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महर्षि दयानन्द व्याख्या : चतुर्थ उपदेश
(धर्माधर्मविषयक)
[शनिवार ता॰ १० जुलाई १८७५ धर्माधर्म इस विषय पर दयानन्द सरस्वती ने व्याख्यान दिया१ उस पर हुए प्रश्नोत्तर]
प्रश्न—क्या वेदों में मन्त्रमयी देवताओं का अथवा विग्रहवती देवताओं का प्रतिपादन है? सावयव देवताओं के विना जड़मति लोग पूजा किस प्रकार कर सकेंगे और धर्म-व्यवहार में उनका निर्वाह कैसे होगा?
उत्तर—वेदों के तीन काण्ड हैं—उपासना, कर्म और ज्ञान। परन्तु उपासना-काण्ड में केवल एक उपासना ही का प्रतिपादन हो यही नहीं अथवा ज्ञान-काण्ड में ज्ञान ही का प्रतिपादन हो वा कर्मकाण्ड में कर्म ही का प्रतिपादन हो, यह नहीं। उपासनाकाण्ड में उपासना प्रधान है, परन्तु उसमें ज्ञान और कर्म का निरूपण भी मिलता है। इसी प्रकार सर्वत्र है।
मीमांसा का प्रारम्भ “अथातो धर्मजिज्ञासा” ऐसा है। इसमें कर्म विचार है। इसमें अथ और अतः इन दो शब्दों के अर्थ के विषय में बड़ी ही मेहनत की है और उस पर से भिन्न-भिन्न काण्ड की बिलकुल भिन्न-भिन्न व्यवस्था प्रतीत होती है ऐसा कोई कहते हैं, परन्तु वैसा कहना अप्रशस्त है। आश्वलायन ने जो व्यवस्था की है वह कुछ-कुछ ठीक है, उसे देखना चाहिए। इन दिनों कर्म वेद-मन्त्रों के अनुकूल नहीं होता, क्योंकि जैमिनि ऋषि ने कर्म-काण्ड में मन्त्रमयी देवता मानी है२ और कर्म का अधिकार स्नातक और योग्यता को प्राप्त हुए पुरुषों को है। इस पर से यह स्पष्ट होगा कि कर्म विषय में जड़बुद्धि पुरुष की योग्यता नहीं है, ऐसा [सिद्ध] होता है। कर्मकाण्ड में मन्त्रमयी देवता हो तो मूर्त देवताओं को उसमें घुसने का स्थान नहीं है।
उपासनादिकों को योगशास्त्र का आधार है, जैसे कर्म-काण्ड को मीमांसा का है, परन्तु योगशास्त्र में मूर्त्ति-पूजा के विषय में कहीं भी वर्णन नहीं है, ज्ञान-काण्ड में मूर्त्ति की कोई आवश्यकता नहीं होती, ऐसी सर्व-सम्मति है। इस पर जैमिनि के मत में व्यास जी के मत में और पतञ्जलि के मत में मूर्त्ति-पूजा गृहीत नहीं होती अर्थात् पूर्व-मीमांसा-शास्त्र, योग-शास्त्र, उत्तर मीमांसा अथवा वेदान्त-शास्त्र इनमें तो मूर्त्ति-पूजा का कहीं भी अवकाश नहीं है।
अब कोई ऐसा कहे कि स्मृति-ग्रन्थों में मूर्त्ति-पूजा है और स्मृति का अनुमान से श्रुति-मूलकत्व है१। उपलब्ध श्रुति में मूर्ति की पूजा का उपदेश न हो तो भी लुप्त श्रुति में मूर्ति-पूजा का विधान है, ऐसा मानकर मूर्ति-पूजा करनी चाहिए। ऐसा श्रुति स्मृति का सम्बन्ध मानकर अनुपस्थित श्रुति का अवलम्बन करके उपस्थित ग्रन्थों के आधार में जो विचार करना अथवा उसमें गड़बड़ मचाना, यह हमें प्रशस्त नहीं दीखता। इन दिनों चार वेद और प्रत्येक वेद की बहुत सी शाखाएँ भी उपलब्ध हैं। शाखा-भेद फिर कई प्रकार का होता है। जो कुछ मूल बीजरूप वेदों में [है] वैसा उलपब्ध शाखाओं में तो न हो, किन्तु लुप्त शाखाओं में होगा, यह कल्पना सयुक्तिक