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Vibhuti Paada / Attainments / 6
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Vibhuti Paada / Attainments / 6

तस्य भूमिषु विनियोगः॥६॥

Padas Name : Vibhuti Paada / Attainments | Sutra No : 6

In Hindi:

पदपाठ : तस्य भूमिषु विनियोगः॥

हिंदी में अर्थ : (तस्य) उस संयम का (भूमिषु) योग की विभिन्न भूमियों में (विनियोगः) उपयोग लेना चाहिए॥

व्यास भाष्य : तस्य संयमस्य जितभूमेर्याऽनन्तरा भूमिस्तत्र विनियोगः। न ह्यजिताधरभूमिरनन्तरभूमिं विलङ्घ्य प्रान्तभूमिषु संयमं लभते। तदभावाच्च कुतस्तस्य प्रज्ञालोकः। ईश्वरप्रसादाज्जितोत्तरभूमिकस्य च नाधरभूमिषु परचित्तज्ञानादिषु संयमो युक्तः। कस्मात्? तदर्थस्यान्यत एवावगतत्वात्। भूमेरस्या इयमनन्तरा भूमिरित्यत्र योग एवोपाध्यायः। कथम्? एवं ह्युक्तम् —

योगेन योगो ज्ञातव्यो योगो योगात्प्रवर्त्तते।

योऽप्रमत्तस्तु योगेन स योगे रमते चिरम्॥ इति॥

हिंदी में अर्थ : (तस्य) उस (संयमस्य) संयम की (जितभूमेः) जितभूमि = जिस भूमि (= अवस्था) को जीत लिया है, उस का (या) जो (अनन्तरा) व्यवधान रहित अग्रिम क्रम प्राप्त (भूमिः) भूमि है, (तत्र) उसमें (विनियोगः) विनियोग = उपयोग करना चाहिए। (हि) क्योंकि (अजिताधरभूमिः) अधर = नीचे की भूमियों = अवस्थाओं को जीते बिना योगी (अनन्तरभूमिम्) उत्तर की = उसके बाद की भूमि को (विलङ्घ्य) उल्लंघन करके = छोड़कर के (प्रान्तभूमिषु) उच्च भूमियों = अवस्थाओं में (संयमम्) संयम को (न लभते) प्राप्त नहीं कर सकता। (च) और (तदभावात्) उस संयम के न होने से (तस्य) उस अजितभूमि वाले योगी को (कुतः प्रज्ञालोकः) प्रज्ञालोक = समाधिप्रज्ञा के आलोक की प्राप्ति कैसे हो सकती है? (ईश्वरप्रसादात्) ईश्वर की कृपा = अनुग्रह से (जितोत्तरभूमिकस्य च) उत्तर = अगली भूमियों को जीते हुए योगी का (नाधरभूमिषु) नीचे की = पूर्व की भूमियों में, यथा (परचित्तज्ञानादिषु) परचित्तज्ञान आदि भूमियों = अवस्थाओं में (संयमः) संयम करना (न युक्तः) अपेक्षित नहीं है। (कस्मात्) क्यों अपेक्षित नहीं है ? क्योंकि (तदर्थस्य) उस अर्थ = उत्तर भूमि जय का, (अन्यतः एव) संयम से अन्य ही कारण = ईश्वर के अनुग्रह से (अवगतत्वात्) सिद्ध होने से, पूर्व की भूमियों में संयम की अपेक्षा नहीं होती।

(अस्या भूमेः) इस भूमि के (अनन्तरा) अनन्तर = पश्चात् (इयम् भूमिः) यह भूमि है, (इति अत्र) इस विषय में (योग एव) योग = योग का अभ्यास ही (उपाध्यायः) उपाध्याय = गुरु होता है। (कथम्) कैसे ? (एवम् हि उक्तम्) क्योंकि ऐसा कहा गया है — (योगः) योग, (योगेन) योग से (ज्ञातव्यः) जानने योग्य है, (योगात्) योग के अभ्यास से (योगः) योग (प्रवर्त्तते) प्रवृत्त होता = आगे बढ़ता है। (यः तु) जो योगी योग साधनों में (अप्रमत्तः) प्रमाद नहीं करता, (योगेन) योग के अभ्यास से ही (सः) वह योगी (योगे रमते चिरम् इति) दीर्घकाल पर्यन्त योग में रमण करता है॥

वैदिक योग मीमांसा : योगी जिस-जिस पदार्थ अथवा विषय (ज्ञानात्मक) में संयम करता है, उसे उस-उस पदार्थ अथवा विषय में समाधिप्रज्ञा की प्राप्ति होती है। इस प्रकार प्रज्ञालोक = समाधिप्रज्ञा को प्राप्त करते हुए साधक को चाहिए कि वह उस समाधिप्रज्ञा को, आगे की भूमियों में अर्थात् अधिक सूक्ष्म पदार्थो तथा विषयों में, संयम हेतु प्रयोग करे और उस-उस पदार्थ तथा विषय में समाधिप्रज्ञा को प्राप्त करे।

