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Vibhuti Paada / Attainments / 47
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Vibhuti Paada / Attainments / 47

ग्रहणस्वरूपास्मितान्वयार्थवत्त्वसंयमादिन्द्रियजयः॥४७॥

Padas Name : Vibhuti Paada / Attainments | Sutra No : 47

In Hindi:

पदपाठ : ग्रहणस्वरूपास्मितान्वयार्थवत्त्वसंयमात् इन्द्रियजयः॥

हिंदी में अर्थ : (ग्रहणस्वरूपास्मितान्वयार्थवत्त्वसंयमात्) पाँच इन्द्रिय के रूपों = ग्रहण, स्वरूप, अस्मिता, अन्वय, अर्थवत्त्व में संयम करने से (इन्द्रियजयः) इन्द्रिय जय = इन्द्रियों पर अधिकार होता है॥

व्यास भाष्य : सामान्यविशेषात्मा शब्दादिर्ग्राह्यः। तेष्विन्द्रियाणां वृत्तिर्ग्रहणम्। न च तत्सामान्यमात्रग्रहणाकारम्। कथमनालोचितः स विषयविशेष इन्द्रियेण मनसाऽनुव्यवसीयेतेति। स्वरूपं पुनः प्रकाशात्मनो बुद्धिसत्त्वस्य सामान्यविशेषयोरयुतसिद्धावयवभेदानुगतः समूहो द्रव्यमिन्द्रियम्। तेषां तृतीयं रूपमस्मितालक्षणोऽहंकारः। तस्य सामान्यस्येन्द्रियाणि विशेषाः। चतुर्थं रूपं व्यवसायात्मकाः प्रकाशक्रियास्थितिशीला गुणा येषामिन्द्रियाणि साहंकाराणि परिणामः। पञ्चमं रूपं गुणेषु यदनुगतं पुरुषार्थवत्त्वमिति। पञ्चस्वेतेष्विन्द्रियरूपेषु यथाक्रमं संयमस्तत्र तत्र जयं कृत्वा पञ्चरूपजयादिन्द्रियजयः प्रादुर्भवति योगिनः॥

हिंदी में अर्थ : (सामान्यविशेषात्मा) सामान्य एवं विशेष के समुदाय रूप (शब्दादिः) शब्द, स्पर्श, रूप, रस, गन्ध रूप विषय (ग्राह्यः) ग्राह्य हैं। और (तेषु) उन ग्राह्य विषयों में (इन्द्रियाणाम्) इन्द्रियों की (वृत्तिः) वृत्ति = व्यापार (ग्रहणम्) ग्रहण है। (च) और (तत्) वह ग्रहण रूप इन्द्रियवृत्ति (सामान्यमात्र-ग्रहणाकारम्) सामान्यमात्र विषय को ही ग्रहण करने वाली (न) नहीं होती। (अर्थात् सामान्य और विशेष दोनों का ग्रहण कराती है।) क्योंकि (इन्द्रियेण अनालोचितः) इन्द्रियों द्वारा ग्रहण न किया गया (स विषयविशेष) वह शब्दादि विषय विशेष (मनसा) मन से (कथम्) कैसे (अनुव्यवसीयेत इति) जाना जा सकता है ?

(पुनः) और (प्रकाशात्मनः बुद्धिसत्त्वस्य) प्रकाश रूप बुद्धिसत्त्व के (सामान्यविशेषयोः) सामान्य विशेषों के (अयुतसिद्धावयवभेदानुगतः) पृथक् न होने वाले अवयव भेदों में अनुगत रहने वाला (समूहः) समूह रूप (द्रव्यम्) द्रव्य ही (इन्द्रियम्) इन्द्रिय है, और वही (स्वरूपम्) इन्द्रियों का “स्वरूप” रूप है।

(तेषाम्) उन इन्द्रियों का (अस्मितालक्षणः) अस्मिता लक्षण वाला (अहंकारः) अहंकार (तृतीयम् रूपम्) तीसरा रूप है। (तस्य सामान्यस्य) उस सामान्य रूप अहंकार के (इन्द्रियाणि विशेषाः) इन्द्रियाँ विशेष हैं।

(व्यवसायात्मकाः) व्यवसायात्मक = निश्चयात्मक व्यवहार कराने वाले (प्रकाशक्रियास्थितिशीला गुणाः) प्रकाश-क्रिया-स्थूल स्वभाव वाले सत्त्वादि गुण (येषाम्) जिनके (साहंकाराणि इन्द्रियाणि) अहंकार सहित इन्द्रियाँ (परिणामः) परिणाम हैं। ये सत्त्वादि गुण (चतुर्थम् रूपम्) इन्द्रियों का चतुर्थ रूप है।

(गुणेषु) सत्त्वादि गुणों में (यत्) जो (पुरुषार्थवत्त्वम्) पुरुष के भोग-अपवर्ग सम्पादन रूप सामर्थ्य का (अनुगतम् इति) अनुगत होना, (पञ्चमम् रूपम्) इन्द्रियों का पाँचवाँ रूप है।