नहीं। आश्वलायन, कात्यायनादि श्रौत-सूत्रकारों को नष्ट शाखाओं में के मन्त्र लेते नहीं बना, इसलिए अमुक मन्त्र नहीं लिए, ऐसे कहीं भी कहते नहीं सुना और शास्त्रव्यवस्था के लिए स्मृत्यवलम्बन करना चाहिए, ऐसा भी उनका कहना नहीं था। हमारा भी यही कहना है कि पूर्वमीमांसा, योग, और उत्तर मीमांसा इन शास्त्रों को कृपा कर लगाओ, विचार कर देखो। इसी प्रकार शतपथादि ग्रन्थों में, निरुक्त में, पातञ्जल महाभाष्य में नष्ट शाखाओं का गौण प्रकार से भी कहीं सूचक लिङ्ग नहीं है। इससे ‘स्मृति का श्रुतिमूलकत्व है’, इस मत के द्वारा आधुनिक अशुद्ध व्यवहार के आवश्यकीय उतने ज्ञापकों को निकालना यह बहुत ही अप्रशस्त है। अस्तु, वेदों में तथा शास्त्रों में मूर्ति-पूजा का कहीं भी विधान नहीं, इसका विचार हो चुका है।
अब रहा यह कि मूढ़ और अज्ञानी लोग सावयव देवताओं के विना अपना निर्वाह कैसे करें? इस प्रश्न पर विचार करें। हमारे विचार से तो मूर्खों को भी मूर्त्ति-पूजा की कोई आवश्यकता नहीं है, क्योंकि मूर्ख अर्थात् प्रथम ही जड़-बुद्धि और फिर उसके पीछे लगाई जाय जड़ पदार्थों की पूजा, तो क्या उसकी बुद्धि और अधिक जड़ न होगी? जड़मूर्त्ति की पूजा से तो जड़बुद्धि में जड़त्व ही जमेगा, इससे उन्नति तो कभी भी न होगी, किन्तु अधोगति तो अवश्य होगी।
अब यह देखें कि पूजा शब्द का अर्थ क्या है? पूजा शब्द का अर्थ ‘सत्कार करना’ ऐसा है, न कि षोडशोपचार पूजा। देखो—
मातृदेवो भव, पितृदेवो भव।
आचार्यदेवो भव, अतिथिदेवो भव॥१
इस स्थल पर माता-पिता, आचार्य और अतिथि इनका पूजन अर्थात् सत्कार करना ही है। उसी प्रकार मनु में भी स्त्री पूजनीय है अर्थात् भूषण, वस्त्र, प्रियवचन इत्यादिकों द्वारा सत्करणीय है [देखो मनु जी क्या कहते हैं—]
पितृभिर्भ्रातृभिश्चैताः पतिभिर्देवरैस्तथा।
पूज्या भूषयितव्याश्च बहुकल्याणमीप्सुभिः॥२
जड़ पदार्थों की सत्कार अर्थ वाली पूजा करते नहीं बनती। सचेतन का, सजीव का ही केवल सत्कार करते बनता है। सजीव का अर्थात् भद्र मनुष्यादिकों का सत्कार करने से बहुत लाभ होते हैं—
मनुष्यों को सत्संग होने से उनकी बुद्धियों की परिपक्वता होकर वे वैशद्य को पहुँचते हैं और उनमें मन्दबुद्धि पुरुषों का कल्याण भी होता है। दूसरा यह कि मनुष्यों में स्वभाव ही से ऐसी इच्छा होती है कि लोग हमें अच्छा कहें, हमारी सुकीर्ति हो, आस-पास के लोग भला कहें, हमारे आचरण को ठीक कहें इत्यादि। तो इस इच्छा से उनके मन की सदाचरण की इच्छा दृढ़ होती है; पर यह कैसे हो जब कि उसे सत् मनुष्यों की संगति हो, तब ही हो सकता है, अन्यथा कभी सम्भव नहीं।
