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महर्षि दयानन्द व्याख्या : सप्तम उपदेश
यज्ञ और संस्कार-विषयक
[मङ्गलवार ता॰ २० जुलाई सन् १८७५ ई॰]
ओ३म् द्यौः शान्तिरन्तक्षिᳬशान्तिः पृथिवी शान्तिरापः शान्ति-रोषधयः शान्तिः। वनस्पतयः शान्तिर्विश्वे देवाः शान्तिर्ब्रह्म शान्तिः सर्वᳬशान्तिः शान्तिरेव शान्तिः सा मा शान्तिरेधि॥१ यजुर्वेदसंहिता
[यह ऋचा बोलकर स्वामी जी ने व्याख्यान का आरम्भ किया।]
यज्ञ और संस्कार क्या है? इसका विचार आज कर्त्तव्य है।
प्रथम यज्ञ का विचार करें—यज्ञ का अर्थ क्या है? यज्ञ के साधन कौन-कौन से हैं। उसकी कृति कैसी है? और उनके फल कौन-कौन से हैं? ये प्रश्न उत्पन्न होते हैं। इनके उत्तर अब हम यथाक्रम देते हैं—
‘यज्ञ’ शब्द के तीन अर्थ हैं—प्रथम देवपूजा, दूसरा सङ्गतिकरण और तीसरा अर्थ दान है।
अब प्रथम देव-पूजा के विषय में विचार करें। केवल देव पद का मूल अर्थ द्योतक अर्थात् प्रकाशस्वरूप है, और वेदमन्त्रों की भी देव संज्ञा है, क्योंकि उनके कारण विद्याओं का द्योतन अर्थात् प्रकाश होता है। यह यज्ञ कर्मकाण्ड का विषय है। यज्ञ में अग्निहोत्र से लेकर अश्वमेध पर्यन्त का समावेश होता है। देव शब्द का अर्थ परमात्मा भी है, क्योंकि उसने वेद का अर्थात् ज्ञान का और सूर्यादि जड़ों का प्रकाश किया है। देव अर्थात् विद्वान् ऐसा भी अर्थ होता है, क्योंकि शतपथ ब्राह्मण नामक ग्रन्थ में ‘विद्वाᳬसो हि देवाः’२ ऐसा वर्णन किया है। पूजा शब्द का अर्थ सत्कार है।
‘पितृभिर्भ्रा॰३। पूजितोऽतिथिः। पूजितो गुरुः, इत्यादि।’
अब देव की पूजा कहने से परमात्मा का सत्कार करना, यह अर्थ होता है। चेतन पदार्थों का केवल सत्कार सम्भावित है, जड़ पदार्थों का अर्थात् मूर्तियों का सत्कार नहीं सम्भव होता। मुख्यतत्त्व से वेदमन्त्र के पठन से ईश्वर का सत्कार होता है। इसलिए प्राचीन आर्य लोगों ने होम के स्थल में मन्त्रों की योजना की है। इसी तरह यज्ञशाला को देवायतन अथवा देवालय कहा है।
तस्मात् सर्वगतं ब्रह्म नित्यं यज्ञे प्रतिष्ठितम्। महाभारत।१
इसीलिए ब्रह्मयज्ञ अर्थात् वेदाध्ययन भी पांच महायज्ञों में से एक है।
स्वाध्यायेनार्च्चयेतर्षीन् होमैर्देवान् यथाविधि।२ (मनु॰)
इस कथन से अर्वाचीन देवालय अर्थात् मन्दिरों को कोई न समझे, देवालय का अर्थ तो यज्ञशाला ही है।
अब दूसरा अर्थ—संगतिकरण—अर्थात् अत्यन्त प्रीतिपूर्वक, प्रेमपूर्वक, देवता का ध्यान, देवता का विचार तथा सत्पुरुषों का सङ्ग करना, इसे भी यज्ञ ही कहते हैं।
अब तीसरा अर्थ दान है—विद्यादान को छोड़ दूसरे दान, दान नहीं हैं। केवल विद्या का दान ही दान है, अन्न-वस्त्रादिकों के दान विद्यादान की सहायता करते हैं, इसलिए उन्हें भी दान कहना उचित है। विद्यादान अक्षय दान है।
अब यज्ञ से क्या-क्या फल होते हैं, इसका विचार करें। यज्ञ का रूढ्यर्थ वेदों में काष्ठ घृतादिकों का दहन करना है, तो इसमें ऐसी शंका उत्पन्न होती है कि व्यर्थ ही काष्ठादि तथा घृतादि द्रव्यों को अग्नि में क्यों जलावें? इसका समाधान यह है कि—
शतपथ ब्राह्मण में कहा है—
जनतायै यज्ञो भवतीति।३ (शतपथ ब्राह्मण)
पुष्टि, वर्धन, सुगन्ध प्रसार और नैरोग्य ये चार उपयोग होम अर्थात् हवन करने से होते हैं। ये लाभ उपदिष्ट रीति से होम होने पर ही होते हैं। कहा है कि—
संस्कृतं हविः होतव्यमिति। (शतपथ ब्राह्मण)
योग्य रीति से यथाविधि होम करना चाहिए। एकदम मन भर घी जला दिया वा चम्मच-चम्मच करके मन भर घृत को वर्ष भर जलाते रहे, तो भी होम नहीं होगा। फिर कोई-कोई कहते हैं कि होम अर्थात् दैवतोद्देशक त्याग है। देवता लोग यजनदेश में आकर सुगन्ध लेते हैं। इसलिए होम करना चाहिए, तो यह कहना अप्रशस्त है।
क्या देव-लोक में सुगन्धि की न्यूनता है, जो वे हमारे क्षुद्र हविर्द्रव्य की अपेक्षा करते हैं?
