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द्वादश उपदेश—इतिहास-विषयक

In Hindi:

महर्षि दयानन्द व्याख्या : द्वादश उपदेश

इतिहास

पूर्व व्याख्यानों से आर्य लोगों का इतिहास चित्रांगद और विचित्रवीर्य तक पहुंचाया गया था। प्राचीन आर्य लोग पूर्ण युवावस्था पर्यन्त ब्रह्मचर्य धारण करते थे, बाल-विवाह का उस समय कोई नाम तक नहीं जानता था; क्योंकि आर्य इतिहासों में प्रायः स्वयंवर का ही वर्णन आता है। विधवा-विवाह का प्रचार केवल शूद्रों में था। द्विजों अर्थात् ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्यों में नियोग का प्रचार था। विधवा-विवाह से जो लोग विरोध करते हैं, उनकी पुष्टि करके विधवा-विवाह का खण्डन करने की मेरी इच्छा नहीं है। पर यह अवश्य कहूँगा कि ईश्वर के समीप स्त्री-पुरुष दोनों बराबर हैं; क्योंकि वह न्यायकारी है, उसमें पक्षपात का लेश नहीं है। जब पुरुषों को पुनर्विवाह करने की आज्ञा दी जावे तो स्त्रियों को दूसरे विवाह से क्यों रोका जावे? प्राचीन आर्य लोग ज्ञानी, विचारशील और न्यायी होते थे। आज कल उनकी संतान अनार्य हो गई। पुरुष अपनी इच्छानुसार जितनी चाहे उतनी स्त्रियां कर सकता है। देश, काल, पात्र और शास्त्र का कोई बन्धन नहीं रहा। क्या यह अन्याय नहीं? क्या यह अधर्म नहीं?

प्राचीन आर्य लोगों में गार्गी, मैत्रेयी आदि कैसी-कैसी विदुषी स्त्रियां हो गई हैं। आजकल स्त्री को विद्या पढ़ने का अधिकार नहीं, वह शूद्र के समान है। यदि स्त्रियां पढ़ी-लिखी होतीं, तो इन पण्डितों की बड़बड़ाहट का खण्डन करके एक घड़ी में इनका मुंह बन्द कर देतीं। यदि इस समय हम लोगों में बाल-विवाह प्रचलित न होता तो विधवाओं की संख्या कभी इतनी न होती और न इतने गर्भपात और भ्रूण-हत्याएं होतीं और न इतनी रोगों की अधिकता होती। प्राचीन समय में यदि कोई धनाढ्य पुरुष निःसन्तान होता, तो आर्यसभा की व्यवस्था से उसका दायाद वारिस नियत होता था। विधवा स्त्री होती, तो उसको नियोग की आज्ञा दी जाती थी और प्रायः विधवायें ब्रह्मचर्य का पालन करती थीं। ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य वर्णों में प्रायः नियोग से निर्वाह होता था। यहाँ कोई यह प्रश्न करेंगे कि नियोग और पुनर्विवाह में क्या अन्तर है? इसका उत्तर यह है कि पुनर्विवाह से स्त्री-पुरुष का सम्बन्ध जन्म भर के लिए होता है और जो सन्तान उत्पन्न होती हैं वे द्वितीय पति की समझी जाती हैं। विपरीत इसके नियोग का सम्बन्ध एक या दो सन्तान उत्पन्न होने तक रहता है, इसके बाद स्त्री-पुरुषों का परस्पर कुछ भी सम्बन्ध नहीं रहता। वे एक या दो सन्तान पूर्व-पति के ही समझे जाते हैं और उसी का नाम चलाते हैं। आर्य लोगों में विधवा-विवाह की अपेक्षा नियोग अच्छा है। क्योंकि यदि विधवा-विवाह की आज्ञा मिल जावे, तो स्त्रियां अपने पतियों को विष देकर मारना आरम्भ कर दें और यदि पहले पति की जायदाद लेकर विधवा स्त्री दूसरा पति कर लेगी तो उसमें और उसके पूर्व पति के सम्बन्धियों में बहुत-से बखेड़े उठेंगे। जिस विधवा का विवाह होता था, वह शूद्रों में गिनी जाती थी।