हमें स्पष्ट विदित है कि जड़ मूर्त्तियों के सम्मुख मन्दिरों में कैसे-कैसे दुराचरण होते हैं वैसे दुराचरण ५ वर्ष के बच्चे के सम्मुख भी करने की मनुष्य की हिम्मत नहीं होती जैसी कि जड़ मूर्त्ति के सम्मुख करने में लज्जा तनिक भी नहीं आती। इस पर से स्पष्ट है कि मनुष्य से मनुष्य जितना डरता है, उतना जड़ मूर्तियों से नहीं डरता, किन्तु यह तो होता है कि लाख मूर्त्तियों में भी यदि मनुष्य खड़ा किया जावे, उसका चित्त भ्रष्ट और चञ्चल होवे तो वह दुराचरण की प्रवृत्ति आप स्वयं दिखाता है। जड़ पदार्थ के सत्कार से कभी भी मनुष्य के मन की उन्नति नहीं होती; परन्तु सद्विचार महाविचारों में मन लगाने से बुद्धि की उन्नति होती है। सत्संगति से, दूसरे का सत्कार करने से आत्मा प्रसन्न होकर प्रीति सदृश उत्तम गुण उनमें उत्पन्न होते हैं। यह इतना पूजन अर्थात् सत्कार इस अर्थ से मूर्तिपूजा के विषय में विचार हुआ।
अब मूर्ति के षोडशोपचार पूजा के विषय पर विचार करना चाहिए। जड़ मूर्ति की केवल जड़ पदार्थ के नाते से पूजा नहीं होती, इसलिए प्रथम उसमें उसकी प्राण-प्रतिष्ठा करनी पड़ती है। मूर्ति में प्राण-प्रतिष्ठा यह सिर्फ भावना ही है। भावना का अर्थ विचारणा यह होता है।
यादृशी भावना यस्य सिद्धिर्भवति तादृशी।
जैसी-जैसी भावना वैसी ही उसको सिद्धि मिलती है—ऐसा कोई-कोई कहने लग जाते हैं। परन्तु यह उनका मिथ्या प्रलाप है, क्योंकि सब मनुष्यों को सदा सुख प्राप्ति की दृढ़ भावना रहती है फिर उनको सर्वदा सुख प्राप्ति क्यों नहीं होती? उसी तरह पर्वत के बीच सुवर्ण की दृढ़ भावना की जाय तो पर्वत सोने का कभी नहीं बन सकता। हमारी भावना के कारण जड़ मूर्ति में कुछ भी परिवर्तन नहीं होता और प्राण-प्रतिष्ठा करने के पश्चात् मूर्ति सचेतन नहीं होती, आँखों से देखे ऐसा नहीं होता, यह हम सबों को अच्छी तरह मालूम ही है। अस्तु, परमेश्वर का अखण्ड निश्चय इस सब जगत् भर में चल रहा है। उसमें हमारी कृति से कोई परिवर्तन नहीं होगा। जो जड़ है वह जड़ ही रहेगा, और सचेतन वह सचेतन ही समझा जावेगा।
अब रहा प्राण-प्रतिष्ठा के कारण जड़ मूर्तिपूजा के अर्थ मानने का क्या आधार है—उसे देखो, न तो चारों वेदों में, अथवा गृह्य, श्रौत सूत्रों में न षड्दर्शनों में कहीं भी प्राण-प्रतिष्ठा के मन्त्र दिये हैं तो फिर प्राणेभ्यो नमः इस प्रकार के प्राण-प्रतिष्ठा के मन्त्र कहां से निकले, इसका विचार हम हिन्दुओं को, नहीं मैं भूला, हम आर्यों को करना चाहिए। हिन्दू शब्द का उच्चारण मैंने भूल से किया; क्योंकि हिन्दू यह नाम हमें मुसलमानों ने दिया है, जिसका अर्थ काला, काफिर, चोर इत्यादि है, सो मैंने मूर्खता से उस शब्द को स्वीकार किया था। आर्य अर्थात् श्रेष्ठ यह हमारा असली नाम है—
विजानीह्यार्यान् ये च दस्यवो बर्हिष्मते रन्धया शासदव्रतान्। शाकी भव यजमानस्य चोदिता विश्वेत्ता ते सधमादेषु चाकन॥१
आर्यो ब्राह्मणकुमारयोः॥२
भाइयो! दस्यु सदृश अव्रतचारी लोगों के साथ लड़ने वाले हम व्रतचारी आर्य हैं, सो स्मरण रहे, अस्तु।
प्रतिष्ठामयूखादि अथवा लिङ्गार्चन-चिन्तामणि इत्यादि तन्त्र ग्रन्थों में के मन्त्र लेकर हम जड़मूर्ति की प्राण-प्रतिष्ठा करते हैं। यदि कोई ऐसा कहे तो [हम] उन तन्त्र ग्रन्थों का कुछ नमूना दिखाते हैं और पूछते हैं कि ये ग्रन्थ माननीय हो सकते हैं वा नहीं?
