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एकादश उपदेश—इतिहास-विषयक

In Hindi:

महर्षि दयानन्द व्याख्या : एकादश उपदेश

इतिहास-विषयक

गौतम ने निम्न रीति पर सोलह पदार्थों का वर्णन किया है—

१. प्रमाण, २. प्रमेय, ३. संशय, ४. प्रयोजन, ५. दृष्टान्त, ६. सिद्धान्त, ७. अवयव, ८. तर्क, ९. निर्णय, १०. वाद, ११. जल्प, १२. वितण्डा, १३. हेत्वाभास, १४. छल, १५. जाति और १६. निग्रहस्थान। इसके अनन्तर आठ प्रमाण स्थापित करके इनकी जांच की है और अन्त में चार ही प्रमाणों के अन्तरंग आठों को ठहरा दिया है। इन प्रमाणों के मेल से अर्थ की जांच होकर सत्य और असत्य का विचार होता है। ये आठ प्रमाण हैं—१. प्रत्यक्ष, २. अनुमान, ३. उपमान, ४. शब्द, ५. ऐतिह्य, ६. अर्थापत्ति, ७. सम्भव, ८. अभाव। इनमें से पांचवां तो चौथे में मिल जाता है और छठा, सातवां, आठवां में मिल जाते हैं।

प्रमाण, प्रमेय, प्रमाता, प्रमिति। इनका लक्षण यह है कि जिससे अर्थ का निश्चय हो उसको प्रमाण कहते हैं और जिससे कि ठीक अर्थ प्राप्त हो वह प्रमेय है। निश्चय करने वाला जो है उसे प्रमाता कहते हैं। अर्थ का विज्ञान जो उत्पन्न होता है उसको प्रमिति कहते हैं।

प्रत्यक्ष ज्ञान को अनुमान की सहायता की बहुत बड़ी आवश्यकता रहती है। जैसे एक वस्तु का पहला (=सामने का)भाग देखें तो हमको उस वस्तु का पूर्ण आकार समझ [नहीं] पड़ता है। वास्तव में यह विदित होता है कि उस वस्तु और उसके पिछले अवशिष्ट भाग का ज्ञान नहीं है। परन्तु विना अनुमान के यह नहीं हो सकता। फिर भी अगले भाग का एक देशी ज्ञान रहते हुए सम्पूर्ण भागों का ज्ञान अनुमान से हो जाता है।

कोई-कोई यह शंका किया करते हैं कि प्रमाण पहले या प्रमेय पहले? उत्तर यह है कि दोनों एक समय में होते हैं। इस पर यदि यह तर्कणा उठाई जावे कि दो वस्तुओं का ज्ञान एक वार जिसमें पैदा न हो यह ही मन की पहचान है१। फिर इसमें एक ही समय प्रमाण और प्रमेय का ज्ञान क्यों कर हो सकता है। तो इसका उत्तर यह है कि तर्कणा प्रमाण और प्रमेय पर नहीं हो सकती है, क्योंकि दूसरे के ज्ञान के लिए जो प्रमाण होता है [वह अपने ज्ञान की दृष्टि से प्रमेय भी होता है] इस तरह प्रमेय और प्रमाण का ज्ञान एक ही समय में हो जाता है। जैसे दीपक की तरफ देखो, तो वह दूसरी वस्तु का प्रमाण अर्थात् दिखाने वाला और स्वयं वह प्रमेय है; परन्तु दोनों बातें एक ही समय में हैं। सूर्य से प्रकाश होता है; परन्तु ऐसा नहीं होता कि सब वस्तुएं पहले ही से दिखाई देने लग जाएं और प्रमेय जो सूर्य है वह पीछे दिखाई देवे। दोनों एक वार ही दिखाई देते हैं।

अब गौतम के विचार के अनुसार एक सत्य ही धर्म है। गौतम ऋषि ने शास्त्रों पर विचार करने वाले हम नये लोगों का बड़ा उपकार किया है कि इस समय एक प्रकार का वाक्छल (धोखा)मच रहा है। इस वाक्छल की तारीफ (=लक्षण)गौतम ने भलीभांति की है—