विवाह में परस्पर स्त्री-पुरुषों की यह प्रतिज्ञा होती है कि दोनों के मन-चित्त आदि एक होंगे और वे कभी एक दूसरे के विरुद्ध कोई काम न करेंगे। बचपन में विवाह होने से भला लड़का-लड़की इन बातों को क्या जान सकते हैं और इन मन्त्रों का अर्थ करके कोई समझाता भी नहीं है। पण्डित लोग कहते हैं कि केवल मन्त्र के सुनने से पुण्य होता है, चाहे मन्त्र बोलने वाला उसका अर्थ समझे या न समझे। ब्राह्मण को दक्षिणा दे दी कि सब विधान ठीक-ठीक हो गया। वाह रे! तुम्हारा सामाजिक प्रबन्ध। इस अन्ध परम्परा को देखकर तो मानना पड़ता है कि इससे विधवा-विवाह सब प्रकार अच्छा है।

यह बात कि “पहले तीन वर्णों में नियोग और शूद्रों में विधवा-विवाह” प्राचीन आर्य लोगों के विरुद्ध नहीं है। इसकी पुष्टि में ऋग्वेद मण्डल १० सूक्त ४० का मन्त्र २ देखने योग्य है।

प्राचीन समय में गृहस्थ लोग अपनी स्त्रियों को अपने साथ रखा करते थे। यही विषय इस मन्त्र में वर्णन किया गया है। कोई-कोई पण्डित उस मन्त्र में “देवर” शब्द के अर्थ पति के छोटे भाई से करते हैं। यह ठीक नहीं, क्योंकि निरुक्त में दूसरे पति का नाम देवर बतलाया है१। इसी सम्बन्ध में ऋग्वेद मण्डल १० सूक्त १८ का मन्त्र ८ भी द्रष्टव्य है२। इसी प्रसंग में एक बात और विज्ञापनीय है। वह यह है कि किन्हीं विशेष दशाओं में पति के जीते जी भी नियोग की आज्ञा मिलती थी।१ नियोग १० वार [तक] करने की आज्ञा थी इसमें ऋग्वेद मण्डल १० सूक्त ८५ के मन्त्र ४५ का प्रमाण है।२ ऋग्वेद के इसी मण्डल के इसी सूक्त के मन्त्र ४५ का अर्थ भी आजकल के पण्डित मनमाना करते हैं जो कि मानने योग्य नहीं।

महाभारत में लिखा है कि व्यासजी ने विचित्रवीर्य की दोनों विधवा-स्त्रियों से नियोग किया था। मनुजी ने भी नियोग की आज्ञा दी है। प्राचीन आर्यलोगों में पति के जीते भी नियोग होता था, इसकी पुष्टि में महाभारत में लिखे हुए बहुत से उदाहरण दिये जा सकते हैं। व्यासजी बड़े पण्डित और धर्मात्मा थे, उन्होंने विचित्रवीर्य की स्त्रियों से नियोग किया और इनमें से एक के गर्भ से धृतराष्ट्र और दूसरी की कुक्षि से पाण्डु उत्पन्न हुए और यह पहले ही वर्णन हो चुका है कि पाण्डु की विद्यमानता में ही उसकी स्त्री ने दूसरे पुरुषों के साथ नियोग किया था। इस प्रकार नियोग का उस समय प्रचार था। पुनर्विवाह की अधिक आवश्यकता ही नहीं होती थी। अब इस समय के नियोग और पुनर्विवाह दोनों के बन्द होने से आजकल के आर्य लोगों में जो-जो भ्रष्टचार फैला हुआ है, वह आप लोग देख ही रहे हैं। हजारों गर्भ गिराये जाते हैं, भ्रूणहत्याएँ होती हैं। एक गर्भ गिराने से एक ब्रह्म-हत्या का पाप होता है। सोचो कि इस देश में कितनी ब्रह्महत्यायें प्रतिदिन होती हैं? क्या कोई उनकी गणना कर सकता है? इन सब पापों का बोझ हमारे सिर पर है।

