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पञ्चम उपदेश—वेद-विषयक

In Hindi:

महर्षि दयानन्द व्याख्या : पञ्चम उपदेश

[वेद-विषय]

[मंगलवार ता॰ १३ जुलाई १८७५ स्वामी दयानन्द सरस्वती ने विज्ञापन के अनुसार बुधवार पेठ में भिड़े के बाड़े में ता॰ १३ जुलाई के दिन रात्रि में आठ बजे दिये वेद-विषयक व्याख्यान का सारांश।]

ओ३म् दृते दृᳬह मा मित्रस्य मा चक्षुषा सर्वाणि भूतानि समीक्षन्ताम्। मित्रस्याहं चक्षुषा सर्वाणि भूतानि समीक्षे। मित्रस्य चक्षुषा समीक्षामहे॥१

आज के व्याख्यान का विषय ‘वेद’ है। तीन प्रकार से इस विषय का विचार करना चाहिए—

(१)वेद की उत्पत्ति किस प्रकार हुई?

(२)वेद का कर्त्ता कौन है?

(३)वेदों का प्रयोजन क्या है?

परमेश्वर वेदों का कर्त्ता है। वेद अर्थात् ज्ञान, वेद अर्थात् विद्या। ज्ञान वा विद्या ये सम्पूर्ण सृष्टि-पदार्थों के बीच उत्तम है। ज्ञान सुख का कारण है, ज्ञान के विना सुखकारक पदार्थ भी दुःखकारक होता है, क्योंकि ज्ञान के विना पदार्थ की योग्य योजना करते नहीं बनती। अनन्त ज्ञान ईश्वर का है इसीलिए “अनन्ता वै वेदाः”२ ऐसा वचन है। अनन्त यह उसकी संज्ञा है। अनन्त ज्ञान-सम्पन्न परमेश्वर मनुष्य की योग्यता बढ़ाने के लिए और उसे ऊँचे दरजे को पहुँचाने के लिए सहज सदा प्रवृत्त है और इसी हेतु को सफल करने के लिए विद्या का प्रकाश करता है, सो वही प्रकाश ‘वेद’ है। मनुष्य इस अनन्त ज्ञान के लिए अर्थात् वेद-ज्ञान के अर्थ योग्य अधिकारी है। इस ज्ञान की उत्पत्ति मनुष्य से नहीं है।

अब यदि ईश्वर साकार नहीं, तो उसने वेद का प्रकाश कैसे किया? ऐसा प्रश्न उद्भव (=उत्पन्न)होता है। तालु, जिह्वा, ओष्ठ आदि जिस अधिकरण में नहीं हैं तो वहां से शब्दोच्चारण कैसे बनेगा?

इसका उत्तर देना सरल है। ईश्वर सर्वशक्तिमान् है तो फिर सहज ही में यह सोच सकते हैं कि उसे मुखादि इन्द्रियों की अपेक्षा नहीं होती। शब्दोच्चारण के संयोगादि कारण अल्प-शक्ति वालों को अपेक्षित होते हैं। किञ्च—

अपाणिपादो जवनो ग्रहीता पश्यत्यचक्षुः स शृणोत्यकर्णः।

स वेत्ति विश्वं न च तस्यास्ति वेत्ता, तमाहुरग्र्यं पुरुषं पुराणम्॥१

आप सब यह स्वीकार करते हैं कि हाथ के विना ईश्वर ने सब सृष्टि की रचना की। फिर भला मुँह विना वेद की रचना क्यों न हो सकेगी?

कोई यदि ऐसी शङ्का करे कि वेद-रूपी पुस्तकों की रचना तो शक्य काम है इसके लिए ईश्वर की साक्षात् कृति की कल्पना करने की क्या आवश्यकता? परन्तु इस स्थल पर जरा विचार करना चाहिए। विद्या और जड़ सृष्टि-रचना में महत् अन्तर है। जड़-रचना ही केवल परमेश्वर ने कर दी तो इससे उसका बड़ा माहात्म्य सिद्ध नहीं होता, क्योंकि विद्या के सम्मुख जड़ सृष्टि-रचना कुछ भी नहीं है। इसलिए विद्या का कारण भी ईश्वर ही है, ऐसा मानना चाहिए। अन्य क्षुद्र पदार्थ निर्माण करके विद्यारूपी वेद ईश्वर उत्पन्न न करे, यह कैसे [सम्भव] हो सकेगा?