पीत्वा पीत्वा पुनः पीत्वा यावत् पतति भूतले।
पुनरुत्थाय वै पीत्वा पुनर्जन्म न विद्यते॥
भला ऐसे-ऐसे तान्त्रिक मन्त्रों के बीच वैदिक मन्त्रों का सामर्थ्य कहां से आ सके? इसीलिए जड़मूर्ति में कभी भी चेष्टा नहीं उत्पन्न होती। मन्त्र से स्वाभाविक जड़ पदार्थ में प्राण डालना तो दूर रहा परन्तु स्वाभाविक जीव रहने वाले सावयव मृत शरीर में जिसमें प्राण आना चाहिए और मुर्दा जिन्दा हो जाय, परन्तु उसमें वैसा भी नहीं होता, तो फिर व्यर्थ ही इस प्रकार के प्राण-प्रतिष्ठा के पाखण्ड में क्या रखा है। अर्थात् कुछ भी ऐसे पाखण्ड से नहीं निकलता।
प्रश्न—भिन्न-भिन्न वर्ण तो आप नहीं मानते, फिर वर्णाश्रमीय धर्म की व्यवस्था आप कैसे करोगे अर्थात् ब्राह्मण कौन? वैश्य कौन? क्षत्रिय कौन? शूद्र कौन हो सकता है?
उत्तर—आश्रम चार हैं—ब्रह्मचर्य, गृहस्थाश्रम, वानप्रस्थ और संन्यास। सुसंगति, अध्ययनादिकों का अधिकार मनुष्यमात्र को है। फिर जिस-जिस प्रकार का जिस-जिस पर संस्कार होगा उसी-उसी प्रकार उसकी योग्यता मनुष्य मात्र में बढ़ेगी। हमारे देश में कोई बड़ी धर्म-सभा नहीं, जिसके कारण आश्रम-व्यवस्था और वर्ण-व्यवस्था कुछ की कुछ ही हो गई। भला आदमी दुःख उठाता है, [जितने] चाहिए उतने मजदूर हर ठौर नहीं मिल सकते, क्योंकि देश भर में साधुओं की टोलियाँ की-टोलियाँ फिरती हैं। आधुनिक सम्प्रदायों के अनुकूल जो साधु बनते हैं, बतलाओ कि उनकी गणना किस आश्रम में की जाए? क्योंकि शास्त्र का आधार छोड़ लोग मनमाने रहने लगे हैं, यह एक प्रकार की जबरदस्ती है। शूद्र, वैश्य, क्षत्रिय और ब्राह्मण यह व्यवस्था गुण, कर्म और स्वभाव से की जा सकती है और प्राचीन आर्य लोगों की व्यवस्था इसी प्रकार थी। वे जन्म से ब्राह्मणादि वर्ण नहीं मानते थे। जानश्रुति [और] जाबाल ये नीच कुल के थे।१ जाबाल ऋषि की कथा छान्दोग्योपनिषद् में कही हुई है।२ उसकी माता व्यभिचारिणी थी, परन्तु गुरु के पास जाकर जाबाल सत्य बोला, इतने ही कथन से गुरु प्रसन्न होकर उससे कहने लगा कि ‘जाबाल! तुम सत्य भाषण के कारण ब्राह्मण हो।’३ ऐसा कहकर उसे ब्राह्मणत्व दिया।
अब पुरुष सूक्त में भी एक श्रुति है, उसका भी अर्थ करना चाहिए।
ब्राह्मणोऽस्य मुखमासीद् बाहू राजन्यः कृतः।
ऊरू तदस्य यद्वैश्यः पद्भ्यां शूद्रो अजायत॥४
पुरुष सूक्त के बीच में ‘सहस्रशीर्षा’ यह पद बहुव्रीहि है, तत्पुरुष नहीं है। जिस प्रकार ‘गङ्गायां घोषः’ इसका अर्थ लक्षणा से करना पड़ता है। इसी प्रकार [की] पद्धति रखकर ऊपर के वाक्य का अर्थ करना चाहिए।
