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अष्टम उपदेश—इतिहास-विषयक

In Hindi:

महर्षि दयानन्द व्याख्या : अष्टम उपदेश

इतिहास-विषयक

[शनिवार ता॰ २४ जुलाई १८७५ स्वामी दयानन्द सरस्वती ने विज्ञापन के अनुकूल बुधवार पेठ में भिड़े के बाड़े में ता॰ २४ मास जुलाई के दिन रात्रि के आठ बजे इतिहास विषय पर व्याख्यान दिया, उसका सारांश]

ओम् यतो यतः समीहसे ततो नो अभयं कुरु।

शन्नः कुरु प्रजाभ्योऽभयन्नः पशुभ्यः१॥

‘इतिहास’—यह आज के व्याख्यान का विषय है—

क्रम से यह व्याख्यान होना चाहिए। इतिहास अर्थात् “इतिहासो नाम वृत्तम्” इतिवृत्त अर्थात् अतीतवर्णन को इतिहास कहते हैं। इतिहास जगदुत्पत्ति से प्रारम्भ होकर आज के समय तक चला आता है। जगदुत्पत्ति के सम्बन्ध से दो एक प्रश्नों का विचार करना पड़ता है। जगत् कैसे उत्पन्न हुआ और किसने उत्पन्न किया?

नासदासीन्नो सदासीत् तदानीं नासीद्रजो नो व्योमा परो यत्।

किमावरीवः कुह कस्य शर्मन्नम्भ किमासीद् गहनं गभीरम्॥२

मूल में प्रकृति भी नहीं थी और न कार्य ही था। उत्पत्ति, स्थिति, लयादि को कार्य कहते हैं। सत् अर्थात् प्रकृति, इसका वर्णन सांख्यशास्त्र में किया है। उस शास्त्र में सत्त्व, रज, तमोगुण की जो समावस्था है वही प्रकृति है, ऐसा माना है। सांख्यसूत्र देखो—

सत्त्वरजस्तमसां साम्यावस्था प्रकृतिः।३

प्रकृति से आगे उत्पत्ति कैसे हुई, इस विषय में सांख्यशास्त्र का सूत्र नीचे लिखे अनुसार है—

प्रकृतेर्महान्महतोऽहंकारोऽहंकारात् पञ्चतन्मात्राण्युभयमिन्द्रियं पञ्चतन्मात्रेभ्यः स्थूलभूतानि पुरुष इति पञ्चविंशतिर्गणः१

मूल में प्रकृति नहीं थी, तब सृष्टि का कार्य कैसे हुआ, इस विषय में यदि कोई संशय करे तो उसके लिए एक दृष्टान्त है—

भूमि पर ओस पड़कर घास और वृक्ष की पत्तियों पर उसके बिन्दु बन जाते हैं, इससे यह ओस पृथ्वी का आवरण नहीं होता। इसी तरह पहले किसी प्रकार का भी आवरण नहीं था।

ईश्वर की इच्छा होकर उसने सृष्टि उत्पन्न की, ऐसा भी कोई-कोई कहते हैं और उसमें निम्न वचन का प्रमाण देते हैं—

तदैक्षत बहु स्यां प्रजायेयेति२। (तैत्तिरीयोपनिषद् ब्रह्मानन्दवल्ली अनु॰ ६)

परन्तु इस वचन से इच्छा के प्रकार का बोध नहीं होता। क्योंकि ‘ईक्ष’ शब्द का उपयोग किया है। इस धातु का अर्थ दर्शन और अंकन है; परन्तु इच्छा अर्थ नहीं है। ईश्वर को इच्छा हुई, यह बात सम्भव नहीं होती। इच्छा होने के लिए किसी भी वार्त्ता की अप्राप्ति होनी चाहिए, सो ईश्वर को सृष्टि में कौन-सी वस्तु अप्राप्त है? अर्थात् कोई भी अप्राप्त नहीं। फिर इच्छा करने वाले को देश, काल, वस्तु परिच्छेद होते हैं, यह बात भी ईश्वर में नहीं सम्भव होती। इसलिए ईश्वर की इच्छामात्र से सृष्टि उत्पन्न हुई, ऐसा कहना अयोग्य है।