देखो! प्राचीन सामाजिक प्रबन्ध के बिगड़ने से हमारे देश की दुर्दशा हो रही है। वेद-मार्ग को एक तरफ ढकेलकर पुष्टि-मार्ग चमक रहा है। महन्तों और साधुओं के राजसी ठाठ लगे हुए हैं। देवालयों, मठों और मन्दिरों में पाप की भरमार हो रही है। न जाने कितने गर्भ गिराये जाते होंगे। यह पाप, दुराचार और अनर्थ का समय बन रहा है। जब तक स्वार्थी और लम्पट लोग लोकाचार की लीक बनते रहेंगे और साधारण लोग अन्धपरम्परा से उस पर चलते रहेंगे, तब तक देश का कल्याण नहीं हो सकता। धर्म के विषय में लोग परम्परा की बड़ी प्रतिष्ठा करते हैं, परन्तु क्या सांसारिक विषयों में भी ऐसा ही है? क्या यदि बाप दरिद्र हो, तो परम्परा के अभिमान से बेटा भी दरिद्र होगा? यदि बाप अन्धा हो तो क्या बेटे को भी परम्परा के लिए आँखें फोड़ लेनी चाहिएँ।

वेदबाह्य रीतियों को हमें परम्परा की पदवी कभी नहीं देनी चाहिए। सदुपदेशपूर्ण वेदों और आर्ष ग्रन्थों में जिस सच्ची परम्परा का विधान किया गया है, उसका पालन करना चाहिए। अस्तु, अब फिर इतिहास का वर्णन किया जाता है।

राजा धृतराष्ट्र स्वभाव से ही कपटी था और पाण्डु धर्मात्मा था। पाण्डु की एक रानी माद्री सती हो गई थी। सती होने के लिए वेद की आज्ञा नहीं है; किन्तु सती होने की कुरीति पहले-पहल पाण्डु राजा के समय से चली। कौरव और पाण्डवों ने उत्तम शिक्षा प्राप्त की। धृतराष्ट्र ने अपने और पाण्डु के पुत्रों को द्रोणाचार्य और कृपाचार्य के सुुपुर्द कर दिया। उस समय ब्राह्मण लोग युद्ध-विद्या में भी आचार्य होते थे। अर्जुन ने धनुर्वेद में सबसे अधिक अभ्यास किया। इसलिए युद्ध-विद्या में उसकी बड़ी ख्याति हो गई। अर्जुन का समकक्ष कौरवों में केवल कर्ण ही था। पर कर्ण सूतपुत्र अर्थात् सारथि का बेटा था। इसलिए अर्जुन ने कर्ण की अवज्ञा की थी, परन्तु इस अवज्ञा से लाभ उठाने के लिए दुर्योधन ने कर्ण को बंगाल का राज्य देकर उसे क्षत्रिय वर्ण का अधिकार दे दिया था। इस प्रकार अनुचित अभिमान से इस राजकुल में द्वेष से आग भड़की। इसी द्वेष से अपने आर्यावर्त्त की सारी दुर्दशा हुई। यह वर्णन करने के योग्य नहीं।

उस समय धृतराष्ट्र के पास एक नीच, छिछोरा, कामुक कनक नाम एक शास्त्री रहता था। उसने पाण्डवों के विरुद्ध बहुत-सी बातें कहकर धृतराष्ट्र का मन उनसे फेर दिया। फिर इसी दुष्ट शास्त्री की सलाह से पाण्डवों को भस्म करने के लिए एक ‘लाख’ का घर बनाया गया। राज-सभा का प्रबन्ध तो पहले ही बिगड़ चुका था। उस पर शकुनि, दुःशासन, दुर्योधन और कनक शास्त्री की चाण्डाल-चौकड़ी जम गई। इस चाण्डाल-चौकड़ी की करतूत से राज्य की जैसी दुर्दशा हुई और उसका जैसा भयानक परिणाम हुआ, उसका सविस्तार वृत्तान्त महाभारत में विद्यमान है।

