In Hindi:
महर्षि दयानन्द व्याख्या : ४०. वृक्षवनस्पतिप्रकरणम्
१ पिप्पलाः फलिता न वा? पीपल फले हैं वा नहीं?
२ इमे वटाः सुच्छायास्सन्ति। ये बड़ अच्छी छायावाले हैं।
३ पश्येम उदुम्बराः सफला वर्त्तन्ते। देख! ये गूलर फलयुक्त हो रहे हैं।
४ इमे बिल्वाः स्थूलफलास्सन्ति। ये बेल बड़े फलवाले हैं।
५ ममोद्यान आम्राः पुष्पिताः फलिताः सन्ति। इदानीं पक्वफला अपि वर्त्तन्ते। मेरे बगीचे में आम फूले-फले हैं। इस काल में पके फल वाले भी हैं।
६ अस्याऽऽम्रस्य मधुराणि रसवन्ति च फलानि भवन्ति। इस आम के मीठे और रसवाले फल होते हैं।
७ तस्य त्वम्लानि भवन्ति। उसके तो खट्टे हैं।
८ पनसस्य महान्ति फलानि भवन्ति। कटहल के बड़े फल होते हैं।
९ शिंशपायाः काष्ठानि दृढानि सन्ति शालस्य दीर्घाणि च। शीशम की लकड़ी दृढ़ होती और सुखवे की लम्बी होती हैं।
१० अस्य किङ्किरोः कण्टकास्तीक्ष्णा भवन्ति। इस बबूल के कांटे तीखे होते हैं।
११ बदरीणां तु मधुराम्लानि फलानि, कण्टकाश्च कुटिला भवन्ति। बेरियों के फल तो मीठे खट्टे और इनके कांटे टेढ़े होते हैं।
१२ कटुको निम्बो ज्वरं निहन्ति। कडुआ नीम ज्वर का नाश कर देता है।
१३ निम्बूफलरसं सूपे निक्षिप्य भोक्तव्यम्। नींबू का रस दाल में डालके खाने योग्य है।
१४ मम वाटिकायां दाडिमफलान्युत्तमानि जायन्ते। मेरे बगीचे में अनार बहुत अच्छे होते हैं।
१५ नवरङ्गीफलान्यानय। नारंगी के फलों को ला।
१६ वसन्ते पलाशाः पुष्प्यन्ति। वसन्त ऋतु में ढाक फूलते हैं।
१७ उष्ट्राः शमीवृक्षपत्रफलानि भुञ्जते। ऊंट शमी अर्थात् खीजड़े के पत्ते और फलों को खाते हैं।