अब वेद-विद्या ईश्वर से उत्पन्न हुई तो इसका तात्पर्य क्या है? ऐसा प्रश्न उत्पन्न होता है। तो उसका उत्तर यह है कि आदि विद्या अर्थात् सब विद्याओं का मूल तत्त्वमात्र ईश्वर द्वारा प्रकाशित हुआ। उसका विशेष प्रभाव मनुष्यों के हाथों से अभ्यास द्वारा होता है।

अब यह आदि-विद्या अर्थात् वेद ईश्वर ने प्रकाशित किए हैं, उसके प्रमाण—

(१)प्रथम प्रमाण यह कि वेद में पक्षपात नहीं। ईश्वर सब जगत् पर [समान रूप से] अनुग्रह करने वाला है। इसलिये तत्प्रणीत जो वेद, उसमें पक्षपात का रहना कैसे सम्भव होगा? इसी तरह ईश्वर न्यायकारी है, इसलिये उसमें पक्षपात की सम्भावना नहीं हो सकती। जिसमें पक्षपात हो वह विद्या ईश्वर-प्रणीत नहीं है। इसका उदाहरण—वेद की भाषा क्या [है]? संस्कृत ही ना? संस्कृत भाषा वेदों की है क्या यह पक्षपात नहीं है, ऐसा कोई कहे तो उसका यह कहना ठीक नहीं है। [क्योंकि] संस्कृत भाषा सारी भाषाओं का मूल है। अंग्रेजी सदृश भाषायें उसमें परम्परा से उत्पन्न हुई हैं एक भाषा दूसरी भाषा का अपभ्रंश होकर उत्पन्न होती है। ‘वयम्’ इस संस्कृत शब्द में के ‘यम्’ को सम्प्रसारण होकर ‘वी’ यह शब्द उत्पन्न हुआ—उसी तरह ‘पितर’ से ‘पेतर’ और ‘फादर’, ‘यूयम्’ से ‘यू’ और ‘आदिम’ से ‘आदम’ इत्यादि। ऐसे अपभ्रंश कुछ नियमों के अनुकूल होते हैं और कुछ अपभ्रंश यथेष्टाचार से भी होते हैं। इसके विषय में बुद्धिमानों को कहने की कुछ अधिक आवश्यकता नहीं। ईश्वर में जैसा अनन्त आनन्द है उसी तरह संस्कृत-भाषा में भी अनन्तानन्द है। इस भाषा के सदृश, मृदु, मधुर और व्यापक सर्व भाषाओं की माता, ऐसी दूसरी कौन सी भाषा है? अर्थात् कोई भी दूसरी नहीं।

अब यदि कोई कहे कि यह भाषा एक ही देश की क्यों होनी चाहिए? तो देखो, संस्कृत-भाषा एक ही देश की नहीं है। सर्व भाषाओं का मूल संस्कृत में है। इसलिए सर्वज्ञान का मूल जो वेद, वे भी संस्कृत में हैं। जिस-जिस देश में संस्कृत भाषा पहुँची, उस-उस देश के विद्वान् लोगों के मन का आकर्षण करती जाती है और यह दूसरी भाषाओं के मातृ-स्थान में है, ऐसी योग्यता प्राप्त करती जाती है।

फिर देखो कि वेद ही में की कुछ-कुछ मुख्य-मुख्य बातों का प्रचार जगत् के सारे देशों में चल रहा है। यहूदी लोग सदा वेदी रचते और यज्ञ करते थे, यह ज्ञान उन्हें कहां से प्राप्त हुआ था? उन्हें होता, उद्गाता, ब्रह्मा इनकी व्यवस्था के साथ यज्ञ करना विदित नहीं। परन्तु इसमें कुछ विशेष भेद नहीं। हम आर्यों की रीति की उन्हें भूल हुई। इसी तरह पारसी लोग भी अग्यारी में अग्नि पूजा करते हैं। क्या यह आचार वेद-मूलक नहीं है?

