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दशम उपदेश—इतिहास-विषयक

In Hindi:

महर्षि दयानन्द व्याख्या : दशम उपदेश

इतिहास-विषयक

गत व्याख्यान में कहे हुए सगर राजा के समय जिस दुष्ट राजपुत्र को दण्ड मिला था, उसको राज्य का अधिकार न मिला। इसी सगर राजा के सम्बन्ध में बहुत सी अलाउद्दीन की तरह कहानियां मनुष्यों में प्रसिद्ध हैं, परन्तु इस प्रकार की अनुचित कहानियों पर कौन विश्वास कर सकता है कि एक ही समय में राजा सगर के साठ हजार पुत्र पैदा हुए, और उन्होंने समुद्र को खोद डाला। इनके हाथ बड़े-बड़े थे और शरीर भी अतिपुष्ट थे।’ कोई-कोई मनुष्य इस बात की उपपत्ति इस रीति पर करते हैं कि यह सब वरदान का प्रभाव था। वरदान अर्थात् आशीर्वाद में केवल वाणी से शब्द बोले जाते हैं परन्तु केवल शब्द में तो कर्त्तव्य शक्ति नहीं है। जैसे ‘अग्नि’ बोलने से जलन या दीप्ति पैदा नहीं होती। शब्द में केवल वाच्य-वाचक सम्बन्ध है। अतः यह सब मिथ्या बड़बड़ाहट है। इसमें मूल्य और समय खोना अतीव निर्बुद्धिता है।

इस सगर के अनन्तर उपरिचर राजा हुआ। वह गुब्बारह की विद्या में निपुण था। कौषीतकीय ब्राह्मण ग्रन्थ में बहुत सम्राट् राजाओं का वर्णन किया है।

अयोध्या में ऋतुपर्ण नामी राजा राज्य करता था। इधर दक्षिण में राजा नल राज्य करता था, नल की रानी दमयन्ती का अपने पति से वियोग हो गया उस समय का वर्णन किया गया है कि उसने अपने ही स्वयंवर के विषय में दो श्लोक स्वयं बनाये थे [और उसने अयोध्या के राजा ऋतुपर्ण के पास भेजे थे]। राजा नल को अश्वविद्या अर्थात् अग्निविद्या विदित थी।

अग्निर्वै अश्वः। देवा एतं वज्रं ददृशुः। अग्निर्वै वज्रः। यदश्वं तं पुरस्तादुदश्रयंस्तस्याऽभयेऽनाष्ट्रे निवातेऽग्निरजायत। तस्माद्यत्राग्न मन्थिष्यन्त्स्यादश्वमानेतवै ब्रूयात् स पूर्वेणोपतिष्ठते। वज्रमेवैत-दुच्छ्रयति। (शतपथ)१

अग्नि का नाम ही अश्व है विद्वानों ने इसे वज्र को दिखाया। वज्र नाम है अग्नि का; जो अग्नि है इसको आगे से दिखाया गया है। इस जगह जहां कि अग्नि का भय नहीं है अर्थात् जहां कि हवा न हो, अग्नि प्रसिद्ध हुआ है। इस कारण से जहाँ अग्नि का मन्थन होता है अर्थात् अग्नि की अनेक प्रकार की सुन्दरता होती है वहाँ अग्नि का बल निश्चय कहा जाता है कि सम्पूर्ण संसार इसी के बल से स्थित है। यह वज्र अर्थात् अग्नि है। इस संसार को उन्नति देती है।

उस समय राजा नल अयोध्या पुरी के राजा ऋतुपर्ण के यहाँ नौकर था। वहां से दमयन्ती के स्वयंवर में नल की विद्या-शक्ति से एक ही दिन में राजा ऋतुपर्ण विदर्भ पहुँच गया था; इस कारण से नल की बड़ी प्रशंसा हुई थी। इसके साथ दुर्बल श्यामकर्ण घोड़ों की मनुष्य ऊटपटांग बातें करते हैं। इनमें कुछ भी सच्चाई नहीं है।

