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ननन्दृभ्रातृजायासंवादप्रकरणम्

In Hindi:

महर्षि दयानन्द व्याख्या : ३०. ननन्दृभ्रातृजायासंवादप्रकरणम्

१ हे ननन्दरिहागच्छ वार्त्तालापं कुर्याव। हे ननन्द! यहां आओ, बातचीत करें।

२ वद भ्रातृजाये! किमिच्छसि? कहो भौजाई! क्या इच्छा है?

३ तव पतिः कीदृशोऽस्ति? तेरा पति कैसा है?

४ अतीव सुखप्रदो यथा तव। अत्यन्त सुख देने वाला है, जैसा तेरा।

५ मया त्वीदृशः पतिः सुभाग्येन लब्धोऽस्ति। मैंने तो इस प्रकार का पति अच्छे भाग्य से पाया है।

६ कदाचित्किञ्चिदप्रियं तु न करोति? कभी कोई बुराई तो नहीं करता?

७ कदापि नहि, किन्तु सर्वदा प्रीतिं वर्द्धयति। कभी नहीं, किन्तु सब दिन प्रीति ही बढ़ाता जाता है।

८ पश्याभ्यां बाल्यावस्थायां विवाहः कृतोऽतः सदा दुःखितौ वर्त्तेते। देखो! इन दोनों ने बाल्यावस्था में विवाह किया है, इससे सदा दुःखी रहते हैं।

९ यान्यपत्यानि जातानि तान्यपि रुग्णानि, अग्रेऽपत्यस्याऽऽशैव नास्ति निर्बलत्वात्। जो लड़के हुए वे रोगी, आगे लड़के होने की आशा ही नहीं है निर्बलता से।

१० पश्य! तव मम च कीदृशानि पुष्टान्य-पत्यानि द्विवर्षानन्तरं जायन्ते। देखो! तेरे और मेरे कैसे पुष्ट तैयार लड़के दो वर्ष के बाद होते जाते हैं।

११ सर्वदा प्रसन्नानि सन्ति वर्द्धन्ते च सुशीलत्वात्। सब काल में प्रसन्न बढ़ते जाते हैं सुशीलता से।

१२ नह्यस्मिन् संसारेऽनुकूलस्त्रीपति-जन्यसदृशं सुखं किमपि विद्यते। इस संसार में अनुकूल स्त्री और पुरुष के सदृश सुख दूसरा कोई नहीं है।

१४ इदानीं वृद्धाऽवस्था प्राप्ता, यौवनं गतम्, केशाः श्वेता जाताः, प्रतिदिनं बलं ह्रसति च। इस समय वृद्धावस्था आई, जवानी गई, बाल सफेद हुए और नित्य बल घटता है।

१५ सोऽद्य गमनागमनमपि कर्तुमशक्तो जातः। वह इस समय आने-जाने में भी असमर्थ हो गया है।

१६ बुद्धेर्विपर्यासत्वाद्विपरीतं भाषते। बुद्धि के विपरीत होने से उलटा बोलता है।

१७ अद्याऽस्य मरणसमय आगत ऊर्ध्वश्वासत्वात्। आज इसके मरने का समय आया, ऊपर को श्वास के चलने से।

१८ सोऽद्य मृतः। वह आज मर गया।

१९ नीयतां श्मशानं वेदमन्त्रैर्घृतादिभिर्दह्यताम्। ले चलो श्मशान को, वेदमन्त्रों करके घी आदि सुगन्ध से दहन करो।

२० शरीरं भस्मीभूतं जातमतस्तृतीयेऽ-हनि सभस्मास्थिसञ्चयनं कार्यमेतत् कृत्वा पुनस्तन्निमितं शोकादिकं किञ्चिदपि नैव कार्यम्। शरीर भस्म हो गया, आज से तीसरे दिन राख सहित हाड़ों को वेदी से अलग करके फिर उसके निमित्त शोकादि कुछ भी न करना चाहिये।

२१ त्वं मातापित्रोः सेवां न करोष्यतः कृतघ्नी वर्त्तसेऽतो मातापितृसेवा केनापि नैव त्याज्या। तू माता पिता की सेवा नहीं करता है इस कारण कृतघ्नी है, इससे माता-पिता की सेवा का त्याग किसी को कभी न करना चाहिये।