Donation Appeal Download Our App
Choose Sutra

षष्ठ उपदेश—जन्म-विषयक

In Hindi:

महर्षि दयानन्द व्याख्या : षष्ठ उपदेश

जन्म-विषयक

[शनिवार ता॰ १७ जुलाई १८७५ को स्वामी दयानन्द सरस्वती ने विज्ञापन के अनुसार बुधवार पेठ में भिड़े के बाड़े में ता॰ १७ जुलाई के दिन रात्रि में आठ बजे दिए जन्मविषयक व्याख्यान का सारांश—]

ओ३म् भद्रं कर्णेभिः शृणुयाम देवा भद्रं पश्येमाक्षभिर्यजत्राः।

स्थिरैरङ्गैस्तुष्टुवांसस्तनूभिर्व्यशेमहि देवहितं यदायुः॥१

[स्वामी जी ने प्रथम यह ऋचा कही।]

आज के व्याख्यान का विषय ‘जन्म’ यह है। अब जन्म का अर्थ क्या है इसका लक्षण प्रथम करना चाहिए। शरीर के व्यापार और क्रिया करने योग्य परमाणुओं का संघात जब होता है तब जन्म होता है, अर्थात् सब साधनों से युक्त होकर क्रिया-योग्य जब शरीर होता है, तब जन्म होता है। सारांश यह है कि इन्द्रिय और (प्राण)अन्तःकरण ये शरीर के मध्य जब उपयुक्त होते हैं तब जन्म होता है, जन्म अर्थात् शरीर और जीवात्मा इनका संयोग। इससे स्पष्ट है कि शरीर और जीवात्मा इनका वियोग मरण कहलाता है।

अब इस जन्मान्तर के विषय में अनेक मत हैं। कोई कहते हैं कि मनुष्य का एक ही जन्म है अर्थात् मरने के पश्चात् फिर पुनर्जन्म नहीं होता। कोई कहते हैं कि जन्म अनेक हैं अर्थात् मनुष्य को मरने पर फिर दूसरे जन्म [प्राप्त होते] हैं।

हमारा सिद्धान्त—मनुष्य का पुनर्जन्म है अर्थात् जन्म अनेक हैं—ऐसा है।

एकजन्मवादियों के और अनेक जन्मवादियों के कथन में बहुत सी युक्तिप्रत्युक्तियों का आधार है। अब उन युक्ति-प्रत्युक्तियों का विचार करें। ‘गतानुगतिको लोकः’ इस न्याय से परम्परागत ज्ञान का स्वीकार करना यह विद्वानों को उचित नहीं। तर्क-वितर्क करके निर्णय करना, यह विद्वानों का मुख्य कर्त्तव्य है।

एकजन्मवादी ऐसा पूर्वपक्ष करते हैं कि इस जन्म के पूर्व दूसरा जन्म होता तो उस जन्म का हाल कुछ भी तो स्मरण रहना चाहिए था और जब कि पूर्व जन्म का कोई स्मरण नहीं है तो इससे पूर्व जन्म न था, यही कहना ठीक है।

इस पूर्वपक्ष का समाधान हम यों करते हैं कि जीव का ज्ञान दो प्रकार का है—स्वाभाविक और दूसरा नैमित्तिक है। स्वाभाविक ज्ञान नित्य रहता है और नैमित्तिक ज्ञान की घटती-बढ़ती, न्यूनाधिक और हानि-लाभ आदि ये सब प्रसंग आते रहते हैं। इसका दृष्टान्त—जैसे अग्नि में ‘दाह करना’ यह स्वाभाविक धर्म है अर्थात् यह धर्म तो अग्नि के परमाणुओं में भी रहता है। यह उसका निज धर्म उसे कभी भी नहीं छोड़ता। इसलिए अग्नि की दाहक-शक्ति का जो ज्ञान है वह स्वाभाविक ज्ञान होता है। अब जीव को—“मैं हूँ” अर्थात् अपने अस्तित्व का जो ज्ञान है वह स्वाभाविक ज्ञान समझना चाहिए। फिर भी देखो कि [अग्नि के] संयोग के कारण जल में उष्णता धर्म उत्पन्न होता है; और वियोग होने से वह उष्णता धर्म नहीं रहता। इसलिए जल के उष्णता विषय का जो ज्ञान है वह नैमित्तिक ज्ञान है। जल में शीतलता विषय का जो ज्ञान है वह स्वाभाविक ज्ञान है; परन्तु चक्षु, श्रोत्र इत्यादि इन्द्रियों से जो ज्ञान उत्पन्न होता है; वह आत्मा का नैमित्तिक ज्ञान है। यह नैमित्तिक ज्ञान तीन कारणों से उत्पन्न होता है—देश, काल और वस्तु। इन तीनों का जैसा जैसा कर्मेन्द्रियों के साथ सम्बन्ध होता है वैसे-वैसे संस्कार आत्मा पर होते हैं। अब जैसे-जैसे ये निमित्त निकल जाते हैं वैसे-वैसे इस नैमित्तिक ज्ञान का नाश होता है, अर्थात् पूर्व जन्म का देश, काल, शरीर का वियोग होने से उस समय का नैमित्तिक ज्ञान नहीं रहता। इसको छोड़ इस विचार में एक बात और ध्यान में रखने योग्य है कि ज्ञान का ही स्वभाव ऐसा है कि वह अयुगपत् क्रम से होता है अर्थात् एक ही समयावच्छेद करके आत्मा के बीच दो तीन ज्ञान एकदम स्फुरित हो सकते नहीं। इस नियम की लापिका से पूर्वजन्म के विस्मरण का समाधान भली-भांति हो जाता है। इस जन्म में ‘मैं हूं’ अर्थात् अपनी स्थिति का ज्ञान आत्मा को ठीक-ठीक रहता है, इसलिए, पूर्वजन्म के ज्ञान का स्फुरण आत्मा को नहीं होता।