विदुर को दुर्योधन की चाण्डाल-चौकड़ी के मनसूबे मालूम थे। ‘लाख’ के घर का भेद विदुर ने युधिष्ठिर को बर्बर देश की भाषा में बतला दिया था। वह भाषा धर्मराज (युधिष्ठिर)को आती थी, जिसके कारण पाण्डव ‘लाख’ के घर में जलने से बच गए थे।

देखो विदुर, युधिष्ठिर, भीष्म आदि बहुत-सी भाषाओं के जानने वाले थे। वे पश्चिम की बहुत-सी भाषाओं को बोल सकते थे। आजकल के शास्त्री महाराजों से यदि कहो कि यावनी और म्लेच्छ भाषा सीखने में कोई दोष नहीं, तो वे कहने लगते हैं—

न वदेद् यावनीं भाषां प्राणैः कण्ठगतैरपि।

हस्तिना ताड्यमानोऽपि न गच्छेज्जैनमन्दिरम्॥

यदि प्राण गले तक आ जायें अर्थात् मृत्यु-का समय तक क्यों न आ जावे; परन्तु यावनी भाषा को नहीं बोलना चाहिए और मत्त हाथी भी सामने से आता हो, तो जैनमन्दिर में कदापि आश्रय न लेवे।

अर्जुन की मत्स्यवेध विद्या में बड़ी प्रशंसा की जाती है, परन्तु यह बात मत समझो कि हमारे देश में अब ऐसे योग्य शूर पुरुष रहे ही नहीं। हमने स्वयं राजपूत लोगों को मत्स्यवेध से अधिकतर कठिन काम करते हुए देखा है।

कर्ण का जो पाण्डवों ने अपमान किया था, इसलिए वह द्रौपदी से छल करने पर उद्यत हुआ—यह कथा सब जानते हैं। राज-सभा ने यह निर्णय किया कि राजा युधिष्ठिर होना चाहिए, परन्तु धृतराष्ट्र ने अत्याचार से [अधिकार] छीन लिया था। इसके पश्चात् जो-जो कष्ट पाण्डवों को झेलने पड़े, उनको सब जानते हैं। फिर जब पाण्डवों का भाग्योदय हुआ, तब उन्होंने राजसूय यज्ञ रचा। मय नामक एक बड़ा शिल्पी था, उसने एक विचित्र सभा बनाई। (प्राचीन आर्य लोगों की शिल्प-विद्या का इतिहास सुनने योग्य है)इस राजसूय यज्ञ में सहस्रों मनुष्य आये थे। मय ने ऐसी रचना चातुरी की थी कि स्थल में जल का सन्देह होता था। दुर्योधन ने इसे सचमुच जल समझ कर अपने कपड़े उठाकर समेट लिए। यह देखकर भीमसेन मुस्कराया और अक्खड़पन से कह दिया कि अन्धे१ के अन्धा ही पैदा हुआ। दुर्योधन खिसियाना हुआ और कनक शास्त्री ने बात का बतंगड़ बनाकर उसे और भी भड़का दिया। उस समय अर्जुन और कृष्ण ने दुर्योधन को समझा-बुझा दिया। तदनन्तर एक बड़ा भोज हुआ, जिसमें ऋषि-मुनि, ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र सबने एक पंक्ति में बैठकर भोजन किया।

