In Hindi:
पदपाठ : सत्त्वपुरुषान्यताख्यातिमात्रस्य सर्वभावाधिष्ठातृत्वम् सर्वज्ञातृत्वम् च॥
हिंदी में अर्थ : (सत्त्वपुरुषान्यताख्यातिमात्रस्य) सत्त्व = बुद्धि और पुरुष के भेदज्ञान के साक्षात्कार से युक्त योगी को (सर्वभावाधिष्ठातृत्वम्) सभी भाव = भावात्मक पदार्थों का स्वामित्व (च) और (सर्वज्ञातृत्वम्) इन सभी पदार्थों का यथार्थ ज्ञान हो जाता है॥
व्यास भाष्य : निर्धूतरजस्तमोमलस्य बुद्धिसत्त्वस्य परे वैशारद्ये परस्यां वशीकारसंज्ञायां वर्त्तमानस्य सत्त्वपुरुषान्यताख्यातिमात्ररूपप्रतिष्ठस्य सर्वभावाधिष्ठातृत्वम्। सर्वात्मानो गुणा व्यवसायव्यवसेयात्मकाः स्वामिनं क्षेत्रज्ञं प्रत्यशेषदृश्यात्मत्वेनोपस्थिता इत्यर्थः। सर्वज्ञातृत्वं सर्वात्मनां गुणानां शान्तोदिताव्यपदेश्यधर्मत्वेन व्यवस्थितानामक्रमोपारूढं विवेकजं ज्ञानमित्यर्थ इति। एषा विशोका नाम सिद्धिर्यां प्राप्य योगी सर्वज्ञः क्षीणक्लेशबन्धनो वशी विहरति॥
हिंदी में अर्थ : (निर्धूतरजस्तमोमलस्य बुद्धिसत्त्वस्य) रजोगुण और तमोगुण के मलों से रहित बुद्धिसत्त्व के (परे वैशारद्ये) अत्यन्त शुद्ध = निर्मल हो जाने पर और (परस्याम् वशीकारसंज्ञायाम्) उत्कृष्ट वशीकारसंज्ञा = अपर वैराग्य में (वर्त्तमानस्य) स्थित, (सत्त्वपुरुषान्यताख्यातिमात्ररूपप्रतिष्ठस्य) बुद्धि और पुरुष के भेदज्ञान की ख्यातिमात्र = साक्षात्कार में ही प्रतिष्ठित चित्त वाले योगी को (सर्वभावाधिष्ठातृत्वम्) सभी भावात्मक पदार्थों = प्रकृति के विकारों का स्वामित्व प्राप्त होता है, अर्थात् (व्यवसायव्यवसेयात्मकाः) ज्ञानात्मक और ज्ञेयात्मक (सर्वात्मानः गुणाः) सभी रूपों वाले सत्त्वादि गुण (स्वामिनम् क्षेत्रज्ञम् प्रति) क्षेत्रज्ञ = पुरुष = जीवात्मा रूप स्वामी के प्रति (अशेषदृश्यात्मत्वेन) सम्पूर्ण दृश्य = भोग्य पदार्थों के रूप में (उपस्थिताः) उपस्थित हो जाते हैं, (इति अर्थः) यह अर्थ है।
(सर्वज्ञातृत्वम्) सर्वज्ञातृत्व अर्थात् (शान्तोदिताव्यपदेश्यधर्मत्वेन) भूत, वर्त्तमान और भविष्यत् धर्मों के रूप में (व्यवस्थितानाम्) स्थित (सर्वात्मनां गुणानाम्) सभी रूपों वाले सत्त्वादि गुणों का (अक्रमोपारूढम्) बिना क्रम के = एक साथ (विवेकजम् ज्ञानम्) विवेकजज्ञान होता है, (इति अर्थः) यह अर्थ है।
(इति) इस प्रकार (एषा) यह दो प्रकार की (विशोका नाम सिद्धिः) विशोका नामक सिद्धियाँ हैं, (याम्) जिनको (प्राप्य) प्राप्त करके (योगी) योगी (सर्वज्ञः) इन पदार्थों के विषय में सभी कुछ जानता हुआ (क्षीणक्लेशबन्धनः) अविद्यादि क्लेश रूप बन्धनों से रहित, और (वशी) इन पदार्थों का वशी = स्वामी होकर (विहरति) विचरता है॥
