In Hindi:
महर्षि दयानन्द व्याख्या : ९. शत्रुवशकरणप्रकरणम्
१ एते शत्रुभिः सह कथं वर्तेरन्? ये लोग शत्रु के साथ कैसे वर्तें?
२ राजप्रजोत्तमपुरुषैररयः सामदानभेद-दण्डैर्वशमानेयाः। राजा और प्रजा के श्रेष्ठ पुरुषों को योग्य है कि अरियों को (साम) मिलाप, (दान) कुछ देना, (भेद) आपस में उनकी फूट कराके और (दण्ड) उनको दण्ड करके वश में करने चाहियें।
३ सदा स्वराज्यप्रजासेनाकोषधर्मविद्या-सुशिक्षा वर्द्धनीयाः। सब दिन अपना राज्य, प्रजा, सेना, कोष, धर्म्म, विद्या और श्रेष्ठशिक्षा बढ़ाते रहना चाहिये।
४ यथाऽधर्माविद्यादुष्टशिक्षादस्युचोरादयो न वर्द्धेरँस्तथा सततमनुष्ठेयम्। जिस प्रकार से अधर्म, अविद्या, बुरी शिक्षा, डाकू और चोर आदि न बढ़ें, वैसा निरन्तर पुरुषार्थ करना चाहिये।
५ धार्मिकैः सह कदाचिन्नैव योद्धव्यम्। धर्मात्माओं के साथ कभी भी लड़ाई न करनी चाहिये।
६ निर्जिता अपि दुष्टा विनयेन सत्कर्त्तव्याः। पराजित शत्रुओं का भी विनय के साथ मान्य करना चाहिये।
७ राजप्रजे अन्तःप्राणवत् परस्परं सम्पोष्ये नैव कर्षणीये। राजा और प्रजा एक दूसरे की पुष्टि करके सदा सुखी रहें। किन्तु एक दूसरे को निर्बल न करें।
८ कर्षिते क्षयरोगवदुभे विनश्यतः। एक दूसरे को निर्बल करने से दमा (क्षय) रोग के समान दोनों निर्बल होकर नष्ट हो जाते हैं।
९ सदा ब्रह्मचर्यविद्याभ्यां शरीरात्म-बलमेधनीयम्। सब काल में ब्रह्मचर्य और विद्या से शरीर और आत्मा का बल बढ़ाते रहना चाहिये।
१० यथादेशकालं पुरुषार्थेन यथावत् कर्माणि कृत्वा सर्वथा सुखयितव्यम्। देश काल के अनुकूल उद्यम से ठीक-ठीक कर्म करके सब प्रकार सुखी रहना चाहिये।