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Vibhuti Paada / Attainments / 8
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Vibhuti Paada / Attainments / 8

तदपि बहिरङ्गं निर्बीजस्य॥८॥

Padas Name : Vibhuti Paada / Attainments | Sutra No : 8

In Hindi:

पदपाठ : तत् अपि बहिरङ्गम् निर्बीजस्य॥

हिंदी में अर्थ : (तदपि) सम्प्रज्ञात समाधि के अन्तरङ्ग धारणा-ध्यान-समाधि भी (निर्बीजस्य) असम्प्रज्ञात समाधि के (बहिरङ्गम्) बहिरङ्ग साधन हैं॥

व्यास भाष्य : तदप्यन्तरङ्गं साधनत्रयं निर्बीजस्य योगस्य बहिरङ्गं भवति। कस्मात्। तदभावे भावादिति॥

हिंदी में अर्थ : (तत् साधनत्रयम्) वे धारणा-ध्यान-समाधि रूपी तीन साधन (अन्तरङ्गम्) सम्प्रज्ञात समाधि के अन्तरङ्ग होते हुए (अपि) भी (निर्बीजस्य योगस्य) निर्बीज = असम्प्रज्ञात समाधि के (बहिरङ्गम्) बहिरङ्ग साधन (भवति) होते हैं। (कस्मात्) किस कारण से ? (तद् अभावे) उन धारणा-ध्यान-समाधि का अभाव = निरोध होने पर (भावात् इति) असम्प्रज्ञात समाधि की सिद्धि होती है॥

वैदिक योग मीमांसा : यमनियमादि परम्परा से सम्प्रज्ञात समाधि की सिद्धि में साधन होते हुए भी बहिरङ्ग साधन हैं, जबकि धारणा-ध्यान-समाधि का सम्यक् अनुष्ठान, सम्प्रज्ञात समाधि की सिद्धि का प्रत्यक्ष साधन होने से, ये तीनों अन्तरङ्ग साधन कहलाते हैं। यहाँ निर्बीज समाधि की सिद्धि में धारणा-ध्यान-समाधि को भी बहिरङ्ग साधन ही कहा गया हैं, क्योंकि इनका भी अभाव = निरोध होने पर निर्बीज = असम्प्रज्ञात समाधि की प्राप्ति होती है। वस्तुतः धारणा-ध्यान-समाधि में किसी एक विषय की एकाग्रता का सम्पादन करते हुए, उस विषय के अर्थमात्र का साक्षात्कार होता है — जो कि सम्प्रज्ञात समाधि का विषय / आलम्बन होता है। परन्तु असम्प्रज्ञात समाधि में तो, सम्प्रज्ञात समाधि में ज्ञात कोई भी विषय अथवा पदार्थ आलम्बन नहीं रहता। ऐसे में धारणा-ध्यान-समाधि निर्बीज = असम्प्रज्ञात समाधि की सिद्धि में सहायक सिद्ध नहीं होते। परन्तु सम्प्रज्ञात समाधि तक की भूमियों को जय किये बिना, योगी, असम्प्रज्ञात समाधि की प्राप्ति में समर्थ नहीं हो सकता, अतः ये धारणा-ध्यान-समाधि रूपी तीनों अङ्ग बहिरङ्ग कहलाते हैं। इनका, अर्थात् आलम्बित विषयों / पदार्थों में एकाग्रता और उनके अर्थमात्र के साक्षात्कार का, अभाव होने पर ही योगी असम्प्रज्ञात समाधि की प्राप्ति में सफल हो पाता है।

असम्प्रज्ञात समाधि के अन्तरङ्ग साधनों का कथन, इस सूत्र अथवा इसके भाष्य में नहीं है। महर्षि पतञ्जलि ने योगसूत्र १.२१ में तीव्र संवेग = परवैराग्य तथा योगसूत्र १.२३ में ईश्वरप्रणिधान को इस समाधि का प्रत्यक्ष साधन कहा है अतः ये दोनों ही इस असम्प्रज्ञात समाधि की सिद्धि में अन्तरङ्ग साधन हैं। इन उपायों की मृदुता, मध्यता और तीव्रता के स्तर के अनुसार ही योगी को असम्प्रज्ञात समाधि और उसके फल की प्राप्ति, देर से अथवा शीघ्र, होती है।

ईश्वरप्रणिधान की असम्प्रज्ञात समाधि में अन्तरङ्गता को शास्त्रकारों ने इस प्रकार कहा है — “ईश्वर में भक्तिविशेष होने से मन का समाधान होके मनुष्य समाधियोग का शीघ्र प्राप्त हो जाता है।” (ऋ० भू॰ उपासनाविषय — महर्षि दयानन्द) अर्थात् ईश्वर की भक्ति विशेष से योगी मन = चित्त में सभी शंकाओं, द्वन्द्वों का समाधान करता हुआ अर्थात् जब वह, प्रकृति को हेय और परमात्मा को उपादेय जानता हुआ, प्रकृति के आलम्बन का सभी प्रकार से निरोध करता हुआ, परमात्मा के स्वरूप में मग्न होता है तो इस अवस्था = असम्प्रज्ञात समाधि को प्राप्त करता है।