पूर्णत्वात् पुरिशयनाद् वा पुरुषः। [यह निरुक्त का प्रमाण है]५
उस पुरुष का मुख अर्थात् मुख्य स्थान अर्थात् विद्वान्—ज्ञानवान् जो हैं वे ब्राह्मण हैं। शतपथ ब्राह्मण में ‘बाहु’ अर्थात् “वीर्य” ऐसा अर्थ दिया है।६ इससे स्पष्ट है कि जो वीर्यवान् वह क्षत्रिय जानना चाहिए ऐसी व्यवस्था होती है। व्यावहारिक विद्या में जो चतुर हैं वे वैश्य। अब ‘पद्भ्यां शूद्रो अजायत’ इस स्थल पर ‘पद’ इसका अर्थ नीच मानकर मूर्खत्वादि गुणों से शूद्र होते हैं ऐसा [मानकर उन्हें नीच] कहना किस प्रकार चल सकेगा? ‘यानि तीर्थानि सागरे तानि ब्राह्मणस्य दक्षिणे पदे’ इस स्थल पर पद की कितनी भारी योग्यता है, यह तुम्हें विदित ही है। इस विचार से शूद्र अर्थात् मूर्ख ऐसा ही अर्थ होता है और तब ही मनु जी के वाक्य का अर्थ सम्यक् प्रकार लग जाता है—
शूद्रो ब्राह्मणतामेति ब्राह्मणश्चैति शूद्रताम्।
क्षत्रियाज्जातमेवं तु विद्याद् वैश्यात् तथैव च॥१
सब वर्णों के अध्ययन का जो समय है वह ब्रह्मचर्य है, और संसार को एक ओर रखकर अध्ययन, उपदेश और लोक-कल्याण करने में जो सम्पूर्ण समय लगाया जावे वह संन्यास है। गृहस्थियों को समय इन सब कार्यों के करने को नहीं मिलता और संन्यासियों को अवकाश बहुत मिलता है बस यही मुख्य भेद है।
अब यदि कहा जाये कि जन्म ही से ब्राह्मण होता है तो जब कोई ब्राह्मण अपने सदाचरण को छोड़ यवनादिकों के समान आचरण करने लग जाता है तो उसका ब्राह्मणत्व क्यों नष्ट होता है? इससे सिद्ध हुआ कि केवल जन्मसिद्ध ही ब्राह्मणत्व नहीं, किन्तु आचार-सिद्ध है। यह तुम्हारे ही कामों से सिद्ध होता है। जिस समय इस आर्यावर्त में अखण्ड राज्य, अखण्ड ऐश्वर्य था, उस समय वर्णाश्रम की ऐसी ही व्यवस्था थी। यदि कोई कहे कि गृहस्थाश्रम का अनुभव लिए विना संन्यास न लेना चाहिए, तो यह कहना अप्रशस्त है। क्योंकि यदि रोग हो तो औषध देना बुद्धिमानी है। उसी प्रकार जिस पुरुष को विषयासक्ति की इच्छा नहीं, भोगेच्छा भी नहीं, तो उसे नया संन्यास लेने की कोई आवश्यकता नहीं, किन्तु वह तो स्वयं बना बनाया संन्यासी ही है।
गार्गी ने कभी भी संसार-सुख का अनुभव नहीं लिया, वह सदा ब्रह्मचारिणी थी। संन्यासियों से बड़े-बड़े लाभ होते हैं। संन्यासियों को शरीर-सम्बन्ध तो केवल होता है, शेष व्यवसाय उन्हें नहीं होते। उपदेश करना वा अधर्म की निवृत्ति करना, यह संन्यासियों का मुख्य कर्त्तव्य कर्म है। अब यदि कोई पूछे कि पुत्रोत्पत्ति विना जन्म कैसे सफल होगा तो उन्हें यह उत्तर है कि पुत्र दो प्रकार के होते हैं—विद्या और योनि से। इन दो ही सम्बन्धों से पुत्र प्राप्ति होती है। “गरीयान् ब्रह्मदः पिता”१। मूढ़ लोग जनपद में दुराचार कर-कर किसी आपत्ति में पड़ेंगे सो उन्हें सदाचरण की ओर लगाना, यही चतुर्थाश्रमधारी ज्ञानी पुरुष का मुख्य काम है।