(एतेषु) इन (पञ्चसु) पाँचों (इन्द्रियरूपेषु) इन्द्रिय रूपों में (यथाक्रमम्) क्रमशः (संयमः) संयम द्वारा (तत्र तत्र जयम् कृत्चा) उस-उस रूप का जय प्राप्त करके (पञ्चरूपजयात्) पाँचों रूपों पर जय होने से (योगिनः) योगी को (इन्द्रियजयः) इन्द्रियजय नामक सिद्धि (प्रादुर्भवति) प्राप्त होती है॥

वैदिक योग मीमांसा : महर्षि पतञ्जलि भूतजय हेतु महाभूतों के पाँच रूपों के समान इन्द्रियजय हेतु भी इन्द्रियों के पाँच रूपों में संयम का विधान कर रहे हैं। इन्द्रियों के पाँच रूप इस प्रकार से हैं —

१. इन्द्रियों का ग्रहण रूप — महाभूतों के सामान्य विशेष के समुदाय रूप जो शब्द आदि विषय हैं, उनकी ओर इन्द्रियों की प्रवृत्ति = व्यापार को इन्द्रियों का ग्रहण रूप कहा है। इन्द्रियों की यह प्रवृत्ति शब्दादि विषयों के मात्र सामान्य धर्मों को ही ग्रहण न करती हुई सामान्य और विशेष दोनों ही धर्मों को ग्रहण करती है। यदि केवल शब्द आदि विषयों के मात्र सामान्यधर्मों का ग्रहण होता, तो वह विषय मन द्वारा सन्निकर्ष होने पर भी जाना ही नहीं जाता, क्योंकि मन द्वारा ज्ञात होने के लिए इन्द्रियों द्वारा शब्द आदि विषयों के विशेषधर्मों का ग्रहण होना आवश्यक है। अतः विषय और इन्द्रिय सन्निकर्ष = सम्बन्ध में विषयों के सामान्य और विशेष दोनों प्रकार के धर्मों का ग्रहण होता है।

२. इन्द्रियों का स्वरूप रूप — ज्ञानेन्द्रियाँ सात्त्विक अहंकार का कार्य हैं, और सात्त्विक अहंकार सात्त्विक महत्तत्त्व का परिणाम है। अतः प्रकाशात्मक = सत्त्वगुण विशिष्ट बुद्धिसत्त्व = महत्तत्त्व के सामान्य एवं विशेष धर्मों के अयुतसिद्ध = पृथक् न होने वाले भेदों में अनुगत रहने वाला समूह रूप द्रव्य ही इन्द्रियाँ हैं। यह इन्द्रियों का दूसरा रूप — “स्वरूप” है।

३. इन्द्रियों का अस्मिता रूप — ज्ञानेन्द्रियों का कारण सात्त्विक अहंकार है, जो कि अस्मिता लक्षण वाला है। इसी सामान्य रूप अहंकार की इन्द्रियाँ विशेष परिणाम हैं। यही इन्द्रियों का तीसरा “अस्मिता” रूप है।

४. इन्द्रियों का अन्वय रूप — ज्ञानेन्द्रियाँ भी पञ्चमहाभूतों के समान अन्तिम कार्य पदार्थ हैं। इन्द्रियाँ अहंकार का, अहंकार महत्तत्त्व का और महत्तत्त्व प्रकृति = सत्त्वादि तीनों गुणों का कार्य है। इस प्रकार ये तीनों गुण ही कार्य कारण परम्परा से सभी विकारों में अनुगत हैं। इस प्रकार से ये सत्त्वादि गुण ही इन्द्रियों का “अन्वय” रूप हैं।

५. इन्द्रियों का अर्थवत्त्व रूप — इन्द्रियों की प्रयोजनता भी वही है जो इनके मूल कारण प्रकृति का प्रयोजन है, अर्थात् पुरुष के लिए भोग और अपवर्ग का सम्पादन करना। यह प्रयोजन प्रकृति के सभी विकारों में स्वाभाविक रूप से अनुगत है। इन्द्रियाँ भी पुरुष के लिए भोग और अपवर्ग रूपी प्रयोजन को सिद्ध करने वाली हैं। यही इन्द्रियों का पाँचवाँ रूप “अर्थवत्त्व” है।

योगी इन्द्रियों के इन पाँचों रूपों में क्रमशः संयम करता हुआ इन पर जय प्राप्त करता है। अर्थात् वह एक-एक इन्द्रिय के एक-एक रूप में संयम करता हुआ, उस-उस रूप पर जय करता हुआ, जब उस इन्द्रिय के पाँचों रूप पर जय प्राप्त कर लेता है, तो योगी को उस इन्द्रिय पर जय प्राप्त हो जाती है।

इसप्रकार से वह पाँचों इन्द्रियों पर जय प्राप्त करके इन्द्रियजयी हो जाता है।