इसी तरह कोई-कोई कहते है कि श्राद्ध आदिकों में पितृ लोग आते हैं और यदि उन्हें श्राद्धान्न और तर्पण का जल न मिले तो वे [क्षुधार्त और] तृषार्त्त रहते हैं। तो क्या वे [भूखे] प्यासे रहकर भूखों मरेंगे? और पितृलोक में सब दरिद्रता ही दरिद्रता है? सारांश यह है कि [यह] सब समझ और विचार ठीक नहीं है। क्योंकि देव-लोक में वा पितृ-लोक में कुछ न्यूनता नहीं है। होम हवन उनके उद्देश्य से कर्त्तव्य नहीं है, किन्तु, सुवृष्टि और वायु-शुद्धि होम-हवनादि से होती है, इसलिए होम करना चाहिए। क्योंकि सब प्रकार के नैरोग्य और बुद्धि-वैशद्य तो वायु और जल का ही आधार है। इसमें दृष्टान्त सुनो कि इन दिनों पंढरपुर१ में बड़ा हैजा (विषूचिका)जारी है तो वहां का जलवायु ही बिगाड़ का कारण हुआ। हरद्वार में एक समय मेला हुआ था,२ वहां पर वायु बिगड़ने से हजारों मनुष्य कालवश हुए अर्थात् मर गए। ब्रह्माण्ड में संचार करने वाला जो वायु है, वही जीवन का हेतु है। अन्तर वायु द्वारा ठीक-ठीक व्यापार होवें, इसलिए बाहर का ब्रह्माण्ड-वायु शुद्ध रहना चाहिए। ब्रह्माण्ड वायु शुद्ध करने के लिए यज्ञकुण्ड में घृत [आदि] पुष्टि-कारक, कस्तूरी केशरादि सुगन्धित द्रव्यों का हवन करना चाहिए। सुगन्धित द्रव्यों के दहन (जलाने)से ब्रह्माण्ड वायु की दुर्गन्धि का नाश होता है। इस हवन के कारण जो सुगन्ध उत्पन्न होता है उस सुगन्ध के सम्मुख वायु के सब दुष्ट दोष दूर होकर नैरोग्य उत्पन्न होता है।
अब कोई-कोई अर्वाचीन लोग ऐसी शंका करें कि पदार्थों का दहन होने से उनका पृर्थं॑रण होकर उनके गुण नष्ट हो जाते हैं, तब फिर हवन से नैरोग्य कैसे उत्पन्न होगा? इस विषय में हमारा प्रथम उत्तर यह है कि सब द्रव्यों में स्वाभाविक और संयोगजन्य दो प्रकार के गुण हैं। उनमें स्वाभाविक गुणों का नाश कभी नहीं होता, संयोगजन्य गुणों का वियोग से ह्रास (घटती)होता है। यदि स्वाभाविक गुण पदार्थों में न माने जायं तो समुदाय में गुण कहां से आवेगा?
दृष्टान्त—एक तिल्ली के दाने से थोड़ा ही तैल निकलता है, इसलिये समुदाय स्थित बहुत से तिलों का तैल बहुत निकलता है। एक जल परमाणु में शीतलता है इस लिये परमाणु समुदायरूप जल का शीतलता स्वाभाविक धर्म है। सुगन्धित पदार्थों का सुगन्धि स्वाभाविक गुण है, वह दहन से फैलता है, उसका नाश नहीं होता।
द्वितीय—सुगन्धि जलाने से दुर्गन्धि का नाश होता है, यह प्रत्यक्ष है।
तृतीय—जब हम अर्क निकालते हैं तब जैसा द्रव्य होता है वैसा तद्गुणविशिष्ट अर्क निकलता है। अर्क अर्थात् आसव, सत्त्व, अतर आदि द्रव्य।
अग्नि-परमाणु में जो गुण हैं, वे अग्नि के परमाणु अत्यन्त सूक्ष्म होकर मेघ-मण्डल तक विस्तीर्ण होते हैं और उससे वायु-शुद्धि परिणाम होता है।
अब कोई ऐसी शंका करे कि होम एक छोटी सी कृति है, इससे ब्रह्माण्ड वायु कैसे शुद्ध होगा, समुद्र में एक चम्मच भर कस्तूरी डालने से क्या सारा समुद्र सुगन्धित और शुद्ध होगा?