फिर इसी जन्म ही में कैसी-कैसी व्यवस्था होती है इसका ही विचार करें। मैं ही जो इतना भाषण कर चुका हूँ, उस भाषण का उसी तरह उस सम्बन्ध के मनोव्यापार का, सब परम्पराओं का मुझे स्मरण कहां रहा है? हां भाषण के स्थूलावयव का तो अवश्य स्मरण है; परन्तु बोलते-ही-बोलते सूक्ष्म अवयवों का विस्मरण हो गया है। इससे यह नहीं मानते बनता कि मैंने भाषण नहीं किया, फिर देखो बाल्यावस्था में जो बातें हुईं उनका अब विस्मरण हुआ है। इससे बाल्यावस्था थी ही नहीं—ऐसा मानते नहीं बनता। पुनरपि जागरित अवस्था में जिन-जिन बातों का स्मरण रहता है, उन-उन बातों का निद्रा में सर्वथैव विस्मरण होता है। इन सब कारणों से यह सिद्ध होता है कि पूर्व जन्म का स्मरण नहीं होता, इतने ही से पूर्वजन्म की असम्भवता सिद्ध नहीं होती। दो जन्म के बीच मृत्यु आ फंसी है और मृत्यु होना अर्थात् महाव्यावृत अन्धकार के बीच में गिरना है।

फिर देखो—मन का धर्म कैसा है, इसका विचार करो। मन का स्वभाव ऐसा है कि वह सन्निहित पदार्थ के विषय में राग द्वेष उत्पन्न करता है। सान्निध्य छूटने से उसको विस्मरण होता है। फिर अर्थापन्न ही पूर्व जन्मावस्था में दूरगत पदार्थ-विषयक यदि आत्मा को विस्मरण होता है, तो इसमें आश्चर्य ही क्या है? अर्थात् इसमें कुछ आश्चर्य नहीं।

मैं एक दृष्टान्त देता हूं। पाठशाला में कुछ विद्यार्थी विद्याध्ययन करते रहते हैं। उनमें से कुछ लड़कों को अपने विषयों की समझ झट उत्पन्न हो जाती है, दूसरों को समझने में कुछ विलम्ब लगता है और तीसरे को तो उसी विषय को उपस्थित करने में बड़ी ही कठिनता पड़ती है। इस प्रकार यहीं-के-यहीं ही उत्तम बुद्धि, मध्यम बुद्धि और अधम बुद्धि ऐसे भिन्न-भिन्न प्रकार दीखते हैं, तो फिर भला मरने के पीछे पूर्व जन्म के ज्ञान की उपस्थिति के विषय [में] कितनी र्दिं॑त होती होगी, यह सहज ही ध्यान में आ सकता है। इससे जन्म एक ही है, ऐसा प्रमाण मानना, यह बिल्कुल युक्तिविरुद्ध है।

ज्ञान यह आठ प्रकार का होता है। प्रत्यक्ष, अनुमान, उपमान, शब्द, ऐतिह्य, अर्थापत्ति, सम्भव और अभाव—ऐसे आठ प्रकार हैं। इनमें इन्द्रियार्थसन्निकर्षमूलक प्रत्यक्ष ज्ञान यह तो बिल्कुल ही क्षुद्र है। अव्यभिचारी, अव्यपदेशी और निश्चित ऐसा ज्ञान प्रत्यक्ष रूप से कभी भी नहीं होता।

इससे दूसरे ज्ञानसाधन का अवलम्बन करना चाहिए। दृष्टान्त कि कोई वैद्य नहीं है, ऐसे पुरुष को यदि रोग हो जाय तो मुझे किस कारण से यह रोग हुआ, यह नहीं जान सकता। तो फिर उस विचारे को रोग के निदान का ज्ञान कहां से हो सकता है? जिस रोगी को ऐसा ज्ञान नहीं है तो इससे उसे रोग ही नहीं है, यह कहते नहीं बनता। क्योंकि कारण विना कार्य नहीं होता। इसलिए इस रोग का भी कुछ-न-कुछ कारण होना ही चाहिए—ऐसा अुनमान होता है। रोगी को कारण का ही केवल ज्ञान नहीं, इससे रोग का कारण नहीं, ऐसा भी क्या कभी किसी ने माना है? कभी नहीं। आगे रोग देखकर और उसका निदान और चिकित्सा करके अमुक-अमुक कारण से यह रोग उत्पन्न हुआ है, ऐसा अनुमान प्रमाण के बल से वैद्य ठहराता है और वह बात हमें भी स्वीकार करनी पड़ती है। ऐसी योग्यता अनुमान प्रमाण की है, अस्तु।