इसके बाद छल से द्यूतक्रीड़ा में युधिष्ठिर आदि को फंसाकर वनवास और अज्ञातवास दिया गया। विराट् राजा के नगर में रहते हुये अर्जुन ने विराट् राजा की कन्या उत्तरा नाम्नी को नृत्यकला की शिक्षा दी थी। इससे प्रकट है कि प्राचीन समय में राजकुमारियां भी गान-विद्या और नृत्य-कला सीखती थीं। चक्रवर्ती राज्य का नाश उस समय तक नहीं होता, जब तक कि आपस में फूट न हो। कुरु-वंश में फूट पैदा हो गई और स्वार्थ और विद्रोह बुद्धि ने लोगों को अन्धा बना दिया। इसके लिए एक ही उदाहरण पर्याप्त है। भीष्म जैसे विद्वान् और धर्मवादी पुरुष पक्षपात के रोग से ग्रस्त हो गए। उनको उचित तो यह था कि वे मध्यस्थ होकर दोनों पक्षों का न्याय करते और अपराधियों और अन्यायियों को दण्ड दिलाते। ऐसा न करके उन्होंने अन्यायियों का पक्ष करके कुरु-वंश का नाश होने दिया। देखिए भीष्म क्या कहता है—

अर्थस्य पुरुषो दासो दासस्त्वर्थो न कस्यचित्।

इति मत्वा महाराज! बद्धोऽस्म्यर्थेन कौरवैः॥

“धन का मनुष्य दास है, धन किसी का दास नहीं। ऐसा मानकर मैं स्वार्थ में बंधा हुआ कौरवों के पक्ष में हूँ।”

इस प्रकार बुद्धि भ्रष्ट होने से और द्वेष बढ़ने से भीष्म, द्रोण और दुर्योधन आदि कौरव एक तरफ हुए और पाण्डव दूसरी तरफ हुए और बड़ा भारी युद्ध हुआ। इस युद्ध में तीन मनुष्य कौरवों की ओर के अर्थात् १. कृपाचार्य, २. कृतवर्मा, ३. अश्वत्थामा और ६ पाण्डवों की ओर से अर्थात् ५ पाण्डव और छठे कृष्ण जीवित रहे थे, शेष सबका नाश हो गया। इस युद्ध से प्राचीन आर्य लोगों का वैभव सदा के लिए अस्त हो गया।

इस सब अनर्थ का कारण केवल यह था कि सम्मति देने का काम नीच और क्षुद्र लोगों को सौंपा गया था। ऐसे अयोग्य जन नेता परामर्श देने वाले बन गए। जहां शकुनि जैसे संकीर्ण हृदय और क्षुद्रमनस्क जन की सम्मति से राज्य-कार्य चलने लगे; कनक शास्त्री महाराज धर्माधर्म का निर्णय करने लगे; वहां यदि घर में फूट उत्पन्न होकर घरवालों का विनाश हो, तो आश्चर्य ही क्या है!

इसी प्रकार जिस देश में केवल सचाई के अभिमान से मार्टिन लूथर जैसे उदारचेता पुरुषों ने सामयिक लोगों के विरुद्ध होते हुए भी पोप के अत्याचार के विरुद्ध उपदेश देना आरम्भ कर दिया और अपने प्राण तक न्यौछावर करने के लिए उद्यत हो गए; उस देश में यदि ऐश्वर्य और अभ्युदय का डंका बजा, तो कोई आश्चर्य की बात नहीं है।

इसी रीति पर कुरु-कुल का तो नाश हो गया। अब कृष्णजी द्वारिका में राज्य करते थे, वहां उस समय यादवों ने बड़ी उन्नति की थी। दुर्भाग्य से इनमें भी प्रमाद और विषयासक्ति के कारण आपस में फूट पड़ गई, जिससे सब लड़-मरकर अल्प काल में ही यादव कुल का नाश हो गया।

