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तृतीय उपदेश—धर्माधर्म-विषयक

In Hindi:

महर्षि दयानन्द व्याख्या : तृतीय उपदेश

[धर्माधर्म-विषयक]

[गुरुवार ता॰ ८ जुलाई १८७५ स्वामी दयानन्द सरस्वती ने विज्ञापन के अनुकूल बुधवार पेठ में भिड़े के बाड़े में ता॰ ८ माह जुलाई के दिन रात्रि में आठ बजे व्याख्यान दिया, उसका सरांश।]

ओम् भद्रं कर्णेभिः शृणुयाम देवा भद्रं पश्येमाक्षभिर्यजत्राः।

स्थिरैरङ्गैस्तुष्टुवांसस्तनूभिर्व्यशेमहि देवहितं यदायुः१॥

ओ३म् शान्तिः शान्तिः शान्तिः॥

[यह स्वामीजी ने प्रथम ऋचा पढ़ी, फिर धर्माधर्म इस विषय पर व्याख्यान प्रारम्भ किया—]

परमेश्वर की आज्ञा यह धर्म, अवज्ञा यह अधर्म, विधि यह धर्म निषेध यह अधर्म, न्याय यह धर्म, अन्याय यह अधर्म, सत्य यह धर्म, असत्य यह अधर्म, निष्पक्षपात यह धर्म, पक्षपात यह अधर्म।

[व्रतेन दीक्षामाप्नोति२ इस प्रतीक का शुक्ल यजुःसंहिता में का मन्त्र कहा और उसका अर्थ किया।]

अब सत्यमूलक यदि धर्म है तो सत्य क्या है? प्रमाणैरर्थपरीक्षणम्३ इस न्याय से जो अर्थ सत्य ठहरे वही सत्य है।

आश्रम चार हैं—ब्रह्मचर्याश्रम, गृहस्थाश्रम, वानप्रस्थ और संन्यास।

अहिंसा परमो धर्मः।

धृतिः क्षमा दमोऽस्तेयं शौचमिन्द्रियनिग्रहः।

धीर्विद्या सत्यमक्रोधो दशकं धर्मलक्षणम्॥

धर्म और अधर्म ये अनेक हैं, परन्तु उनमें से विशेष रीति से ग्यारह धर्म और ग्यारह अधर्म हैं। उनका स्वामीजी ने विशेष विवरण किया।

इस प्रकार ग्यारह धर्म सनातन उपदिष्ट हैं—

प्रथम अहिंसा का लक्षण—

अहिंसासत्यास्तेयब्रह्मचर्यापरिग्रहा यमाः॥१

अहिंसा—इसका केवल ‘पश्वादि न मारना’ ऐसा संकुचित अर्थ करते हैं परन्तु व्यास जी ने ऐसा अर्थ किया है कि—

सर्वथा सर्वदा सर्वभूतानामनभिद्रोहः अहिंसा ज्ञेया॥२

अर्थात् वैर-त्याग करना।

(२)धृति—अर्थात् धैर्य। राज्य जाये तो भी धर्म नहीं छोड़ना चाहिए, धैर्य छोड़ने से धर्म का पालन नहीं होता।

(३)क्षमा—अर्थात् सहनता, बड़े ने कोई अपकृत्य छोटे मनुष्य के लिये किया तो उसे छोटे ने सहन कर लिया, यह क्षमा नहीं है। इसे असामर्थ्य कहते हैं, किन्तु शरीर में सामर्थ्य होकर बुरे का प्रतिकार न करना यही क्षमा है।

(४)दमनाम मनसो वृत्तिनिग्रहः—मन की वृत्तियों का निग्रह करना इसी का नाम दम है, वैराग्य ऐसा अर्थ नहीं है।

(५)अस्तेय—अन्याय से धनादि ग्रहण करना, [वा] आज्ञा विना परपदार्थ उठा लेना स्तेय है और स्तेय-त्याग अस्तेय कहलाता है।

(६)शौच—दो प्रकार का है—शारीरिक और मानसिक। उत्कृष्ट रीति से स्नानादिक विधि का आचरण करना, यह शारीरिक शौच है। किसी भी दुष्ट वृत्ति को मन में आश्रय न देना, यह मानसिक शौच है। शरीर स्वच्छ रखने से रोग उत्पन्न नहीं होते तथा मानसिक प्रसन्नता भी रहती है।

(७)इन्द्रियनिग्रह—अर्थात् सारी इन्द्रियों को न्यायपूर्वक वश में रखना। इन्द्रियों का निग्रह बड़ी युक्ति से करना चाहिए। इन्द्रियों का आकर्षण परस्पर सम्बन्ध से होता है। मनु ने कहा है कि—