इसका समाधान यह है कि सौ घड़े रायते में थोड़ी-सी हींग के बघार से रुचि आ जाती है, यह प्रत्यक्ष है। इसकी जैसी उत्पत्ति समझी जाती है तद्वत् ही यह प्रकार भी है।
यदि कोई ऐसी शंका करे कि होम तो यहाँ करो और अमेरिका में उसका परिणाम कैसे होगा?
इसका समाधान यह है कि वायु द्वारा शुद्धि सर्वत्र फैले, यह वायु का धर्म है। [इसके] सिवाय—यदि सब लोग अपन-अपने घर में आर्यसम्मत रीति से हवन करें तो यह शंका ही नहीं सम्भव होती। पहले आर्य लोगों का ऐसा सामाजिक निमय था कि प्रत्येक पुरुष प्रातःकाल स्नान कर बारह आहुति देता था, क्योंकि प्रातःकाल में जो मल-मूत्रादिकों की दुर्गन्धि उत्पन्न होती थी, वह इस प्रातःकाल के हवन से दूर होती थी। इसी तरह सायंकाल में हवन करने से दिन भर की जमी हुई जो दुर्गन्धि उसका नाश होकर रात भर वायु निर्मल और शुद्ध चलती थी। प्राचीन आर्य लोग बड़े ही बुद्धिमान् थे, इसमें किञ्चित् भी सन्देह नहीं है। फिर अमावस्या और पौर्णमासी के दिन समस्त भरतखण्ड में होम होता था। उससे भरतखण्ड में वायु शुद्धि के कितने साधन उत्पन्न होते थे? इसका विचार करने से यह छोटा ही सा प्रकार है, ऐसा किसी को भी प्रतीत न होगा। अब वायु शुद्ध रहने से वृष्टि का जल भी शुद्ध रहता है। वृष्टि और वायु का बड़ा ही घनिष्ठ सम्बन्ध रहता है और सब देश का जल वृष्टि से उत्पन्न होता है।
जल स्वच्छ और वायु के भी स्वच्छ रहने से वृक्षों के फल, पुष्प, रस ये बड़े ही शुद्ध और पुष्टिकारक होते हैं। इसी तरह अन्नादि सब द्रव्य शुद्ध और पुष्टिकारक होते हैं। इसलिए शरीर को सुख होकर अन्न से बल उत्पन्न होता है। प्राचीन आर्य लोगों के शौर्य का वर्णन इस प्रसंग में करने की कोई आवश्यकता नहीं है। वायु और जल की दुर्गन्धि नष्ट होकर उनमें शुद्धि और पुष्टि वर्धनादि गुण बढ़ने से सब चराचरों को सुख होता है, इसीलिए कहा है कि—
स्वर्गकामो यजेत, सुखकाम इति शेषः॥ (ऐतरेय, शतपथब्राह्मण)
होम—हवन से परमेश्वर की सेवा कैसे होती है, ऐसा यदि कोई कहे तो उसे विचार करना चाहिए कि सेवा का अर्थ प्रिय आचरण है। परमेश्वर की सेवा अर्थात् उसको जो प्रिय है वह आचरण करने से वह न्यायकारी होने के कारण उसके द्वारा योग्य प्रत्युपकार होता है, ऐसा एक नियम ही है। अब स्वर्ग अर्थात् सुख विशेष अथवा विद्या और नरक अर्थात् दुःख विशेष अथवा अविद्या है। विद्या स्वर्गप्राप्ति का तथा बुद्धि-वर्धन का कारण है। बुद्धि-वर्धन को शारीरिक दृढ़ता अवश्य चाहिए और शुद्ध वायु, शुद्ध जल और शुद्धान्न के विना शरीर-दृढ़ता कैसे प्राप्त होगी? होम-हवन से वायु शुद्ध होकर सुवृष्टि होती है। उससे शरीर नीरोग और बुद्धि विशद होती है, विद्या प्राप्त होती है अर्थात् स्वर्ग-प्राप्ति, सुख-प्राप्ति होती है।
कोई-कोई ऐसी भी शंका करें कि वायु शुद्ध्यर्थ यदि हवन है तो उसमें वेद-मन्त्रों के पठन की क्या आवश्यकता है और होम करने में अमुक ही रीति की ईंट रखकर अमुक ही प्रकार की वेदी बनावे, ऐसी विशेष योजना किस वास्ते चाहिये?