श्रोताओ! प्रमाद का फल देखिये, बलदेव मद्य पीने लगा और डूबकर मर गया। सात्यकि सांप से लड़ा। ऐसे मूर्खता के काम जहां होने लगें वहां श्रीकृष्ण जैसे सत्पुरुषों की बात कौन सुनें? इन प्राचीन आर्यों के युद्ध के पश्चात् केवल इनकी स्त्रियां ही शेष रह गई थीं।

इनमें अभिमन्यु का पुत्र एक परिक्षित भी बचा था, वह कुछ विक्षिप्त-सा था, उसके समझ में आर्ष ग्रन्थ नहीं आते थे। इसी कारण उसके समय में कुछ-कुछ पुराणों का प्रचार हो चला था। उसका पुत्र जनमेजय हुआ और उसके पीछे वज्रनाथ ने राज्य किया। इतने समय में सम्पूर्ण वैभव का नाश हो गया। राज-सभा, धर्मसभा और विद्यासभा तीनों डूब गईं। केवल एक राजा की इच्छानुसार सब राज्य-कार्य होने लगा। विद्वान् और सच्चरित्रों को, जो विधि-निषेध की मीमांसा और व्यवस्था करने का अधिकार था, वह दूर हो गया। व्यास, जैमिनि और वैशम्पायन आदि महर्षि न रहे। चक्रवर्ती राज्य नष्ट होकर यत्र-तत्र माण्डलिक राज्य स्थापित हो गए। ब्राह्मण लोगों में विद्या की कमी होती गई और अभिमान बढ़ता गया।

ब्रह्मवाक्यं प्रमाणम्। ब्राह्मणास्तु भूदेवाः।

इस प्रकार की उलटी समझ लोगों में फैल गई, जिससे मनुष्य अन्धपरम्परा के दास बन गए और भी देखिये, ब्राह्मणों की लीला—

पृथिव्यां यानि तीर्थानि तानि सर्वाणि सागरे।

सागरे यानि तीर्थानि पदे विप्रस्य दक्षिणे॥

पृथिवी में जितने तीर्थ हैं, वे सब समुद्र में आ जाते हैं और समुद्र में जितने तीर्थ हैं, वे सब ब्राह्मण के दाहिने पैर में हैं।

ऐसे लोगों के जाल में भोले-भाले लोग फंस गए। जब देखा कि हमारा मन्त्र चल गया और सब लोग हमारी आज्ञा को मानते हैं; तब इन्होंने अनेक प्रकार के व्रत, उपवास, उद्यापन, श्राद्ध और मूर्तिपूजा आदि वेद-विरुद्ध कर्मों में लोगों को चलाना प्रारम्भ कर दिया, जिससे अनायास अपनी आजीविका चल सके। सर्वसाधारण ब्राह्मणों से विमुख न हो जावें, इसलिए ऐसे-ऐसे श्लोक गढ़े गए।

अविद्वाँश्चैव विद्वाँश्च ब्राह्मणं दैवतं महत्।

प्रणीतश्चाप्रणीतश्च यथाग्निर्दैवतं महत्॥

श्मशाने ष्वपि तेजस्वी पावको नैव दुष्यति।

हूयमानश्च यज्ञेषु भूय एवाभिवर्द्धते॥१

अग्नि के दृष्टान्त से प्रकट किया है कि ब्राह्मण चाहे विद्वान् हो या मूर्ख वह साक्षात् देवता है। प्राचीन ग्रन्थों में इस प्रकार के बनावटी श्लोक डालकर और नवीन रचनायें करके ब्राह्मणों ने अपनी शक्ति बढ़ाई और मन्वादि स्मृतियों में भी अपने महत्त्व के वाक्य मिला दिए। यथा—