अविशेषाभिहितेऽर्थे वक्त्रभिप्रायादर्थान्तरकल्पना वाक्छलम्१॥

अपना प्रयोजन प्राप्त करने के लिए बोलने वाले के प्रयोजन के विरुद्ध अर्थ की कल्पना करना वाक्छल है। इसका उदाहरण किसी ने इस प्रकार कहा है—

नवकम्बलोऽयं माणवकः।

इस वाक्य में जो शब्द ‘नव’ है इसके दो अर्थ हैं—एक नया और दूसरा नववां है। अपने अर्थ के अनुसार बोलने वाले के अर्थ के विरुद्ध जो अर्थ लिया जावे वह वाक्छल कहलावेगा। साधारण रीति पर नव शब्द का अर्थ नया होता है, इसलिए ९ अंक (=संख्या)का अर्थ सम्भव नहीं है। गौतम ऋषि ने जाति वा व्यक्ति और आकृति इन्हीं का भली-भांति विचार किया है। जाति का लक्षण यह है कि—

समानप्रसवात्मिका जातिः२।

इस सूत्र के अनुसार जाति शब्द का उच्चारण इस प्रकार होना चाहिए कि मनुष्य जाति, पशु जाति आदि। और जो जाति का अर्थ ‘प्रकार’ या ‘भेद’ करके एक ही वस्तु के भेद का किया जाता है उसको गौतम के सूत्र से कोई सहायता नहीं मिलती।

श्रवण, मनन, निदिध्यासन का विचार योगशास्त्र में किया है।

मीमांसाशास्त्र में धर्म और धर्मी के लक्षण कहे हैं।

कणाद ऋषि के वैशेषिकशास्त्र में द्रव्य और गुण का यथार्थ विचार किया है।

गौतम के शास्त्र में यह वर्णन किया है कि प्रमाण और प्रमेय पर क्योंकर विचार करना चाहिए।

इन तीनों मीमांसा, वैशेषिक और न्यायशास्त्रों ने मानो श्रवण, मनन के साधन का ही द्वार बताया है। अब श्रवण, मनन के आगे एक ही सीढ़ी है अर्थात् साक्षात्कार करना। इस विषय पर योगशास्त्र में वर्णन किया गया है कि चित्त की वृत्तियों का निरोध करने से और अविद्या की निवृत्ति से ज्ञान बढ़ता है। परन्तु यह निवृत्ति किस प्रकार की होनी चाहिए, इस पर विचार होते हुए विदित होता है कि सब बाहरी वस्तुओं का ज्ञान होते हुए भी मन बाहर खिंचा हुआ न रहे। बाहरी ज्ञान वर्तमान होते हुए अन्तर्मुख स्थिर रहना इसी का नाम निवृत्ति है। जैसे कोई एक नदी का बहाव बन्द कर देवे तो पानी पूर्णरूप से भर जाता है। इसी प्रकार बाहरी विषयों से चित्त को हटाने में स्वयं दृढ़ता उत्पन्न हो जाती है। यह योगशास्त्र का सिद्धान्त है कि—बाहरी विषयों में आसक्त न रहे। इसके लिए एकान्त स्थान में बैठकर समाधि लगाना चाहिए। कारण यह है कि एकान्त में बैठने से चित्त निवृत्त होता है। परन्तु नित्य प्रति एकान्त में ही रहना अच्छा नहीं है, क्योंकि मुख्य कर एकान्त में रहने से भी ज्ञान नहीं होता। सत्संग से ही ज्ञान प्राप्त होता है। योगशास्त्र का उपाय ईश्वर के साक्षात् करने पर है—

तदा द्रष्टुः स्वरूपेऽवस्थानम्१।

इसमें द्रष्टा से अभिप्राय ईश्वर है। योगी विभूति को शुद्ध करता है यह योगशास्त्र में लिखा है। अणिमा आदि विभूतियां हैं। ये योगी के चित्त में पैदा होती हैं। सांसारिक लोग जो यह मानते हैं कि ये योगी के शरीर में पैदा होती हैं, वह ठीक नहीं है। अणिमा का अर्थ यह है कि [योगी का चित्त] छोटी से छोटी वस्तु का विशेष सूक्ष्म होकर नापने वाला होता है। इसी प्रकार बड़े से बड़े पदार्थ को विशेषतर बड़ा होकर योगी का मन घेर लेता है, उसे गरिमा कहते हैं। ये मन के धर्म हैं, शरीर में इनकी शक्ति नहीं है। इस तरह पर श्रवण, मनन, निदिध्यासन, साक्षात्कार हो जाने से निस्सन्देह स्पष्ट ज्ञान प्राप्त हो जाता है।