वेद में पक्षपात नहीं, यह स्पष्ट है। यहूदी लोग अन्य लोगों से द्वेष करना सीखे थे, मुसलमान लोग दूसरों को ‘काफिर’ कहते हैं और उनके धर्म-पुस्तकों में ऐसा करने की प्रेरणा की गई है, परन्तु इस प्रकार के अभिमान के लिए वेदों में उत्तेजन नहीं है। इसलिए वेद ईश्वर प्रणीत है ऐसा [सिद्ध] होता है।

२—द्वितीय प्रमाण—वेद यह सुलभ ग्रन्थ है। अर्वाचीन पण्डित अवच्छेदक-अवच्छिन्न पदों को घुसेड़ कर बड़े लम्बे-चौड़े परिष्कार करते हैं। परन्तु उन परिष्कारों में केवल शब्द-जाल मात्र रहता है, विशेष अर्थ-गाम्भीर्य नहीं होता। इस प्रकार के वेद ग्रन्थ नहीं हैं।

जब कोई कहे कि दुर्बोध के कारण परिष्कार में काठिन्य पाण्डित्यसूचक है, तो आप जानते हैं कि जब कौवे आपस में लड़ते हैं तब उनकी भाषा का अर्थ किसी को भी नहीं समझ पड़ता, तो क्या दुर्बोध के कारण काक-भाषा में पाण्डित्य की सम्भावना होगी? कभी नहीं। अस्तु, वाक् सुलभता और अर्थ-गाम्भीर्य्य, यही सामर्थ्य का प्रमाण है। ज्ञानप्राप्ति क्लेश विना होना यह ईश्वर-कृति का दर्शक है। यों ही “शक्यतावच्छेदक शक्यतावच्छिन्न” कहने की जगह सुलभ शब्दों से जो भगवान् वात्स्यायनजी ने प्रतिपादन किया है, उसे देखो—

प्रमातुः प्रमाणानि प्रमेयाधिगमार्थानीति शक्यप्राप्तिः।१

इसी सुलभता के कारण वात्स्त्यायन महापण्डित क्या आधुनिक शास्त्रियों की अपेक्षा गंवार ठहराया जा सकता है? नहीं-नहीं। फिर वात्स्यायन की भाषा की अपेक्षा तो वेदों की भाषा लाख-दरजा सरल है।

(३)तृतीय प्रमाण—वेदों से अनेक विद्या और शास्त्र सिद्ध होते हैं। जैसे—

नमोऽस्तु रुद्रेभ्यो ये दिवि येषां वर्षमिषवः।

तेभ्यो दश प्राचीर्दश दक्षिणा दश प्रतीचीर्दशोचीर्दशोर्ध्वाः।

तेभ्यो नमो अस्तु ते नोऽवन्तु ते नो मृडयन्तु

ते यं द्विष्मो यश्च नो द्वेष्टि तमेषां जम्भे दध्मः॥२

मनुष्यों के बनाए हुए पुस्तकों में एक ही विषय का प्रतिपादन रहता है। जैमिनिजी के सारे मत का प्रवाह एक धर्म और धर्मी इस विषय में विचार करते-करते पूर्ण हुआ। भगवान् कणाद के मन का ओघ३ षट् पदार्थों के विवेचन के विचार ही में समाप्त हुआ। इसी तरह वैद्यक ग्रन्थ, व्याकरण-भाष्य और योग-शास्त्र की व्यवस्था लगाने में भगवान् पतञ्जलिजी की सारी आयु बीती। परन्तु वेद ये अनन्त विद्या के अधिकरण हैं, इसलिए वेद मनुष्य-कृत नहीं है, किन्तु ईश्वर प्रणीत ही हैं। अब सारी विद्याओं के अधिकरण वेद हैं अर्थात् वेद में सारी विद्याओं के मूलतत्त्वों का दिग्दर्शन मात्र है। उदाहरणार्थ देखें—