मूल में प्रकृति हुई और प्रकृति से सारी सृष्टि उत्पन्न हुई।

ऋतं च सत्यं चाभीद्धात्तपसोऽध्यजायत।

ततो रात्र्यजायत ततः समुद्रो अर्णवः॥ १॥

समुद्रादर्णवादधि संवत्सरो अजायत।

अहोरात्राणि विदधद्विश्वस्य मिषतो वशी॥ २॥

सूर्याचन्द्रमसौ धाता यथापूर्वमकल्पयत्।

दिवं च पृथिवीं चान्तरिक्षमथो स्वः॥ ३॥३

तस्माद्वा एतस्मादात्मन आकाशः सम्भूतः, आकाशाद्वायुः, वायोरग्निः, अग्नेरापः, अद्भ्यः पृथिवी, पृथिव्या ओषधयः, ओषधिभ्योऽन्नम्, अन्नाद्रेतः, रेतसः पुरुषः स वा एष पुरुषो-ऽन्नरसमयः॥ (तै॰ आ॰ ब्रह्मानन्दवल्ली अनु॰ १)

आकाश विभु होने से सब पदार्थों का अधिकरण है और उससे भी विभु और अति सूक्ष्म परमात्मा है। आकाश को ईश्वर ने उत्पन्न किया।

आकाशस्तल्लिङ्गात्।१ (व्याससूत्रम्)

ओं खं ब्रह्म।२ (य॰ सं॰)

आकाश और परमात्मा का आधाराधेय सम्बन्ध है। अव्यक्त प्रकृति की जो अव्यक्त स्थिति [होती है] उसी को आकाश कहना चाहिए।

अब कोई ऐसी शङ्का करे कि ईश्वर को जगत् उत्पन्न करने का क्या प्रयोजन था?

इस शङ्का का विचार करते समय प्रथम प्रयोजन शब्द का सच्चा अर्थ क्या है, यह देखना चाहिए। जिस प्रकार की इच्छा जगत् में दिखाई देती है, उस प्रकार की इच्छा ईश्वर में सम्भव नहीं होती, इसलिए—

यमर्थमधिकृत्य प्रवर्त्तते तत्प्रयोजनम्॥३ (गौतमसूत्रम्)

यह प्रयोजन शब्द का अर्थ यहां सम्भव नहीं होता। क्षुधानिवृत्ति के लिए पाक-सिद्धि करनी पड़ती है। इसमें क्षुधा-निवृत्ति यही प्रयोजन है। अब ईश्वर से कोई भी पदार्थ बड़ा नहीं है और न ईश्वर को प्रवृत्त करने वाला ही कोई पदार्थ है। इसलिए ईश्वर के काम में उपर्युक्त अर्थ वाला प्रयोजन नहीं सम्भव होता। दूसरा एक ऐसा भी विचार है कि ऊपर लिखे अनुसार जो शंका करे, उस शंका करने वाले से हम पूछते हैं कि भाई! सृष्टि न उत्पन्न करने में ईश्वर का क्या प्रयोजन है? यदि तुम से सृष्टि उत्पन्न न करने का प्रयोजन नहीं कहते बनता, तो हम भी सृष्टि उत्पन्न करने का प्रयोजन नहीं कहते, फिर तुम्हारी हमारी बराबरी तो अवश्य ही हुई। परन्तु ऐसा नहीं है। सृष्टि उत्पन्न करने का कारण ऐसा है कि ईश्वर का सामर्थ्य निष्फल न जावे, ईश्वर की शक्ति प्रकट न हुई अर्थात् यदि उसने जगत् उत्पन्न न किया तो फिर ईश्वर के बीच वह शक्ति रहने पर उसका क्या उपयोग वा लाभ है? ईश्वर का सर्वशक्तिमत्त्व निष्फल होगा। सर्वशक्ति इस शब्द में रचना, धारणा, दया इत्यादि गुणों का समावेश होता है, इसलिए सृष्टि उत्पत्ति विषय में शक्तिसाफल्य होना यही प्रयोजन है।