इस शंका का समाधान यह है कि विशेष योजना के अनुकूल कोई भी बात किए विना उससे विशेष कार्य नियमित समय पर प्राप्त नहीं होता। इसी तरह कच्ची ईंटों की चार अंगुल गहरी और सोलह अंगुली ऊंची गणित प्रमाण से वेदी बनाकर उसमें नियमित प्रमाण का ही मसाला लेकर प्रमाण से घृतादिक का हवन करने से, अल्प व्यय में अतिशय उष्णता उत्पन्न होती है और उष्णता के कारण वायु शुद्ध होकर जल परमाणु वायु में उड़ जाते हैं और इस उष्णता के कारण वायु का घर्षण होकर विद्युत् उत्पन्न होती है और मेघ-मण्डल में गड़गड़ाहट की आवाज उत्पन्न होती है, इस प्रकार हवन की विशेष योजना के कारण विशेष उष्णता उत्पन्न होकर विशेष वृष्टि उत्पन्न होती है।
अब गड़गड़ाहट अर्थात् इन्द्र-वज्र-संघातजन्य शब्द वर्णन किया हुआ है। इसका सच्चा अर्थ यह है कि इन्द्र अर्थात् सूर्य और सूर्य की उष्णता के कारण विद्युत् और मेघ गर्जनादि कार्य होते हैं।
कोई-कोई कहते हैं कि इन्द्र अपने वज्र से बलि को मारता है सो यह बात बिलकुल झूठ है। बलि राजा पाताल में राज्य करता है और पाताल अमेरिका देश है, सो अब उस अमेरिका में बलिराजा कहाँ पर है? इसी तरह वेदी की एक आध ईंट यदि टेढ़ी बैठी कि मानो यजमान मरता है इत्यादि कहना भी अप्रशस्त और निर्मूल है। यह सब लीला अर्वाचीन लोगों के मतलब-सिद्धि की है। वे कहते हैं कि हम जो कहें उसे बछिया के बाबा की नाईं सुनो, शंका मत करो, शंका करते ही तुम नास्तिक बन जाओगे, इत्यादि धमकियां धूर्त लोग देते रहते हैं।
अब होम समय में वेद पठन किस लिए है यह पूछा था, सो इसका उत्तर यह है कि दो काम यदि एक ही समय में हो सकते हों तो उन्हें करना चाहिए, ऐसा उद्देश्य कर प्राचीन आर्य लोगों ने जब हाथों को होमादिक द्रव्यों की व्यवस्था करने में लगाया, तब मुंह खाली न रहे, परमेश्वर की स्तुति प्रार्थना मुंह से होती रहे, इसलिए पहले के ऋषि लोग वेद-मन्त्र बोलते थे। इसके लिए ब्राह्मण लोगों ने वेद कण्ठस्थ आज तक किया, इसीलिए वेद-विद्या भी अबलों बनी रही है। फिर यह भी था कि वेदपाठ करने से परमेश्वर की भक्ति होती थी, जिससे विचार-शक्ति भी उत्पन्न होती थी।
त्रातारमिन्द्रमवितारमिन्द्रं हवे हवे।१ (ऋ॰सं॰)
दूसरा ऐसा भी विचार है कि जो हाथों से प्रयोग होता है उसके जो मन्त्र उस समय कहे जाते हैं, उससे कुछ भी सम्बन्ध नहीं रहता, इससे मन्त्रोच्चार कर्म के उद्देश्य से नहीं होता, किन्तु परमेश्वर की स्तुति मुंह से होती रहे, यही प्रधान उद्देश्य है और कोई-कोई मन्त्र ऐसे भी हैं जिनमें होम के लाभ कहे गए हैं। सारांश यह कि वेद-मन्त्रों को कहने से वेद की रक्षा ही मुख्य प्रयोजन है। इस प्रकार कर्मकाण्ड बिलकुल निष्फल नहीं है। अस्तु,
कोई-कोई ऐसी शंका करेंगे कि वेदों में बीभत्स कथायें क्यों हैं?
उत्तर—वेदों में तो बीभत्स कथायें कहीं भी नहीं हैं। ऐसी-ऐसी कथायें अर्वाचीन महीधरादि भाष्यकार दिखलाते हैं, सो यह दोष वेद पर नहीं लग सकता। यह केवल भाष्यकार की बीभत्स बुद्धि का दोष है। दृष्टान्त—जैसे किसी सुवासिनी (=सौभाग्यवती)स्त्री ने किसी विधवा को नमन किया तो विधवा क्या कहती है अर्थात् आशीर्वाद देती है कि ‘आओ बहिन मुझसी हो!’ बस, इसी प्रकर मतलबी लोगों ने मन-माना अर्थ वेदों में निकाला है। शतपथ ब्राह्मण को देखो—
श्रीर्वा राज्यस्याग्रमित्यादि॰।२ (शतपथ ब्राह्मण)
जब कोई ऐसा कहे कि अश्वमेध में घोड़े के शिश्न का संस्कार यजमान की स्त्री के सम्बन्ध से कहा है। इससे ऐसा प्रकार वेदों में बिलकुल ही उपदिष्ट नहीं है, सो ठीक है; परन्तु इसके सम्बन्ध में जो-जो बीभत्स कथायें लिखी हैं उन्हें पढ़ते हुए मानों उलटी आती है तथापि ऐसा बीभत्सपना कभी भी प्रचार में न आया हो, तो यह कहते नहीं बनता, क्योंकि पद्धति-निरूपक ग्रन्थों में यह बात स्पष्ट मिलती है।
पच्चीस सौ वर्ष के पूर्व बौद्ध लोगों ने जो-जो ग्रन्थ बनाये उनमें ऐसी-ऐसी बातों का उद्देश्य कर ब्राह्मणों की निन्दा की है।
अब कोई ऐसी शंकाएं करें कि अस्तु जो हो, परन्तु बीभत्स कथायें तो भी उनमें हैं वा नहीं? अश्व को फेरते थे और सार्वभौम राजा लोग इसमें क्या शत्रुता उत्पन्न करते थे?