परन्तु इन दिनों संन्यासियों पर बड़े-बड़े जुल्म अत्याचार हो रहे हैं अर्थात् संन्यासियों को वन में रहना चाहिए। एक ही बस्ती में तीन दिन से अधिक न रहें, इत्यादि-इत्यादि प्रतिबन्ध हैं। यदि इन्हें माना जाए, तो भाई! बताओ कि वह फिर किस प्रकार और किसे उपदेश करे? क्या वह एक गाँव से दूसरे गाँव दौड़ता फिरे? संन्यासियों को आग को न छूना चाहिए ऐसा भी कहते हैं, परन्तु मरने तक वे अपने जठराग्नि को कैसे छोड़ सकेंगे अर्थात् वह तो उनमें बना ही रहेगा। आधुनिक ‘विश्वेश्वरपद्धति’ नामक ग्रन्थ से यह सब पाखण्ड फैला है।
फिर आधुनिक साधुओं को तन मन धन का समर्पण करे, [यह] क्या है? भाई मन का समर्पण कैसे होगा? और तन का समर्पण करने में क्या मल, मूत्रादिकों का भी समर्पण होगा? आधुनिक साधुओं ने कुछ विलक्षण ही व्यवस्था बनाई है। उन्हें वेद-शास्त्रों से क्या काम?
विचारे संन्यासीमात्र को अलबत्ता कष्ट होते हैं। मुझे कुछ धन चाहिए, इसलिए ऐसा कहता हूँ, यह बात नहीं। किन्तु मेरी मनोवृत्ति का साक्षी ईश्वर है। तुम उल्टा मत समझना।
प्रश्न—मूर्त पदार्थों के विना ध्यान कैसे करते बनेगा?
उत्तर—शब्द का आकार नहीं तो भी शब्द ध्यान में आता है वा नहीं? आकाश का आकार नहीं तो भी आकाश का ज्ञान करने में आता है वा नहीं? जीव का आकार नहीं तो भी जीव का ध्यान होता है वा नहीं? ज्ञान, सुख, दुःख, इच्छा, द्वेष, प्रयत्न ये नष्ट होते ही जीव निकल जाता है, यह किसान भी समझता है। ध्यान यह ऐसा ही पदार्थ है। योग आदि शास्त्र में ध्यान का लक्षण किया—
रागोपहतिर्ध्यानम्॥२
ध्यानं निर्विषयं मनः॥३
तत्र प्रत्ययैकतानता ध्यानम्॥१
साकार का ध्यान कैसे करोगे? साकार के गुणों का ज्ञानाकार होने तक ध्यान नहीं बनता अर्थात् सम्भव नहीं होता कि ज्ञान के पहले ध्यान हो जाय। देखो एक सूक्ष्म परमाणु के भी अधम, उत्तम और मध्यम ऐसे अनेक विभाग ज्ञान-बल से कल्पना में आते हैं। अब कोई ऐसा कहे कि मुट्ठी में क्या पदार्थ है तो विदित होने तक ढकी हुई मुट्ठी की ओर देखने ही से केवल उस पदार्थ को जानने के लिए और भी दृढ़तर सबल उपाय हैं। देखो! अनुमान; उपमान, शब्द, ऐतिह्य, अर्थापत्ति, सम्भव और अभाव—ये आठ२ उपाय हैं। अनुमान ज्ञान के सम्मुख प्रत्यक्ष की क्या प्रतिष्ठा है। अब यह विचारणीय है, अस्तु।
ओ३म् शान्तिः शान्तिः शान्तिः॥