परमात्मा न्यायकारी और निष्पक्ष है, यह बात भी सब स्वीकार करते हैं। ऐसे न्यायकारी परमात्मा द्वारा निर्मित संसार के लोगों की स्थिति के बीच और सुख लाभ में बड़ा ही भेद दीखता है; यह भी निर्विवाद है। इसके विषय में एक दृष्टान्त देना चाहिए। देखो एक ही मां-बाप के दो पुत्र हुए और उन्हें एक ही गुरु के पास अध्ययन के लिए रखा और उनके खाने-पीने की व्यवस्था भी एक ही सी रखी। ऐसा होते हुए भी एक लड़के की धारणाशक्ति उत्तम होने से वह बड़ा विद्वान् और नीतिमान् होता है और दूसरा भूलने वाला मूर्ख, ऐसा ही रहता है। सो बतलाओ इसका कारण क्या है? इस बुद्धि-भेद का कारण इस जन्म में तो कुछ भी नहीं है और भेद तो प्रतीत होता है। ऐसा निरर्थक भेद ईश्वर ने किया, ऐसा कहें तो ईश्वर पक्षपाती ठहरता है। ईश्वर ने नहीं किया, ऐसा कहें तो भेद की उत्पत्ति होती नहीं। इससे पूर्व जन्म है, ऐसा ही मानना अवश्य होता है। पूर्व जन्मार्जित पाप-पुण्य के अनुसार ही यह व्यवस्था होती है, ऐसा माने विना दूसरी कोई भी कल्पना जमती भी नहीं, अस्तु।

एक-जन्मवादी ऐसा कहेंगे कि ईश्वर स्वतन्त्र और स्वेच्छाचारी है। जैसे कोई माली अपने बगीचे में जैसे चाहे वैसे वृक्ष लगाता और उन वृक्षों में खाद डाल उन्हें बढ़ाता है, उसी तरह जगत् में ईश्वर की लीला है। इस प्रकार का स्वातन्त्र्य ईश्वर में मानने से ईश्वर के न्यायकारित्व की हानि होती है और उन्मत्ता प्रसंग ईश्वर पर आता है। परन्तु सब प्रकार सृष्टि-क्रम के और वेद के अवलोकन से परमेश्वर न्यायी है, ऐसा सिद्ध होता है। तब इस विरोध का निराकरण करने के लिए पूर्वजन्म था, ऐसा मानना ही चाहिए। यदि ऐसा न मानें तो स्थिति-भेद कैसे उत्पन्न होता है, इसका सम्यक् (ठीक-ठीक)उत्तर मिलता नहीं। संग-प्रसंग भेद से यह स्थिति भेद हुआ ऐसा भी कहते नहीं बनता; क्योंकि संग-प्रसङ्ग भेद की कल्पना जहाँ नहीं है, ऐसी जो माता के उदर की स्थिति है, वह भी सबों के लिए कहां समान रहती है। पेट में होते हुए एक जीव के लिए सुख होता है तो दूसरों को वहीं क्लेश होते हैं। एक धर्मात्मा के पेट से जन्मता है और दूसरा पाप-स्थान में जन्म लेता है। तो बताओ यह भेद कहां से और क्योंकर हुआ? पूर्व-जन्म न मानने से इस भेद के कारण ईश्वर पर कितना भारी दोष आता है, इसका कुछ विचार करो।

पूर्व-जन्म विषयक उपर्युक्त अनुमान के सिवाय एक प्रत्यक्ष प्रमाण भी है। जीव की शरीर-चेष्टा होने से पूर्व प्रथम हमें प्रत्यक्ष होता है, फिर आत्मा पर संस्कार होता है, फिर स्मृति होती है और पश्चात् किसी कार्य के विषय में प्रवृत्ति-निवृत्ति होती है, यह प्रकार सर्वत्र प्रतीत होता है। अब देखो कि शरीर-योनि में से बच्चा बाहर पड़ने के पूर्व पेट में था, बाहर गिरते ही श्वास लेने वा रोने लगता है, तो यह प्रवृत्ति उसे पूर्व संस्कारों के विना कैसे होगी? माता का स्तन खींचकर दूध पीने लग जाता है, यह प्रवृत्ति कहाँ से हुई? दूध के विषय में तृप्त होने पर निवृत्त होता है, तो यह निवृत्ति भी किस प्रकार की है? माता ने कुछ धमकी दी, तो झट बच्चा समझता है, तो यह पूर्व संस्कारों के विना कैसे होगा? इस से निश्चयपूर्वक पूर्वजन्म था, यह प्रत्यक्ष और अनुमान दोनों प्रमाणों से सिद्ध होता है।

पुनरपि, सब चराचर सृष्टि की उत्पत्ति, स्थिति और प्रलय का क्रम यदि देखा जाय तो उस समय सादृश्य से जीव सृष्टि का भी पूर्व-जन्म था। यह हमारा मध्यम जन्म है और मोक्ष होने तक अभी भी जन्म होने वाले हैं। इस परम्परा से इस मध्य-जन्म की सम्भावना तभी हुई जब कि पूर्व-जन्म पहले था, क्योंकि यदि कुयें में जल न हो तो डोल में पानी कहां से आवे? इस दृष्टान्त की योजना इस स्थल पर ठीक होती है।

