In Hindi:
महर्षि दयानन्द व्याख्या : ४. भोजनप्रकरणम्
१ नित्यः स्वाध्यायो जातो भोजनसमय आगतो गन्तव्यम्। *१आज का पढ़ना-पढ़ाना हो गया, भोजन समय आया, चलना चाहिये।
[*१. मूल में ‘आज का’ ही पाठ है, अतः हमने ‘नित्य का’ न रखकर ‘आज का’ ही रखना उपयुक्त समझा है। सम्पादक]
२ तव पाकशालायां प्रत्यहं भोजनाय किं किं पच्यते? तुम्हारी पाकशाला में प्रतिदिन भोजन के लिये क्या क्या पकाया जाता है?
३ शाकसूपौदश्वित्कौदनरोटिकादयः। शाक, दाल, कढ़ी, भात, रोटी, चटनी आदि।
४ किं वः पायसादिमधुरेषु रुचिर्नास्ति? क्या आप लोगों की खीर आदि मीठे भोजन में रुचि नहीं है?
५ अस्ति खलु परन्तवेतानि कदाचित् कदाचिद् भवन्ति। है, परन्तु ये चीजें कभी कभी बनती हैं।
६ कदाचिच्छष्कुलीश्रीखण्डादयोऽपि भवन्ति न वा? कभी पूरी, कचोरी, श्रीखण्डादि भी होते हैं वा नहीं?
७ भवन्ति, परन्तु यथर्त्तुयोगम्। होते हैं, परन्तु जैसा ऋतु होता है वैसे ही भोजन बनते हैं।
८ सत्यमस्माकमपि भोजनादिकमेवमेव निष्पद्यते। ठीक है, हमारे भी भोजन ऐसे ही बनते हैं।
९ त्वं भोजनं करिष्यसि न वा? तू भोजन करेगा वा नहीं?
१० अद्य न करोम्यजीर्णतास्ति। आज नहीं करता अजीर्णता है।
११ अधिकभोजनस्येदमेव फलम्। अधिक भोजन का यही फल है।
१२ बुद्धिमता तु यावज्जीर्यते तावदेव भुज्यते। बुद्धिमान् पुरुष तो जितना पचे, उतना ही खाता है।
१३ अतिस्वल्पे भुक्ते शरीबलं ह्रसत्यधिके चातः सर्वदा मिताहारी भवेत्। बहुत कम और अत्यधिक भोजन करने से शरीर का बल घट जाता है, इससे सब दिन मिताहारी होवे।
१४ योऽन्यथाहारव्यवहारौ करोति स कथं न दुःखी जायेत? जो उलट-पलट आहार और व्यवहार करता है, वह क्यों न दुःखी होवे?
१५ येन शरीराच्छ्रमो न क्रियते स नैव शरीरसुखमाप्नोति। जो शरीर से परिश्रम नहीं करता वह शरीर के सुख को प्राप्त नहीं होता।
१६ येनात्मना पुरुषार्थो न विधीयते तस्यात्मनो बलमपि न जायते। जो आत्मा से पुरुषार्थ नहीं करता उसका आत्मा का बल भी नहीं बढ़ता।
१७ तस्मात्सर्वैर्मनुष्यैर्यथाशक्ति सत्क्रिया नित्यं साधनीया। इससे सब मनुष्यों को उचित है कि शरीर और आत्मा से उत्तम कर्मों की साधना नित्य करें।
१८ भो देवदत्त! त्वामहं निमन्त्रये। हे देवदत्त! तुझ को मैं भोजन के लिये निमन्त्रित करता हूँ।
१९ मन्येऽहं कदा खल्वागच्छेयम्? मैं मानता हूँ, परन्तु किस समय आऊँ?
२० श्वो द्वितीयप्रहरमध्ये आगन्तासि। कल दोपहर दिन चढ़े आना।
२१ आगच्छ भो आसनमध्यास्व त्वया ममोपरि महती कृपा कृता। आप आइये, आसन पर बैठिये, तुमने मुझ पर बड़ी कृपा की।