इसके अनन्तर भरत-कुल में अनेक राजा होते रहे। इसी कारण उस समय से आर्यावर्त्त का नाम भारतवर्ष भी हो गया। तदन्तर राजा रघु हुआ, वह भी बड़ा महात्मा था। राम राजा से रघु राजा बड़ा था। रघु पीछे राजा राम हुए। इनका रावण से युद्ध हुआ। इनका इतिहास रामायण में वर्णन किया गया है। ऐसे-ऐसे वीर पराक्रमी, बुद्धिमान्, विद्वान्, वैद्य और न्यायकारी राजा लोग आर्यावर्त्त में हुए इैं। उस समय आर्यावर्त में प्रत्येक स्थान पर बड़ी भारी उन्नति थी। कौषीतकीय ब्राह्मण में लिखा है कि सब पुत्र वा पुत्रियां पाँच वर्ष की अवस्था में पाठशाला को भेजे जाते थे। यह एक सामाजिक नियम था। परन्तु माता-पिता इस सामाजिक नियम को तोड़ते तो राज-सभा से उनको दण्ड मिलता था। इस तरह की उन्नति का समय व्यतीत होते हुए राजा शन्तनु का समय आ पहुँचा। इस समय आर्यावर्त्त का ऐश्वर्य बहुत बढ़ गया था। इस ऐश्वर्य के नशे के कारण सहज ही इस आर्यावर्त्त की दशा बहुत बिगड़नी प्रारम्भ हुई। जिसके पास द्रव्य बहुत था वह नशे में मस्त था। इस कारण से एकाएक देश में सामाजिक नियमों में विरुद्धता उत्पन्न हो गई।

राजा शन्तनु को ऐश्वर्य का बड़ा भारी अभिमान उत्पन्न हुआ और देश में व्यभिचार बढ़ गया। निष्कण्टक राज्य होने के कारण से शन्तनु और भी विशेष अभिमानसंयुक्त हुआ। मनु जी ने कहा है—

अर्थकामेष्वसक्तानां धर्मज्ञानं विधीयते।

धर्मं जिज्ञासमानानां प्रमाणं परमं श्रुतिः॥१

जो मनुष्य सांसारिक विषयों में फंसे हुए हैं उन्हें धर्म का ज्ञान नहीं हो सकता। धर्म के जिज्ञासुओं के लिए परम प्रमाण वेद है।

इसके अनन्तर शन्तनु विषयों में अत्यन्त आसक्त हो गया। सत्यवती के प्रति इसकी चालाकी का समाचार आप सब लोग जानते हैं; परन्तु शन्तनु राजा होकर भी सत्यवती के पिता पर बल प्रयोग न कर सका। सत्यवती के पिता ने उसको डांटा था। जब तक भीष्म ने अपना कुल हक सत्यवती के पुत्रों को देने का निश्चय नहीं किया, तब तक सत्यवती के दरिद्री पिता ने राजा की आज्ञा स्वीकार नहीं की। भीष्म पितामह के इस निश्चय पर कि इसने अपना कुल हक सत्यवती के पुत्रों को दे दिया, सत्यवती के दरिद्री पिता ने राजा का कहना स्वीकार किया। इससे ही प्रकट हो सकता है कि प्राचीन आर्य मनुष्यों में कितनी स्वाधीनता थी और राजा लोग भी सामाजिक प्रबन्ध में किस प्रकार प्रबन्धकर्त्ता हुए थे। इस आर्यावर्त्त के राजाओं की नेकी वा नेकनामी संसार में फैल रही थी। योरुप और अमेरिका के कुछ राजा लोग इनकी सेवकाई में तत्पर होकर कर देते थे। अब सोचिए कि वर्त्तमान समय में देश की दशा कितनी गिर गई है। ये सब बातें महाभारत के राजसूय और अश्वमेध पर्वों में वर्णित हैं। निदान शन्तनु राजा के समय में पाप बढ़ने लगा और राज्य का प्रबन्ध बिगड़ चला। यह ही पाप अन्त में बढ़ते-बढ़ते कौरवों व पाण्डवों के बड़े भारी संग्राम पर समाप्त हुआ और उसी समय से इस देश की दशा बिगड़नी प्रारम्भ हुई। अब इस जगह राजा लोगों का इतिहास समाप्त किया जाता है।