मात्रा स्वस्रा दुहित्रा वा न विविक्तासनो भवेत्।

बलवानिन्द्रियग्रामो विद्वांसमपि कर्षति॥१

इस वाक्य का अर्थ—इन्द्रियां इतनी प्रबल हैं कि माता तथा बहिनों के साथ एकान्त रहने में भी सावधान रहना चाहिए।

(८)धी—अर्थात् बुद्धि। सब प्रकार बुद्धि को बल प्राप्त हो वैसे ही आचरण करने चाहियें, शरीर-बल के विना बुद्धि-बल का क्या लाभ? इसलिये शरीर-बल सम्पादन करने के लिए और उसकी रक्षा करने के लिए बहुत प्रयत्न करते रहना चाहिए।

(९)विद्या—योग-सूत्र में अविद्या का लक्षण किया हुआ है—

अनित्याशुचिदुःखानात्मसु नित्यशुचिसुखात्मख्यातिरविद्या।२

तस्य हेतुरविद्या।३

अविद्या अर्थात् विषयासक्ति, ऐश्वर्यभ्रम, अभिमान यह है। बड़े-बड़े पाठान्तर४ करने से ही केवल विद्या उत्पन्न नहीं होती। पाठान्तर यह विद्या का साधन होगा। यथार्थ दर्शन ही विद्या है। यथाविहित ज्ञान विद्या है। प्रमा५ के विरुद्ध भ्रम है, विद्या में भ्रम नहीं होता। ‘अनात्मनि आत्मबुद्धिः’ ‘अशुचिपदार्थे शुचिबुद्धिः’ यह भ्रम है। यही अविद्या का लक्षण है और इसके विरुद्ध जो लक्षण हैं वे विद्या के हैं।

जिस पुरुष को यह अभिमान होता है कि में धनाढ्य हूँ वा मैं बड़ा राजा हूँ, उसे अविद्या का दोष है। दूसरा शरीर का क्षीण रहना, यह अविद्या के कारण ही होता है। इससे सब प्रकार की विद्या सम्पदान करने के विषय में प्रयत्न करते रहना चाहिए। हमारे देश में छोटी अवस्था में विवाह करने की रीति के कारण विद्या-सम्पादन करने में अड़चन आती है। अपवित्र पदार्थ में पवित्रता मानना यह अविद्या है। ईश्वर का ध्यान, यह पूर्ण विद्या है। यह सारी विद्याओं का मूल है। किसी भी देश में इस विद्या का ह्रास (न्यूनता)होने से उस देश को दुर्दशा आ घेरती है।

(१०)सत्य—तीन प्रकार का है, सत्य-भाव, सत्य-वचन, सत्यक्रिया। सत्य-भावना होनी चाहिए, सत्य भाषण करना चाहिए और सत्य आचरण तो करना ही चाहिए। किसी प्रकार का विकल्प मन में न होना चाहिये। असत्य का त्याग करना चाहिये।

विकल्प का लक्षण योग-सूत्र में किया है कि—

शब्दज्ञानानुपाती वस्तुशून्यो विकल्पः।१

सम्भव कौन सा और असम्भव कौन सा, इसका विचार करना चाहिए। कुम्भकर्ण के विषय में तुलसीदासजी का एक दोहा है कि—

जोजन एक मूंछ रही ठाढ़ी, योजन चार नासिका बाढ़ी।

दक्षिण में देवमामलेदार१ की कोई बात बताते हैं कि उसने अपने वचन से पुरुष को स्त्री बना दिया था। ऐसी असम्भाव्य बातें हमारे देश में बहुत सी फैल गई हैं। इसलिए प्रमाणों के सहाय से अर्थ विवेचन करके देखने से विचार के अन्त में निश्चय होता है कि झूठ बात कौन-सी और सच्ची बात कौन-सी है।

(११)अक्रोध—बड़ा भारी जो क्रोध उत्पन्न होता है, उसका सर्वथा त्याग करना चाहिए। स्वाभाविक क्रोध कभी नहीं जा सकता, परन्तु उसे भी रोकना, मनुष्य का धर्म है। क्रोधाधीन होने से बड़े-बड़े अनर्थ होते हैं।

इस प्रकार का एकादशलक्षणी सनातन धर्म है। [जो मनुष्य मात्र का कर्त्तव्य है।]