इनमें हमारा समाधान यह है कि शतपथ में लिखा है कि—
अग्निर्वा अश्वः१। आज्यं मेधः॥२ (शतपथ ब्राह्मण)
अश्वमेध अर्थात् अग्नि में घी डालना—इतना ही अर्थ है। उसी तरह ग्रन्थ-साहचर्य की ओर ध्यान देने से हरिश्चन्द्र, शुनःशेप१ इत्यादि वार्ताओं का निर्वाह होता है।
अब केनोपनिषद् में एक यक्ष की वार्ता है। यक्ष ने अग्नि के सम्मुख तृण डाला और अग्नि से कहा कि इस तिनके को तू जला दे। अग्नि से वह तिनका न जल सका। फिर वायु से कहा कि तू इस तिनके को उड़ा ले जा। वायु से भी वह तिनका न उड़ सका, ऐसा कहकर जो हैमवती नामक ब्रह्मविद्या है, उसका माहात्म्य दर्शाया।
यज्ञ में मांस आदि खाना यह गपोड़ अर्वाचीन पण्डितों ने निकाला है।
कोई-कोई व्यभिचार के विषय में भी ऐसी ही कोटियां निकालते हैं। कहते हैं कि क्या इन्द्र के पास मेनकादि अप्सरायें नहीं हैं? हम नकद रुपया दे बाजार में कोई माल मोल लेवें तो इसमें दोष क्या है? तो भाई सोचो कि ये बातें कहना क्या तुम्हें प्रशस्त दीखती हैं? कभी नहीं।
अस्तु, पुरुषमेध का अब थोड़ा सा विचार करें। यजुर्वेद के इस मन्त्र को देखो—
विश्वानि देव सवितर्दुरितानि परासुव। यद् भद्रं तन्न आसुव॥४ (यजुर्वेदसंहिता)
होम तो देवताओं का हो और मांस पशुओं का तथा मनुष्यों का रखें तो कहो यह व्यवस्था कैसे ठीक है? ऐसी व्यवस्था परमेश्वर बनावेगा, यह हमें तो निश्चय नहीं होता, अर्थात् ऐसी व्यवस्था को अन्याय के सिवाय क्या कह सकते हैं।
परमेश्वर की व्यवस्था में ऐसा अन्याय नहीं है और ऐसी निष्कारण हानि का बर्ताव भी नहीं है। देखो, गौ सदृश परोपकारी गरीब पशु को खाने के लिए वा यज्ञ के लिए मारने से कितनी हानि होती है। एक गाय चार सेर दूध देती है। इस दूध को औटाकर खीर (क्षीर)पकाने से न्यून-से-न्यून निदान चार मनुष्यों के लिए भी तो पौष्टिक अन्न होता है, अर्थात् प्रातःकाल सायंकाल दोनों समय का दूध मिलाकर आठ मनुष्यों का पोषण होता है। यदि उस गाय ने दस महीने दूध दिया तो समझ लो कि चौबीस सौ (२४००)मनुष्यों का पालन उस गाय के एक बेत में होगा। इस प्रकार आठ औलाद औसत पकड़े तो (१९२००)उन्नीस हजार दो सौ लोगों का पालन हेागा। वही गाय कोई यदि मारकर खा जाय तो पच्चीस-तीस मनुष्यों का पालन एक टंक१ का होता है। इस प्रकार की युक्ति की रीति से भी मांस-भक्षण ठीक नहीं है।
अस्तु, इन दिनों मांसाहारियों ने राज्य-बल के आधार से इतना जबर हाथ फेरना प्रारम्भ किया है कि चौपाये बिल्कुल न्यून होते जाते हैं। पांच रुपये के बैल के आजकल पच्चीस रुपये लगने लगे हैं और गरीब लोगों को दूध-घृत मिलने में बड़ी ही कठिनाई होती जाती है। जिस देश में बिल्कुल मांस नहीं खाते, उस देश में दूध घी की खूब ही बहुतायत हो रही है अर्थात् वहां पर खूब समृद्धि रहती है।
अस्तु, अब लों तो पशु-वध होम में न करने के लिए युक्तियों तथा शास्त्र का विचार किया। अब इस शंका का विचार करें कि कभी होम में पशु को मारते थे वा नहीं?
