन आगाशे जी, जिन्होंने इनको लिपिबद्ध किया था, ने यह कही नहीं कहा कि इन लेखों को, महर्षि दयानन्द ने, किसी छूट आदि के दृष्टिकोण से, इन्हें छपने से पूर्व देखा था। सर्वप्रथम ये मराठी और गुजराती में छपे थे। इस संस्करण के लगभग ४० वर्ष पश्चात् इनका हिन्दी अनुवाद छपा था। इसविषय में हमारा यह कहना है कि अणिमा और महिमा तो चित्तगत ही सम्भव है, जैसा कि लिपिलेखकों ने लिखा है। परन्तु महर्षि दयानन्द ने लघिमा से आगे की सिद्धियों के सम्बन्ध में कुछ नहीं कहा, और हो सकता है कि कुछ ऐसे शब्द कहे हों जिससे यह अर्थ स्पष्ट होता हो कि शेष तो स्थूल शरीर में भी सम्भव हैं, परन्तु ये दोनों केवल चित्तगत ही हैं। इसी वाक्य में अणिमा के सन्दर्भ में (योगी का चित्त) ये शब्द कोष्टक में छपे हैं, जिससे से प्रतीत होता है कि ये शब्द अर्थ को स्पष्ट करने हेतु लिपिकार ने जोड़े हैं; तथा इसी पैरे के अन्त में यह वाक्य है — “इस तरह पर श्रवण, मनन, निदिध्यासन, साक्षात्कार हो जाने से निस्सन्देह स्पष्ट ज्ञान हो जाता है।” यहाँ इस वाक्य में श्रवण से पूर्व “पर” शब्द का अर्थ स्पष्ट नहीं है। हम यहाँ लिपिकारों द्वारा सम्भवतः छूटे शब्दों को सुझाने का प्रयास कर सकते हैं, परन्तु यह सर्वथा अनुचित होगा।
अतः योगदर्शन की अन्तःसाक्षी और महर्षि दयानन्द द्वारा स्वयं प्रमाणिक रूप से किए वेदभाष्य के आगे दूसरों द्वारा लिपिबद्ध किया गया लेख मार्गदर्शक तो माना जा सकता है, परन्तु सैद्धान्तिक दृष्टि से महर्षि के स्वयं के लेख के समान प्रामाणिक नहीं। अतः उपर्युक्त प्रकार से किया गया अर्थ सिद्धान्तानुकूल ही है।
कायसम्पत् की व्याख्या अगले सूत्र में की गई है।
तद्धर्मानभिघातः का अभिप्राय है कि भूतों के धर्म योगी की शारीरिक क्रियाओं में बाधक नहीं होते। इस विषय में महाभूतों के धर्मों का साक्षात्कार होने के पश्चात् उनपर जय होना भी आवश्यक है, और यह भूतजय पदार्थविज्ञान के क्रियात्मक रूप के बिना सम्भव नहीं होता। अतः योगी भूतों के धर्मों को समाधि में साक्षात् करता हुआ उनके धर्मों के अनुसार पदार्थविज्ञान को अपनाता हुआ इस सिद्धि को प्राप्त करता है। महर्षि व्यास इस विषय को निम्न प्रकार से कहते हैं—
१. पृथिवी का मूर्त्त धर्म = आकार, स्थूल रूप आदि योगी के शरीर की क्रिया को बाधित नहीं करता। इस से योगी शिला में भी प्रवेश करने में समर्थ होता है। यहाँ महर्षि व्यास ने “अनुप्रविशति” क्रिया का प्रयोग किया है नाकि “प्रविशति” अर्थात् मार्ग निर्माण के पश्चात् प्रवेश न कि सीधा प्रवेश अतः पदार्थ विज्ञान द्वारा शिला आदि में, मार्ग का निर्माण कर शिला प्रवेश हो सकता है।
