In Hindi:
महर्षि दयानन्द व्याख्या : ३. गृहाश्रमप्रकरणम्
१ पुनस्ते का चिकीर्षास्ति? फिर तुझको क्या करने की इच्छा है?
२ गृहाश्रमस्य। गृहस्थाश्रम की।
३ किं च भोः पूर्णविद्यस्य जितेन्द्रियस्य परोपकारकरणाय संन्यासाश्रमग्रहणं शास्त्रोक्तमस्ति तत् किं न करिष्यसि? क्यों! जिसको पूर्ण विद्या और जो जितेद्रिय है उसको परोपकार करने के लिये संन्यासाश्रम का ग्रहण करना शास्त्रोक्त है, क्या इसको न करोगे?
४ किं गृहाश्रमे परोपकारो न भवति? क्या गृहाश्रम में परोपकार नहीं हो सकता?
५ यादृशः संन्यासाश्रमिणा कर्तुं शक्यते न तादृशो गृहाश्रमिणाऽनेककार्यैः प्रतिबन्धकत्वेन भ्रमणाशक्यत्वात्। जैसा संन्यासाश्रमी से मनुष्यों का उपकार हो सकता है वैसा गृहाश्रमी से नहीं हो सकता, क्योंकि इसको अनेक कामों की रुकावट से सर्वत्र भ्रमण ही नहीं हो सकता।