In Hindi:
पदपाठ : ततः मनोजवित्वम् विकरणभावः प्रधानजयः च॥
हिंदी में अर्थ : (ततः) उस इन्द्रियजय से (मनोजवित्वम्) मनोजवित्व, (विकरणभावः) विकरणभाव, (च) और (प्रधानजयः) प्रधानजय नामक सिद्धियाँ प्राप्त होती हैं॥
व्यास भाष्य : कायस्यानुत्तमो गतिलाभो मनोजवित्वम्। विदेहानामिन्द्रियाणामभिप्रेतदेशकालविषयापेक्षो वृत्तिलाभो विकरणभावः। सर्वप्रकृतिविकारवशित्वं प्रधानजय इति। एतास्तिस्रः सिद्धयो मुधप्रतीका उच्यन्ते। एताश्च करणपञ्चकरूपजयादधिगम्यन्ते॥
हिंदी में अर्थ : (कायस्य) शरीर = शरीरस्थ ज्ञानेन्द्रियों की (अनुत्तमः) अत्युत्तम (गतिलाभः) गति की प्राप्ति (मनोजवित्वम्) मनोजवित्व नामक सिद्धि है। (विदेहानाम्) देह में स्थित इन्द्रिय गोलकों की अपेक्षा के बिना (इन्द्रियाणाम्) इन्द्रियों का (अभिप्रेतदेशकालविषयापेक्षः) अभीष्ट देश, काल और विषयों में (वृत्तिलाभः) प्रवृत्ति = व्यापार होना (विकरणभावः) विकरणभाव नामक सिद्धि है। (सर्वप्रकृतिविकारवशित्वम्) प्रकृति के सभी विकारों पर वशित्व = अधिकार की प्राप्ति (प्रधानजय इति) प्रधानजय नामक सिद्धि है।
(एताः) ये (तिस्रः सिद्धयः) तीनों सिद्धियाँ (मुधप्रतीका) मधुप्रतीका (उच्यन्ते) कही जाती हैं। (च) और (एताः) ये सिद्धियाँ (करणपञ्चकरूपजयात्) इन्द्रियों के पाँचों रूपों पर जय से (अधिगम्यन्ते) प्राप्त होती हैं।
वैदिक योग मीमांसा : इस सूत्र में इन्द्रियों के पाँचों रूपों पर संयम करने से होने वाले इन्द्रियजय से प्राप्त होने वाली सिद्धियों को कहा है; जो कि इस प्रकार से हैं —
१. मनोजवित्व — शरीरस्थ इन्द्रियों का अत्युत्तम गति वाला होना मनोजवित्व है। वस्तुतः सूत्रभाष्य में “कायस्यानुत्तमो गतिलाभः” कहा है जिसका सीधा सा अर्थ भाष्यकारों ने “काया का अत्युत्तम गति वाला होना” किया है। यहाँ विचार करना चाहिए कि इन्द्रियजय से, शरीरस्थ इन्द्रियों में उत्कृष्टता की प्राप्ति का ही सम्बन्ध हो सकता है, न कि स्थूल शरीर में उत्कृष्टता। वस्तुतः मन ही ज्ञान प्राप्ति का साधन है अर्थात् वह ही इन्द्रियों से सम्बद्ध होता हुआ, शरीर के गोलकों में स्थित इन्द्रिय और अर्थ सन्निकर्ष से बाह्य विषयों को ग्रहण करता है। इन्द्रियजय से होने वाली अगली सिद्धि विकरणभाव में शरीर की अपेक्षा के बिना ही इन्द्रियों की अर्थ = विषय में प्रवृत्ति को माना है। अतः यहाँ “शरीर की अपेक्षा” प्रधान होने से महर्षि व्यास “कायस्थेन्द्रियस्यानुत्तमो गतिलाभः” न कहकर “कायस्यानुत्तमो गतिलाभः” कहकर शरीरस्थ इन्द्रियों की अत्युत्तम गति को ही कहा है। अतः यह अर्थ महर्षि व्यास की भावना के अधिक अनुकूल है। इस सिद्धि के अर्थ में बहुधा भाष्यकारों ने गतिलाभ को “मनोवत्” = मन के समान कहा है। महर्षि व्यास ने भाष्य में “मनोवत्” शब्द नहीं कहा। इस शब्द का प्रथम प्रयोग भोजवृत्ति में उपलब्ध होता है, जिसका बाद के भाष्यकारों ने अनुकरण किया है।
वस्तुतः शास्त्रकारों ने मन को आशुगामी स्वीकार किया है परन्तु मन की इस योग्यता को, इन्द्रियों में कही भी स्वीकार नहीं किया गया, और न ही महर्षि व्यास ने भी अपने भाष्य में ऐसा कहा है। अतः “मनोजवित्व” का अभिप्राय है कि योगी को इन्द्रियजय के परिणामस्वरूप इन्द्रियों में पूर्व की अपेक्षा उत्कृष्टता अर्थात् उनमें विषयों के प्रति, सामान्य मनुष्य की अपेक्षा से, अत्युत्तम गति की प्राप्ति होती है।
