In Hindi:
महर्षि दयानन्द व्याख्या : ११. कुसीदग्रहणप्रकरणम्
१ यद्येकवारं दद्याद् गृह्णीयाच्च तर्हि कुसीदवृद्धेर्द्वैगुण्ये धर्मोऽधिकेऽधर्म इति वेदितव्यम्। जो एक वार दें लें तो ब्याजवृद्धि सहित मूलधन द्विगुणा तक लेके आसामी को अनृण करने में धर्म और अधिक लेने में
अधर्म होता है, ऐसा जानना चाहिये।
२ प्रतिमासं प्रतिवर्षं वा यदि कुसीदं गृह्णीयाद्यदा समूलं द्विगुणं धनमागच्छेत्तदा मूलमपि त्याज्यम्। जो महीने-महीने अथवा वर्ष वर्ष में ब्याज लेता जाय तो भी जब दूना धन आ जाय फिर आगे आसामी से कुछ भी न लेना चाहिये।