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मन्तव्यामन्तव्यप्रकरणम्

In Hindi:

महर्षि दयानन्द व्याख्या : ५२. मन्तव्यामन्तव्यप्रकरणम्*१

[*१. यह प्रकरण मूलपाण्डुलिपि में नहीं है, प्रथम संस्करण में है।]

१ त्वं जगत्स्रष्टारं सच्चिदानन्दस्वरूपं परमेश्वरं मन्यसे न वा? तू इस संसार के बनानेवाले सत्, चित् और आनन्दस्वरूप परमेश्वर को मानता है वा नहीं?

२ अयं नास्तिकत्वात् स्वभावात् सृष्ट्युत्पत्तिं मत्वेश्वरं न स्वीकरोति। यह मनुष्य नास्तिक होने से स्वभाव से सृष्टि की उत्पत्ति को मानकर ईश्वर को नहीं मानता।

३ यद्ययं कर्तृकार्यरचकरचनाविशेषान् संसारे निश्चिनुयात्तर्ह्यवश्यं परमात्मानं मन्येत। जो यह नास्तिक कर्त्ता क्रिया बनानेहारा और बनावट को इस जगत् में निश्चय करे तो अवश्य ईश्वर को माने।

४ अत्र सृष्टौ रचितरचनादर्शनाज्जीव-कार्य्यवत् [सृष्टेः] स्रष्टारं कुतो न मन्येत? जो इस सृष्टि में बने हुए पदार्थ और इनमें बनावट को प्रत्यक्ष देखता है वह जैसा कारीगरी को देख के कारीगर का निश्चय करते हैं वैसे जगत् के बनानेवाले परमात्मा को क्यों न माने?

५ यत्रोत्तमा धार्मिका आस्तिका विद्वांसोऽध्यापका उपदेष्टारः स्युस्तत्र कोऽपि कदाचिन्नास्तिको भवितुं नैवार्हेत्। जहां श्रेष्ठ, धर्मात्मा, आस्तिक, विद्वान् लोग पढ़ानेवाले और उपदेशक हों, वहां कोई भी मनुष्य नास्तिक होने को प्रवृत्त कभी नहीं होता।

६ कैः कर्मभिर्मुक्तिर्भवति तदा क्व वसन्ति तत्र किं भुञ्जते? किन कर्मों से मुक्ति होती है, उस समय कहां वास करते हैं और वहां क्या भोगते हैं?

७ धर्म्यैंः कर्मोपासनाविज्ञानैर्मुक्तिर्जायते, तदानीं ब्रह्मणि निवसन्ति परमानन्दं च सेवन्ते। धर्मयुक्त कर्म, उपासना और विज्ञान से मोक्ष होता है, उस समय ब्रह्म में मुक्त जीव रहते और परम आनन्द का सेवन करते हैं।

८ मोक्षं प्राप्य तत्र सदा वसन्त्याहोस्वित् कदापि ततो निवृत्य पुनर्जन्ममरणे प्राप्नुवन्ति? जो जीव मुक्ति को प्राप्त होते हैं वे वहाँ सदा रहते हैं अथवा वहां से निवृत्त होकर पुनः जन्म और मरण को प्राप्त होते हैं?

९ प्राप्तमोक्षा जीवास्तत्र सर्वदा न वसन्ति, किन्तु महाकल्पपर्यन्तमर्थाद् ब्राह्ममायुर्यावत्तावत्तत्रोषित्वाऽऽनन्दं भुक्त्वा पुनर्जन्ममरणे प्राप्नुवन्त्येव। जो जीव मुक्त होते हैं वे सर्वदा वहां नहीं रहते, किन्तु जितना ब्राह्म कल्प का परिमाण है उतने समय तक ब्रह्म में वास कर आनन्द भोग के फिर जन्म और मरण को अवश्य प्राप्त होते हैं।

इति श्रीमद्दयानन्दसरस्वतीस्वामिना निर्मितः संस्कृतवाक्यप्रबोधनामको निबन्धः समाप्तः॥