कोई-कोई कहते हैं कि ईश्वर ने यह जगत् लीला से उत्पन्न किया। उसमें जगदुत्पत्ति का प्रयोजन लीला है, परन्तु यह कहना सयुक्तिक नहीं है, क्योंकि ईश्वर यदि प्रसन्न अर्थात् सुखानुभव लेनेवाला होगा, तो उसमें अप्रसन्नता अर्थात् दुःख की भी सम्भावना होगी। इसलिए सृष्टि-उत्पत्ति का कारण ईश्वर-लीला है, ऐसा जो लोग कहते हैं वह कहना त्याज्य है।

कोई-कोई ऐसी भी शंका करते हैं कि प्रथम बीज उत्पन्न हुआ या वृक्ष पैदा हुआ? सो इसका उत्तर सुनो—

यदि ऐसा कहें कि प्रथम बीज उत्पन्न हुआ तो वृक्ष के विना बीज कहां से आ पड़ा? इस प्रकार का झगड़ा आ पड़ता है, भला—प्रथम वृक्ष उत्पन्न हुआ ऐसा कहें तो भी बीज के विना वृक्ष कैसे हुआ? इस प्रकार “उभयतः पाशा रज्जुः” प्रसंग न आवे, इसलिए हम ऐसा कहते हैं कि प्रथम बीज ही आया, क्योंकि सब जगत् का बीज ईश्वर ही है। वहां से सब उत्पन्न हुए। अस्तु, पतिव्रता का एक बड़ा हास्यजनक दृष्टान्त है। अपने उपास्य देवता के पास किसी पतिव्रता ने यह वरदान मांगा कि मेरा जो पति अभी है वही अगले जन्म में फिर मेरा पति होवे, तब उस देवता ने उसको वैसा ही वर दिया। फिर आगे वह पति मुक्त हो गया अर्थात् जन्म-मरण से छूट गया, तो बताओ अब ऐसे प्रसङ्ग में देवता के वरदान की सफलता कैसे होनी चाहिए? इस प्रकार की शंका कर नाना प्रकार के तर्क लोग करते हैं। उनके प्रति इतना ही उत्तर है कि मुक्त जो पुण्यात्मा पति उसके संत्सङ्ग से उसकी पतिव्रता स्त्री मुक्त होगी। फिर देवता आदि के वरदान होने का बिलकुल ही प्रयोजन शेष नहीं रहेगा। सारांश ऐसे उलटे-सीधे दृष्टान्त में या भाषण में न पड़कर शान्त रीति से विचार करना, यह हमारा धर्म है। अस्तु।

अव्यक्त प्रकृति अर्थात् शून्य से वायु उत्पन्न हुआ, वायु से अग्नि उत्पन्न हुई, अग्नि से जल उत्पन्न हुआ, जल से पृथ्वी उत्पन्न हुई, यह सब व्यवस्था परमाणुओं में हुई। आठ परमाणु का एक अणुक होता है, दो अणुक का एक द्व्यणुक होता है। तीन द्व्यगुणक का एक त्रसरेणु होता है, त्रसरेणु का लक्षण ऐसा किया है—

जालान्तर्गतो भानौ सूक्ष्मं यद् दृश्यते रजः।

प्रथमं तत्प्रमाणानां त्रसरेणुं प्रचक्षते॥ मनुः।१

यह उत्पत्तिकाल की व्यवस्था हुई। आगे प्रलय काल में त्रसरेणु का द्व्यणुक होता है। द्व्यणुक के अणु होते हैं अणु के और परमाणु होते हैं। यह प्रलय-व्यवस्था है।

अब ईश्वर सामर्थ्य ही प्रकृति है, उत्पत्ति की सामग्री है और यही जगत् का उपादान कारण है। यह [सामर्थ्य] ईश्वर के पास सनातन सृष्टि उत्पत्ति के पूर्व से है।

यह सामर्थ्य प्रकट हुआ तब ही सृष्टि हुई और ईश्वर में इसका लय होने में प्रलय होता है। अत्यन्त प्रलय अब तक नहीं हुआ। वायु तक भी प्रलय नहीं हुआ। जल प्रलय हुए हैं। अग्नि तक प्रलय हुआ है।

तदैक्षत तत्तेजोऽसृजत् तदपोऽसृजत् तदन्नमसृजत्॥

तदैक्षत तदपोऽसृजत् तदन्नमसृजत्॥ (ऐतरेय उप॰)