एतद्देशप्रसूतस्य सकाशादग्रजन्मनः।

स्वं स्वं चरित्रं शिक्षेरन् पृथिव्यां सर्वमानवाः॥३

व्यवहार धर्म की ओर भी ध्यान देना चाहिए। सारी दुनिया में इसी आर्यावर्त से विद्या गयी। इस आर्यावर्त देश के आर्य पुरुषों के वैभव का वर्णन जितना ही किया जाय थोड़ा है। समुद्र पर चलने वाले जहाजों पर कर लेने की आज्ञा मनु ने अष्टमाध्याय में लिखी है—

समुद्रयानकुशला देशकालार्थदर्शिनः।

स्थापयन्ति तु यां वृद्धिं सा तत्राधिगमं प्रति॥१

इससे स्पष्ट है कि समुद्र-यानादिक पहले हमारे लोग बनाया करते थे।

अधर्म—अर्थात् अन्याय, इसका विचार करना चाहिए। मनु ने ऐसा लिखा है कि—

परद्रव्येष्वभिध्यानं मनसानिष्टचिन्तनम्।

वितथाभिनिवेशश्च त्रिविधं कर्म मानसम्॥

पारुष्यमनृतं चैव पैशुन्यं चापि सर्वशः।

असम्बद्धप्रलापश्च वाङ्मयं स्याच्चतुर्विधम्॥

अदत्तानामुपादानं हिंसा चैवाविधानतः।

परदारोपसेवा च शारीरं त्रिविधं स्मृतम्॥२

मानसिक कर्मों में से तीन मुख्य अधर्म हैं। [परद्रव्येष्वभिध्यानम् अर्थात्] परद्रव्यहरण अथवा चोरी; मनसानिष्टचिन्तनम् अर्थात् लोगों का बुरा चिन्तन करना, मन में द्वेष करना, ईर्ष्या करना; वितथाभिनिवेश अर्थात् मिथ्या निश्चय करना।

वाचिक अधर्म चार हैं—पारुष्य अर्थात् कठोर भाषण। सब समय सब ठौर मृदु भाषण करना यह मनुष्यों को उचित है। किसी अन्धे मनुष्य को ‘आ अन्धे’ ऐसा कहकर पुकारना निस्सन्देह सत्य है, परन्तु कठोर भाषण होने के कारण अधर्म है। अनृत भाषण अर्थात् झूठ बोलना। पैशुन्य अर्थात् चुगली करना। असम्बद्धप्रलाप अर्थात् जान बूझ कर बात को उड़ाना।

शारीरिक अधर्म तीन हैं—अदत्तानामुपादानम् अर्थात् चोरी। हिंसा अर्थात् सब प्रकार के क्रूर कर्म। परदारोपसेवा अर्थात् रंडीबाजी वा व्यभिचारादि कर्म करना। किसी मनुष्य ने अपने खेत में की जमीन में न बोकर अपना बीज लेकर दूसरे की जमीन में बोया तो उसे हम क्या कहेंगे? क्या उसे हम मूर्ख न कहेंगे? अपने वीर्य को अगम्यागमन करके खर्च करनेहारा तो महामूर्ख है। कोई ऐसा कहने लग जाते हैं कि हम नकद पैसा देकर बाजार का माल मोल लेते हैं, इसमें व्यभिचार वा पाप क्या होगा? परन्तु वे मूर्ख नहीं सोचते कि पल्ले का रुपया खर्च करके अपने अमूल्य वीर्य को खर्च करना यह व्यापार किस प्रकार का है? ऐसा व्यापार करने वाला क्या महामूर्ख नहीं है? अवश्य मूर्ख है।

धर्म के तीन स्कन्ध हैं—यज्ञ, अध्ययन और दान।१

यज्ञ—अर्थात् होम। यज्ञ करने से वायुशुद्धि होकर देश में बहुत ही वृष्टि होती है। मीमांसा और ब्राह्मणादि ग्रन्थों से मन्त्रमयी देवता तो मानी है और विग्रहवती देवता कहीं भी नहीं मानी२। इस व्यवस्था के द्वारा शास्त्रकारों ने बहुत सा झगड़ा मिटा दिया, परन्तु—

यज्ञेन यज्ञमयजन्त देवाः।३

इस पुरुषसूक्त में की ऋचा की व्यवस्था का लगाना जरा अच्छा ही कठिन पड़ता है।

अध्ययन—अध्ययन अर्थात् लड़कों को पढ़ाना, वैसे ही लड़कियों को पढ़ाना यह है।

पतिसेवा गुरौ वासो गृहार्थोऽग्निपरिष्क्रिया।४

इसमें ‘गुरौ वासः’ अर्थात् [गुरु के समीप अध्ययन के लिए रहना। परन्तु] कुल्लूक भट्ट ने ‘पति के घर में वास करना’ ऐसा अर्थ कर अर्थ का घोटाला (=अनर्थ)कर दिया।