वैदिक योग मीमांसा : इस सूत्र में सत्त्व-पुरुषान्यताख्याति से होने वाली सिद्धियों का वर्णन किया गया है। योगी की बुद्धि जब —(१) रजोगुण और तमोगुण के मलों से सर्वथा रहित हो जाने (= यहाँ अविद्यादि क्लेशों से भी रहित हो जाना अनिवार्य रूप से अपेक्षित है) से अत्यन्त निर्मल = शुद्ध हो जाती है; और (२) परम वशीकारसंज्ञा अर्थात् अपर वैराग्य की अवस्था में सर्वदा स्थित रहती है, अर्थात् योगी के चित्त में दृष्ट और आनुश्रविक विषयों के प्रति तृष्णा का सर्वथा अभाव हो जाता है; ऐसी स्थिति में बुद्धि (= जो प्रकृति का विकार, जड़, परिणामी, परार्थ है) और पुरुष (= जो चेतन, अपरिणामी, स्वार्थ, सत्त्वादि आदि गुणों से सर्वथा रहित है) की अन्यता = भिन्नता का साक्षात्कार हो जाने पर योगी को दो सिद्धियों की प्राप्ति कही गई है। योगी की यह अवस्था अस्मितानुगत सम्प्रज्ञात समाधि की उच्च अवस्था की है। इस अवस्था में प्राप्त होने वाली दो सिद्धियाँ निम्न हैं —
१. सर्वभावाधिष्ठातृत्व — इसका अभिप्राय है योगी को सभी भाव = भावात्मक पदार्थों अर्थात् प्रकृति के सभी विकारों का स्वामित्व प्राप्त हो जाना। अर्थात् ज्ञानात्मक और ज्ञेयात्मक समस्त रूपों वाले सत्त्व, रज और तम गुणों के सभी विकार जो कि महत्तत्त्व से लेकर पञ्चमहाभूत पर्यन्त है, और इन पञ्चमहाभूतों के भी जो धर्म परिणाम अर्थात् घट, पट आदि हैं; ये सभी परिणाम परार्थ होने से, पुरुष अर्थात् जीवात्मा के प्रति भोग्य पदार्थों के रूप में उपस्थित हो जाते हैं। योगी इन सभी पर वश्यता = अधिकार को प्राप्त कर लेता है अर्थात् वह इन सभी विकारों के, परिणामी, जड़ और परार्थ रूप को जानता हुआ इनके वश में नहीं होता और इनसे अपने भोग और अपवर्ग रूपी प्रयोजनों को सिद्ध करने में समर्थ होता है।
२. सर्वज्ञातृत्व — योगसूत्र ३.१३ में धर्म, लक्षण, अवस्था परिणामों का विस्तार पूर्वक वर्णन किया गया है। उसकी व्याख्या में यह स्पष्ट किया गया है कि वस्तुतः तो परिणाम एक ही है जो कि धर्म परिणाम होता है, लक्षण परिणाम और अवस्था परिणाम तो मात्र उसी धर्म परिणाम की काल और अवस्था की अपेक्षा से व्याख्या मात्र है। योगी के प्रति सत्त्वादि गुणों का धर्म परिणामों के रूप में उपस्थित हो जाना, पहली सिद्धि सर्वभावा- धिष्ठातृत्व में कहा गया है; यहाँ इनके लक्षण और अवस्था परिणामों के ज्ञान को कहा जा रहा है। महर्षि व्यास कहते हैं कि शान्त = भूत, उदित = वर्त्तमान और व्यपदेश्य = भविष्यत् धर्मों के रूप में स्थित सत्त्वादि गुणों के सभी विकारों / परिणामों का योगी को बिना क्रम के ज्ञान हो जाना ही सर्वज्ञातृत्व है। अर्थात् योगी इस प्रकार सभी पदार्थों के सम्बन्ध में जानता है कि इस विकार / परिणाम का अतीत में क्या स्वरूप था और भविष्यत में क्या होने जा रहा है, इस प्रकार से अतीत, वर्तमान और भविष्यत धर्मों को जान कर उनमें आसक्ति को प्राप्त नहीं करता और वह स्पष्ट रूप से जानता है ये विकार किसी भी लक्षण अथवा अवस्था में हो, ये सभी अपने मूल धर्म अर्थात् जड़, परिणामी और परार्थरूपता को त्याग नहीं करते। योगी का सत्त्वादि गुणों के सम्बन्ध में यही ज्ञान ही सर्वज्ञातृत्व है, अर्थात् इस सम्बन्ध में उसे अन्य ज्ञान की अपेक्षा नहीं रहती।
इस विभूति के परिणामस्वरूप ही योगी इन सत्त्वादि गुणों से भी विरक्त होकर परवैराग्य को प्राप्त करने हेतु पुरुषार्थ करता है। जिसकी प्राप्ति हो जाने पर योगी के लिए कैवल्य का मार्ग खुल जाता है।