अब कोई यह कहे परमेश्वर तो सदा व्यवस्था करते हुए बैठा है और यह व्यवस्था कभी तो बिगड़ती है और कभी सध भी जाती है। जैसे ईसाइयों की धर्म-पुस्तक में कहा है कि ईश्वर ने एक सुन्दर बगीचा बनाया और उसमें एक स्त्री-पुरुष का जोड़ा रख उसमें एक ज्ञानवल्ली भी लगा रखी और परमेश्वर ने दोनों स्त्री-पुरुष को आज्ञा दी कि तुम ज्ञान के पेड़ के फल मत खाना अर्थात् तुम अज्ञानी रहो, तब सहज ही उन स्त्री-पुरुषों ने ईश्वरीय आज्ञा को तोड़ा तो परमेश्वर को बड़ा गुस्सा आया, फिर तो ईश्वर ने उन्हें वहां से निकाल दिया। परन्तु अब सोचो कि यदि ईश्वर की व्यवस्था इस प्रकार बिगड़ गई तो वह सर्वज्ञ कैसे रहा? इसलिए ऐसी-ऐसी व्यवस्था ठीक नहीं। इसलिए एक-जन्मवाद भी नहीं जमता। ईश्वर सब जगत् का धारणमात्र करता है; परन्तु उसने कृति एक ही वार कर रखी है, ऐसा जानना चाहिए। कोई ऐसा न समझे कि उसने सात दिन श्रम किया और आठवें दिन आराम किया अर्थात् विश्राम लिया। यह कहना सर्वशक्तिमान् परमेश्वर के विषय में किसी प्रकार सम्भव नहीं होता। उसी प्रकार बगीचे के बीच जो व्यवस्था की, उसे एक समय भूला और फिर उसे ठीक करूं, यह ईश्वर के मन में आया; इसलिये उसने लोगों के पाप-निवारणार्थ यह व्यवस्था की, यह कहना भी ठीक-ठीक सम्भव नहीं होता। मनुष्य को स्वमत के विषय में सहज ही दुराग्रह उत्पन्न होता है, यह मनुष्य का स्वभाव है, परन्तु सुज्ञ पुरुषों को उचित है कि दुराग्रह को [परे] फेंक सत्य की परीक्षा करें, यही उनका भूषण है।

अब कोई ऐसा पूर्व पक्ष कहते हैं कि राजा पालकी में बैठता है और कहार पालकी ले जाता है। इसमें एक को सुख अधिक और दूसरे को दुःख अधिक है, ऐसा कहना, यह भ्रम है। राजा के मन में परचक्र की अथवा राज्यव्यवस्था की चिन्ता दुःख का पहाड़ उत्पन्न करती रहती है, इसलिए बाहर से जितना राजा को सुख होता है उतना ही अन्दर से दुःख रहता है। रात्रि को नींद आने में भी हाय बाँय मचती है। इधर देखो तो इसके बिलकुल विरुद्ध कहारों को बाहर से तो बड़ा क्लेश होता है, पालकी वहना (ले जाना)पड़ता है और रूखी-सूखी रोटी उसे मिलती है तो भी कम्बल डालकर लेटते ही गाढ़ निद्रा में सोता है अर्थात् उसे नींद स्वस्थता से आती है। इससे दोनों स्थितियों में सुख-दुःख समान ही हैं। इसलिए एक जन्म ही मानना ठीक है।

इस पूर्व पक्ष का समाधान सहज ही में किया जा सकता है—

श्रीमानों और दरिद्रियों को, सशक्तों और अशक्तों को सुख-दुःख समान ही है, यह कहना सारे अनुभवों के विरुद्ध है। राजा के एक पुत्र उत्पन्न हुआ और भंगी के भी एक पुत्र हुआ। राजपुत्र को गर्भ समय में सुख, जन्मते समय सुख, आगे लड़कपन में भी सुख, खान-पीने के और दूसरे सब प्रकार के पदार्थ हाथ में ले सेवक लोग तैयार खड़े रहते हैं। इसके विरुद्ध भंगी के लड़के को गर्भ समय में दुःख, जन्मते समय किसी पाषाण के सदृश पेट में से बाहर आ पड़ता है, बाल्यावस्था से खाने-पीने में भी रोना पीटना मचा रहता है, वस्त्र का तो नाम तक निकालते नहीं बनता, अन्न-जल के लिए कई वार रो-रो कर जी घबराना पड़ता है। सारांश-इस प्रकार के अनेक कार्य दृष्टिगत होते हैं तो बतलाओ! यह सुख-दुःख का भेद कहां से आया? फिर देखो! सब मनुष्यों की ‘सम्पत्ति मिले और अपने से श्रेष्ठ लोगों की सी स्थिति प्राप्त हो’ यह स्वाभाविक इच्छा रहती ही है, यह भी तुम देखते ही हो। इस इच्छा के कारण सब संसार का क्रम चल रहा है। इससे सिद्ध हुआ कि सुख-दुःख का भेद वास्तविक है अर्थात् भ्रम नहीं है, ऐसा सिद्ध होता है। अब यदि सुख-दुःख का भेद है और जन्म भी एक ही है, तो ईश्वर इससे अन्यायी ठहरता है। ईश्वर में अन्याय का आरोपण करना, यह हमारे प्रथम सिद्धान्त के विरुद्ध है। इसलिए जन्म अनेक हैं, यही कहना योग्य है, अर्थात् ईश्वर न्यायकारी और जन्मान्तर के अपराधानुरूप जीवों को वह दण्ड देता है, अर्थात् जितना ही तीव्र पाप जीव करता है उतना ही उसे दुःख भोगना पड़ता है, ऐसा सिद्ध होता है।