अब आगे देवता, विद्या और ऋषि आदि के इतिहास का प्रारम्भ करते हैं। शतपथ ब्राह्मण में लिखा है कि देवता विद्वानों को कहते हैं।२ इन विद्वानों के तीन प्रकार थे—प्रथम देव, द्वितीय ऋषि, तृतीय पितृ। इन तीन प्रकार के पृथक् ब्राह्मण आदि ग्रन्थों में तेंतीस देवता वर्णन किए गए हैं३ और तेंतीस करोड़ का मानना जो नवीन पुरुषों ने किया है वह बहुत अनुचित है; क्योंकि कोटि का अर्थ ‘प्रकार’ है और इनको पुस्तक रचयिता लोगों ने ‘करोड़’ का अर्थ करके ऐसी गलती खाई है। आदित्य, रुद्र, वसु आदि इस तरह के तेंतीस देवता शतपथ ब्राह्मण के बृहदारण्यक उपनिषद्१ में वर्णन किए गए हैं। वहां देख लेना चाहिए। इन तेंतीस देवताओं में, बारह आदित्य अर्थात् महीने, ग्यारह रुद्र अर्थात् १० प्राण और एक जीवात्मा। रुद्र शब्द का अर्थ है कि इस शरीर में से प्राणों के निकल जाने पर लोग रोया करते हैं। इसलिए प्राणों को रुद्र कहते हैं। इसलिए दश प्राण और जीवात्मा मिलकर ग्यारह रुद्र समझने चाहियें; क्योंकि इनके शरीर से अलग होने पर ही सम्बन्धी रोते हैं। आठ वसु, जो निम्न रीति पर वणि्रत हैं—१. पृथिवी, २. जल, ३. तेज, ४. वायु, ५. आकाश, ६. द्यौ, ७. चन्द्रमा, ८. सूर्य ये सब मिलकर आठ वसु हुए। बत्तीसवें प्रजापति, तेंतीसवें इन्द्र।

विष्णु वैकुण्ठ में रहने वाले थे और वही उनकी राजधानी का नगर था। महादेव कैलाश के रहने वाले थे। कुबेर अलकापुरी के रहने वाले थे। यह सब इतिहास केदारखण्ड में वर्णन किया गया है। हम स्वयं भी इन सब ओर घूमे हुए हैं। जिस पहाड़ पर कि पुरानी अलकापुरी थी उस पर भी मैं इस विचार से गया था कि एक वार ही अपना शरीर बर्फ में गलाकर संसार के धंधों से निवृत्त हो जाऊं, परन्तु वहां पहुँचकर विचार में आया कि इस जगह पर मर जाना तो कोई पुरुषार्थ नहीं है, अपितु ज्ञान प्राप्त करके परोपकार करना ही पुरुषार्थ है। इस विश्वास के बदलने पर लौट आया था। अब तो विदित होता है कि जीवात्मा की मृत्यु ही नहीं होती है।