होम दो प्रकार के हैं—एक राज-धर्म सम्बन्धी और दूसरा सामाजिक। इतने समय तक सामाजिक होम का निरूपण किया। अब राज-धर्म सम्बन्धी जो होम है उसकी सब की व्यवस्था भिन्न है। उसमें पशु मारने की तो क्या ही बात है; परन्तु कभी-कभी मनुष्यों को भी मारना पड़ता है। युद्ध-प्रसङ्ग में हजारों मनुष्यों का प्राण लेना, यह राज-धर्म विहित है। भयंकर श्वापदादि जो खेती को उजाड़ते हैं या मनुष्यादि को हानि पहुँचाते हैं, उनको मारना ठीक ही है; क्योंकि जङ्गली पशुओं का विध्वंस करना अति आवश्यक है, परन्तु सब ही होमों में मांसाहार लाना यह सर्वथैव अयोग्य है। किसी प्राणी को पीड़ा देना, कहो यह धर्म-विहित कैसे होगा और इतने पर भी बेचारों को मुंह बांधकर घूंसे मार-मार कर उनका जीव लेना तो ईश्वर-प्रणीत व्यवहार कभी भी न होगा।
अब यज्ञ के विषय में किसका अधिकार है ऐसी कोई शंका करें तो जानना चाहिए कि कर्म-काण्ड में जिनकी प्रवृत्ति है, उन्हीं को केवल अधिकार है। कर्म से विचार-शक्ति थोड़ी-थोड़ी जागरित होती है। उपासना से विचार में निर्मलता उत्पन्न होती है। फिर ज्ञान में विचार-दृढ़ता और पक्वता आकर फिर वह ज्ञान-मार्ग का अधिकारी होता है।
अब हम होम के विषय में छोटी-छोटी शंकाओं का विचार करते हैं—
कोई-कोई कहते हैं कि जब राज-नियम से इन दिनों ग्राम स्वच्छ रहता है, तो फिर होम किस लिए करें? उनके प्रति यह उत्तर है कि हमारे घर स्वच्छ बनाये विना ग्राम कैसे स्वच्छ रहेगा और ग्राम के बाहर की दुर्गन्धि कैसे दूर होगी?
दूसरी शंका यह करते हैं कि जब आग गाड़ी में (रेल के इञ्जन में)और रसोई के घर में धुआं (धूम)बहुत उत्पन्न होता है फिर वृष्टि भी बहुत होनी ही चाहिए, तो फिर होम किस वास्ते करना चाहिए?
इस पर हमारा यह कहना है कि यह धूम दुर्गन्ध और दूषित रहता है, इससे वायु शुद्ध नहीं होती।
इन दिनों होम के न्यून होने से बारम्बार वायु बिगड़ रही है, सदा विलक्षण रोग उत्पन्न होते जाते हैं।
अब तक यज्ञ का विचार हुआ, अब थोड़ा संस्कारों का भी विचार करें।
दूसरा भाग—संस्कार
संस्कार किसे कहते हैं? इस प्रश्न का प्रथम विचार करना चाहिए।
किसी द्रव्य को उत्तम स्थिति में लाना, इसका नाम संस्कार है। इस प्रकार स्थित्यन्तर मानवीय प्राणियों पर होवे, एतदर्थ आर्य लोगों ने सोलह संस्कारों की योजना की है, परन्तु उन प्राचीन आर्यों को इससे यह इच्छा न थी कि संस्कारों के कारण पेटार्थू पत्रा-पांडे हमारा माल उड़ावें और आलसी बनें, क्योंकि वे आचार्य आर्य महाजन (श्रेष्ठ-जन)थे, तो फिर वे अनार्य अर्थात् अनाड़ियों की समझ में क्योंकर मदद देते।
१. निषेक—अर्थात् ऋतु-प्रदान यह प्रथम संस्कार है। पिता निषेक करता है, इसलिए पिता ही मुख्य गुरु है।
निषेकादीनि कर्माणि यः करोति यथाविधि।
सम्भावयति चान्नेन स विप्रो गुरुरुच्यते॥१
ऐसा मनु में वाक्य है। पिता ही को सब उपदेश और संस्कार करने चाहिएं। पुत्रेष्टि का वर्णन छान्दोग्य२ उपनिषद् में किया है। उस स्थल पर गर्भ-धारण करने वाली स्त्रियों को क्या-क्या पदार्थ खाने चाहिएं, जिससे पुत्र के शरीर और बुद्धि में दृढ़ता आती है, यह मुख्यकर विचार किया है। प्राचीनकाल के आर्य लोग अमोघ-वीर्य थे और स्त्रियों में भी पूर्ण वय होने के कारण वीर्याकर्षता रहती थी। पुत्रेष्टि यह गृहस्थाश्रम का प्रथम धर्म है।