कोई-कोई ऐसा पूर्वपक्ष करते [हैं] कि मनुष्य [योनि में] पाप करने के कारण वह पशु योनि में गया, ऐसा कुछ काल के लिए मान भी लें; परन्तु पशु होकर “मैंने पाप किया इसलिए पशु-जन्म मुझे प्राप्त हुआ है” ऐसा यदि उसको ज्ञान नहीं है तो ज्ञान विना दण्ड भोगना, यह व्यवस्था किस प्रकार की है!

इसका समाधान—इस जन्म में भी ऐसी ही व्यवस्था दीखती है। दुःख भोगते हुए भी दुःख के कारण का ज्ञान कभी नहीं रहता। अघोरी बन बहुत सा खा लिया और फिर उसके कारण किसी रोग ने शरीर को जकड़ लिया, तो उस समय जो दुःख होता है, उस दुःख के कारण-उसके असल सबब का स्मरण होता हो, ऐसा कभी भी देखने में नहीं आता। इसी तरह अन्यत्र बहुत सी व्यवस्था इस संसार में प्रतीत होंगी अर्थात् वैसी व्यवस्था मिल सकेंगी।

अस्तु, इस संसार में सुख-दुःख के जो भेद दीखते हैं उनका कुछ न कुछ कारण अवश्य होना चाहिए। कारण के विना ये कार्य नहीं हो सकेंगे। इन सुख-दुःख के भेदों के कारण पूर्व जन्म के कर्म हैं। इसलिए शेषवत् अनुमान से सुख-दुःखादि के भेदों की व्यवस्था ठीक-ठीक लग जाती है। अब कर्मों के विषय में कहा जाय तो वे भी विचित्र हैं। नाना प्रकार के आत्मा पर जो संस्कार होते हैं उनके कारण नाना प्रकार के मानस कर्म उत्पन्न होते हैं। ईश्वर की ऐसी व्यवस्था है कि उन-उन कर्मों के योग से पाप-पुण्य उत्पन्न होने चाहियें। इस प्रकार पाप-पुण्य का हिस्सा विना भोगे छुटकारा नहीं होता, पापों को भोगना ही पड़ता है, वे कभी भी नहीं छूटते।

अब कोई ऐसा कहे कि ईश्वर की भक्ति, प्रार्थना आदि करने से उसे दया आती है और फिर वह पाप का दण्ड नहीं देता, सो इस पूर्वपक्ष का समाधान सरल है कि ईश्वर की भक्ति वा प्रार्थना से पूर्वकृत पापों का दण्ड नहीं चुकता; किन्तु यह तो सम्भव है कि आगे के होने वाले पापों से ही केवल निवृत्ति होती है। यदि ऐसा न होता तो पाप करने के लिए यत्किञ्चित् भी भीति किसी को भी न होती।

अब इस सम्बन्ध में एक बात और कहनी चाहिए। कोई-कोई ऐसी शंका करते हैं कि ईश्वर-सर्वज्ञ है, उसे हमारे मन के सारे भाव विदित ही हैं अर्थात् जैसे पतिव्रता की सी भक्ति किस की है और वेश्याओं के सदृश भक्ति किसकी है, यह उसे विदित है। हम मनुष्यों को तो प्रसंगवशात् ही केवल लोगों के मनोभाव विदित होते हैं। ईश्वर सर्वज्ञ होने के कारण उसे सदैव सब लोगों के मनोभाव, पाप-पुण्य, वासना और परमेश्वर-भक्ति-भावना ये सब प्रत्यक्ष हैं। यदि पूर्वकृत पापों को अवश्य भोगना पड़े और ईश्वर की भक्ति करने से वह दया कर पाप-दण्ड से न छुड़ावें तो फिर मुक्ति किस प्रकार होगी? ऐसी शंका है। इसलिए मुक्ति किसको कहते हैं इसका ही प्रथम विचार करें।

मुक्ति अर्थात् ईश्वर-प्राप्ति, ईश्वर की ओर जीव का आकर्षण होकर उसके परमानन्द में तल्लीन हो जाना, यही मुक्ति का लक्षण है। इस प्रकार तल्लीन होने से सहज ही में हर्ष और शोक दूर होकर सदानन्द स्थिति प्राप्त होती है। शोक से चित्त बिगड़ता है यह तो ठीक ही है, परन्तु हर्ष से भी चित्त बिगड़ जाता है, इसे दिखलाने के लिय दृष्टान्त देना चाहिए। किसी गरीब आदमी को लाख रुपया एक दम मिलने से उस हर्ष के कारण उसे पागलपन आ घेरता है। सब को यह बात स्मरण रखनी चाहिए कि ईश्वर को छोड़कर चाहे कितने ही दूसरे कर्म किए जायें, परन्तु उनसे आत्मा मुक्त नहीं होती। मुक्त होने के लिए जो कुछ है वह एक ईश्वर प्राप्ति ही कारण है।