एवं यद्यप्यनिष्टेषु वर्त्तन्ते सर्वकर्मसु।

सर्वथा ब्राह्मणाः पूज्याः परमं दैवतं हि तत्॥२

यदि दुष्टाचारण वाले ब्राह्मण की कोई निन्दा करता, तो उसको ब्रह्मविरोधी कहकर उसकी हड्डी-हड्डी निकाल लेते थे। निदान ब्राह्मणों को सब प्रकार के दण्ड और शासन से मुक्त कर देने के कारण सारी बुराइयां इन्हीं में घर कर गईं। सदाचार विलुप्त हो गया। धूर्त्तता और अत्याचार बढ़ गया। मूर्खता ने देश में अपना डेरा-डण्डा जमा दिया। जब देश की ऐसी दुर्दशा हुई, तब गाजीपुर नगर में एक राजा के पुत्र उत्पन्न हुआ (जो पीछे जाकर बुद्ध बना)उसने वेदों की निन्दा करके ब्राह्मणों के अत्याचार से दूसरे लोगों को मुक्ति दिलाने का प्रयत्न किया। इसके उपदेश से लाखों मनुष्य बौद्ध-धर्मानुयायी हो गए। बुद्ध और उसके पश्चात् जैनमत के फैल जाने से और निरीश्वरवाद बढ़ गया। ईश्वर की पूजा के स्थान में मूर्त्तिपूजा प्रचलित हुई। बौद्ध और जैनमत में ईश्वर को नहीं मानते, किन्तु वे उन सिद्धों और तीर्थंकरों की भक्ति वा उपासना करना सिखलाते हैं, जो उनकी दृष्टि में महात्मा वा सत्पुरुष हुए हैं। यही कारण है कि बौद्ध वा जैन लोग अपने तीर्थंकरों की मूर्तियां बनाकर रखते हैं। पहले पारसनाथ आदि तीर्थंकरों की मूर्तियां बनाकर जैनों ने उनका पूजन आरम्भ किया, फिर उनको देखा-देखी पौराणिक लोग भी अपने इष्ट देवों की मूर्तियाँ बनाने लगे। इस प्रकार वेदों का आत्मवाद और एक ईश्वर की पूजा इस देश से उठ गई। लोग मन्दिरों में जाकर मूर्तियों की उपासना करने और इसी को धर्म का मुख्य अंग मानने लगे। जैनी लोगों में कुछ सहिष्णुता पाई जाती है, परन्तु इन्होंने वेद-मार्ग को विध्वंस करने के लिए कोई उपाय उठा न रखा। वेदों पर बड़े-बड़े आक्षेप किए। “वेद में अश्लील गाथायें हैं, वेद में हिंसा है, वेद में बहुदेववाद है और वेद में अधिकतर ब्राह्मणों का और कुछ-कुछ क्षत्रिय, वैश्यों का पक्षपात किया गया है।” इत्यादि आक्षेप किए। इनके विरोध और खण्डन से वर्णाश्रम व्यवस्था को बहुत कुछ हानि पहुँची। यहीं तक सन्तोष नहीं किया, किन्तु जैनियों ने बहुत-से वैदिक ग्रन्थ जलाकर भस्मसात् कर दिए।

इनके पश्चात् श्रीयुत गौड़पादाचार्य के प्रसिद्ध शिष्य स्वामी शंकराचार्यजी प्रादुर्भूत हुए। शंकर स्वामी वेद-मार्ग और वर्णाश्रम धर्म के मानने वाले थे। उनकी योग्यता कैसी उच्च कक्षा की थी, यह उनके बनाये शारीरक भाष्य से विदित होता है। शंकर स्वामी के समय में जो अनेक पाखण्ड मत चले थे और जिनका कि उन्होंने खण्डन किया है, वह शंकर-दिग्विजय के निम्नलिखित श्लोक से प्रकट होते हैं—

शाक्तैः पशुपतैरपि क्षपणकैः कापालिकैर्वैष्णवै-

रन्यैरप्यखिलैः खलु खलैर्दुर्वादिभिर्वैदिकम्॥

इससे अनुमान किया जा सकता है कि श्रीमान् स्वामी शंकराचार्य ने वेद-विरुद्ध मतों के खण्डन में कितना उद्योग किया है।

ओ३म् शान्तिः शान्तिः शान्तिः॥