In Hindi:
महर्षि दयानन्द व्याख्या : नवम उपदेश
इतिहास-विषयक
[रविवार ता॰ २५ जुलाई १८७५ स्वामी दयानन्द सरस्वती ने विज्ञापन के अनुसार बुधवार पेठ में भिड़े के बाड़े में ता॰ २५ मास जुलाई के दिन रात्रि में आठ बजे व्याख्यान दिया, उसका सारांश]
‘इक्ष्वाकु’ यह आर्यावर्त्त का प्रथम राजा हुआ। इक्ष्वाकु की ब्रह्मा से छठी पीढ़ी है। पीढ़ी शब्द का अर्थ बाप से बेटा यही न समझें, किन्तु एक अधिकारी से दूसरा अधिकारी ऐसा जानें, पहला अधिकारी स्वायम्भुव [मनु] था। इक्ष्वाकु के समय में लोग अक्षर स्याही आदि लिखने की रीति को प्रचार में लाये, ऐसा प्रतीत होता है, क्योंकि इक्ष्वाकु के समय में वेद को बिलकुल कण्ठस्थ करने की रीति कुछ-कुछ बन्द होने लगी। जिस लिपि में वेद लिखे जाते थे, उसका नाम देवनागरी ऐसा है, कारण देव अर्थात् विद्वान् इनका जो नगर ऐसे विद्वान् नागर लोगों ने अक्षर द्वारा अर्थ-संकेत उत्पन्न करके ग्रन्थ लिखने का प्रचार प्रारम्भ किया।
ब्रह्मा की उत्पत्ति तक दिव्य सृष्टि थी, पश्चात् मैथुनी सृष्टि उत्पन्न हुई। उससे विराट् हुआ, और विराट् के पीछे मनु हुआ। मनु ने धर्म-व्यवस्था बनाई। मनु के दस पुत्र थे, उनमें स्वायम्भुव के समय में राजकीय और सामाजिक व्यवस्थाएं प्रारम्भ हुई।
इक्ष्वाकु राजा हुआ तो वह इससे नहीं कि राजकुल में वह उत्पन्न हुआ था, अथवा उसने बलात्कार से राज्य उत्पन्न किया हो, किन्तु सारे लोगों ने उसे उसकी योग्यतानुकूल राजसभा में अध्यक्ष स्थान पर बैठाया। उस समय सारे लोग वैदिक व्यवस्थानुकूल चलते थे। भृगुजी ने अपनी संहिता में यह सब व्यवस्था प्रकट की है और यह ग्रन्थ श्लोकात्मक है। इससे श्लोक बनाने का प्रारम्भ वाल्मीकिजी ने किया, यह कहना कितना युक्तिक है, सो देखो। इस व्यवस्था के सम्बन्ध से मनु के सातवें, आठवें वा नवें अध्यायों में जो राज्यों की व्यवस्था बतलाई है उसे देखो। केवल अकेले राजा ही के हाथ में किसी प्रकार का हुकम चलाने की शक्ति न थी, वह तो केवल राजसभा में अध्यक्ष का अधिकार चलाता रहता था।
राज्य की व्यवस्था कैसी होती थी, उसे संक्षेप में इस स्थल पर कहता हूँ—ग्राम, महाग्राम, नगर, पुर, ऐसे-ऐसे देश विभाग रहते थे। ग्रामों में सौ-सौ घर, महाग्रामों में हजार, नगर में दश हजार और पुर में इससे भी अधिक घरों की संख्या रहती थी। दश ग्राम पर एक दशेश नाम का अधिकारी होता था, सौ ग्रामों पर शतेश नाम का अधिकारी रहता था, और सहस्र ग्रामों पर सहस्रेश नाम का अधिकारी होता था। दश सहस्रों पर महासुशील नीतिमान् ऐसा ही एक अधिकारी रहता था। लिखने-पढ़ने के कामों में अनुभवशील ऐसे सब देशों में गुप्त दूत बातनियां (खबरें)पहुँचाने के लिए तथा अधिकारी लोग कैसा अधिकार चलाते हैं, इसका शोध रखने के लिए चारों ओर फिरते रहते थे, और यह दूतों का काम पुरुष या स्त्रियां करती थीं।
राज्य में चार प्रकार के अधिकारी होते थे—राज्याधिकारी, सेनाधिकारी, न्यायाधिकारी और कोषाधिकारी। ऐसे चार महकमे के चार अधिकारी रहते थे। इक्ष्वाकु राजसभा का प्रथम अध्यक्ष था। यदि सभा के विचार में दो पक्ष आ पड़ते तो उस स्थल पर निर्णय करने का काम अध्यक्ष का था। देश में भिन्न-भिन्न जाति [प्रकार] की सभायें थीं। उनमें राजार्य्य सभा ही मुख्य थी और धर्मसभायें अर्थात् परिषद् भी स्थल-स्थल पर थीं। दश विद्वान् विराजे विना परिषद् सभा नहीं होती थी और न्यून से न्यून तीन विद्वानों के आये विना तो सभा का काम चलता ही नहीं था। धर्म-सभा की ओर से किसी प्रकार का अधिकार न था, किन्तु उसमें धर्माधर्म का विवेचन और उपदेश ही होता था। परीक्षा और शिल्पोन्नति की ओर भी इस सभा का ध्यान रहता था, न्यूनाधिक के विषय में राजार्य सभा को विदित करके राजार्य सभा की ओर से दण्डादिक की व्यवस्था होती थी। महाभारतान्तर्गत