वाराह्योपानहोपनह्यामि॰१

सहस्रारित्रां शतारित्रां नावमित्यादि॰२

एका च मे तिस्रश्च मे पञ्च च मे॰॥३

प्रथम उद्धरण में रचना विशेष३ का निरूपण किया हुआ है, दूसरे में नौका-शास्त्र का निरूपण किया है और तीसरे में गणित-शास्त्र का निरूपण बतलाया है।

अब यदि कोई पूछे कि ईश्वर ने सब विद्याओं के मूल तत्त्व ही क्यों प्रकाशित किए और साद्यन्त्त विद्या और कला का क्यों विवरण नहीं किया? तो उसमें मेरा यह कहना है कि जैसे ईश्वर ने मनुष्यमात्र के बुद्धि व्यापार का, उसी तरह बुद्ध्युन्नति का भी अवकाश रखा।

(४)चतुर्थ—कोई-कोई ऐसी शंका भी करते हैं कि वेद अनेक पुरुष घटित हैं, तो इसका यह उत्तर है कि यदि अनेक पुरुष घटित वेद होते तो वेदों में [जो] एकवाक्यतादि गुण हैं, उनकी व्यवस्था कैसी लगाओगे?

पूर्वकाल में भिन्न-भिन्न विद्यायें भरत-खण्ड में वेदों के कारण प्रसिद्ध थीं। जैसे विमान-विद्या, अस्त्र-विद्या इत्यादि। विद्याओं के पुस्तक नष्ट होने से वे विद्यायें भी नष्ट हो गईं। मुसलमानों ने लकड़ी को जलाने की जगह पुस्तकों को जलाया। जैनियों ने भी ऐसा ही अनर्थ किया। सन् १८५७ के साल के लगभग जब दंगा-फसाद हुआ था, उस समय किसी एक यूरोपियन ने अमृतराव पेशवे के भारी पुस्तकालय में आग लगा दी थी—ऐसी दन्त-कथा है। इस पर विचार करो कि कितनी विद्या नष्ट होती आई है।

उपरिचर नामक राजा था। वह सदा भूमि को स्पर्श न करता हुआ हवा ही में फिरा करता था। पहले के जो लोग लड़ाइयाँ लड़ते थे, उन्हें विमान रचने की विद्या भली प्रकार विदित थी। मैंने भी एक विमान-रचना का पुस्तक देखा है। भाई! उस समय दरिद्रों के घर में भी विमान थे। भला सोचो कि उस व्यवस्था के सम्मुख रेलगाड़ी की प्रतिष्ठा क्या हो सकती है? अर्थात् कुछ भी नहीं।

(५)पञ्चम—वेद सनातन सत्य हैं, इससे उनका सामर्थ्य भी बहुत बड़ा है। देखो शार्मण्य (जर्मन)देशों के लोग वेदों का अवलोकन कर उनकी कीर्ति और गुणानुवाद गा रहे हैं। इसी तरह सब देशों के विद्वानों के मन का आकर्षण वेद के सत्य के सामर्थ्य से हो रहा है, सारांश यह है कि सत्यता, एकवाक्यता; सुगम रचना, भाषा-लावण्य, निष्पक्षपातता, सर्व विद्यामूलकत्व, ये गुण वेदों ही में केवल सम्भावित होते हैं। इसी से वेद ईश्वर-प्रणीत हैं। इन दिनों हमारे अंग्रेजी पढ़े हुए लोग अंग्रेजी ग्रन्थों की खटपट देखकर वही सच है, ऐसा मानते हैं, सो यह ठीक नहीं है। [उधर] हमारे बड़े भाई शास्त्री लोग जो परम्परा न छोड़ने के विषय में हठ करके बैठे हैं, यह भी ठीक नहीं है, क्योंकि रेल में प्रवास करते समय उनकी परम्परा का हठ किधर जा घुसता है? क्या बाप अन्धा हो तो पुत्र को भी अपनी आँखें फोड़ लेनी चाहियें? मतलब [यह है कि] इतनी परम्परा को पकड़ रखने से धर्म प्रबन्ध में बड़ी गड़बड़ मच गई है। इस गड़बड़ को विचारने से कलेजा धड़कने लग जाता है।