अब कोई ऐसा पूर्वपक्ष करे कि जब हम सृष्टि को अनादि नहीं मानते तो अवश्य सृष्टि का कहीं-न-कहीं प्रारम्भ होना ही चाहिए और जब सृष्टि का आरम्भ हुआ, उस समय योनि-भेद था। यदि ऐसा कहा जाय तो ईश्वर अन्यायी ठहरेगा क्योंकि कुछ आत्मा पशु आदिकों की नीच योनि में जायँ और कुछ एक मनुष्य की योनि में जायँ, यह कैसे?

इस पूर्वपक्ष का समाधान ऐसा है। कोई ऐसा कहते हैं कि पहले परमेश्वर ने एक स्त्री-पुरुष का जोड़ा उत्पन्न किया, फिर स्त्री ने सर्प के कहने से ज्ञानवल्ली का फल खाया, तब स्त्री के अपराध के कारण स्त्री-पुरुष पतित हुए। इसलिए जगत् में पाप और पुण्य घुसा। तो ऐसी-ऐसी गपोड़ कहानियों को कहकर हम अपना समाधान नहीं करते, किन्तु सृष्टि की उत्पत्ति कैसे हुई? और इस विषय में आर्य लोगों ने शास्त्र द्वारा सूक्ष्म रीति से क्या विचार किया है? उसे देखें। जिस स्थिति में आजकल सृष्टि है, उसी स्थिति में प्रारम्भ में सृष्टि नहीं थी। इसलिए वर्त्तमान सृष्टि को उत्तर-सृष्टि ऐसी संज्ञा देता हूँ और पूर्व सृष्टि को आदि-सृष्टि ऐसी संज्ञा देता हूँ जिससे झट समझ में आ जाय।

तस्माद्वा एतस्मादात्मन आकाशः सम्भूतः, आकाशाद्वायुः, वायोरग्निः, अग्नेरापः, अद्भ्यः पृथिवी, पृथिव्या ओषधयः॥ इत्यादि॥१

आदि सृष्टि में ईश्वर ने बहुत से मनुष्य, पशु और पक्षी उत्पन्न किए “ततो मनुष्या अजायन्त” इत्यादि यजुः संहिता२ में है, परन्तु उनमें अब जैसा ज्ञान के कारण और कृति (कर्म)के कारण भेद न था। उन सबों को केवल आहर-विहार और मैथुन इतना ही विदित था और इन विषयों में भी सब प्राणी एक ही से और एक रस थे। सब शरीर सब जीवों के भोग के लिये हैं अर्थात् एक ही जीव के लिये नहीं हैं, ये सब जीव-जन्तु परमेश्वर से उत्पन्न हुए।

सन्मूलाः सोम्येमाः प्रजाः सदायतनाः सत्प्रतिष्ठाः।१

तथाक्षरात् सोम्येमाः प्रजाः प्रजायन्ते, इत्यादि॥ (छान्दोग्यो॰)

जैसे छोटे बच्चों को अब भी यहां पर स्थित रहते हुए और उसी तरह आगे मरने पर किसी प्रकार का दण्ड नहीं मिलता, उसी तरह इस आदि-सृष्टि में सब मनुष्य बाल्यावस्था में थे। उनकी अशिष्टाप्रतिषिद्ध चेष्टा थी अर्थात् उन्हें शासन या प्रतिषेध नहीं लगाए थे, नेत्रों से अपना काम करें अर्थात् रूप को देखें, श्रोत्रों से अपना काम करें अर्थात् शब्द सुनें, पाँव से अपना काम करें अर्थात् इधर-उधर फिरें, बस इससे और विशेष व्यापार आदि-सृष्टि में नहीं था। ऐसी व्यवस्था आदि-सृष्टि में पांच वर्ष चलती रही, फिर परमात्मा ने मनुष्यों को वेद-ज्ञान दिया।

ओ३म् खम्ब्रह्म।२

याथातथ्यतोऽर्थान् व्यदधाच्छाश्वतीभ्यः समाभ्यः।३ (य॰ सं॰)

अब वेद-ज्ञान से पाप-पुण्य का ज्ञान हुआ और वैसा-वैसा आचरण भेद होता गया, फिर प्रत्यक्ष ही है पाप-पुण्य की व्यवस्था के अनुसार सहज ही कार्य उत्पन्न होने लगे। मनुष्य पाप के कारण पशु जन्म को गए और पाप छूटने पर फिर भी मनुष्य जन्म में आए। आदि-सृष्टि में पशुओं को एक दफे मनुष्य जन्म प्राप्त हुआ। फिर तो आचार-भेद के अनुकूल पाप-पुण्यानुसार वे भी जन्मान्तर के र्चं॑र में आ फंसे।

