In Hindi:
महर्षि दयानन्द व्याख्या : २२. साक्षिप्रकरणम्
१ भोः साक्षिन्! त्वमत्र किमपि जानासि न वा? हे गवाह! तू इस विषय में कुछ जानता है वा नहीं?
२ जानामि। जानता हूँ।
३ यादृशं जानासि तादृशं सत्यं वद। जैसा जानता है वैसा सच कह।
४ सत्यं वदामि। सच कहता हूँ।
५ अस्मादनेन मत्समक्षे सहस्रं मुद्रा गृहीताः। इससे इसने मेरे सामने हजार रुपये लिये थे।
६ ओ भृत्य! तं शीघ्रमानय। ओ नौकर! उसको जल्दी ले आ।
७ आनयामि। लाता हूँ।
८ गच्छ राजसभायां राज्ञा त्वमाहूतोऽसि। चल राजसभा में राजा ने तुझको बुलाया है।
९ चलामि। चलता हूँ।
१० भो राजन्! उपस्थितः सः। हे राजन्! वह यहां आया है।
११ त्वयाऽस्यर्णं कुतो न दीयते? तू इसका ऋण क्यों नहीं देता?
१२ अस्मिन् समये तु मम सामर्थ्यं नास्ति षण्मासानन्तरं दास्यामि। इस समय तो मेरा सामर्थ्य नहीं है, परन्तु छः महीनों के पीछे दूंगा।
१३ पुनर्विलम्बन्तु न करिष्यसि? फिर देर तो न करेगा?
१४ महाराज! कदापि न करिष्यामि। महाराज! कभी न करूंगा।
१५ अच्छगच्छ धनपाल! यदि सप्तमे मास्ययं न दास्यति तर्ह्येनं निगृह्य दापयिष्यामि। अच्छा जाओ धनपाल! जो यह सातवें महीने में न देगा तो इसको पकड़ के दिला दूंगा।
१६ अनेन मम शतं मुद्रा गृहीता अधुना न ददाति। इसने मेरे सौ रुपैये लिये, अब नहीं देता।
१७ किं च भो! यदयं वदति तत् सत्यं न वा? क्योंजी! जो यह कहता है वह सच है वा नहीं?
१८ मिथ्यैवाऽस्ति। झूठ ही है।
१९ अहं तु जानाम्यपि नाऽस्य मुद्रा मया कदा स्वीकृताः। मैं तो जानता भी नहीं कि इसके रुपये मैंने कब लिये थे।
२० उभयोस्साक्षिणः सन्ति न वा? दोनों के गवाह लोग हैं वा नहीं हैं?
२१ सन्ति। हैं।
२२ कुत्र वर्त्तन्ते? कहां हैं?
२३ इम उपतिष्ठन्ते। ये खड़े हैं।
२४ अनेन युष्माकं समक्षे शतं मुद्रा दत्ता न वा? इसने तुम्हारे सामने सौ रुपये दिये वा नहीं?
२५ दत्तास्तु खलु। निश्चित दिये तो हैं।
२६ अनेन शतं मुद्रा गृहीता न वा? इसने सौ रुपये लिये वा नहीं?
२७ वयं न जानीमः। हम नहीं जानते।
२८ प्राड्विवाकेनोक्तम्— वकील ने कहा—
२९ “अयमस्य च साक्षिणः सर्वे मिथ्या-वादिनः सन्ति। ” यह और इसके गवाह लोग सब झूठ बोलने वाले हैं।
३० कुत इदमेतेषां परस्परं विरुद्धं वचोऽस्ति। क्योंकि यह इन लोगों का वचन पूर्वापर विरुद्ध है।
३१ यतस्त्वया मिथ्याप्रलपितमतएव तवैक- संवत्सरपर्य्यन्तं कारागृहे बन्धः क्रियते। जिससे तूने झूठ बोला इसी कारण तेरा एक वर्ष तक कैदीखाने में बन्ध किया जाता है।
३२ अयमुत्तमर्णस्त्वदीयान् पदार्थान् गृहीत्वा विक्रीय वा स्वर्णं ग्रहीष्यति। यह सेठ तेरे पदार्थों को लेकर अथवा बेच के अपने ऋण को ले लेगा।
३३ अयं मदीयानि पञ्चशतानि रूप्याणि धृत्वा न ददाति। यह मेरे पांच सौ रुपये लेकर नहीं देता।
३४ कुतो न ददासि? क्यों नहीं देता?
३५ मया नैव गृहीतानि, कथं दद्याम्? मैंने लिये ही नहीं, कैसे दूं?
३६ अयम्मम लेखोऽस्ति पश्यैतम्*१।
[*१. यहाँ “पश्य तम्” के स्थान पर ‘पश्यैतम्’ पाठ उपयुक्त प्रतीत होता है।] यह मेरा लिखा है, देखो इसे।
३७ आनय। लाओ।
३८ गृह्यताम्। लीजिये।
३९ अयं लेखो मिथ्या प्रतिभाति। यह लिखा हुआ झूठ मालूम पड़ता है।
४० तस्मात् त्वं षण्मासान् कारागृहे वस तवेमे साक्षिणश्च द्वौ द्वौ मासौ च तत्रैव गच्छेयुः। इससे तू छः महीने कैदखाने में रह और ये तेरे गवाह भी दो दो महीने के लिये वहीं जायें।