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महर्षि दयानन्द व्याख्या : [संस्कृतवाक्यप्रबोध के सम्बन्ध में श्री पं॰ अम्बिकादत्त व्यास ने अबोधनिवारण पुस्तक की रचना की थी। उसमें संस्कृतवाक्यप्रबोध पर आक्षेप किया था, जिसका उत्तर ऋषि दयानन्द ने लिखवाकर एक पण्डित के नाम से आर्यदर्पण मई १८८० के पृष्ठ १२० पर प्रकाशित कराया था। वह समाधान नीचे दिया जा रहा है।]
१—येन शरीराच्छ्रमो न क्रियते स नैव शरीरसुखमवाप्नोति। पृ॰ ७। पं॰ १॥
यहां पण्डित अम्बिकादत्तजी लिखते हैं कि (शरीरात्) इस पद में पञ्चमी विभक्ति अशुद्ध है किन्तु (शरीरेण) ऐसा चाहिये। सो यह सन्देह कारक-व्यवस्था को ठीक-ठीक नहीं विचारने से हुआ है। देखो श्रम कहते हैं पुरुषार्थ करने को। उसका कर्त्ता जीवात्मा और शरीर आश्रय रहता है। क्योंकि चेष्टेन्द्रियार्थाश्रयः शरीरम्। चेष्टा अर्थात् क्रिया का जो आश्रय है उसको शरीर कहते हैं। सो यहां पञ्चमी विधाने ल्यब्लोपे कर्मण्युपसंख्यानम्। अ॰ २।३।२८॥ इस वार्तिक से (आश्रित्य) इस ल्यबन्त क्रिया के लोप में पञ्चमी विभक्ति हुई है। देखो, ऐसा वाक्यार्थ होगा। येन पुरुषेण शरीरमाश्रित्य श्रमो न क्रियते-इत्यादि। जो कहो कि ऐसा अर्थ भाषा में क्यों न किया तो संस्कृत के एक वाक्य का व्याख्यान भाषा में कई प्रकार से कर सकते हैं इसमें कुछ विवाद नहीं है। परन्तु यहां तो प्रयोजन यही है कि भाषा सुगम और थोड़ी हो ऐसा उल्था करना चाहिये। अब पण्डितजी के कहने से तो प्रासादात्प्रेक्षते इत्यादि महाभाष्यकार के प्रयोगों में भी पञ्चमी विभक्ति नहीं होनी चाहिये। और भी पण्डितजी क्या लिखते हैं कि विभाषा गुणेऽस्त्रियाम्। अ॰ २।३।२५॥ भला इसका यहाँ क्या प्रसंग था? सो जब स्वामीजी के मुख्य अभिप्राय को पण्डितजी न समझे तो जो सूत्र सामने आया लिख बैठे। भला शरीर शब्द को कोई थोड़ी विद्यावाला भी गुणवाचक कह सकता है कि जिससे गुणवाची मान के पञ्चमी विभक्ति हो जावे। और कारक विषय में ऐसा भी नियम है कि कारकं चेद्विजानीयाद्यां यां मन्येत सा भवेत्। महाभाष्य १। ४। ५१॥ अर्थात् यह शब्द क्रिया के किस अंश को सिद्ध करता है ऐसे क्रियासाधक कारक को जान के जिस-जिस विभक्ति से वह अर्थ प्रतीत हो सके वह विभक्ति हो जाती है। इन गूढ़ बातों को समझना सबका काम नहीं है॥१॥
२—चक्रवर्तिशब्दस्य कः पदार्थः? पृ॰ ११ पं॰ ५॥
यहां पण्डितजी लिखते हैं कि चक्रवर्ति शब्द का क्या अर्थ है इसकी संस्कृत यही होगी। इनको भाषा का भी बोध है जैसा विदित हो गया। भला संस्कृत शब्द को स्त्रीलिंग पण्डितजी ने किस व्याकरण से किया। यह संस्कृत प्राचीन ऋषि-मुनियों के अनुकूल है, इसमें कुछ दोष नहीं। देखो, महाभाष्य में लिखा है कि अथ सिद्धशब्दस्य कः पदार्थः? अ॰ १। पाद ११। आह्निक १॥ इसका क्या यह अर्थ नहीं है कि सिद्ध शब्द का क्या अर्थ है? बड़े आश्चर्य की बात है कि प्राचीन ग्रन्थों को विना देखे दोष देने लगते हैं। अब पण्डितजी का लगाया दोष कुछ स्वामीजी को ही लगा हो सो नहीं किन्तु इन्होंने तो सब ऋषि-मुनियों को दोष लगा दिया और सापेक्षमसमर्थं भवतीति। महाभाष्य २। १। १॥ यह दोष यहाँ कभी नहीं आता क्योंकि यहां एक देश के साथ अन्वय नहीं है। और इसी प्रकार सभा शब्दस्य कः पदार्थः? इसको शुद्ध समझ लेना॥२॥