काश्मीर से लेकर नैपाल तक हिमालय की जो ऊंची-ऊंची चोटियां हैं वहाँ देवता अर्थात् विद्वान् पुरुष रहते हैं। गत समय में इस समय की तरह प्रायः बर्फ नहीं पड़ती थी, ऐसा विचार होता है क्योंकि यदि उस समय भी वहां बर्फ पड़ती होती तो देव अर्थात् विद्वानों का इस स्थान पर निवास कैसे होता? इस देव लोक में भद्र पुरुष प्रत्येक स्थान पर राज्य करते थे। इस समय भी भरतखण्ड में हमारे कथन का प्रमाण मिलता है। देहली में इन्द्रप्रस्थ नामी स्थान था। वहां इन्द्र का राज्य था। पुष्कर और ब्रह्मावर्त्त में ब्रह्मा ने राज्य किया। काशी, उज्जैन और हरद्वार आदि में महादेवजी का राज्य था। इन विद्वानों अर्थात् आर्यों के वैरी अनार्य भील आदि थे। इनके साथ बराबर आर्यों को युद्ध करना पड़ता था। विमानों में बैठकर भी युद्ध करते थे। केवल यही नहीं; किन्तु जहाँ कहीं स्वयंवर रचा गया और बुलाया गया कि उन्हीं विमानों पर चढ़कर शीघ्र ही उस स्थान पर पहुंच जाते थे। इन देवताओं में बड़े देवता लोग अत्यन्त वीर थे। इनकी स्त्रियां मर्दाना जोश से अपने पतियों के साथ युद्ध में जाया करती थीं। इन पहाड़ के रहने वाले देवताओं के राज्य के व्यवहार आज तक के राजपूत लोगों से अब तक मिलते हैं। प्राचीन समय के राजा लोग युद्ध के समय रथों में बैठे भोजन किया करते थे। इस समय राजपूतों में ठाकुर लोग अवसर आने पर ऐसा ही करते हैं। राजपूत लोग जिस स्थान पर जी चाहे खाते हैं। इसी सम्बन्ध में मैं एक रिवायत सुनाता हूं जो कि शहर जयपुर में कुछ समय पहले से प्रसिद्ध है। जयपुर के राजा लोग ब्राह्मण को रसोईदार बनाकर नहीं रखते। इसका कारण इस रीति से वर्णन करते हैं कि चार पुस्तों से पहले रसोई का काम ब्राह्मण नहीं करते थे। ब्राह्मण वा क्षत्रिय और वैश्य इन तीन वर्णों के घर में शूद्र रसोईदार रहते थे और यह आचार मनुस्मृति में भी मिलता है। वर्त्तमान में वही राजपूतों के रसोईदार हैं। ब्राह्मणों को रसोई के काम के लिए न रखने का कारण यहां वर्णन करते हैं कि गत समय में एक वार ब्राह्मण ने राजा के भोजन में विष डाल दिया था।

प्राचीन समय में जिसको त्रिविष्टप देश कहते थे उसको वर्त्तमान में मुल्क तिब्बत कहते हैं। कोई-कोई हमसे प्रश्न करते हैं कि विष्णु, महादेव, इन्द्र आदि देवता आजकल हमें क्यों दिखाई नहीं देते। उनके लिए हमारा उत्तर यह है कि नेक और पराक्रमी विद्वान् जो थे, वे सब-के-सब मर गए। कोई-कोई पूछते हैं कि हिमालय में राज्य करने वाले लोग कहां चले गए। कोई-कोई कहते हैं कि देव अमर हैं, परन्तु हम पापी लोगों को दिखाई नहीं देते। भला देवता लोग तो अमर होने के कारण न देख पड़े, उनके नौकर-चाकर भंगी आदि क्यों नहीं दिखाई देते। ठीक बात तो यह है कि जो उत्पन्न हुआ है वह दिखलाई देता है और वह अवश्य एक दिन मरने वाला है। इस तर्कणा से देव भी मर गए। यद्दृष्टं तन्नष्टम्।

देव मर गए इससे यह अभिप्राय है कि इस पृथिवी पर से उनका शरीर जाता रहा, परन्तु देवता और मनुष्य की आत्मा अमर है। इस प्रकार जाति के विचार से देवजाति अर्थात् विद्वानों का समूह अमर है अर्थात् सदैव कुछ न कुछ विद्वान् पुरुष रहते हैं। इस कारण से कहा है कि—विद्वाᳬसो वै देवाः।१ इसलिए देवजाति तो अमर है।

अब प्रश्न है कि हमारे देश के इतिहास में ऐसा गड़बड़ क्यों हो गया और इसका क्या कारण है कि किसी स्थान अथवा लेख के दिन आदि का ठीक पता नहीं लगता है। इस विषय में जानना चाहिये कि मतलबी लोगों ने पुस्तकों में तारीखें छिपा दीं और जैनियों वा मुसलमानों ने वे ग्रन्थ जला दिये। यह संक्षेप से देवताओं का इतिहास वर्णन किया गया।