देखो! चारों ओर जाति-विभाग होकर हम निर्बल हो गए हैं। पहले आर्य लोगों में शतघ्नी अर्थात् तोपें भी थीं और भुशुंडी अर्थात् बन्दूकें भी थीं। यह सब हमारा बल किधर चला गया? आग्नेय अस्त्रादिकों का लोप कैसे हुआ? आजकल के पण्डित लोग ऐसा कहते हैं कि पहले केवल मन्त्रोच्चारण के सामर्थ्य से आग्नेयास्त्रादि निर्माण होते थे; परन्तु ऐसा नहीं है। मन्त्रों के कारण आग उत्पन्न होती थी, यदि ऐसा मानें तो मन्त्र बोलने वाला स्वयं कैसे नहीं जलता था? तो भाई ऐसा नहीं है। मन्त्र अर्थात् विशेष अक्षर आनुपूर्विक अर्थात् शब्दों में और अर्थों में संकेत-मात्र सम्बन्ध है और [दाहक] सामर्थ्य नहीं। जैसे अग्नि शब्द में दाहकत्व नहीं है, तद्वत् मन्त्र जपने में कोरा समय खोना है। व्रतबन्ध (जनेऊ)के समय लड़के का अल्प सामर्थ्य रहने से एक ही मन्त्र उसे वार-वार रटना पड़ता है। इससे यह मन्त्र का एक सच्चा विनियोग नहीं है। मन्त्र का अर्थ है विचार। राजमन्त्री कहने से विचार करने वाला, यही सत्य अर्थ होगा। यदि यह अर्थ न मानो तो राजमन्त्री वा अमात्य का, राजा का माला लेकर जप करने वाला ऐसा अर्थ करना पड़ेगा, तो मन्त्री शब्द का अर्थ जप करने वाला नहीं, किन्तु विचार करने वाला ही होता है। तो वेद-मन्त्र का सच्चा विनियोग करना अर्थात् बुद्धि-वैशद्य, बुद्ध्युन्नति, बुद्धि-प्रकाश, बुद्धि-सामर्थ्य को बढ़ाना यह है। इस प्रकार का सामर्थ्य पहले आर्यों में था। वे एक ही मन्त्र को लेकर जपने नहीं बैठते थे, परन्तु अनेक मन्त्रों की मीमांसा करते थे। इसीलिए वारुणास्त्र, आग्नेयास्त्रादि उन्हें विदित थे अर्थात् पदार्थों के गुणों को जान उनकी विशेष योजना वे करते थे। विशल्यौषधि नामक उन्हें एक औषधि विदित थी जिससे कैसा ही जख्म क्यों न हो इस औषधि से झट से भर आता था। पहले बंगाल में आर्य लोगों की वैद्यक विद्या की लोग हंसी उड़ाते थे। परन्तु डाक्टर महेन्द्रनाथ सरकार सदृश विद्वान् पण्डित ने चरक सुश्रुत सदृश ग्रन्थों का उज्जीवन किया, जिससे अंग्रेजी सीखे हुए लोगों का भ्रम दूर हुआ। महेन्द्रनाथ ने प्राचीन आर्यग्रन्थों का उज्जीवन करने के लिए बहुत-सा धन इकट्ठा करने का प्रयत्न चलाया है, सो यह उनका भूषण है।

