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शरीराऽवयवप्रकरणम्

In Hindi:

महर्षि दयानन्द व्याख्या : ३२. शरीराऽवयवप्रकरणम्

१ अस्य शिरः स्थूलं वर्त्तते। इसका शिर बड़ा है।

२ देवदत्तस्य मूर्द्धनि केशाः कृष्णा वर्त्तन्ते। देवदत्त के शिर के बाल काले हैं।

३ मम तु खलु श्वेता जाताः। मेरे तो सफेद हो गये।

४ तवापि केशा अर्द्धश्वेताः। तेरे भी बाल आधे सफेद हैं।

५ अस्य ललाटं सुन्दरमस्ति। इसका माथा सुन्दर है।

६ अयं शिरसा खल्वाटः। इसके शिर में बाल नहीं हैं।

७ तस्योत्तमभ्रुवौ स्तः। उसके अच्छी भौहें हैं।

८ श्रोत्रेण शृणोषि न वा? कान से सुनता है वा नहीं?

९ शृणोमि। सुनता हूँ।

१० अनया स्त्रिया कर्णयोः प्रशस्तान्या-भूषणानि धृतानि। इस स्त्री ने कानों में अच्छे सुन्दर गहने पहिने हैं।

११ किमयं कर्णाभ्यां बधिरोऽस्ति? क्या यह कानों से बहिरा है?

१२ बधिरस्तु न परन्तु श्रवणाय ध्यानं न ददाति। बहिरा तो नहीं है किन्तु सुनने के लिए ध्यान नहीं देता वा ख्याल नहीं करता।

१३ अयं विशालाक्षः। यह बड़े नेत्रवाला है।

१४ त्वं चक्षुषा पश्यसि न वा? तू आंख से देखता है वा नहीं?

१५ पश्यामि तु परन्त्विदानीं मन्ददृष्टिर्जातोऽहमस्मि। देखता तो हूँ, परन्तु इस समय मन्ददृष्टि अर्थात् थोड़ी दृष्टिवाला हो गया हूँ।

१६ इदानीन्ते रक्ते अक्षिणी कथं वर्त्तेते? इस समय तेरी आँखें लाल क्यों हैं?

१७ यतोऽहं शयनादुत्थितः। जिससे सोके उठा हूँ इस कारण से।

१८ स काणो धूर्तोऽस्ति। वह काना बदमाश है।

१९ द्रष्टव्यमयमन्धः सचक्षुष्कवत् कथं गच्छति। देखो! यह अन्धा आँखवाले के समान कैसे जाता है।

२० तवाऽक्षिणी कदा नष्टे? तेरी आँखें कब नष्ट हुईं?

२१ यदाऽहं पञ्चवर्षोऽभूवम्। जब मैं पांच वर्ष का था।

२२ इदानीम्मन्नेत्रे रोगोऽस्ति स कथं निवर्त्स्यते? इस समय मेरे नेत्र में रोग है, वह कैसे निवृत्त होगा?

२३ अञ्जनादीन्यौषधान्युषित्वा निवर्त्तिष्यते। अञ्जनादिक औषध के सेवन से निवृत्त होगा।

२४ तस्य नासिकोत्तमास्ति। उसकी नाक अति सुन्दर है।

२५ भवानपि शुकनासिकः। आप भी सुग्गे के सी नाकवाले हैं।

२६ घ्राणेन गन्धं जिघ्रसि न वा? नाक से गन्ध को सूंघते हो वा नहीं?

२७ श्लेष्मकफत्वान्मया नासिकया गन्धो न प्रतीयते। सरदी कफ होने से मुझको नासिका से गन्ध की प्रतीति नहीं होती।

२८ अयं पुरुषः सुकपोलोऽस्ति। यह पुरुष अच्छे गाल वाला है।

२९ अतिस्थूलत्वादस्य नाभिर्गभीरा। बहुत मोटा होने से इसकी नाभि गहरी है।

३० त्वमद्य प्रसन्नमुखो दृश्यसे किमत्र कारणम्? तू आज प्रसन्नमुख दिखाई देता है इसका क्या कारण है?

३१ अयं सदैवाह्लादितवदनो विद्यते। यह सब दिन प्रसन्नमुख बना रहता है।

३२ अस्यौष्ठौ श्रेष्ठौ वर्त्तेते। इसके ओष्ठ बहुत अच्छे हैं।

३३ अयं लम्बौष्ठत्वाद् भयङ्करोऽस्ति। यह लम्बे ओष्ठवाला है इससे भयङ्कर दिखाई देता है।

३४ सर्वैर्जिह्वया स्वादो गृह्यते। सब लोग जीभ से स्वाद का ग्रहण किया करते हैं।

३५ वाचा च सत्यं प्रियं मधुरं सदैव वाच्यम्। सदैव वाणी से सत्य, प्रिय और मधुर बोलना चाहिये।

३६ नैव केनचित्खल्वनृतादिकं वक्तव्यम्। कभी किसी को झूठ बोलना न चाहिये।

३७ अयं सुदन् वर्त्तते। यह अच्छे सुन्दर दांतवाला है।

३८ तव दन्ता दृढास्सन्ति वा चलिताः? तेरे दांत दृढ़ हैं वा चलते हैं?