पञ्च महाभूत अनन्त परमाणु का संचय होकर उत्पन्न हुए। उसी प्रकार उद्भिज-सृष्टि और जीव-सृष्टि के असंख्य बीज हैं। यह भी ईश्वर शक्ति है। उसी तरह एक-जातीय विजातीय परमाणु है। एक बीज में अनन्त बीज उत्पन्न करने की शक्ति है। औषधि से अन्न होता है, अन्न से रेत उत्पन्न होता है और रेत से शरीर उत्पन्न होता है। अब कोई ऐसी शंका करे कि रेत किसलिए चाहिए। सब पदार्थ एकमात्र अन्न से ही उत्पन्न होते हैं, यदि ऐसा कहा जाय तो, उसमें क्या हानि है? इसका उत्तर यह है कि जीव-सृष्टि में मैथुनी सृष्टि का भाग है तो उसमें केवल अन्नग्रहण से ही नई उत्पत्ति नहीं होती, रेत-सिंचन की भी आवश्यकता होती है।

तपसोऽध्यजायत।२

धाता ने सृष्टि कैसे उत्पन्न की इस विषय में वर्णन है—

सूर्याचन्द्रमसौ धाता यथापूर्वमकल्पयत्।

दिवं च पृथिवीं चान्तरिक्षमथो स्वः॥३ (ऋ॰ सं॰)

‘यथापूर्व’ कहने से कल्प-कल्पान्तर में सृष्टिभेद है ऐसा कहना बिल्कुल अयोग्य है और ‘यथापूर्व’ शब्द से जैसा उसके ज्ञान में था, वैसा ही उसने यह विश्व रचा, ऐसा भी बोध होता है।

तस्माच्च देवा बहुधा सम्प्रसूताः साध्या मनुष्याः पशवो वयांसि॥

अर्थात् उसके अनेक सामर्थ्य के कारण सृष्टि उत्पन्न हुई।

ततो रात्र्यजायत।१

इन सब बातों का विचार सत्यार्थप्रकाश और पञ्चमहायज्ञ आदि पुस्तकों में भलीभांति किया गया है।

यदि ईश्वर ने यथापूर्व जगत् उत्पन्न नहीं किया, ऐसा कहें तो क्या नवीन जगत् उत्पन्न करते समय उसने पुरानी भूलों को सुधारा है? अथवा जो उसे [पूर्व] विदित न थीं, क्या ऐसी बातों को उसमें डाला है? कभी नहीं। इस स्थल पर तर्क का अप्रतिष्ठान उत्पन्न होता है और अनवस्था प्रसंग भी आता है और फिर ईश्वर की सर्वज्ञता में दोष आकर पूर्वानवस्था उत्तरानवस्था का प्रसंग आता है।

सबों के पश्चात् मनुष्य प्राणी उत्पन्न किया गया, वे मनुष्य बहुत से थे। अन्यान्य मतों में तो दो ही मनुष्य [उत्पन्न किये] थे ऐसा मानते हैं सो ठीक नहीं है। इस प्रकार सृष्टि की उत्पत्ति का इतिहास हो चुका।

अब मनुष्य-सृष्टि होने पर मनुष्य-जाति का इतिहास प्रारम्भ करना चाहिए।

कहीं ठग लोगों की पुस्तकों में यह कहा हो कि मनुष्यों को मारकर चोरी करना चाहिए, तो क्या वह ग्रन्थ प्राचीन है इसलिए उसकी सब बातें मानना चाहिए? कभी नहीं। व्यर्थ ही पुरानी पुस्तकों का नाम रखकर दाम्भिक मत का माहात्म्य बढ़ाने जैसे उद्योग को क्या कहना चाहिए?