२. विकरणभाव — विकरणभाव का अर्थ है योगी शरीरस्थ इन्द्रियों के गोलकों की अपेक्षा के बिना ही इन्द्रियों से अपनी इच्छानुसार = अभीष्ट देश, काल और विषय में प्रवृत्ति में समर्थ हो जाता है। बाह्यविषयों के ग्रहण में इन्द्रिय का अर्थ (= शब्दादि विषयों) के साथ सन्निकर्ष अपेक्षित है, जो शरीर में स्थित इन्द्रिय-गोलकों के माध्यम से सम्भव होता है। परन्तु योगी का प्रत्यक्ष मात्र बाह्य न होकर अन्तःप्रत्यक्ष भी होता है, और यह अन्तःप्रत्यक्ष बाह्यप्रत्यक्ष की अपेक्षा से विशिष्ट होता है। इस अन्तःप्रत्यक्ष में योगी को शरीरस्थ इन्द्रिय-गोलकों के माध्यम से विषय के साथ सन्निकर्ष की अपेक्षा नहीं होती। इस बाह्य इन्द्रिय-अर्थ सन्निकर्ष के बिना भी योगी पदार्थों के साक्षात्कार में समर्थ होता है, यही विकरणभाव नामक सिद्धि है। इस विषय में महर्षि दयानन्द हुगली शास्त्रार्थ (प्रतिमापूजन-विचार) में कहते हैं —
“सो हृदय में ही परमाणुपर्यन्त जितने पदार्थ हैं, उनको योगज्ञान से योगी जानता है। बाहर के पदार्थों से किञ्चिन्मात्र भी ध्यान में सम्बन्ध योगी नहीं रखता, किन्तु आत्मा से ही ध्यान का सम्बन्ध है, और से नहीं।”, तथा “ इससे निर्मल प्रकाश स्वरूप चित्त होता है। जैसा सूक्ष्म विभु आकाश है, वैसे ही योगी की बुद्धि होती है। तत्र नाम अपने हृदय में विशाल स्थिति होने से बुद्धि की जो शुद्ध प्रवृत्ति, सोई बुद्धि सूर्य, चन्द्र, ग्रह, मणि इन्हों की, जैसी प्रभा, वैसी ही योगी की बुद्धि समाधि में होती है।”
अतः समाधि में सूर्य, चन्द्र आदि रूप वाले पदार्थों का साक्षात्कार नेत्रेन्द्रिय रूपी शक्ति द्वारा, बिना बाह्य नेत्र रूपी गोलक की अपेक्षा से, प्रत्यक्ष होना ही विकरणभाव का उदाहरण है।
३. प्रधानजय — इन्द्रियजय से प्राप्त होने वाली तीसरी सिद्धि प्रधानजय है। इसका तात्पर्य है कि योगी को प्रकृति के सभी विकारों पर वशित्व = अधिकार प्राप्त हो जाता है। योगी इन इन्द्रियों के अन्वय सत्त्वादि गुणों को जानता हुआ तथा इनकी अर्थवत्त्वता = पुरुष के भोग और अपवर्ग सम्पादन के सामर्थ्य को जान कर इनके द्वारा अपने भोग और अपवर्ग रूपी उद्देश्य को प्राप्त करने में समर्थ होता है अर्थात् जीवन यापन हेतु भोग और परम पुरुषार्थ अपवर्ग की प्राप्ति में भी समर्थ होता है। प्रकृति का यह प्रयोजन उसके सभी विकारों महत्तत्त्व, अहंकार, इन्द्रियों, मन, तन्मात्राओं और पञ्चमहाभूतों में अनुगत रहता है। इस प्रयोजन को जानता हुआ योगी इन सभी पर वश्यता = अधिकार प्राप्त कर लेता है अर्थात् वह इनसे अपने उद्देश्य के अनुसार भोग और अपवर्ग दोनों को ही सिद्ध करने में समर्थ होता है; और स्वयं जड़ प्रकृति और उसके विकारों के वश में नहीं होता।
इसमें यह भी जानना चाहिए कि इस अधिकार का यह अभिप्राय कदापि नहीं है कि वह इनसे अपनी इच्छानुसार कुछ भी करने में समर्थ होता है। योगी सृष्टि नियमों और ईश्वरीय-व्यवस्था का न तो अतिक्रमण करता और न ही कर सकता। इसका स्पष्टीकरण योगसूत्र ३.४५ के अन्तर्गत “यत्रकामावसायित्व” सिद्धि की व्याख्या में कर दिया है।
इन तीनों सिद्धियों को योगशास्त्र में मधुप्रतीका कहा जाता है।