विद्या का इतिहास

अब संक्षेप रीति से विद्या का इतिहास कहा जाता है कि सबसे पहला विद्वान् देव ब्रह्मा हुआ। इसने अग्नि, वायु, आदित्य और अङ्गिरा चार ऋषियों के पास वेद पढ़ा। इस ब्रह्मा का पुत्र विराट्, उसका पुत्र मनु, मनु के दश मरीचि, अत्रि, अंगिरा आदि थे। इस समय में पढ़ने-पढ़ाने की रीति क्या थी, यह सरलता से विदित हो सकता है। ऋग्वेद की इर्ीं॑स शाखा, यजुर्वेद की एक सौ एक शाखा, सामवेद की एक हजार शाखा और अथर्ववेद की नव शाखा थीं। इसी तरह ग्यारह सौ इकत्तीस शाखा पढ़ने-पढ़ाने के लिए थीं। चारों वेदों को अर्थ सहित जानने वाला जो यज्ञ का करने वाला होता था उसको ब्रह्मा कहते थे। ब्राह्मणों के बनाये हुए जो वेदों के व्याख्यान थे उनको ब्राह्मण पुस्तक कहा जाता था। ऐसे ब्राह्मण और अनुब्राह्मण रूप बहुत-सी पुस्तकें हैं। साफ पानी और हवा जिन एकान्त स्थानों की होती थी, ऐसे एकान्त स्थानों पर जाकर रहने वाले ऋषि मन्त्रद्रष्टा, श्रवण वा मनन करने वाले वा पदार्थ विवेचन करने वाले, ब्रह्म-विचार करने के वास्ते वा सिद्धान्तों के निश्चय करने के लिए नैमिषारण्य आदि स्थानों में सभा करते थे।

एक महर्षि पाणिनि की बनाई हुई अष्टाध्यायी में ही देखो कितने नाम ऋषियों के आये हैं। आजकल के स्वेच्छाधारी वैरागियों के समूह को देखकर कृपापूर्वक प्राचीन ऋषियों का अनुमान कदापि न कीजिए। सब तैयार की हुई पुस्तकों के आधार पर सिद्धान्तों की एक पुस्तक तैयार करते थे। फिर उस पर ऋषियों की सभा में विचार होता था।

राज-सभा के विषय में मनुजी कहते हैं कि—

मौलाञ्छास्त्रविदः शूरांल्लब्धलक्ष्यान् कुलोद्गतान्।

सचिवान् सप्त चाष्टौ वा प्रकुर्वीत परीक्षितान्॥

अपि यत् सुकरं कर्म तदप्येकेन दुष्करम्।

विशेषतोऽसहायेन किन्तु राज्यं महोदयम्॥

तैः सार्द्धं चिन्तयेन्नित्यं सामान्यं संधिविग्रहम्।

स्थानं समुदयं गुप्तिं लब्धप्रशमनानि च॥१

तेषां स्वं स्वमभिप्रायमुपलभ्य पृथक् पृथक्।

समस्तानां च कार्येषु विदध्याद्धितमात्मनः२॥

अपने राज्य और देश में उत्पन्न हुए वेद वा शास्त्रों के जानने वाले, शूरवीर, कवि, गृहस्थ, अनुभवकर्त्ता सात अथवा आठ धार्मिक बुद्धिमान् मन्त्री राजा को रखना चाहिए; क्योंकि सहायता विना लिए साधारण काम भी एक को करना कठिन हो जाता है। फिर बड़े भारी राज्य का काम एक से कैसे हो सकता है? इसलिए एक को राजा बनाना और उसी की बुद्धि पर सारे काम का बोझ रखना बुद्धिमानी नहीं है। निदान महाराज को उचित है कि मन्त्रियों समेत छः बातों पर विचार करें—१. मित्र और २. शत्रु में चतुरता, ३. अपनी उन्नति, ४. अपना स्थान, ५. शत्रु के आक्रमण से देश की रक्षा, ६. विजय किए हुए देशों की रक्षा, स्वास्थ्य आदि प्रत्येक विषय पर विचार करके यथार्थ निर्णय से जो कुछ अपनी और दूसरों की भलाई की बात विदित हो उसे करना।

