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देशदेशान्तरप्रकरणम्

In Hindi:

महर्षि दयानन्द व्याख्या : ५. देशदेशान्तरप्रकरणम्

१ भवानेतान् जानातीमे महाविद्वांसः सन्ति। आप इनको जानते हैं? ये बड़े विद्वान् हैं।

२ किन्नामान एते कुत्रत्याः खलु? इनके क्या क्या नाम और ये कहां-कहां के रहने वाले हैं?

३ अयं यज्ञदत्तः काशीनिवासी। यह यज्ञदत्त काशी में निवास करता है।

४ विष्णुमित्रोऽयं कुरुक्षेत्रवास्तव्यः। यह विष्णुमित्र कुरुक्षेत्र में बसता है।

५ सोमदत्तोऽयं माथुरः। यह सोमदत्त मथुरा में रहता है।

६ अयं सुशर्मा पर्वतीयः। यह सुशर्मा पर्वत में रहता है।

७ अयमाश्वलायनो दाक्षिणात्योऽस्ति। यह आश्वलायन दक्षिणी है।

८ अयं जयदेवः पाश्चात्यो वर्तते। यह जयदेव पश्चिमदेशवासी है।

९ अयं कुमारभट्टो बाङ्गो विद्यते। यह कुमारभट्ट बंगाली है।

१०. अयं कापिलेयः पाताले निवसति। यह कापिलेय पाताल अर्थात् अमेरिका में रहता है।

११ अयं चित्रभानुर्हरिवर्षस्थः। यह चित्रभानु हिमालय से उत्तर हरिवर्ष अर्थात् यूरोप में रहता है।

१२ इमौ सुकामसुभद्रौ चीननिकायौ। ये सुकाम और सुभद्र चीन के वासी हैं।

१३ अयं सुमित्रो गन्धारस्थायी। यह सुमित्र गन्धार अर्थात् काबुल कन्धार का रहनेवाला है।

१४ अयं सुभटो लङ्काजः। यह सुभट लंका में जन्मा है।

१५ इमे पंच सुवीरातिबलसुकर्मसुधर्म-शतधन्वानो मत्स्याः। सुवीर, अतिबल, सुकर्मा, सुधर्मा और शतधन्वा ये पांच मारवाड़ के रहनेवाले हैं।

१६ एते मयाऽऽमन्त्रिताः स्वस्वस्थानादागताः। ये सब मेरे बुलाने पर अपने अपने घर से आये हैं।

१७ इमे शिवकृष्णगोपालमाधवसुचन्द्रप्रक्रमभूदेवचित्रसेनमहारथा नवात्रत्याः। शिव, कृष्ण, गोपाल, माधव, सुचन्द्र, प्रक्रम, भूदेव, चित्रसेन और महारथ ये नव इस मध्य देश के रहनेवाले हैं।

१८ अहोभाग्यं मेऽस्ति त्वत्कृपयैतेषामपि समागमो जातः। मेरा बड़ा भाग्य है कि आप की कृपा से इन सत्पुरुषों का भी मिलाप हुआ।

१९ अहमपि सभवतः सर्वानेतान्निमन्त्रयितुमिच्छामि। मैं भी आपके समेत इन सब का निमन्त्रण करना चाहता हूँ।

२० अस्माभिर्भवन्निमन्त्रणमूरीकृतम्। हमने आपका निमन्त्रण स्वीकार किया।

२१ सत्कृतोऽस्मि, परन्तु भवद्भोजनार्थं किं किं पक्तव्यम्? यद्यद्भोक्तुमिच्छास्ति तत्तदनुज्ञापयन्तु। आपके निमन्त्रण मानने से मैं बड़ा प्रसन्न हुआ परन्तु [आपके भोजन के लिये क्या-क्या पकाया जाय?] जिस जिस पदार्थ के जीमने की इच्छा हो, उस-उस की मुझको आज्ञा कीजिये।

२२ भवान् देशकालज्ञः कथनेन किम्? यथायोग्यं पक्तव्यम्। आप देशकाल को जानते ही हैं, कहने से क्या लाभ? जैसा उचित हो वैसा पकाया जाय।

२३ सत्यमेवमेव करिष्यामि। ठीक है, ऐसा ही करूंगा।

२४ उत्तिष्ठत भोजनसमय आगतः पाकः सिद्धो वर्तते। उठिये, भोजन-समय हुआ, पाक तैयार हुआ है।

२५ भो भृत्य! पाद्यमर्घ्यमाचमनीयं जलं देहि। हे नौकर! इनको पग, हाथ, मुख धोने के लिये जल दे।

२६ इदमानीतं जलं गृह्यताम्। यह लाया जल लीजिये।

२७ भोः पाचकाः! सर्वान् पदार्थान् क्रमेण परिवेविष्ट। हे पाचक लोगो! सब पदार्थों को क्रम से परोसो।

२८ भुञ्जीध्वम्। भोजन कीजिये।

२९ भोजनस्य सर्वे पदार्थाः श्रेष्ठा जाता न वा? भोजन के सब पदार्थ अच्छे हुए हैं वा नहीं?

३० अत्युत्तमाः सम्पन्नाः किं कथनीयम्। क्या कहना है, बड़े उत्तम हुए हैं।

३१ भवता किञ्चित् पायसं ग्राह्यं वा यस्येच्छाऽस्ति। आप थोड़ी सी खीर लीजिये वा जिसकी इच्छा हो।

३२ प्रभूतं भुक्तं तृप्ताः स्मः। बहुत रुचि से भोजन किया, तृप्त हो गये।

३३ तर्ह्युत्तिष्ठत। तो उठिये।

३४ जलं देहि। जल दे।

३५ गृह्यताम्। लीजिये।

३६ ताम्बूलादीन्यानीयन्ताम्। पान बीडे़, इलायची आदि लाओ।

३७ इमानि सन्ति गृह्णन्तु। ये हैं, लीजिये।