२. तरल जल उसे गीला नहीं करते। योगसूत्र ३.३९ में उदानजय से जल से असंगता को कहा है। इसी प्रकार योगसूत्र ३.४२ की व्याख्या में महर्षि व्यास ने “लघुत्वाच्च जले पादाभ्यां विहरति” जल पर चलना कहा है। अतः यह सम्भव है।
३. अग्नि उसे जलाता नहीं। पदार्थ विज्ञान द्वारा तापरोधक पदार्थों एवं वस्त्रों का निर्माण और उनके उपयोग करने से ऐसा सम्भव है। वर्त्तमान काल में भी कुछ लोग (साधु आदि भी) अंगारों पर चलकर दिखाते हैं, ऐसा कौशल दूरदर्शन पर स्पष्ट रूप से देखा गया है।
४. वायु उसे उड़ाता नहीं। योग सूत्र ३.३१ में कूर्मनाड़ी में संयम से शरीरिक स्थिरता को सर्प, गोधा के समान स्वीकार किया है। अतः यह सम्भव है।
५. अनावरण आकाश में भी वह आवरणयुक्त होता है, अर्थात् अन्यों को दृष्टिगोचर नहीं होता। योगसूत्र ३.२१ में अन्तर्धान सिद्धि को कहा है। अतः यह सम्भव है।
शंका — आपने अपनी व्याख्या में योगी को भौतिक वैज्ञानिक के समकक्ष कर दिया है। यहाँ सिद्धियों हेतु योगी को भी भौतिक वैज्ञानिक के समान कार्य करना होगा। ऐसे में योगी और भौतिक वैज्ञानिक में क्या अन्तर रहेगा? जबकि योगी तो योगबल से उपरोक्त कार्यों को करने में समर्थ होना चाहिए। इतिहास में ऐसे प्रमाण उपलब्ध भी होते हैं।
समाधान — आपको यह शंका पुराणों में कथित मिथ्या इतिहास के कारण हुई है। देखो, अपने जीवनकाल में श्रीकृष्ण जैसे योगी भी पदार्थविज्ञान का सम्यक् उपयोग करते थे। यदि ऐसा न होता तो उनको शस्त्रविद्या में प्रवीण होने की आवश्यकता ही नहीं होती। वे तो मात्र मानसिक योगबल से शत्रुओं का विनाश करने में समर्थ होते। परन्तु इतिहास इससे विपरीत है। महाभारत आदि ग्रन्थों में उनके द्वारा पदार्थविज्ञान विद्या का प्रयोग, इसी सिद्धान्त को बल देता है कि योग की क्रिया प्रधान सिद्धियों हेतु योगबल के साथ पदार्थविज्ञान का समुचित प्रयोग आवश्यक है। आधुनिक काल के महान् योगी महर्षि दयानन्द सरस्वती ने यजु॰ ११.२ के भावार्थ में इस मान्यता को स्पष्ट रूप से प्रतिपादित किया है।
भौतिक वैज्ञानिक की अपेक्षा से योगी का स्तर अत्यधिक उन्नत रहता है, क्योंकि वह विषयों को संयम द्वारा अर्थात् धारणा-ध्यान-समाधि के द्वारा स्वयं साक्षात् करता है। जबकि भौतिक वैज्ञानिक पदार्थों के धर्मों आदि को जानने और समझने हेतु क्रियात्मक प्रयोग ही करता रहता है, जिसमें सफलता और असफलता दोनों प्रकार की सम्भावनाएँ रहती हैं। इस प्रकार के परीक्षणों द्वारा किसी भी निर्णय पर पहुँचने हेतु अत्यधिक धन, बल और समय की आवश्यकता रहती है। जबकि योगी संयम द्वारा भूतों के धर्मों को साक्षात् करता हुआ, क्रियात्मक रूप से पदार्थ विद्या के क्षेत्र में निश्चित दिशा में कार्य करता है, न कि अनुमानों के आधार पर प्रयोग करता। अतः योगी और भौतिक वैज्ञानिक को समान स्तर पर नहीं माना जा सकता।