पूर्व काल में आर्य लोगों की स्त्रियाँ उत्कृष्ट रीति से पढ़ती थीं। आर्य लोगों के इतिहास की ओर देखो—स्त्रियां आजन्म ब्रह्मचर्य व्रत धारण कर रहती थीं और साधारण स्त्रियों के भी उपनयन और गुरुगृह में वास इत्यादि संस्कार होते थे। यह सबको विदित ही है।

गार्गी, सुलभा, मैत्रेयी, कात्यायनी आदि बड़ी-बड़ी सुशिक्षित स्त्रियां होकर बड़े-बड़े ऋषि-मुनियों की शंकाओं का समाधान करती थीं, फिर [न मालूम] कुल्लूक भट्ट ने ‘पतिसेवैव गुरौ वासः’ ऐसा अर्थ कहां से किया? आथर्वण संहिता में—

ब्रह्मचर्येण कन्या युवानं विन्दते पतिम्।५

ऐसा स्पष्ट वाक्य है। इस वाक्य को एक ओर रख कर कुल्लूक भट्ट के अर्थ को ग्रहण करना बहुत कठिन होगा। सुशिक्षित स्त्रियां कुटुम्बी गृहस्थों को सब प्रकार सहाय करने वाली होती हैं। संगति का बल कितना बढ़कर है, इसका विचार करो। विद्वान् को अविदुषी स्त्री से संग पड़े तो उसका परिणाम कैसे लगे? फिर स्त्रियां ही केवल पढ़ें इतना ही नहीं; किन्तु सब जातियां वेदाभ्यास करने का अधिकार रखती हैं, देखो—

यथेमां वाचं कल्याणीमावदानि जनेभ्यः।

ब्रह्मराजन्याभ्याᳬ शूद्राय चार्याय च स्वाय चारणाय च॥१

शूद्रो ब्राह्मणतामेति ब्राह्मणश्चैति शूद्रताम्।

क्षत्रियाज्जातमेवं तु विद्याद् वैश्यात् तथैव च॥२

‘शूद्र ब्राह्मण हो जाता है और ब्राह्मण भी शूद्र हो जाता है’ इस मनु-वाक्य का भी विचार करना चाहिए।

अध्ययन करना अर्थात् ब्रह्मचर्य निभाना यह बड़ा भारी धर्म है। ब्रह्मचर्य के कारण शरीर-बल और बुद्धि-बल प्राप्त होता है। आजकल लड़के-लड़कियों के शीघ्र विवाह करने की बुरी रस्म पड़ गई है। काशीनाथ ने ‘शीघ्रबोध’ नामक एक ज्योतिष का ग्रन्थ बनाया है, उसमें ऐसा कहा है कि—

अष्टवर्षा भवेद् गौरी नववर्षा तु रोहिणी।

दशवर्षा भवेत् कन्या तत ऊर्ध्व रजस्वला॥

माता चैव पिता तस्या ज्येष्ठो भ्राता तथैव च।

त्रयस्ते नरकं यान्ति दृष्ट्वा कन्यां रजस्वलाम्॥

लड़की शीघ्र गौरी होती है, रोहिणी होती है, रजस्वला होती है, ऐसी बहुत कुछ बकवास की है। इस को बने अभी १०० वर्ष भी नहीं हुए होंगे।

स्वयंवर के विषय में मनु का कथन है कि—

त्रीणि वर्षाण्युदीक्षेत गृहे कन्यर्तुमत्यपि।

ऊर्ध्वं तु कालादेतस्माद् विन्देत सदृशं पतिम्॥३

इसी प्रकार मनु जी कहते हैं कि कन्या को मरने तक चाहे वैसी ही कुमारी रखो, परन्तु बुरे मनुष्य के साथ विवाह न करो। यथा—

काममामरणात्तिष्ठेद् गृहे कन्यर्तुमत्यपि।

न चैवैनां प्रयच्छेत् तु गुणहीनाय कर्हिचित्॥१

पुरातन सुश्रुत चरकादि वैद्यक के ग्रन्थों में आयु के चार भाग कल्पित किये हैं—(१)वृद्धि (२)यौवन (३)सम्पूर्णता और (४)हानि। इनकी व्यवस्था इस श्लोक२ में दी है सो देखो—

चतस्रोऽवस्थाः शरीरस्य वृद्धिर्यौवनं सम्पूर्णता किञ्चित् परि-हाणिश्चेति। आषोडशाद् वृद्धिः, आपञ्चविंशतेर्यौवनं, आचत्वारशतः सम्पूर्णता, ततः किञ्चित् परिहाणिश्चेति॥