पदार्थ-ज्ञान के विषय में वेदों में बड़ी क्षमता है।

अग्निवायुरविभ्यस्तु त्रयं ब्रह्म सनातनम्।

दुदोह यज्ञसिद्ध्यर्थमृग्यजुःसामलक्षणम्॥१

सृष्ट पदार्थों के विवेचन करने के लिए, उसी तरह ईश्वर के ज्ञानप्राप्त्यर्थ बुद्धि-सामर्थ्य को सम्पादन करना, यह वेदाध्ययन का प्रयोजन है। वेदोत्पत्ति ब्रह्मा से हुई और व्यासजी ने संग्रह अर्थात् संहिता बनाई, ऐसा आजकल के पण्डित लोग कहते हैं, परन्तु भाई! इसमें उनकी भूल है; क्योंकि मनु ने लिखा है कि ब्रह्माजी ने अग्नि, वायु, आदित्य और अङ्गिरा इन चार ऋषियों से वेद सीख फिर आगे वेद का प्रचार किया। ब्रह्माजी का चतुर्मुख ऐसा नाम है। इससे यह नहीं समझना चाहिए कि सचमुच उनके चार ही मुख होंगे। यदि सत्य में ऐसे चार मुख होते तो बेचारे ब्रह्माजी को बड़ा दुःख हुआ होता और फिर बेचारे सुख से कैसे सोते? तो ऐसा नहीं है, किन्तु ‘चत्वारो वेदा मुखे यस्य इति चतुर्मुखः’ ऐसा समास करना चाहिए। प्रथमारम्भ में ईश्वर-ज्ञान से इन चार ऋषियों के ज्ञान में वेद प्रकाशित हुए और उनसे ब्रह्माजी ने सीखे और पश्चात् उन्होंने सारी दुनिया भर में फैलाये, और उनसे मनुष्यों को ज्ञान प्राप्त हुआ। इसलिए उनका ‘वेद’ ऐसा नाम है, और पहले ऋषि लोग एक दूसरे से सुनते आए, ‘श्रुति’ ऐसा वेदों का नाम है।

अग्नि, वायु, आदित्य, अङ्गिरा इन चार ऋषियों को वेद प्रथम प्राप्त हुए। इस पर कोई कहेगा कि ये आदि में चार ही ऋषि क्यों थे, एक या अधिक क्यों न थे, तो ये शंकायें पाँच या तीन भी होते, तब भी बनी रहतीं। यह अशोकवनिका न्याय१ होगा।

अब कोई कहे कि वेद आधुनिक हैं, नित्य नहीं हैं; क्योंकि ब्रह्मदेव के मन में ज्ञान-लहर उत्पन्न हुई, और उसी समय से वेद की परम्परा चल सकी है, फिर नित्य कैसे? सो भाई! इस प्रकार नहीं है। देखो ईश्वर का अपूर्व ज्ञान है, और ज्ञान-रचना नित्य है, सृष्टि का तथा वेदों का आविर्भाव तिरोभाव ही केवल [होता] है, क्योंकि—

सूर्याचन्द्रमसौ धाता यथापूर्वमकल्पयत्।२

इत्यादि वचन ईश्वरीय नित्य ज्ञान के प्रमाण हैं।

ब्रह्माजी के पीछे विराट् उत्पन्न हुआ, फिर वशिष्ठ, नारद, दक्ष, प्रजापति, स्वायंभुव मनु आदि हुए। इन ऋषियों के मन में ईश्वर ने प्रकाश किया।

अब यह व्याख्यान पूर्ण करने के पूर्व वेद-विषय में साधारण विचार करना चाहिए।

कोई-कोई कहते हैं कि चांद, सूरज आदि भूतों की पूजा वेदों में उपदिष्ट है; परन्तु यह कहना बिल्कुल सम्भव नहीं।

(शुक्ल यजुर्वेद)

तदेवाग्निस्तदादित्यस्तद् वायुस्तदु चन्द्रमाः।

तदेव शुक्रं तद् ब्रह्म ता आपः स प्रजापतिः॥१

तथा—

इन्द्रं मित्रं वरुणमग्निमाहुरथो दिव्यः स सुपर्णो गरुत्मान्।

एकं सद्विप्रा बहुधा वदन्ति [अग्निं यमं मातरिश्वानमाहुः]॥२

अग्नि, इन्द्र, वायु ये सब परमेश्वर ही के नाम हैं। इसलिए अनेक देवताओं का वाद बिल्कुल सम्भव नहीं।