अब “असिद्धं बहिरङ्गमन्तरङ्गे२” इस न्याय के अनुकूल अनेक दूसरे देशों का इतिहास छोड़कर अपने ही देश का इतिहास कहना योग्य है।

प्रथम मनुष्य-जाति हिमालय के किसी प्रान्त में उत्पन्न हुई—ऐसा मानने से प्राचीन आर्य-ग्रन्थों की परदेशस्थ लोगों के ग्रन्थों के मतों के साथ एकवाक्यता होती है और प्राचीन आर्य लोगों के ब्राह्मणादि ग्रन्थों में कहा है—

सर्वेषां तु स नामानि कर्माणि च पृथक् पृथक्।

वेदशब्देभ्य एवादौ पृथक्संस्थाश्च निर्ममे॥१

इस वचन के अनुकूल आर्य लोगों ने वेदों का अनुकरण करके जो व्यवस्था की, वह सर्वत्र प्रचलित है। उदाहरणार्थ—सब जगत् में सात ही वार हैं, बारह ही महीने हैं और बारह ही राशियां हैं, इस व्यवस्था को देखो।

अब भिन्न-भिन्न भाषायें कैसे उत्पन्न हुईं। इसका विचार करना अति आवश्यक है। इस सम्बन्ध में यहूदी लोगों में एक ऐसी कहानी है कि उनके पूर्वज स्वर्ग इतना ऊँचा एक बुर्ज बना रहे थे। इससे ईश्वर उन पर अप्रसन्न हुआ और उसने उनकी बोली में गड़बड़ मचा दी।२ बस इसी से जगत् में अनेक भाषायें उत्पन्न हुई, सो यह कल्पना बिलकुल अप्रशस्त है।

देश, काल भेद, आलस्य, प्रमाद के कारण एक मूलभाषा से व्यवहार में भेद बढ़कर भिन्न-भिन्न भाषायें उत्पन्न हुई।

यो ब्रह्माणं विदधाति पूर्वं यो [वै] वेदांश्च प्रहिणोति तस्मै॰।३

वेदाध्ययन और अध्यापन, इन दोनों कामों में ब्रह्मा आदि ब्राह्मण, आदि आचार्य और आदि गुरु हैं। उसका पुत्र विराट् और उसमें परम्परा से स्वायम्भुव मनु तक वेद का उपदेश किस प्रकार हुआ, यह सब व्यवस्था मनुस्मृति में कही हुई है।

मनुष्य-सृष्टि उत्पन्न होने पर एक मनुष्य जाति ही थी। पश्चात् आर्य और दस्यु ये भेद हुए।

विजानीह्यार्यान् ये च दस्यवो॰।४ (ऋग्वेदसंहिता)

अर्थात् ऊपर कहे हुए आर्य और दस्यु। आर्य अर्थात् विद्वान् लोग और दस्यु अर्थात् दुष्ट। फिर आर्यों में गुणकर्मानुसार चार वर्णों की उत्पत्ति हुई। ब्राह्मण अर्थात् पूर्ण विद्वान्, क्षत्रिय अर्थात् मध्यम विद्याधिकारी, वैश्य अर्थात् कनिष्ठ विद्याधिकारी और शूद्र अर्थात् अविद्या का स्थान ही समझना चाहिए।

ब्राह्मणादिकों का याजन अध्यापनादि मुख्य धर्म है, वैश्यों का कृषि कर्म व्यापारादि, शूद्रों का सेवादि कर्म है, उसी तरह राजधर्म युद्धधर्म ये क्षत्रियों के मुख्य धर्म हैं। इस प्रकार चार वर्ण हुए। इसके आगे चार आश्रम हुए। इन चारों आश्रमों का विचार अन्य प्रसंग में हो चुका है।

अब मनुजी का धर्मशास्त्र कौन सी स्थिति में है इसका विचार करना चाहिए। जैसे ग्वाले लोग दूध में पानी डालकर उस दूध को बढ़ाते हैं और मोल लेने वाले को फंसाते हैं, उसी प्रकार मानव-धर्मशास्त्र की अवस्था हुई है। उसमें बहुत से दुष्ट क्षेपक श्लोक हैं, वे वस्तुतः भगवान् मनु के नहीं हैं। यदि कोई कहे कि यह कैसे? तो इसका प्रमाण यह है कि एकन्दर इन श्लोकों को मनुस्मृति की पद्धति से मिलाकर देखने से वे श्लोक सर्वथैव अयुक्त दीखते हैं। मनु सदृश श्रेष्ठ पुरुष के ग्रन्थ में अपने स्वार्थसाधन के लिए चाहे जैसे वचनों को डालना बिलकुल नीचता दिखलाना है। अनुभूति स्वामी नाम का कोई महान् पण्डित था। उसके मुंह में से ‘पुंसु’ इस प्रयोग के स्थान में ‘पुंक्षु’ ऐसा अशुद्ध प्रयोग निकला। अब उसी की उत्पत्ति कर पण्डित लोग दिखाते हैं कि वह शुद्ध ही है। मूढ़ लोगों की रीति कुछ-कुछ कौवों के सदृश है। कौवे को किसी जानवर के व्रण झट दिखाई देते हैं; परन्तु उन्हीं जानवरों के अच्छे शुद्ध (व्रणरहित सुन्दर)भाग नहीं दीखते। अशुद्धियां झट दिखाई देने लगती हैं। हमारे पण्डित भाइयों का स्वभाव इन दिनों बहुत बिगड़ गया है।