अब कोई-कोई ऐसी भी शंका करें कि मनुष्य को पाप-वासना ही क्यों हुई? तो उसका इतना ही समाधान है कि परमात्मा ने मनुष्यों को स्वतन्त्रता दी है और उस स्वतन्त्रता के जो-जो परिणाम होवेंगे, उन्हें भी स्वीकार करने चाहिएं। सुख के सब सामान होने पर भी यदि स्वतन्त्रता नहीं है तो वह स्थिति दुःखमिश्रित स्वतन्त्रता होकर अतिदुःखसह होती है। तब पाप-वासना होती है यह अपनी स्वतन्त्रता का विकार है इसके लिए ईश्वर पर दोष नहीं लगा सकते। कोई-कोई ऐसा मानते हैं कि दुःख-विशेष देश नरक है और सुख-विशेष देश स्वर्ग है और इस उभय प्रकार के प्रदेशों में मनुष्य की पाप-पुण्य के अनुकूल एक समय [अर्थात्] जगत्-प्रलय के समय में न्याय कर अनन्तकाल तक सुख वा दुःख में ईश्वर रखेगा। ऐसा प्रतिपादन करने से ईश्वर अन्यायी ठहरेगा। ईश्वर के न्याय का ऐसा अटकाव नहीं है। प्रत्येक क्षण में ईश्वर के न्याय की व्यवस्था जारी है और अपने-अपने पाप-पुण्य के अनुसार हमें बुरा-भला जन्म मिला करता है।

पाप-पुण्य मनुष्य जन्म ही में केवल होते हैं। पश्वादिकों के जन्म में भोग होता है, नये पाप-सम्पादन नहीं होते।

कोई-कोई शंका करते हैं कि मनुष्य-जन्म एक ही समय मिलता है अथवा अनेक वार? तो इसका उत्तर यह है कि मनुष्य जन्म बारम्बार प्राप्त होता है। अब पहले कह ही चुके हैं कि—

मृत्यु अर्थात् जीव का और शरीर का वियोग होना है तो वह कैसे आती है? इस विषय में कोई-कोई कहते हैं कि गरुड़-पुराण में कहे अनुसार मनुष्य का प्राण-हरण करने के लिए यमदूत आते हैं। इन यमदूतों के मुख दरवाजे इतने बड़े होते हैं और शरीर पर्वत के सदृश होते हैं, यह वर्णन सर्वथैव अतिशयोक्ति का है। निरुक्त में अन्तरिक्ष काण्ड है, उसमें वायु के यमराज धर्मराज ये नाम दिए हैं—

यमो वैवस्वतो देवो यस्तवैव हृदि स्थितः।

इससे जीव यम की ओर जाता है अर्थात् वायु में, वायु के द्वारा अन्य योनि के बीच उसका प्रवेश होता है, ऐसा समझना चाहिए।

मरने पर जीव वायु में मिलता है, ऐसे-ऐसे उपदेश से अज्ञानी लोगों की हानि होगी, विद्वानों की क्या हानि हो सकती है? अर्थात् विद्वानों की कुछ भी हानि नहीं है। हां! अवश्य धूर्त्तों की हानि हो तो हम निरुपाय हैं।

कोई ऐसा भी कहते हैं कि ‘जीव (=प्राण)ले; परन्तु जीविका न ले’। हमारे भाषण से वा लेख से गरुड़ पुराणादिक ग्रन्थों के विषय में लोगों की अश्रद्धा उत्पन्न होने से सहज ही कट्टहाओं की जीविका डूबेगी तो उससे हमें पाप लगेगा, सो भाई हमें इसका भय नहीं है। कारण, राजा दुष्ट लोगों को दण्ड देता है। [उससे उसे पाप नहीं लगता] उसी तरह हमारे वचनों से दुष्टों की जीविका डूबेगी तो उसमें हमें पाप किस बात का लगेगा? ब्राह्मणों को अर्थात् विद्वान् आर्यों को अध्यापन, याजन करने का अधिकार है। उन्हें मतलब सिन्धु साधने के लिए कट्टहापन का धन्धा करना वा जन्म-पत्रिका बनाना या आप ही शनि बन लोगों को लग जाना और दुष्ट उपायों से उपजीविका करना अत्यन्त अनुचित है, क्योंकि ये सब पाप आजकल के उन ब्राह्मणों के सिर चढ़ते हैं। जरा विचार तो करो कि कहीं भी सारे महाभारत भर में जन्म-पत्रिका का वर्णन आया है? कहीं भी नहीं। इससे सिद्ध हुआ कि फलित ज्योतिष की जड़ कहीं भी आर्य-विद्या में नहीं है, यह स्पष्ट है।

मृत्यु-समय में यमदूत जीव को ले जाता है इससे यह आशय समझें कि वायु जीव का हरण करता है। अस्तु, वायु मनुष्य का हरण करता है और फिर आगे पुनर्जन्म प्राप्त होता है। इस प्रकार ईश्वर-नियम की व्यवस्था से यह सब सहज ही में बन जाता है। इसमें वैतरणी नदी और गोपुच्छादि सदृश पाखण्ड मत को अवकाश कहां से हो सकता है? अर्थात् इन सारे प्रलापों का आधार वेदादि सत् शास्त्रों में कहीं भी नहीं।

