In Hindi:
महर्षि दयानन्द व्याख्या : ३३. राजसभाप्रकरणम्
१ तिष्ठ भो देवदत्ताहं! त्वया सह राजसभां गच्छामि। ठहर देवदत्त! तेरे साथ मैं भी राजा की सभा को चलता हूँ।
२ सभाशब्दस्य कः पदार्थः? सभा शब्द का क्या अर्थ है?
३ या सत्यासत्यनिर्णयाय प्रकाशयुक्ता वर्त्तेत। जो सच-झूठ के निर्णय करने के लिये प्रकाश से सहित हो।
४ तत्र कति सभासदः सन्ति? वहां कितने सभासद् हैं?
५ सहस्रम्। हजार।
६ या मम ग्रामे सभास्ति तत्र खलु पञ्चाशत् सभासदस्सन्ति। जो मेरे गाम में सभा है उसमें तो पचास सभासद् हैं।
७ इदानीं सभायां कस्य विषयस्योपरि विचारो विधातव्यः? इस समय सभा में किस विषय पर विचार करना चाहिये?
८ युद्धस्य। युद्ध का अर्थात् लड़ाई का।
९ तेन सह युद्धं कर्त्तव्यं न वा? यदि कर्त्तव्यं तर्हि कथम्? उसके साथ युद्ध करना चाहिये वा नहीं? यदि करना चाहिए, तो कैसे?
१० यदि स धर्मात्मा तदा तु न कर्त्तव्यम्। जो वह धर्मात्मा हो तब तो उससे युद्ध करना योग्य नहीं।
११ पापिष्ठश्चेत्तर्हि तेन सह योद्धव्यमेव। और जो वह पापी हो तो उससे युद्ध करना ही चाहिये।
१२ सोऽन्यायेन प्रजां सततं पीडयत्यतो महापापिष्ठः। वह अन्याय से प्रजा को निरन्तर पीड़ा देता है, इस कारण से वह बड़ा पापी है।
१३ एवं चेत्तर्हि शस्त्रास्त्रप्रक्षेपयुद्धकुशला वा बलिष्ठा कोशधान्यादिसामग्रीसहिता सेना युद्धाय प्रेषणीया। यदि ऐसा है तो शस्त्र अस्त्र फेंकने चलाने और युद्ध में कुशल, बड़ी लड़ने वाली, खजाना और अन्नादि सामग्री सहित सेना युद्ध के लिये भेजनी चाहिये।
१४ सत्यमेवात्र वयं सर्वे सम्मतिं दद्मः। सच ही है, इसमें हम सब लोग सम्मति वा सलाह देते हैं।
१५ इदानीं कस्यां दिशि कैः सह युद्धं वर्त्तते? इस समय किस दिशा में किन के साथ युद्ध होता है?
१६ पश्चिमायां दिशि यवनैः सह हरिवर्षस्थानाम्।*१
[*१ जिस समय यह पुस्तक लिखी गई थी उस समय अफगानों के साथ अंग्रेजों का युद्ध हो रहा था। अफगानों के साथ दूसरी लड़ाई सन् १८७८-७९ में तथा तीसरी १८७९-८१ तक हुई थी। सम्भवतः यहाँ अफगानों की तीसरी लड़ाई की ओर संकेत है क्योंकि यह पुस्तक सन् १८८० के फरवरी वा मार्च में लिखी गई थी। —युधिष्ठिर मीमांसक १ पश्चिम दिशा में मुसलमानों के साथ हरिवर्षस्थ अर्थात् यूरोपियन अंग्रेज लोगों का।
१७ पराजिता*१ अपि यवना अद्याप्युपद्रवं न त्यजन्ति।
[*१ सन् १८७८-७९ के युद्ध में अफगान पराजित हो गये थे, परन्तु उन्होंने कुछ समय पीछे ही अफगानिस्तान में स्थित अंग्रेज रेजिडेण्ट Louis Cavagnari को मार डाला था। इस पर तीसरी लड़ाई आरम्भ हुई।] हारे हुए भी मुसलमान लोग अब उपद्रव भी धूमधाम नहीं छोड़ते।
१८ अयं खलु पशुपक्षिणामपि स्वभावोऽस्ति यदा कश्चित्तद्गृहादिकं ग्रहीतुमिच्छेत् तदा यथाशक्ति युध्यन्त एव।*२
[*२ ऋषि दयानन्द ने यहाँ परोक्ष रूप से गहरी राजनीति का परिचय दिया है। और अफगानों की दूसरी लड़ाई में अफगानों से बलात् छीने गये क्वेटा और बिलोचिस्तान की ओर संकेत करके भारत के प्रथम स्वातन्त्र्ययुद्ध (संवत् १९१४, सन् १८५७) को युक्त बताया है और आगे भी स्वतन्त्रता के लिए संघर्ष करते रहने का संकेत किया है। —युधिष्ठिर मीमांसक] यह तो पशु-पक्षियों का भी स्वभाव है कि जब कोई उनके घर आदि को छीन लेने की इच्छा करता है तब यथाशक्ति युद्ध करते अर्थात् लड़ते ही हैं।