आग्रहेणारम्भं कुर्याच्छेषं कोपेन पूरयेत्।

किसी ने “शास्त्र” शब्द का उपयोग किया तो झट प्रथम ही पूछने लग जाते हैं कि “शास्त्रस्य कोऽर्थः” ऐसे-ऐसे प्रश्न पूछकर वितण्डावाद करने की उनको बड़ी ही हवस होती है, परन्तु वितण्डावादी को कोई वितण्डावादी ही मिले तो वह सहज ही प्रश्न करेगा कि “शकारस्य कोऽर्थः” “स्त्रकारस्य कोऽर्थः” और इस प्रकार फिर वही वितण्डा होगा इत्यादि। सो भाई वितण्डावाद छोड़ करके शान्तवृत्ति धारण कर वाद करें, यह हमें योग्य है। भगवान् पतञ्जलि ने महाभाष्य में कहा है कि जो दौड़ेगा सो गिरेगा, इसमें कुछ दोष नहीं—

‘धावतः स्खलनं न दोषाय भवति’

इस वचन के आधार से हमारे बोलने में कुछ प्रमाद अथवा अशुद्ध प्रयोग निकल आवे तो पण्डितों को उसका विषाद न मानना चाहिए। हम सर्वज्ञ नहीं, और सब बातें हमें उपस्थित भी नहीं। हमारे बोलने में अनन्त दोष होते होंगे। इसका हमें ज्ञान भी नहीं है। दोष बतलाने पर हम स्वीकार करेंगे। सत्य की छानबीन होनी चाहिए, वितण्डा नहीं होनी चाहिए, यही हमारी बुद्धि में आता है। थोड़ा-सा गुण पर भी ध्यान देना चाहिए और दोष को क्षमा करना चाहिए। शान्तता अर्थात् शम, दम, तप, ये ब्राह्मणों के मुख्य गुण हैं, और जिनमें ये गुण हों निस्सन्देह वे ही ब्राह्मण हैं। ब्राह्मणों का काम अध्यापन है, उसी तरह उनकी जीविका अध्यापन, याजनादि कार्यों की दक्षिणा से होती है, व्यर्थ प्रतिग्रह लेना अप्रशस्त ही है।

उपासते ये गृहस्थाः परपाकमबुद्धयः।

तेन ते प्रेत्य पशुतां व्रजन्त्यन्नादिदायिनाम्॥१ (मनु॰)

शम—अन्तःकरण की वृत्तियों का शमन, दम—जितेन्द्रियत्व, तप विद्यानुष्ठान, दोनों प्रकार का शौच—शारीरिक और मानसिक शान्ति, सरलता अर्थात् अनाग्रह, ये धर्म जब ब्राह्मणों में होते हैं, तब उनमें गाम्भीर्य रहता है, और कच्चे ब्राह्मण अर्थात् अब्राह्मणों में ब्राह्मण्य का बड़ा ही घमण्ड रहता है, सो ठीक नहीं है। किसी धनिक को दरिद्री कहने से उसे क्रोध नहीं आता; परन्तु दरिद्री को दरिद्री कहने से बहुत क्रोध आता है। अपनी-अपनी अन्तःकरण की वृत्तियों के अनुकूल मनुष्यों की बोलने की रीति होती है।

