In Hindi:
पदपाठ : त्रयम् अन्तरङ्गम् पूर्वेभ्यः॥
हिंदी में अर्थ : सम्प्रज्ञात समाधि की सिद्धि के लिए (त्रयम्) धारणा, ध्यान, समाधि रूपी तीन अङ्ग (पूर्वेभ्यः) पूर्व के पाँच अङ्गों — यम, नियम, आसन, प्राणायाम, प्रत्याहार की अपेक्षा से (अन्तरङ्गम्) अन्तरङ्ग है॥
महर्षि दयानन्द कृत अर्थ : “यमादिक पाँच अङ्गों से धारणा, ध्यान और समाधि ये तीन अन्तरङ्ग हैं और यमादिक बहिरङ्ग हैं।” (ऋषि दयानन्द का पण्डित ताराचरण तर्करत्न से “प्रतिमापूजन विचार” पर शास्त्रार्थ से — द्र० ऋषि दयानन्द के पत्र और विज्ञापन भाग १, पृष्ठ २९-३०)
व्यास भाष्य : तदेतद्धारणाध्यानसमाधित्रयमन्तरङ्गं सम्प्रज्ञातस्य समाधेः पूर्वेभ्यो यमादिभ्यः पञ्चभ्यः साधनेभ्य इति॥
हिंदी में अर्थ : (तत् एतत्) वह यह (धारणाध्यानसमाधित्रयम्) धारणा, ध्यान और समाधि — ये तीनों (पूर्वेभ्यः) पूर्व कहे (यमादिभ्यः पञ्चभ्यः) पाँच — यम, नियम, आसन, प्राणायाम और प्रत्याहार (साधनेभ्यः) योग के अङ्गों की अपेक्षा से (सम्प्रज्ञातस्य समाधेः) सम्प्रज्ञात समाधि के (अन्तरङ्गम् इति) अन्तरङ्ग साधन हैं॥
वैदिक योग मीमांसा : सम्प्रज्ञात समाधि की सिद्धि में धारणा, ध्यान और समाधि अन्तरङ्ग साधन हैं। अर्थात् इनके सम्यक् अनुष्ठान से ही योगी सम्प्रज्ञात समाधि को प्राप्त करने में समर्थ होता है। जबकि यम नियम आदि के अनुष्ठान मात्र से सम्प्रज्ञात समाधि सिद्ध नहीं होती। यम नियम के पालन के द्वारा साधक चित्त के दोषों को दूर करता हुआ, आसन-प्राणायाम-प्रत्याहार रूपी अङ्गों के द्वारा शरीर एवं चित्त की स्थिरता का अभ्यास करता हुआ, धारणादि की योग्यता को प्राप्त करता है। परन्तु धारणा-ध्यान-समाधि के सम्यक् अनुष्ठान बिना सम्प्रज्ञात समाधि की प्राप्ति नहीं होती। अतः यम-नियमादि परम्परा से सहायक होते हुए, सम्प्रज्ञात समाधि की सिद्धि में बहिरङ्ग साधन ही कहलाते हैं। दूसरी ओर धारणा, ध्यान और समाधि का अनुष्ठान ही सम्प्रज्ञात समाधि की सिद्धि में प्रत्यक्ष रूप से सहायक होने से, ये तीनों अन्तरङ्ग साधन कहे जाते हैं।
शंका — योगसूत्र १.२३ में “ईश्वरप्रणिधान” को समाधिसिद्धि का शीघ्रतम उपाय कहा है, जिससे यह ज्ञात होता है कि “ईश्वरप्रणिधान” असम्प्रज्ञात समाधि की प्राप्ति का निकटतम उपाय है। दूसरी ओर “ईश्वरप्रणिधान” को महर्षि पतञ्जलि ने योगसूत्र २.३२ में नियमों में कहा है; और प्रस्तुत सूत्र ३.७ में नियमों को धारणादि की अपेक्षा से बहिरङ्ग साधन कहा है। ऐसी अवस्था में “ईश्वरप्रणिधान” को समाधि का बहिरङ्ग साधन जानना चाहिए अथवा अन्तरङ्ग साधन?
समाधान — “ईश्वरप्रणिधान” समाधि सिद्धि का बहिरङ्ग साधन भी है, और अन्तरङ्ग भी। जब साधक योगाभ्यास को आरम्भ करता हुआ, आन्तरिक शुद्धि हेतु, नियम के रूप में “ईश्वरप्रणिधान” का पालन करता है, अर्थात् वह अपने “सब सामर्थ्य, गुण, प्राण, आत्मा और मन के प्रेम भाव से आत्मादि द्रव्यों को ईश्वर के अर्पित करता” (महर्षि दयानन्द द्वारा योगसूत्र २.३२ पर अर्थ — ऋ० भू॰ उपासनाविषय) तो यह सम्प्रज्ञात समाधि की सिद्धि हेतु बहिरङ्ग साधन रहता है। इस काल में साधक ईश्वरप्रणिधान द्वारा ईश्वर के प्रति अर्पित होता हुआ, अंहकार से दूर रहता हुआ, राजसिक और तामसिक वृत्तियों का निरोध करता हुआ, चित्त को सत्त्वगुण प्रधान बना, उसकी एकाग्रता को प्राप्त करने में समर्थ होता है।
जब साधक अस्मितानुगत सम्प्रज्ञात समाधि की अवस्था में पुरुषख्याति = आत्मसाक्षात्कार के उपरान्त विवेकख्याति को भी हेय जानता हुआ, उसके प्रति भी विरक्त होकर, परवैराग्य के द्वारा सत्त्वादि गुणों के प्रति भी तृष्णारहित हो जाता है, तो वह असम्प्रज्ञात समाधि को प्राप्त करने में समर्थ होता है। यहाँ योगी तीव्र परवैराग्य के साथ-साथ जब “ईश्वरप्रणिधान” का भी पालन करता है, तो योगी असम्प्रज्ञात समाधि की सिद्धि और समाधिफल कैवल्य को शीघ्र प्राप्त करने में समर्थ होता है। (इस पर विशेष व्याख्यान हेतु योगसूत्र १.२३ की व्याख्या देखें) अतः इस प्रकार “ईश्वरप्रणिधान” असम्प्रज्ञात समाधि हेतु अन्तरङ्ग साधन होता है।