महर्षि पतञ्जलिजी कहते हैं कि—

तत्र ध्यानजं ज्ञानमनाशयम्१। तत्र ऋतंभरो प्रज्ञः।२

अब योग के आठ अंग कहे गये हैं—१. यम, २. नियम, ३. आसन, ४. प्राणायाम, ५. प्रत्याहार, ६. धारणा, ७. ध्यान, ८. समाधि। यम पांच हैं—१. अहिंसा, २. सत्य, ३. अस्तेय, ४. ब्रह्मचर्य, ५. अपरिग्रह। इनका और नियमों का वर्णन पहले ही भली-भांति किया है।

स्थिरसुखमासनम्।३

यह आसन का लक्षण कहा है। आसन वही है कि जिसमें सुख से बैठकर ईश्वर से योग हो सके, तो फिर नये लोगों का यह कहना कि यह चौरासी आसनों वाला भानमती का तमाशा ठीक है, कैसे मान लिया जावे। इसी तरह पर प्राणायाम के विषय में तमाशा बन रहा है। प्राणायाम की यथार्थ प्रशंसा प्रथम ही वर्णन कर चुके हैं। नासिका और मुख बांधकर प्राणों की रुकावट करने से कुम्भक होता है, तो जो लोग फांसी पर चढ़ते हैं, उन्हीं को कुम्भक का ठीक साधक समझना चाहिए। यथार्थ स्वरूप कुम्भक का यह है कि वायु बाहर की बाहर रोक रखना। बाहर निकालने में विशेष उपाय करने से रेचक होता है। भीतर-के-भीतर प्राणों को रखने से पूरक होता है। यह प्राणायाम का विधान है।

अब हठ-योग का विधान वर्णन किया जाता है। हठ-योग में ‘बस्ति’ उसे कहते हैं कि गुदा के रास्ते से पानी चढ़ाकर सफाई करना। टकटकी लगाकर इस तरह देखने को कि जिसमें पलक न झपके ‘त्राटक’ कहते हैं। नासिका में सूत्र डाल कर मुख से निकालने को ‘नेति’ कहते हैं। मलमल का चार अंगुल चौड़ा १६ से लेकर ८० हाथ तक लम्बा कपड़ा मुख के रास्ते पेट में डालकर फिर बाहर निकालने को ‘धोती’ कहते हैं। यह बाजीगरी का खेल है। इनसे कब निवृत्ति पाकर योग प्राप्त कर सकते होंगे? यह हठवाले ही जानें। इन कामों से बीमारियाँ पैदा होती हैं।

अब प्राणायाम का विचार किया जाता है। प्राण अर्थात् श्वास और आयाम अर्थात् लम्बाई—तात्पर्य श्वास की लम्बाई को प्राणायाम कहते हैं। प्राणायाम का प्रयोजन है कि बहुत देर तक श्वास रोका जावे। बहुत समय तक प्राणायाम करने से चित्त एकाग्र हो जाता है। प्राणायाम का मुख्य काम यह है कि यदि योगशास्त्र के अनुकूल श्वास भीतर बाहर छोड़े तो शरीर की नीरोगता की उन्नति होती है।

ईश्वर में लौ लगाने को प्रत्याहार कहते हैं।

मुख्य-मुख्य स्थानों में चित्त को स्थिर करने का नाम धारणा है।

आत्मा, मन और इन्द्रियों को किसी वस्तु में लगाकर उस वस्तु पर मनन करने का नाम ध्यान है।

ईश्वर में लय होने का नाम समाधि है।

जब धारणा, ध्यान और समाधि तीनों एकत्र हो जावें, तो उसे संयम कहते हैं।

इसी प्रकार पतञ्जलि मुनि ने उपासना की युक्ति बतलाई है और मुक्ति के अनेक साधनों का यथार्थ वर्णन किया है। परमेश्वर में चित्त लगाने की शिक्षा करते हुए कहीं भी यह नहीं बतलाया गया कि मूर्तिपूजा भी कोई साधन है। इसलिए उपासना के वर्णन में कहीं भी मूर्तिपूजा का सहारा नहीं मिलता है।