आजकल के साम्प्रदायिक साधु परमेश्वर का नामोच्चारण करते समय अपनी-अपनी वृत्तियों के अनुकूल उस नाम में जोड़ लगाते हैं। उदाहरणार्थ जैसे ब्राह्मण साधु हो तो यह कहता है कि—

राम नाम लडुवा गोपाल नाम घी।

क्षत्रिय साधु हो तो वह यह कहता है कि—

राम नाम की ढाल बनाकर कृष्ण कटारा बांध लिया।

यदि साधु जी कोई बनिये हुए, तो यों कहते हैं कि—

राम मेरा बानियां समज करे व्योपार।

शूद्र साधु हो तो, वह यों कहने लग जाता है कि—

हरि को भजे सो हरि का होय, जात पांत पूछे ना कोय।

अनार्य्यता निष्ठुरता क्रूरता निष्क्रियात्मता।

[पुरुषं व्यञ्जयन्तीह लोके कलुषयोनिजम्॥

पित्र्यं वा लभते शीलं मातुर्वोभयमेव वा।]

न कथंचिद् दुर्योनिः प्रकृतिं स्वां नियच्छति॥१ (मनु॰)

ब्राह्मणों का मुख्य धर्म सब ग्रन्थों में ज्ञान-प्राप्ति करना ही कहा है। ज्ञान अर्थात् निर्णय, ज्ञान से विज्ञान प्राप्त करना, यही ब्राह्मणों का श्रेष्ठ धर्म है, विज्ञान दृढ़ निश्चय को कहते हैं। अस्तु, ये गुण जब हम ब्राह्मणों में उत्पन्न होंगे तब ही यह देश सहज ही में वैभव को प्राप्त होगा, इसमें संशय नहीं है। मनु के प्रथम अध्याय को देखो, उसमें ब्राह्मणों के धर्म का वर्णन किया हुआ है।

अब क्षत्रियों का धर्म—शौर्य, तेज, धृति, दक्षता, युद्ध में जय, दान, ईश्वरभाव (=स्वामित्व)अर्थात् आज्ञा देना और प्रजा की ओर से यथार्थ अनुवर्त्तन करवाना है। यथार्थ प्रजा का रक्षण करने से देश में इज्या, अध्ययन, दान ये कर्म अच्छे प्रकार होते हैं।

बनियों का धर्म पशुओं का पालन, दान, इज्या देना-लेना और खेती करना है।

इस प्रकार की मनुष्यों में गुण-कर्मानुरूप व्यवस्था स्वायम्भुव मनु के समय तक पूर्णतया चलती रही।

मनु के दस पुत्र हुए—

मरीचिमत्र्यङ्गिरसौ पुलस्त्यं पुलहं क्रतुम्।

प्रचेतसं वसिष्ठं च भृगुं नारदमेव च॥

एते मनूंस्तु सप्तान्यानसृजन् भूरितेजसः।

देवान् देवनिकायांश्च महर्षींश्चामितौजसः॥२

स्वायंभुव मनु का पुत्र मरीचि यह प्रथम क्षत्रिय राजा हुआ। इसके पश्चात् हिमालय के प्रदेश में छः क्षत्रिय राजाओं की परम्परा हुई। अनन्तर इक्ष्वाकु राजा राज्य करने लगा। कला-कौशल की व्यवस्था करने वाला विश्वकर्मा नामक एक पुरुष हुआ। विश्वकर्मा परमेश्वर का भी नाम है और शिल्पकार का भी था। अस्तु, विश्वकर्मा ने विमान की युक्ति निकाली। फिर इस विमान में बैठकर आर्य लोग इधर-उधर भ्रमण करने लगे। ब्रह्मदेव का पुत्र विराट् उसका पुत्र विष्णु, सोमसद् थे और अग्निष्वात्त का पुत्र महादेव था। ये ही विष्णु और महादेव आगे जाकर ब्रह्मा के साथ त्रिमूर्त्ति में मुख्य देवता करके प्रसिद्ध हुए। मन्द, सुगन्ध और शीतल वायु जहाँ चल रही है, रमणीय वनस्पतियाँ जहाँ उगी हैं और जहां यह स्फटिक के सदृश निर्मल झर्झरोदक बह रहा है, ऐसे हिमालय की ऊँची चोटी पर विष्णु वास करने लगा। उसी को वैकुण्ठ भी कहते थे। फिर दूसरे हिमाच्छादित भयंकर ऊंचे प्रदेश में महादेव वास करने लगा, उसे कैलाश कहते थे। इसके आगे विष्णु और महादेव, ये कुलों के नाम पड़ गए। ऊपर लिखे हुए विष्णु और महादेव आज तिथि तक जीते हैं कहना ठीक नहीं, किन्तु अत्यन्त भोलापन है। इसमें दृष्टान्त इतना ही है कि मिथिला देश के जनकपुर के राजा को अभी तक जनक ही कहते हैं। इससे सीता जी का पिता जनक राजा अब तक जिन्दा है, यह कहना बिलकुल अप्रशस्त है। यही प्रकार ब्रह्माजी के विषय में भी लागू होता है। आर्यावर्त्त में लोकसंख्या बहुत हो गई, उसे न्यून करनी चाहिए, इसलिए आर्य लोग अपने साथ मूर्ख शूद्रादि अनार्य लोगों को लेकर विमान उड़ाते फिरते, जहां कहीं सुन्दर प्रदेश देखा कि झट वहीं पर बस जाते। इस प्रकार सब जगत् के प्रत्येक देश में मनुष्य फैले।