३—अस्मिन् समये तु मम सामर्थ्यं नास्ति षण्मासानन्तरं दास्यामि। (महा॰ २। १। १) पृ॰ १९। २४॥ यहां ‘षण्मास’ शब्द में पण्डितजी को सन्देह हुआ है कि यहाँ द्विगोः। अष्टा॰ ४। १। २१॥ इस सूत्र से ङीप् होके षण्मासी शुद्ध होता है। इस भ्रम का मूल यही है कि उनको व्याकरण के सब सूत्र विदित नहीं हैं। पण्डितजी के कथनानुसार यदि स्वामीजी का लेख अशुद्ध भी माना जावे तो फिर पाणिनि मुनि का सूत्र भी अशुद्ध मानना चाहिये। सू॰ षण्मासाण्यच्च। अ॰ ५। १। ८३॥ यहां पण्डितजी के मतानुसार षण्मास्याण्यच्च इस प्रकार का सूत्र होना चाहिये। अब देखिये पाणिनीय सूत्र को यदि पण्डितजी जानते होते तो स्वामीजी के लेख को मिथ्या दोष क्यों लगाते और छोटे-छोटे बालक कि जो अष्टाध्यायी के सूत्र भी घोखते हैं वे भी जानते हैं कि यह सूत्र ऐसा है। इस प्रकार के बहुत से प्रयोग व्याकरण आदि शिष्ट जनों के ग्रन्थों में आते हैं तो क्या सब अशुद्ध हैं? अब रहा कि ङीप् क्यों नहीं होता तो पात्रादिभ्यः प्रतिषेधः। महा॰ २/४/१७॥ यह वार्तिक इसीलिये है। पात्रादि आकृतिगण है। इसका परिगणन कहीं नहीं किया कि इतने ही पात्रादि शब्द हैं। महाभाष्यकार ने तो इस वार्तिक पर उदाहरण मात्र दिया है। अब इसी प्रकार ‘द्विवर्षानन्तरम्’ इसको भी शुद्ध समझ लेना चाहिये। पाणिनिजी महाराज ने अपने सूत्र में ‘षण्मास’ शब्द को पढ़ा है। इससे यह भी उनका उपदेश प्रसिद्ध विदित होता है कि ‘षण्मास’ आदि शब्दों में ङीप् कदापि नहीं होता और कोई किया चाहे तो अशुद्ध ही है॥ ३॥
४—संस्कृतवाक्यप्रबोध में रही एक अशुद्धि का संशोधन अशुद्धि के निर्देशक श्री बारहट किशनजी के पत्र के उत्तर में महर्षि दयानन्द द्वारा लिखे गये चैत्र कृष्ण १० सोमवार संवत् १९३९ के पत्र में इस प्रकार लिखा है—
बारहट श्री कृशनजी आनन्दित रहो।
विदित हो कि पत्र आपका आया समाचार विदित हुए। संस्कृत वाक्य प्रबोध के विषय में जो तुमने लिखा सो छापे वालों की भूल में छप गया है। वहाँ (एकत्रैकाङ्गुष्ठ एकत्र चतुरङ्गुलयः) ऐसा चाहिये, सो सुधार लीजिये।
पत्र व्यवहार पृष्ठ ४०१
संस्कृत वाक्य प्रबोध में रही अशुद्धियों के सम्बन्ध में महर्षि दयानन्द द्वारा मुंशी बखतावर सिंह जो श्रा॰ शु॰ १३ बुध सं॰ १९३७ (सन् १८ अगस्त १८८०) को लिखे गये पत्र का निम्नलिखित अंश बहुत महत्त्वपूर्ण है—
“जो संस्कतवाक्यप्रबोध पर पुस्तक छपाया है सो बहुत ठिकानों में उनका लेख अशुद्ध है। और कै एक ठिकानों में संस्कृत वाक्य प्रबोध में अशुद्ध भी छपा है। इस अशुद्धि के कारण तीन हैं। एक शीघ्र बनना, मेरा चित्त स्वस्थ न होना। दूसरा भीमसेन के आधीन शोधने का होना और मेरा न देखना न प्रूफ को शोधना। तीसरा छापेखाने में उस समय कोई कम्पोजीटर बुद्धिमान् न होना, लैंपों की न्यूनता होना। इसके उत्तर में जोजो उनकी सच्ची बात है सो-सो शोधक और छापा का दोष रहेगा। इसके खंडन पर भीमसेन का नाम मत लिखना, किन्तु पंडित ज्वालादत्त के नाम से छापना। इस पर आगे के आर्य्यदर्पण में छापने के लिये पं॰ ज्वा॰ भी लिखेगा। भीमसेन भी लिखो, परन्तु उसका नाम उसपर छपवाने से उसके पढ़ने में वहाँ के लोग बहुत विरोध करेंगे।”