अब यह देखना है कि सांख्यशास्त्र की प्रवृत्ति कैसे हुई। सांख्यशास्त्र का मूल मुख्यकर पदार्थों की गिनती करने के वास्ते है। सांख्य के कर्त्ता कपिलदेवजी कहते हैं—

न वयं षट्पदार्थवादिनो वैशेषिकादिवत्।१

मैं वैशेषिक आदि के अनुसार छः पदार्थों को मानने वाला नहीं हूं और फिर बहुत से विवाद के पीछे यह निश्चय करते हैं कि अवस्तु के अभाव से विवेक होता है। अब इस पर यह उत्तर ठहरता है कि इस सांख्यशास्त्र व अन्य शास्त्रों के साथ विरुद्ध नहीं तो क्या है? परन्तु यह विरुद्धता केवल बाह्यदृष्टि से ही विदित होती है किन्तु अन्त में सांख्यकर्ता उसी निर्णय को पहुँचता है जो कि अन्य शास्त्रकारों का सिद्धान्त है; क्योंकि सांख्यकर्ता अविवेक का चित्र खींचता है और अज्ञान, अविद्या भ्रम और अविवेक सब एक ही अर्थ में आते हैं।

अन्य देशों के नवीन विद्वान् लोग तत्त्व शब्द की तारीफ यह करते हैं कि जो मुफरद१ हो अर्थात् आर्य शास्त्रकारों को पञ्चभूत (अग्नि, पृथ्वी, जल, वायु, आकाश)मानने पर निषेध करते हैं; परन्तु यह दोष कदापि नहीं आ सकता; क्योंकि रूप, गन्ध, रस, स्पर्श और शब्द इन पांचों सिफ्तों२ के मौसूफो३ को जुदे जुदे नाम दिये गए हैं और वे ही पञ्चभूत कहलाते हैं। सांख्यशास्त्र में २५ पदार्थों का निरूपण किया गया है, जो कि इस शास्त्र के अवलोकन से विदित हो सकता है—

सत्त्वरजस्तमसां साम्यावस्था प्रकृतिः प्रकृतेर्महान् महतोऽ-हङ्कारोऽहङ्कारात् पञ्चतन्मात्राण्युभयमिन्द्रियं पञ्चतन्मात्रेभ्यः स्थूल-भूतानि पुरुष इति पञ्चविंशतिर्गणः॥

यास्काचार्य ने अलंकार शास्त्र बनाया है, जिस पर कि भाष्य भी हुए हैं अर्थात् विस्तार से लिखा है। इस आर्ष ग्रन्थ में गन्दे अधर्म की रीतियों पर रुचि को बढ़ाने वाले रस कुछ भी नहीं हैं। इसका मुकाबला नवीन अलंकार ग्रन्थों के साथ कीजिये, जिनमें गन्दापन, झूठ और शृंगार रस भरे पड़े हैं।

नालिङ्गिता प्रेमभरेण नारी वृथा गतं तस्य नरस्य जीवितम्।

अर्थात् जिस पुरुष ने प्रेम में मस्त होकर स्त्री को गले में नहीं लिपटाया उसका जन्म निष्फल हो गया और फिर इस तरह के बेढंगे अलंकार हैं जैसे—हे स्त्री! तेरा मुख चन्द्रमा के समान है इत्यादि। ऐसे दीवानापन के अलंकार में मग्न होकर क्या हो सकता है। किन्तु एक पत्नीव्रत करके जो पुरुष गृहस्थाश्रमी रहेंगे, वही ब्रह्मचर्य धारण करने के योग्य होंगे।