३९ मम तु दृढा अस्य तु त्रुटिताः सन्ति। मेरे तो दृढ़ हैं अर्थात् निश्चल हैं और इसके तो टूट भी गये हैं।

४० मन्मुख एकोऽपि दन्तो नास्त्यतः कष्टेन भोजनादिकं करोमि। मेरे मुख में एक भी दांत नहीं है इससे क्लेश से भोजन करता हूँ।

४१ अस्य श्मश्रूणि लम्बीभूतानि सन्ति। इसकी मूंछें लम्बी हैं।

४२ तव चिबुकस्योपरि केशा न्यूनाः सन्ति। तेरी ठोड़ी के ऊपर बाल थोड़े हैं।

४३ अस्य हनुर्महान् वर्त्तते।*१

[*१. यह वाक्य मूल में है, प्रथम संस्करण में नहीं है।] इसकी ठोड़ी बड़ी है।*१

[*१. यह वाक्य मूल में है, प्रथम संस्करण में नहीं है।]

४४ त्वया कण्ठ इदं किमर्थं बद्धमस्ति? तूने गले में यह किसलिये बांधा है?

४५ अस्योरो विस्तीर्णमस्ति। इसकी छाती बड़ी है।

४६ त्वया हृदये किं लिप्तम्? तूने छाती में क्या लगाया है?

४७ इदानीं हेमन्तोऽस्त्यतः केशरकस्तूर्यौ लिप्ते। इस समय शीतकाल है, इसलिये केसर और कस्तूरी लगाई है।

४८ तथा हृच्छूलनिवारणायौषधम्। वैसे ही हृदयशूल निवारण के लिये औषध=दवाई।

४९ माणवकः स्तनाद् दुग्धं पिबति। बालक स्तन से दूध पीता है।

५० पश्य! देवदत्तायं लम्बोदरो वर्त्तते। देख देवदत्त! यह बड़ा पेटवाला अर्थात् तोंदवाला है।

५१ अयं तु खलु क्षामोदरः। यह तो छोटे पेटवाला है।

५२ तव पृष्ठे किं लग्नमस्ति? तेरी पीठ में क्या लगा है?

५३ किं स्कन्धाभ्यां भारं वहसि? क्या कन्धों पर बोझा ढोता है?

५४ पश्याऽस्य क्षत्रियस्य बाह्वोर्बलं येन स्वभुजबलप्रतापेन राज्यं वर्द्धितम्। देख! इस क्षत्रिय का बाहुबल अर्थात् बांह का जोर जिसने अपने बाहुबल के प्रताप से राज्य को बढ़ाया है।

५५ मनुष्येण हस्ताभ्यामुत्तमानि धर्म्म-कार्याणि सेव्यानि नैव कदाचिदधमानि। मनुष्य हाथों से उत्तम धर्मयुक्त कर्म करै, न कभी अधर्म कर्मों को।

५६ अस्य करपृष्ठे करतले च घृतं तले लग्नमस्ति। इसके हाथ की पीठ और में घी लगा है।

५७ मुष्टिबन्धने एकत्राङ्गुष्ठ एकत्र चतुरङ्गुलयो भवन्ति। मूंठी बांधने में एक ओर अंगूठा और एक ओर चार अंगुली होती हैं।

५८ शरीरस्य मध्यभागो नाभिः पुरतः, पश्चिमतः कटिः कथ्यते। शरीर के आगे बीच भाग को नाभि और पीछे के भाग को पीठ कहते हैं।

५९ अयं मल्लः स्थूलोरुः। यह पहलवान मोटी जंघावाला है।

६० माणवको जानुभ्यां गच्छति। लड़का घुटनों के बल से चलता है।

६१ अद्यातिगमनेन जङ्घे पीडिते स्तः। आज बहुत चलने से जांघें दूखती हैं।

६२ अहं पद्भ्यां ह्यो ग्राममगमम्। मैं पैदल कल गाम को गया था।

६३ अस्य शरीरे दीर्घाणि लोमानि सन्ति तव शरीरे च न्यूनानि सन्ति। इसके शरीर में बड़े रोम हैं, तेरे शरीर में थोड़े रोएं हैं।

६४ अस्य शरीरचर्म श्लक्ष्णं वर्त्तते। इसके शरीर का चमड़ा चिकना है।

६५ पश्यास्य नखा आरक्ताः सन्ति। देख! इसके नख कुछ कुछ लाल हैं।

६६ अयं दक्षिणेन हस्तेन भोजनं वामेन जलं च पिबति। यह दहिने हाथ से भोजन और बायें से जल पीता है।

६७ इदानीं त्वया श्रमः कृतोऽस्ति यतो धमनिः शीघ्रं चलति। इस समय तूने श्रम किया है, इससे नाड़ी शीघ्र चलती है।

६८ अधुना तु ममान्तस्त्वग् दह्यतेऽस्थिषु पीडापि वर्त्तते। इस समय मेरे भीतर की त्वचा जलती है और हाड़ों में पीड़ा भी है।