इसी समय में राजा इक्ष्वाकु ने विद्वान् लोगों को अपने साथ लेकर इस भरत-खण्ड में प्रथम वसाहत की। आर्यावर्त देश कहने से पश्चिम में सरस्वती अर्थात् सिन्धु नदी और पूर्व में ब्रह्मपुत्र अथवा दृषद्वती, उत्तर में हिमालय, दक्षिण में विन्ध्याद्रि, इनके बीच का जो प्रदेश है उसी को आर्यावर्त कहते हैं।१ यह आर्यावर्त कितना सुन्दर है, कितना सुपीक (जरखेज)है, और जलवायु भी यहां का कितना उत्कृष्ट है। इसमें छहों ऋतु क्रम से आते रहते हैं।

देव का अर्थ विद्वान् है। उन्हीं के कारण देवनदी ऐसी संज्ञा उत्पन्न हुई। इसलिए “देवनद्योर्यदन्तरम्”२ ऐसा कहा है। प्रथम गंगा का नाम पद्मा था, फिर उस नदी की नहर भगीरथ ने निकाली, इसलिये उसका नाम भागीरथी पड़ा।

उस समय ब्रह्मचारी और ब्राह्मण इनका नाम आर्य था, उसका सूत्र है कि—

“आर्यो ब्राह्मणकुमारयोः”१ (पाणिनि-सूत्रम्)

ऐसी व्यवस्था होते हुए हमारे देश का नाम ‘आर्यस्थान अथवा आर्य खण्ड’ होना चाहिए, सो उसे छोड़ न जाने ‘हिन्दुस्तान’ यह नाम कहां से निकला? भाई श्रोतागण! ‘हिन्दु’ शब्द का अर्थ तो काला, काफिर, चोर इत्यादि है और हिन्दुस्थान कहने से काले, काफिर, चोर लोगों की जगह अथवा देश, ऐसा अर्थ होता है तो भाई! इस प्रकार का बुरा नाम क्यों ग्रहण करते हो? और आर्य अर्थात् श्रेष्ठ अथवा अभिज्ञात इत्यादि और आवर्त्त कहने से ऐसों का देश, ऐसा अर्थ होता है। सो भाई ऐसे श्रेष्ठ नाम को तुम क्यों स्वीकार नहीं करते? क्यों तुम अपना मूल का नाम भूल गए? हाँ! हम लोगों की यह स्थिति देखकर किस के हृदय को क्लेश न होगा? सब ही को होगा अस्तु, सज्जन जन! आज से ‘हिन्दू’ नाम का त्याग करो और आर्य तथा आर्यावर्त इन नामों का अभिमान धरो। गुणभ्रष्ट हम लोग हुए तो हुए, परन्तु नामभ्रष्ट तो हमें न होना चाहिए। ऐसी आप सबों से मेरी प्रार्थना है।

ओ३म् शान्तिः शान्तिः शान्तिः॥