Vibhuti Paada / Attainments / 46
रूपलावण्यबलवज्रसंहननत्वानि कायसम्पत्॥४६॥
Padas Name : Vibhuti Paada / Attainments | Sutra No : 46
In Hindi:
पदपाठ : रूपलावण्यबलवज्रसंहननत्वानि कायसम्पत्॥
हिंदी में अर्थ : (रूपलावण्यबलवज्रसंहननत्वानि) रूप, लावण्य, बल, वज्रसंहननत्व = शरीर के अङ्गों का सुदृढ़ होना (कायसम्पत्) शरीर की सम्पत्ति है॥
व्यास भाष्य : दर्शनीयः कान्तिमानतिशयबलो वज्रसंहननश्चेति॥
हिंदी में अर्थ : योगी का शरीर (दर्शनीयः) दर्शनीय = रूपवान् (कान्तिमान्) कान्तियुक्त (अतिशयबलः) अतिशय बलयुक्त (च) और (वज्रसंहननः) वज्र के समान सुदृढ़ (इति) हो जाता है॥
वैदिक योग मीमांसा : भूतजय से होने वाली कायसम्पत् को इस सूत्र में कहा गया है। कायसम्पत् का अर्थ है योगी का शरीर रूपवान्, कान्तियुक्त, अतिशयबलयुक्त और वज्र के समान कठोर = सुदृढ़ हो जाता है। योगी को यह क्रियात्मक सिद्धि भी पदार्थविज्ञान के आधार पर ही प्राप्त होती है। योगी महाभूतों तथा उनके विकारों के गुणों का साक्षात्कार करता हुआ जब पदार्थविज्ञान द्वारा उन पर जय कर लेता है, तो इस प्रकार वह जानता है कि कौन-कौन से पदार्थों का सेवन करने से उसका शरीर रूप और लावण्य = कान्तियुक्त होगा। वह यह भी जानता है कि कौन-कौन से व्यायाम करने, और भोज्य पदार्थों का सेवन आदि से उसे बल की प्राप्ति होगी। योगसूत्र ३.२४ में “बलेषु हस्तिबलादीनि” में योगी द्वारा हाथी आदि के बल की प्राप्ति को कहा गया है। इसी प्रकार पदार्थविज्ञान का उपयोग करते हुए योगी का शरीर इतना सुदृढ़ हो जाता है कि सामान्य रूप से वह भिदता एवं क्षतिग्रस्त आदि नहीं होता। इसी प्रकार ईश्वर की उपासना आदि से शरीर के साथ मानसिक बल की प्राप्ति भी योगी को होती है।