छठा दर्शन वेदान्त “उत्तरमीमांसा” है जिसके कर्त्ता व्यासजी हैं। उन्होंने ब्रह्म को कारण बतलाकर जगत् को कार्य कहा है और कार्य, कारण इन दोनों पदार्थों की जांच की है। व्यासजी ने पहले सृष्टि का वर्णन किया है। अनेक शास्त्रों में अनेक प्रकार के प्रलय वर्णन किये गये हैं अर्थात् वैशेषिक में अप्रमेय मण्डल तक, गौतम ने परमाणुओं तक और सांख्यकर्त्ता ने प्रकृति तक वर्णन किए हैं। परन्तु वेदान्त में महाप्रलय का वर्णन किया है। इस महाप्रलय में परमात्मा और उसकी सामर्थ्य ही स्थित रहती है। इस तरह इस दूरदृष्टि बुद्धि से देखा जावे तो छहों शास्त्र अपनी रीति पर वर्णन करते हैं। इनमें विरुद्धता किसी तरह की भी नहीं है।

अब मूर्त्तिपूजा (बुतपरस्ती)पर फिर किसी प्रकार विचार किया जाता है।

पारस्कर और आश्वलायन गृह्यसूत्रों में मूर्तिपूजा का नाम भी नहीं है और कल्पसूत्रों में भी मूर्तिपूजा का वर्णन नहीं है। इन ग्रन्थों पर परिशिष्ट रचे गए हैं। उनमें चाहे मूर्तिपूजा होवे। परिशिष्ट का स्पष्टार्थ क्या है? यह सब विद्वान् लोग जानते हैं। शास्त्रों की दृष्टि से मूर्तिपूजा सिद्ध नहीं होती है।

अब फिर इतिहास का कुछ वर्णन किया जाता है। राजा शन्तनु ने सत्यवती से विवाह किया, उससे दो पुत्र चित्राङ्गद और विचित्रवीर्य उत्पन्न हुए। तत्पश्चात् भीष्मपितामह काशी के राजा से तीन कन्यायें लाया। उनमें ंसे अम्बा का विवाह शाल्व से हुआ। अम्बिका और अम्बालिका दोनों ने विचित्रवीर्य के साथ विवाह किया। तब व्यास के साथ नियोग होने से पाण्डु, धृतराष्ट्र और दासी के पुत्र विदुर पैदा हुए। पांडु ने दो स्त्रियों के साथ विवाह किया, उनके नाम कुन्ती और माद्री थे। माद्री ईरान के राजा की पुत्री थी। धृतराष्ट्र की स्त्री गान्धारी कंधार की रहने वाली थी। उसका भाई शकुनि कन्धार का राजा था, दुर्योधन के साथ हस्तिनापुर में रहता था। कुन्ती और माद्री दोनों ने पुत्र के लिए नियोग किया था। उनमें धर्म [वायु और इन्द्र से नियोग करने पर युधिष्ठिर] भीम और अर्जुन उत्पन्न हुवे और इसी प्रकार अश्विनीकुमार से नियोग करने पर नकुल और सहदेव उत्पन्न हुए। इनमें [धर्म] इन्द्र, वायु से नाम समझना चाहिए। स्पष्ट विदित है कि वायु के संसर्ग से पुत्र उत्पन्न नहीं हो सकता है। धृतराष्ट्र के यहां कहा जाता है कि एक ही गर्भ से सौ पुत्र उत्पन्न हुए।

इन सब प्राचीन आर्य लोगों में स्वयंवर होता था अर्थात् कन्या स्वयं अपना वर पसन्द कर लेती थी। किन्तु इस समय के अनुसार विवाह नहीं होता था। मारवाड़ी लोगों ने इस पर और विशेषता की है कि वे पुत्र और पुत्री का उसी समय नाता कर देते हैं जबकि वे दोनों गर्भ में ही होते हैं। यह कैसी फजीहती की बात है। विवाह के समय पर धर्म, अर्थ और काम के परस्पर निर्वाह के लिए निर्णय होता है। वह निर्णय विना पुत्र और पुत्री वर्त्तमान हुए कैसे हो सकता है? प्राचीन आर्यों में यह दृढ़ रीति थी कि प्रत्येक मनुष्य विद्याभ्यास करे। जब तक कि विद्या के भूषण से भूषित नहीं होते थे तब तक पुरुष-स्त्री को विवाह करने की आज्ञा राजसभा से नहीं मिलती थी।