चौरासी लाख योनियां हैं अथवा न्यूनाधिक हैं, इन गपोड़ कथाओं का वर्णन करने की भी कोई आवश्यकता नहीं है। जगत् में कितनी योनियां हैं इसका शोध लगा, गिनकर हमारे शास्त्री लोग बतावें।

विद्वांसो हि देवाः।१

शतं ते मनुष्याणामानन्दाः स एको मनुष्यगन्धर्वाणामानन्दः श्रोत्रियस्य चाकामहतस्येत्यादि॰॥२ (तैत्तिरीय उपनिषद्)

जिनके पाप-पुण्य सम होते हैं, वे मनुष्य जन्म पाते हैं। जिनकी मानसिक स्थिति सात्त्विक होती है वे देवता, पापातिशय के कारण तिर्यग् योनि को प्राप्त होते हैं। परन्तु पाप की अपेक्षा पुण्य अधिक हो अथवा पुण्य की अपेक्षा पाप अधिक हो तो इन्हें भोगकर जब ही पाप-पुण्य सम हुआ कि मानो मनुष्य जन्म प्राप्त होता ही है। इस प्रकार पाप-पुण्य पर सारी व्यवस्था ईश्वर ने नियत कर रखी है और यही व्यवस्था यथार्थ है। इस प्रकार आदि सृष्टि का वर्णन हुआ।

अब कोई ऐसी शंका निकाले कि पूर्व कृत पापों का दण्ड जीव को विना भोगे छुटकारा नहीं मिल सकता यह हमारा मत है, तो फिर पश्चात्ताप का कुछ भी लाभ नहीं है क्या? उसका उत्तर यह है कि पश्चात्ताप से पाप-क्षय नहीं होता; परन्तु आगे पाप करना बन्द हो सकता है।

कृत्वा पापं हि संतप्य तस्मात् पापात्प्रमुच्यते।

नैवं कुर्यां पुनरिति निवृत्त्या पूयते तु सः॥१

चाहे कितना भी पश्चात्ताप किया जावे तो भी कृत पापों को तो भोगना ही होगा। इसका दृष्टान्त—जैसे कोई कुये में गिरा और उसके हाथ-पांव टूट गए, तो अब चाहे जितना पश्चात्ताप करें, तो भी उसके हाथ-पांव टूटे सो तो टूट ही चुके, वह तो कुछ भी किए नहीं छूट सकता। हां, आगे के लिए कुये में न गिरेगा, इतना ही केवल होगा।

अब पाप का फल शोक है और पुण्य का फल हर्ष है, तो पाप-पुण्य भोगने के लिए देश, काल, वस्तु ये साधन भी अवश्य चाहिएं। इन निमित्तों के विना भोग कैसे होगा? जब कि भोग न भोगा जावेगा, तो फिर आनन्द भी कैसे प्राप्त होगा? अब इस पर कोई ऐसा कहेगा कि मुक्त समय में शरीर न होने पर जीव को सर्वज्ञ परमेश्वर का ज्ञान होकर वह परमेश्वर को ही प्राप्त होता है, फिर एक परमेश्वर ही उसका आधार रहा और फिर ऐसे परमानन्द समय में शरीर का प्रयोजन नहीं है। तो जानना चाहिए कि शरीर अर्थात् भेागायतन, वह इस जगत् में पाप-पुण्य भोगने का साधन है, इसका सम्बन्ध मुक्तावस्था में नहीं है।

अब पुनरपि मुक्त जीव का ज्ञान कैसा है? इसका विचार करें।

कोई ऐसी शंका करता है कि इस जन्म में पूर्व-जन्म का विस्मरण होता है तो सर्वदैव जीव को पूर्वजन्म का ज्ञान नहीं होगा। जिस ज्ञान का निमित्त छूटता है तो उस ज्ञान का भी विस्मरण हो जाता है।

युगपज्ज्ञानानुत्पत्तिर्मनसो लिङ्गम्।२ (गौतम सूत्र)

ये सब आपत्तियाँ अमुक्त आत्मा को लगती हैं, परन्तु धनञ्जय वायु का जिसे ज्ञान हुआ है और जिसका आत्मा उसमें सञ्चार कर सकता है और जिनके आत्मा से पूर्वजन्म संस्कार निकल चुके हैं वह और जिसके आत्मा में शान्ति उत्पन्न हुई है, जिसके आत्मा को अत्यन्त पवित्रता, स्थिरता, ज्ञानोन्नति की पहचान हो चुकी है और जिसकी दृष्टि को और मनोवृत्ति को ज्ञान सुख के विना अन्य सुख विदित नहीं है, ऐसे योगी को परमानन्द प्राप्त होता है। ऐसे मुक्त पुरुषों को देश, काल, वस्तु परिच्छेद का ज्ञान होता है, उन्हें युगपत् ज्ञान की अटक नहीं है इसका दृष्टान्त—जैसे एक कण र्शं॑र का यदि चींटी को मिले तो वह उसे ले जाना चाहती है; परन्तु उसे कण र्शं॑र का गोला मिल जाय तो उसी र्शं॑र के गोले को वहीं पर चींटी लिपट जाती हैं; इसी तरह योगियों की आत्मा की स्थिति परमानन्द प्राप्त होने पर होती है।

ओ३म् शान्तिः शान्तिः शान्तिः॥