योग की विभिन्न भूमियाँ कौन सी हैं ? महर्षि व्यास ने इसका व्याख्या में कोई निर्देश नहीं किया। इस विषय में जबकि महर्षि पतञ्जलि ने समाधिपाद में वितर्क, विचार, आनन्द और अस्मितानुगत सम्प्रज्ञात समाधियाँ और निर्बीज समाधि के रूप में निर्देश किया है। साधक स्थूल पदार्थों के आलम्बन से आरम्भ करता हुआ, सूक्ष्म पदार्थों और मूल प्रकृति, तथा स्वयं के आलम्बन से सम्प्रज्ञात समाधि की विभिन्न अवस्थाओं को प्राप्त करता है; और अन्त में परमात्मा को लक्ष्य जानता हुआ, असम्प्रज्ञात समाधि में परमात्म-साक्षात्कार को भी प्राप्त करता है। महर्षि पतञ्जलि ने विभिन्न विषयों (ज्ञानात्मक एवं क्रियात्मक) में संयम से होने वाली सिद्धियों का वर्णन, यहाँ विभूतिपाद में किया है। ये विषय भूत और इन्द्रियों के परिणाम त्रय (३.१६) से आरम्भ होकर विवेकजज्ञान (३.५२) तक कहे गए हैं। व्यासभाष्य में “परचित्तज्ञानादिषु संयमः” के कथन से, समाधि हेतु विभिन्न भूमियों के रूप में उपरोक्त विषयों को भी जानना चाहिए। इन विषयों में कौन सा विषय अधर = पूर्व की भूमि है और कौन सा उत्तर की भूमि है, यह तो योग के सम्यक् अभ्यास से ही साधक को ज्ञात होता है। इसी प्रकार महर्षि व्यास ने योगसूत्र ३.५१ तथा ३.५४ के भाष्य में “मधुमतिं भूमिम्” कहा है। इससे यह जानना चाहिए कि महर्षि व्यास ने योगसूत्र ३.५१ की व्याख्या में जो चार प्रकार के योगी कहे हैं — प्राथमकाल्पिक, मधुभूमिक, प्रज्ञाज्योति तथा अतिक्रान्तभावनीय, जो कि योग में विभिन्न अवस्थाओं की प्राप्ति वाले होते हैं, भी योग की भूमियाँ हैं।

शंका — क्या विभूतिपाद में कहे गए सभी विषयों में संयम, सभी साधकों के लिए आवश्यक है, अथवा क्या ये सभी विषय ही योग की विभिन्न भूमियों के रूप में जाने जाए, जिनकी प्राप्ति आवश्यक है ?

समाधान — नहीं, ऐसा नहीं है। इन विषयों में संयम से होने वाली विभूतियों का, योग के चरम लक्ष्य मोक्षप्राप्ति से कोई सम्बन्ध नहीं है। बहुसंख्यक सिद्धियाँ आगे की अवस्थाओं की प्राप्ति हेतु और समाधि हेतु भी विघ्न रूप में हैं। अतः इन सभी को क्रमशः योग की भूमियाँ नहीं कहा जा सकता। योग के चरम लक्ष्य परमात्म-प्राप्ति को अपना लक्ष्य जानने वाले योगी के लिए तो, ये विषय किसी भी प्रकार से योग की भूमियाँ नहीं हो सकते। हाँ, उन योगियों से इतर साधकों यथा विदेह, प्रकृतिलय आदि योगियों के लिए ये सिद्धियाँ योग की विभिन्न भूमियाँ हो सकती हैं, और इसका सम्यक् ज्ञान उस साधक को तत्-तत् विषयों में अभ्यास करने से ज्ञात होगा। दूसरी ओर परमात्म-साक्षात्कार को अपना लक्ष्य मानने वाले योगी के लिए वितर्कानुगत से आरम्भ करते हुए, विचारानुगत, आनन्दानुगत, अस्मितानुगत सम्प्रज्ञात समाधियों की प्राप्ति, तदुपरान्त पर-वैराग्य के अभ्यास से असम्प्रज्ञात समाधि का सम्यक् अनुष्ठान ही एक मात्र मार्ग है।

महर्षि व्यास कहते हैं कि अधर = नीचे की भूमियों को जीते बिना, आगे की भूमि को भी छोड़कर, उच्च भूमियों में संयम को करना साधक के लिए सम्भव नहीं होता। जब किसी भूमि विशेष में संयम नहीं हो पायेगा तो साधक को उस विषय में समाधिप्रज्ञा, ऋतम्भराप्रज्ञा की प्राप्ति भी सम्भव नहीं हो पायेगी। परन्तु जिस पुरुष ने पूर्व जन्मों में साधना की होती है, वह साधक ईश्वर के अनुग्रह से आरम्भ में अथवा अल्प अभ्यास से ही योग की उच्च भूमि में संयम को प्राप्त कर लेता है। ऐसे योगी के लिए उस भूमि से नीचे की भूमियों में संयम की आवश्यकता नहीं रहती। परन्तु यह नियम विशिष्ट योगियों के लिए ही लागू होता है। क्योकि ईश्वर परम न्यायकारी है, और वह किसी पुरुष को उसके पूर्वकृत पुरुषार्थ के बिना, अपनी इच्छा मात्र से, कोई फल नहीं देता। अतः सामान्य साधक को क्रम से ही चलना चाहिए।

किस भूमि के पश्चात् कौन सी भूमि है ? अथवा किसी विषय में कितने अभ्यास के उपरान्त योगी अगले स्तर के आलम्बन को अपनाए ? अर्थात् सवितर्क सम्प्रज्ञात समाधि में कितने अभ्यास अथवा किस उपलब्धि के उपरान्त योगी निर्वितर्क सम्प्रज्ञात समाधि का अभ्यास करे ? (इसी प्रकार आगे के स्तरों में भी क्रमशः जानना चाहिए।) इसको जानने के लिए महर्षि व्यास कहते हैं कि इस विषय में योग ही योग का गुरु है। योग के सम्यक् अभ्यास से परमात्मा योगी को क्रमशः अगले-अलगे स्तरों का ज्ञान कराता जाता है। इस प्रकार प्रमाद हीन योगी, योग के सम्यक् अभ्यास से ही अन्तिम भूमि को प्राप्त करता हुआ ईश्वर के आनन्द में मग्न हो जाता है और शरीरपात् के उपरान्त ईश्वर की व्यवस्था में मुक्ति को भी प्राप्त करता है।