इन श्लोकों से राज-सभा का वर्णन यथार्थ विदित होता है। पुराने राजा युद्ध करने वाले सिपाहियों की रक्षा अपने पुत्र की तरह करते थे, इसलिए उन सिपाहियों को युद्ध करने में बड़ा भारी उत्साह होता था। इन विचारों पर सब राजा लोग चलते थे और सब सामान एवं देश की रक्षा करते थे और उनके लिए खजाना जमा करने में लगे रहते थे। मनुजी ने युद्ध में जय के विषय में विस्तार पूर्वक वर्णन किया है और उसी (में)युद्ध में मृत्यु को प्राप्त हुए सिपाहियों के हक भी बतलाये हैं और क्षत्रिय का धर्म पूर्णतया वर्णन किया है। केवल यही नहीं; किन्तु मनुजी ने विद्या की रक्षा और विद्वानों के सत्कार आदि के लिए नियम भी बतलाये हैं।

महाभाष्य में लिखा है कि ब्राह्मण को छः अङ्गों समेत वेदों की शिक्षा ग्रहण करनी चाहिये। ब्राह्मणेन निष्कारणो धर्मः षडङ्गो वेदोऽध्येयो ज्ञेय इति।१

इन छः अंगों में व्याकरण मुख्य है। और पाणिनि बड़े विद्वान् वैयाकरण हो गए हैं, इनकी जितनी प्रशंसा की जावे उतनी ही कम है। इस महामुनि ने पांच पुस्तकें बनाई हैं—१. शिक्षा, २. उणादिगण, ३. धातुपाठ, ४. प्रातिपदिक-गण, ५. अष्टाध्यायी। यह बात निश्चय करने के लिए कि पाणिनि कब हुए, अनेक प्रकार की तर्कणायें प्रस्तुत की जाती हैं; परन्तु इस विवाद से कुछ लाभ नहीं हो सकता। यह बात तो ठीक है कि पाणिनि बहुत पुराने ग्रन्थकर्त्ता हैं।

प्राचीन समय में चौदह विद्याओं के पढ़ने की रीति हमारे देश में थी। चार वेदों के नाम तो सभी जानते हैं। चार उपवेद और छः अंग मिलकर चौदह होते है। चार उपवेद और छः अंग कौन होते हैं उनका विचार करेंगे।

चार उपवेद जो हैं उनमें से पहला आयुर्वेद है। इस पर जो ग्रन्थ चरक और सुश्रुत मिलते हैं उनके बनाने वाले [अग्निवेश और] धन्वन्तरि ऋषि हैं। इस विषय का वर्णन हमारे सत्यार्थप्रकाश में तीसरे समुल्लास में किया गया है।

दूसरा धनुर्वेद है जिसमें अस्त्र-शस्त्र विद्या का विचार है। इस उपवेद में ब्रह्मास्त्र, पाशुपत-अस्त्र, नारायण अस्त्र, वरुण अस्त्र, मोहन अस्त्र, वायव्यास्त्र आदि की व्यवस्था लिखी है। ये सब अस्त्र वेदार्थ का विचार कर और वस्तुओं के गुण और दोष जानकर तैयार किये जाते थे। क्षत्रिय लोगों को यह धनुर्वेद बड़े परिश्रम से पढ़ना पड़ता था। यह कहना दिवानापन है कि केवल मन्त्रों के उच्चारण से शस्त्र और अस्त्र तैयार हो जाते थे।

तीसरा गन्धर्ववेद है, जिसमें विद्वानों ने गान-विद्या का वर्णन किया है। उस समय नये वेश की कविता अर्थात् पद, ध्रुवपद, ख्याल, लावनी आदि नहीं गाते थे। प्राचीन आर्य लोग वेदमन्त्रों का रसीला गायन करते थे।