सभापर्व में भिन्न-भिन्न सभाओं का वर्णन किया हुआ है, उसे देखो। सेना के सिपाही लोगों को आज्ञा मानना ही मुख्य कर्त्तव्य कर्म है, ऐसा बतलाकर उन्हें धनुर्वेद सिखाते थे। आर्य लोगों को ‘कवायद क्या है’ यह विदित न था, ऐसा बहुत से अंग्रेजी पढ़े हुए लोग कहते हैं, परन्तु यह कहना पागलपने का है। क्योंकि मकरव्यूह, बकव्यूह, बलाकाव्यूह, सूचीव्यहू, शूकरव्यूह, शकटव्यूह, चक्रव्यूह इत्यादि कवायद के नाना प्रकार प्राचीन काल में आर्य लोगों को विदित थे और सैन्य में भी भिन्न-भिन्न टोलियों पर दशेश, शतेश, सहस्रेश ऐसे अधिकारी रहते थे और उस समय के उनके हथियार अर्थात् शक्ति, असि, शतघ्नी, भुशुण्डी आदि होते थे। अंग्रेज लोगों में अब तक व्यूह रचना का पूर्ण ज्ञान नहीं हुआ है अर्थात् वे नहीं जानते कि व्यूह-रचना किसे कहते हैं। थोड़ी बहुत कवायद करते हैं, उतने ही से वे प्राचीन आर्य लोगों की अपेक्षा कुशल हैं, ऐसा तुम्हें प्रतीत होने लगा है। सारांश ‘निरस्तपादपे देशे एरण्डोऽपि द्रुमायते’ यह कहावत सत्य है।
इससे अंग्रेजों में हमारी अपेक्षा विशेष गुण नहीं हैं, ऐसा मेरा कहना नहीं है; किन्तु उनमें भी बहुत से अच्छे गुण हैं सो उनके गुणों को हम स्वीकार करें, यहीं हमें योग्य है। पहले समय में जो कोई युद्ध में मरता तो उसके लड़के-बालों को वेतन मिला करता था और युद्धप्रसंग में जो लूट मिलती तो उसे नियत समय पर व्यवस्था से बांट दिया करते थे। सैन्य की योग्य व्यवस्था के सम्बन्ध से उस समय बहुतेरे कार्यों की ओर ध्यान दिया करते और समस्त ऐश्वर्य की मूल कारण सेना है यह जानकर सेना में लोगों को कोई प्रकार की चिन्ता वा कष्ट नहीं होने देते थे, इस विषय में अधिकारी लोग उस समय बहुत ही दक्ष होते थे। यदि सेना में कोई बीमार पड़ता तो उसकी विशेष चिन्ता की जाती थी अर्थात् उत्तम रक्षा होती थी।
कार्षापणं भवेद्दण्ड्यो यत्रान्यः प्राकृतो जनः।
तत्र राजा भवेद्दण्ड्यः सहस्रमिति धारणा॥१
श्रेष्ठ पुरुषों को और राजा को गरीबों की अपेक्षा शतपथ (सौगुना)दण्ड अधिक दिया जाता और राजा लोग मुनि लोगों के साथ धर्मवाद करने में समय लगाते थे, इस विषय में पिप्पलाद मुनि की कथा देखो२। इस प्रकार इक्ष्वाकु के समय में राज्य-व्यवस्था थी। इक्ष्वाकु राजा इस प्रकार का सुशील, नीतिमान्, सुज्ञ, जितेन्द्रिय, विद्वान् और गुणसम्पन्न राजा था।
बहुत सी पीढ़ियों के पश्चात् सगर राजा राज्य करने लगा। उस समय राजा लोग यदि मूर्ख होते तो उन्हें अधिकार से दूर कर देते थे अथवा अधिकार ही न देते थे।
इन दिनों हमारे राजा लोगों को खुशामदियों की चाण्डाल-चौकड़ी ने घेरा है। इस कारण सहज ही राजाओं में सारे दुर्गुण वास करते हैं, इसमें आश्चर्य ही क्या है? बस सारांश इतना ही है कि यह हमारे आर्यावर्त्त का दुर्दैव है।
बहवः पुरुषा राजन् सततं प्रियवादिनः।
अप्रियस्य तु पथ्यस्य वक्ता श्रोता च दुर्लभः॥१ (महाभारते)
सगर राजा सुशील और नीतिमान् था। इस राजा का मूर्ख और दुष्ट ऐसा असमंजस नाम का पुत्र उत्पन्न हुआ। उसने एक गरीब के बालक को पानी में फेंक दिया। इसकी प्रार्थना का न्याय राजार्य सभा के सम्मुख होने पर राजा ने उसे शासन किया और उसे एक महाभयंकर जंगल के बीच कैद कर रखा, इसी का नाम न्याय है। नहीं तो आजकल के राजा लोग और उनके न्याय का क्या पूछना है, कहते हैं कि—
समरथ को नहीं दोष गुसाई। रवि पावक सुरसरि की नाईं॥२
बस इस प्रकार की शिक्षा ने भारत को तबाह कर दिया। प्यारे आर्यगण! समर्थों को मूर्खों की अपेक्षा अधिक दोष लगता है। क्योंकि उसे समझ देखकर समर्थ किया है। वह भला बुरा पाप-पुण्य सब जान सकता है। तात्पर्य है कि ऐसे-ऐसे गपोड़ों को न मानकर अपने धर्मानुरागी पूर्वजों की धर्म शिक्षानुकूल बर्त्ताव रखें, इसी में कल्याण है।
ओ३म् शान्तिः शान्तिः शान्तिः॥