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महर्षि दयानन्द व्याख्या : ४१. औषधिप्रकरणम्
१ कदलीफलानि पक्वानि न वा? केले के फल पके वा नहीं?
२ तण्डुलादयस्तु वैश्यप्रकरणे लिखितास्तत्र द्रष्टव्याः। चावल इत्यादिक तो बनिये के प्रकरण में लिखे हैं वहां देख लेना।
३ विषनिवारणायाऽपामार्गमानय। विष निवारण के लिये चिचिड़ा लाओ।
४ निर्गुण्ड्याः पत्राण्यानेयानि। निर्गुण्डी के पत्ते लाने चाहियें।
५ लज्जावत्याः किं जायते। लज्जावन्ती का क्या होता है?
६ गुडुची ज्वरं निवारयति। गुडुच ज्वर को शान्त कर देती है।
७ शंखावलीं दुग्धे पक्त्वा पिबेत्। शंखावली को दूध में पका के पिये।
८ यथर्त्तुयोगं हरीतकी सेविता सर्वान् रोगान्निवारयति। जिस प्रकार से ऋतु ऋतु में हरड़े का सेवन करना योग्य है वैसे सेवी हुई सब रोगों को छुड़ा देती है।
९ शुण्ठीमरीचपिप्पलीभिः कफवातरोगा निहन्तव्याः। सोंठ, मिर्च और पीपल से कफ़ और वात रोगों का नाश करना चाहिये।
१० योऽश्वगन्धां दुग्धे पाचयित्वा पिबति स पुष्टो जायते। जो असगन्ध दूध में पका के पीता है, वह पुष्ट होता है।
११ इमानि कन्दानि भोक्तुमर्हाणि वर्त्तन्ते। ये कन्द खाने के योग्य हैं।
१२ एतेषां तु शाकमपि श्रेष्ठं जायते। इन कन्दों का शाक भी अच्छा होता है।
१३ अस्यां वाटिकायां गुल्मगुच्छलताः प्रशंसनीयाः सन्ति। इस बगीचे में गुच्छा गुलाब और बेलें प्रशंसा के योग्य अर्थात् अच्छी हैं।