२. पुंसवन—इस संस्कार का प्रयोजन वीर्य को पुनः किस प्रकार जमावे इस योजना के सम्बन्ध से है। वीर्य में सदा स्थिरता, दृढ़ता और नैरोग्य गुण रहने चाहिएं, अन्यथा विकृत वीर्य से संतति में नाना प्रकार के विकार उत्पन्न होते हैं। एतदर्थ सूत्र-कारों ने औषधियां बतलाई हैं। वीर्यवृद्ध्यर्थ और शान्त्यर्थ वर्ष भर (साल भर तक)पुरुषों को ब्रह्मचर्य रखना चाहिए, ऐसा भी निर्बन्ध कहा हुआ है।
३. सीमन्तोन्नयन—स्त्रियों के अकाल में गर्भपात होने की बड़ी भीति रहती है, सो वह न हो और नीरोगी पुष्ट पदार्थों के सेवन से और मन के उत्साह रहने से गर्भ की स्थिति उत्तम रहे, एतदर्थ इस संस्कार की योजना है।
४. जातकर्म—इस संस्कार के विषय में विशेष होम करना है। कारण यह कि सूतिका गृह का (जच्चा के घर)अमंगलपना दूर करने के लिए सुगन्धिवर्धक होम करना योग्य है। बच्चे की नाभि को काटने से दुःख न हो, जच्चा सुखी रहे, इस प्रकार का इस संस्कार का उद्देश्य है।
५. नामकरण—नाम रखने में भी कोई भूल न करे, यहां तक तो प्राचीन आर्य लोगों की बारीक दृष्टि थी। नाम का सुख से उच्चारण हो, उसमें मधुरता रहे, इसलिए दो अक्षर वाला या चार अक्षर वाला नाम होवे ऐसा कहा है, यों ही व्यर्थ लम्बा-चौड़ा नाम न होवे। नहीं तो कभी-कभी इन दिनों लोग मथुरादास, गोपवृन्द, सेवकदास ऐसे लम्बे-चौड़े नाम रखकर गड़बड़ मचाते हैं, कभी-कभी कौड़ीमल, भिखारीमल, घोंड्या, पथर्या आदि विलक्षण नाम रखते हैं। इन दिनों सब प्रकार का पागलपना फैल रहा है, फिर नाम रखने में दोष हो तो आश्चर्य क्या है? दोष देने में कुछ भी उपयोग नहीं। स्त्रियों के नामों में मधुरता होनी चाहिए जैसे भामा, अनसूया, सीता, लोपामुद्रा, यशोदा, सुखदा ऐसे-ऐसे प्राचीन आर्य लोगों की स्त्रियों के नाम होते थे।
६. निष्क्रमण—कोमल शरीर के बच्चों को बाहर हवा खाने के लिए ले जाना, यही इस संस्कार का मुख्य उद्देश्य है।
७. अन्नप्राशन—योग्य समय में बच्चे को अन्नप्राशनादि यदि प्रारम्भ न करे तो बड़ा ही दुःख होता है। इसलिए इस संस्कार की योजना है।
८. चूडाकर्म—मस्तक में उष्णता उत्पन्न न हो और उष्ण वायु में पसीने आदि के करण जो मैल जमता है वह दूर होवे, इसलिए इस संस्कार की योजना की है।
९. व्रतबन्ध (यज्ञोपवीत)—पुरुषों को विद्यारम्भ के समय उत्साह हो, इस उद्देश्य से व्रतबन्ध विषय में विशेष नियम ठहराये हैं अर्थात बनाए हैं। स्त्रियों को भी विद्या-सम्पादन का अधिकार पहले था और उसके अनुकूल उनका भी व्रतबन्ध संस्कार पूर्व में करते थे। विद्वान् अर्थात् ब्राह्मण लोग आर्यकुलोत्पन्न बालक को विद्यारम्भ के समय कार्पास का (रुई का)यज्ञोपवीत विशेष चिह्न ज्ञान-धारण करने को देते थे। इसके धारण करने में बड़ी ही जवाबदारी रहती थी। क्षत्रिय वैश्यादिकों के बालकों को कार्पास का तो नहीं; किन्तु दूसरे पदार्थों का यज्ञोपवीत धारण करने के लिए देते थे। यदि ठीक-ठीक विद्यासम्पादन न हुई तो चाहे ब्राह्मण के ही कुल में उत्पन्न हुआ हो तो भी उसका यज्ञोपवीत छीना जाता और उसकी अप्रतिष्ठा होती थी। उसी तरह शूद्रादिक भी उत्तम विद्यासम्पादन कर ब्राह्मणत्व के अधिकारी होकर यज्ञोपवीत धारण करते थे। इस प्रकार की व्यवस्था प्राचीन आर्य लोगों ने कर रखी थी। इस कारण सब जाति के पुरुषों को और स्त्रियों को विद्यासम्पादन करने के विषय में उत्साह बढ़ता रहा था। विद्या के अधिकारानुसार उत्तम, मध्यम, कनिष्ठ, ऐसे यज्ञोपवीत के भूषण सबों को धारण करने को मिलते रहते थे।