प्रशासितारं सर्वेषामणीयांसमणोरपि। रुक्माभं स्वप्नधीगम्यं विद्यात् तं पुरुषं परम्॥

एतमग्न वदन्त्येके मनुमन्ये प्रजापतिम्। इन्द्रमेकेऽपरे प्राणमपरे ब्रह्म शाश्वतम्॥३

परिच्छेद, प्रकार, विकार इत्यादि सम्बन्ध से एक ही आत्मा के भिन्न-भिन्न नाम हो सकते हैं।

कोई-कोई कहते हैं कि वेदों में बीभत्स कथा भरी हुई है। ‘माता च ते पिता च ते’३ इस वचन पर महीधर ने भाष्य कर बड़ा ही बीभत्स रस उत्पन्न किया है। ‘गभे’ के स्थान पर वर्ण विपर्यास कर ‘भगे’ यह शब्द निकाला है, परन्तु इस सम्बन्ध में शतपथ ब्राह्मण को देखो—

वृक्षो राज्यं भगः श्रीः स्पर्शो राष्ट्रं श्रीर्वा वृक्षस्याग्रम्।४

इस प्रकार राष्ट्र के स्थान पर इस वचन की योजना करने से बीभत्सपन नहीं रहता।

इसी तरह पुराणों में काश्यपीय प्रजा का वर्णन है। मरीचि का पुत्र कश्यप है, दक्ष की साठ कन्याओं में से तेरह कन्याओं के साथ कश्यप का विवाह हुआ; इस प्रकार का वर्णन किया हुआ है। इस कथा के लिए वेदों में कहीं भी आधार नहीं है। कश्यप अर्थात् आद्यन्त के विपर्यास से ‘पश्यकः’ परमात्मा का नाम तो हो सकता है।

पश्यकः सर्वदृक् परमात्मा गृहीतः।१

इसी प्रकार किसी ने कोई कथा करने के लिए ‘ब्रह्मोवाच’ लगाकर कुछ कथा बना अनेक पुराणों का पाखण्ड रचा है। इस प्रकार का दुष्ट उद्योग आधुनिक सम्प्रदायी लोगों ने तो बहुत ही किया है।

ब्रह्मोवाच

टका धर्मष्टका कर्म टका हि परमं पदम्।

यस्य गृहे टका नास्ति हा टका टकटकायते॥

इस सम्प्रदाय का बाजार आजकल खूब गरम है। इसके कारण जो दुकानदारी प्रारम्भ हुई है उसे सम्प्रदायी लोग क्यों कर छोड़ेंगे। यजमान की चाहे तीन जन्म तक की हानि हो तो उनका क्या मतलब? इसलिए जब सब स्त्री-पुरुष सर्वत्र वेदों का अवलोकन करेंगे, तब इन सम्प्रदायियों की लूट बन्द होगी, तब ही कण्ठी द्वारा वैकुण्ठ मिलने का सुगम मार्ग बन्द होगा। भाई! सोचो जो एक ही कण्ठी से वैकुण्ठ मिल जाय तो विसाती को कुल कण्ठियों की पेटियां गले में लटकाने से संसार में क्यों सुख नहीं होता? चन्दन, तिलक और छापों से यदि स्वर्ग, मिल जाय तो सारे मुंह पर चन्दन लीपने से क्यों न सुख मिले? इसलिए भाई! सोचो चन्दन, तिलक, कण्ठी ये सब पाखण्ड सम्प्रदायी लोगों का द्रव्य-हरण करने के लिए हैं। ये सच्चे तीर्थ नहीं हैं। सच्चे तीर्थ कौन से हैं सो इनके विषय में वचन है—

अहिंसन् सर्वभूतान्यत्र तीर्थेभ्यः२। सतीर्थ्यः सब्रह्मचारी३ विद्या-व्रतस्नातः४।

ब्रह्मचारी पुरुष विद्यास्नात, व्रतस्नात होते थे, इससे वेदविद्या ही मुख्य तीर्थ है।

ओ३म् शान्तिः शान्तिः शान्तिः॥