पुरुषों की योग्य अवस्था प्राप्त होने के लिए कम से कम चालीस वर्ष वय [आयु] होनी चाहिए, निकृष्ट पक्ष में भी लड़के की पच्चीस वर्ष की वय होनी चाहिए और लड़की की सोलह वर्ष की वय होनी चाहिए, ऐसा सुश्रुत का कहना है।

पञ्विंशे ततो वर्षे पुमान्नारी तु षोडशे।

समत्वागतवीर्यौ तौ जानीयात्कुशलो भिषक्३॥

छान्दोग्य उपनिषद्४ में प्रातःसवन चौबीस वर्ष तक वर्णन किया हुआ है। यह पुरुषों की कुमार अवस्था है। चवालीस वर्ष तक मध्यसवन कहा है। यही यौवन-अवस्था है और अड़तालीस वर्ष तक सायंसवन वर्णन किया है, जो सम्पूर्णता की अवस्था है। इसके पश्चात् जो समय आता है वही उत्कृष्ट समय विवाहादि के लिए माना गया है। विवाह होने के पूर्व वेदाध्ययन अवश्य करना चाहिए। इन दिनों ब्राह्मण लोगों ने वेदाध्ययन स्वार्थवश नष्ट कर दिया है। सो प्रारम्भ होना चाहिए।

अथर्ववेद में अल्लोपनिषद् करके घुसेड़ दिया है। मतलबी पण्डित लोगों ने नये-नये श्लोक बनवाकर लोगों के मनों में भ्रम डाल दिया है, यह बड़े ही दुःख की बात है। इसलिए ऐसा हो कि स्थान-स्थान पर वेद-शालायें हों, उनमें वेदाध्ययन कराया जावे, परीक्षायें लिवायी जावें अर्थात् वेदाध्ययन को हर प्रकार से उत्तेजना मिले, ऐसा प्रयत्न करना चाहिए।

दान—दान शब्द का आजकल जो अर्थ लेते हैं वह नहीं है। पेटभरू ब्राह्मण कहते हैं—

परान्नं दुर्लभं लोके शरीराणि पुनः पुनः।

विवेचनामूलक दान सदा होता रहा है। इन दिनों लोगों ने “पीत्वा पीत्वा१ ब्रह्मापि मृतः” ऐसे-ऐसे वाक्यों को कहकर दान का मिथ्या ही अर्थ किया है। विद्यावृद्धि के लिए द्रव्य खर्च हो, कला-कौशल की उन्नति के लिए धन लगाया जाय, दीन, अपाहिज, रोगी, कुष्ठी, अनाथादिकों को सहाय करना सच्चा दान है।

आश्रम चार हैं—ब्रह्मचर्याश्रम का वर्णन पूर्व ही हो चुका है।

गृहस्थ आश्रम में परस्पर प्रीति बढ़कर सामाजिक कल्याण बढ़े, यही मुख्य धर्म है। इस प्रकार की सामाजिक प्रीति बढ़ने के लिए मूर्त्ति-पूजादिक पाखण्ड दूर होना चाहिए।

सन्तुष्टो भार्यया भर्ता भार्या भर्त्रा तथैव च।

यस्मिन्नेव कुले नित्यं कल्याणं तत्र वै ध्रुवम्॥२

उपर्युक्त श्लोक में कहे अनुसार गृहस्थों को आनन्द करते हुए निर्वाह करना चाहिए, यह उनका मुख्य धर्म है।

वानप्रस्थ—इस आश्रम में विचार करना चाहिए। तप अर्थात् विद्या को सम्पादन करना उचित है।

संन्यासी—संन्यासी को उचित है कि सारे जगत् में घूमे और सदुपदेश करे, यही उसका मुख्य कर्त्तव्य कर्म है। यथार्थ उपदेश के विषय में मनु कहते हैं—

दृष्टिपूतं न्यसेत् पादं वस्त्रपूतं जलं पिबेत्। सत्यपूतां वदेद् वाचं मनः पूतं समाचरेत्॥३

पंचशिख और शङ्कराचार्य इनका इतिहास देखना चाहिए कि उन्होंने सदा सत्य और सदुपदेश ही किये, उसी प्रकार संन्यासीमात्र को सदुपदेश करना चाहिए।

[इसके अनन्तर स्वामीजी महाराज ने]

सह नाववतु सह नौ भुनक्तु सह वीर्यं करवावहै।

तेजस्विनावधीतमस्तु मा विद्विषावहै॥१

ओ३म् शान्तिः शान्तिः शान्तिः॥

[यह कहकर व्याख्यान समाप्त किया।]