१०-११ तदनन्तर दसवां वेदारम्भ और ग्यारहवां वेदाध्ययन-समाप्ति अर्थात् समावर्त्तन ऐसे दो संस्कार हैं।
१२. विवाह—इस संस्कार का आगे जब इतिहास विषय में व्याख्यान देंगे, उस समय विचार करेंगे। इन दिनों मुहूर्त्तादिक के विषय में जो आडम्बर मचा रखा है यह केवल बलात्कार (जबरदस्ती)है।
व्यर्थ ही कालक्षेप न हो और नियमित समय पर सब वार्त्ता हो, इसलिए कालनियम में ध्यान अत्यावश्यक है, परन्तु उसी के शास्त्रार्थ में व्यर्थ टांय-टांय करना अनुचित है। इसी प्रकार आर्य लोग स्वयंवर करते थे। एक नाड़ी१ आई, और मनुष्यगण आ घुसा और अमुक ग्रह नहीं मिला और फलानी राशि टेढ़ी हुई इत्यादि गपोडे़ उन दिनों में नहीं थे।
१३. गार्हपत्य—गृहस्थाश्रम में पञ्चमहायज्ञ करने पड़ते हैं इसका विचार भी आगे इतिहास विषय में व्याख्यान देते समय करेंगे।
१४. वानप्रस्थ—पुत्र का बेटा होते ही गृहस्थाश्रम में वास करने वाला गृहस्थी वानप्रस्थाश्रम धारण करे, ऐसी योजना थी। वानप्रस्थाश्रम में धर्माधर्म और सत्यासत्य के विषय में निर्णय होता रहता था, क्योंकि विचार के लिए समय मिले और गुण-दोष का निर्णय करने में आवे, इसलिए वानप्रस्थाश्रम की योजना की है।
१५. संन्यास—धर्म की प्रवृत्ति विशेष हो और जनहित करने में आवे, इसलिए यह आश्रम है।
१६. अन्त्येष्टि—आश्वलायन सूत्र में इस संस्कार का वर्णन किया है। आजकल हमारे देश में अन्त्येष्टि के तीन प्रकार जारी हैं। कोई तो जलाते हैं वा कोई जंगल में डाल आते हैं और तीसरे जल समाधि देते हैं।
प्राचीन आर्य लोगों में अन्त्येष्टि यज्ञ है। उसमें दहन प्रकार मुख्य है। अब मुर्दे को गाड़ने वाले ऐसी शंका करें कि जलाना बड़ी निष्ठुरता है, परन्तु मुसलमान आदिकों को विचार करना चाहिए कि मुर्दे को जमीन में गाड़ने से रोग की उत्पत्ति होती है।
कोई-कोई ऐसी शंका करेगा कि जल में देह डालने से मच्छियां उसे खाती हैं, तो क्या यह परोपकार नहीं है। परन्तु जल बिगड़ता है इसका भी तो विचार करना चाहिए। गंगा सदृश महान् नदियों में प्रेतों को डालने से जल में विकार उत्पन्न होता है, तो फिर छोटी-मोटी नदियों की तो कथा ही क्या है। अब गंगा में हड्डियां ले जाकर बहुत से लोग डालते हैं, तो बतलाओ यह कितना भारी भोलापन है? मरे हुए प्राणी की देह मृत्तिका है। उसे गङ्गा में डालने से क्या लाभ होगा? वन में फेंकने से भी दुर्गन्धि उत्पन्न होकर रोग उत्पन्न होता है, इसे कहने की कोई आवश्यकता नहीं है।
इससे प्राचीन आर्य लोगों ने दहन-विधि ही को मुख्य माना था और ठीक यही है। वे श्मशानभूमि में एक वेदी बनाया करते थे और उसे र्पीं॑ ईंटों से बांधते थे और फिर उसमें मृत देह को जलाते समय बीस सेर घृत डालकर चन्दनादि सुगन्धित पदार्थ भी डालते थे। शुक्ल यजुर्वेद ३९ वें अध्याय में इसका वर्णन किया है।
आजकल अन्त्येष्टि संस्कार यथाविधि नहीं होता, नाम-मात्र होता है। अलबत्ता कट्टहाओं की चैन उड़ती है, सो यह जबरदस्ती है। सबों को उचित है कि फिर संस्कारों के विषय का सुधार करें, जिससे कल्याण हो।
ओ३म् शान्तिः शान्तिः शान्तिः॥