जनमेजय के राज्य तक चारों वर्णों का परस्पर में वर्ताव होता था और वे सामाजिक नियम, राज-सभा, धर्म-सभा, विद्या-सभा के प्रबन्ध में रीत्यनुसार चलते थे। यह बात कि चारों वर्णों का परस्पर में वर्ताव कैसा था, आप लोगों को महाभारत के राजसूय पर्व और अश्वमेध पर्व के देखने से विदित हो जावेगा। मनुजी ने कहा है प्राचीन समय में स्त्रियों और पुरुषों के हक बराबर थे। इस समय में तो सब प्रबन्ध ही उलटा हो गया है। अब घास का तिनका तोड़ने में देर लगती है, परन्तु हमारे धर्म टूटने में देर नहीं लगती है। चोटी में गांठ न देंगे, तो धर्म गया। अंगरखा लम्बा पहना गया, तो धर्म गया। खाने-पीने में तो बड़ा भारी बखेड़ा खड़ा हो गया है। इन खाने-पीने की वस्तुओं ने तो वीरों को कायर कर दिया और चौका लगाकर बैठे-बैठे अपनी सारी बड़ाई पर चौका लग गया। ्रप्राचीन समय में सब क्षत्रिय-राजा और ब्राह्मण ऋषि आदि एक ही सभा में भोजन किया करते थे। इस समय इस प्रकार की रीति सिक्खों में रणजीतसिंह के समय तक थी। कुरीतियों से कभी भी जन्म का फल पूरा नहीं होता है। ब्राह्मण लोग छूत-छात का ढोंग मचाते हैं। परन्तु वह ढोंग हींग, र्शं॑र आदि पदार्थ सेवन करते समय कहां जाता है। यदि यह कहो कि केवल दृष्ट का ही दोष होता है तो जो वस्तु दिखलाई न दे क्या उसका दोष नहीं है। क्या भूल से यदि भांग खा ली जावे तो नशा न करेगी?

बड़ी-बड़ी बिरादरियों के अन्दर बहुत-सी फिर्काबन्दियों के कारण बिरादरियों के सम्बन्ध में खर्च बहुत बढ़ता जाता है, चाहे कोई मरे, चाहे किसी का विवाह हो, गुजरात देश में दोनों मौकों पर बिरादरी को खिलाना पड़ता है। ऐसा खर्च किस काम आवेगा? एक का मरना और भूषंडों का पेट भरना, मरे हुए पुरुष के सम्बन्धी पुत्रादिकों को कर्ज में डुबाना, इससे बढ़कर दीवानापन और क्या हो सकता है? इन बिरादरियों के झगड़ों और अनेक कारणों से युद्ध में कैसी कैसी रुकावटें होती हैं। एक बात कहता हूँ सुनने के योग्य है। पंजाब के राजा रणजीतसिंह का हरिसिंह (नलवा)नामी एक सरदार था। उसने काबुल कन्धार पर चढ़ाई की और इन पर विजय पाकर निवास किया। मुसलमानों ने यह समझकर कि हिन्दू बैरी है इनका सामान जो आ रहा था, उसको रास्ते में रोक दिया। दोपहर के समय तक जब कुछ न मिला तो हरिसिंह ने सिपाहियों को आज्ञा दे दी कि मुसलमानों का कुल खाना इकट्ठा करो। यह आज्ञा पाकर सिक्खों की सेना ने धावा कर दिया और जो खाना कि मुसलमान लोगों ने अपने लिए तैयार किया था, वह सब लूट लाये और उसको हरिसिंह के पास ढेर लगा दिया और फिर हरिसिंह ने कहा कि सूवर का एक दांत ले आओ। वे दाँत ले आए। वह सूवर का दांत हरिसिंह ने उस भोजन के ढेर के चारों तरफ फेर दिया और सिपाहियों से कहा कि अब यह सारा अन्न शुद्ध हो गया। अब इसके खाने में हिन्दुओं को कुछ भी दोष नहीं है। ऐसा कहकर आपने भोजन किया, फिर सिपाहियों ने पेट भरकर अपने कष्ट को दूर किया। ऐ सुनने वालो! क्या चौके के बखेड़े में तुम अपना धर्म स्थिर रख सकते हो, इस पर विचार करो।

ओ३म् शान्तिः शान्तिः शान्तिः॥