चौथा अर्थवेद अर्थात् शिल्पशास्त्र। इसका विचार मयसंहिता, वाराहसंहिता, विश्वकर्मसंहिता आदि पुस्तकों में बहुत तरह पर किया है।

एक अपूर्व बात इस समय स्मरण हुई है, वह आपको सुनाता हूं—एक अंग्रेजी विद्वान् डाक्टर हमको मिला। उसने मुझसे कहा कि हमारे प्राचीन आर्य लोगों में डाक्टरी औजार का कुछ भी प्रचार न था और उन्हें विदित न था। तब मैंने सुश्रुत का ‘नेत्र-अध्याय’ जिसमें कि बारीक-से-बारीक औजार का वर्णन है, निकालकर उसे दिखाया। तब उसको ज्ञात हुआ कि आर्य लोग चिकित्सा में बड़े चतुर थे और उन्हें औजारों की विद्या भी उत्तम ज्ञात थी।

छः वेदाङ्ग हैं—१. शिक्षा, २. कल्प, ३. व्याकरण, ४. निरुक्त, ५. छन्द, ६. ज्योतिष—ये सब मिलकर चौदह विद्यायें हुईं। इन सब पुस्तकों का अवलोकन करने में बारह वर्ष लगते हैं और इन ग्रन्थों का दृढ़ अभ्यास करने से बुद्धि में उत्तमता पैदा होती थी। इस समय कुछ ऐसा अनुचित शिक्षा-प्रबन्ध का प्रचार हुआ कि इनमें से एक भी विद्या अत्यन्त परिश्रम करने पर चौबीस वर्ष में भी नहीं आती है। इसका कारण यह है कि केवल तोता-पाठ का घोषाघोष चलता है। इस प्रकार की शिक्षा-प्रणाली बन्द करनी चाहिए। प्राचीन ऋषियों ने विद्या-स्नातक होने को ब्रह्मचारी के लिए केवल बारह वर्षों की हद रखी है। उद्दालक ऋषि के पुत्र श्वेतकेतु ने ये सब विद्यायें बारह वर्षों में सीखी थीं, ऐसा लेख मिलता है और यदि प्राचीन रीति के अनुसार इस समय भी शिक्षा दी जावे तो बारह वर्ष से विशेष समय इस काम में नहीं लगेगा।

अब कुछ थोड़ा-सा विचार छः दर्शनों का किया जाता है—

पहला दर्शन जैमिनि जी का बनाया मीमांसाशास्त्र है। इसमें धर्म और धर्मी का विचार किया है और प्रत्यक्ष एवं अनुमान इन्हीं दो प्रमाणों को माना है। धर्म का लक्षण करते हुए इन्होंने वर्णन किया है कि [वेद की] आज्ञा ही धर्म का लक्षण है।

दूसरा कणाद मुनि का बनाया वैशेषिक दर्शन है। इसमें द्रव्य को धर्मी मानकर गुण आदि को धर्म स्थापन करके विचार किया है। इन्होंने भी दो ही प्रमाण माने हैं और छः पदार्थों का निरूपण किया है।

तीसरा गौतम का बनाया न्याय-शास्त्र है। इसमें यह विचार प्रारम्भ करके धर्मी का धर्म और धर्म का धर्मी क्यों नहीं होता; इस विचार से वाद आरम्भ करके प्रमाण और प्रमेय का सम्बन्ध बतलाया है और सोलह पदार्थ माने हैं।

इस पर कोई-कोई यह कहते हैं कि इन शास्त्रों में परस्पर विरोध है। इसलिए पहले विरोध शब्द के अर्थ पर विचार करना चाहिए। यदि एक विषय में अवगुण संयुक्त विचार का प्रवेश हो तो उसको विरोध कहते हैं; परन्तु यदि अनेक विषयों के विचार से अनेक विचारों का वर्णन हो तो उसको विरोध नहीं कहते हैं। ये छहों दर्शन अपने-अपने लेखों पर चलने वाले हैं।

ओ३म् शान्तिः शान्तिः शान्तिः॥