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वृत्तयः पञ्चतय्यः क्लिष्टाऽक्लिष्टाः॥५॥

In Hindi:

पदपाठ : वृत्तयः पञ्चतय्यः क्लिष्टाऽक्लिष्टाः॥

संस्कृत में सूत्र की भूमिका : ताः पुनर्निरोद्धव्या बहुत्वे सति चित्तस्य—

भूमिका हिंदी अर्थ : (ताः) वृत्तियों का (बहुत्वे सति) बहुत्व = आधिक्य होने पर भी वे (पुनः निरोद्धव्या) निरोध करने योग्य हैं। (चित्तस्य) चित्त की —

हिंदी में अर्थ : (वृत्तयः) वृत्तियाँ (पञ्चतय्यः) पाँच प्रकार की है; तथा ये (क्लिष्टाऽक्लिष्टाः) क्लिष्ट = क्लेश सहित और अक्लिष्ट = क्लेश रहित होती हैं॥

महर्षि दयानन्द व्याख्या : (वृत्तयः) अर्थात् सब जीवों के मन में पांच प्रकार की वृत्ति उत्पन्न होती है, उसके दो भेद हैं। एक क्लिष्ट, दूसरी अक्लिष्ट अर्थात् क्लेशसहित और क्लेशरहित। उनमें से जिनकी वृत्ति विषयासक्त परमेश्वर की उपासना से विमुख होती है, उनकी वृत्ति अविद्यादि क्लेश-सहित और जो पूर्वोक्त उपासक हैं, उनकी क्लेश-रहित शान्त होती है॥ (ऋ० भू॰ उपासनाविषय)

प्राचीन ॠषि भाष्य : क्लेशहेतुकाः कर्माशयप्रचये क्षेत्रीभूताः क्लिष्टाः। ख्यातिविषया गुणाधिकारविरोधिन्योऽक्लिष्टाः। क्लिष्टप्रवाहपतिता अप्यक्लिष्टाः। क्लिष्टच्छिद्रेष्वप्यक्लिष्टा भवन्ति। अक्लिष्टच्छिद्रेषु क्लिष्टा इति।

तथाजातीयकाः संस्कारा वृत्तिभिरेव क्रियन्ते संस्कारैश्च वृत्तय इति। एवं वृत्तिसंस्कारचक्रमनिशमावर्त्तते। तदेवम्भूतं चित्तमवसिताधिकारमात्मकल्पेन व्यवतिष्ठते प्रलयं वा गच्छतीति॥

प्राचीन ॠषि भाष्य हिन्दी अर्थ : (क्लेशहेतुकाः) अविद्या आदि क्लेश हेतु = कारण है जिनके अर्थात् अविद्या आदि क्लेशों से उत्पन्न होने वाली, तथा (कर्माशयप्रचये) कर्माशय = धर्म-अधर्म रूप कर्म सम्बन्धी वासनाओं = कर्मसंस्कारों की उत्पत्ति में (क्षेत्रीभूताः) क्षेत्रीभूत = खेत बनी हुई चित्त की वृत्तियाँ (क्लिष्टाः) क्लिष्ट कहलाती हैं। और (ख्यातिविषया) सत्त्वपुरुषान्यताख्याति = चित्त और पुरुष का अलग-अलग बोध कराने वाली, अर्थात् प्रकृति-पुरुष के भेद का विवेक कराने वाली, तथा (गुणाधिकारविरोधिन्यः) सत्त्व, रज और तम गुणों के कार्य परिणाम का विरोध करने वाली वृत्तियाँ (अक्लिष्टाः) अक्लिष्ट हैं।

(क्लिष्टप्रवाहपतिता) क्लिष्ट वृत्तियों के प्रवाह = निरन्तर व्यापार में से गिरी हुई = निकली हुई (अपि) भी (अक्लिष्टाः) अक्लिष्ट वृत्तियाँ हुआ करती हैं और अक्लिष्ट ही रहती हैं। (क्लिष्टः) क्लिष्ट वृत्तियों के (छिद्रेषु अपि) छिद्रों में = दोष दर्शन के कारण से बहती हुई भी (अक्लिष्टाः भवन्ति) अक्लिष्ट वृत्तियाँ उत्पन्न हुआ करती हैं। इसी प्रकार (अक्लिष्टः छिद्रेषु) अक्लिष्ट वृत्तियों के व्यापार के मध्य में आने वाले छिद्र = क्षुद्र द्वारों = विक्षेपों के कारण से (क्लिष्टाः इति) क्लिष्ट वृत्तियाँ उत्पन्न हो जाती हैं।

(तथाजातीयकाः) अक्लिष्ट अथवा क्लिष्ट प्रकार के (संस्काराः) संस्कार (वृत्तिभिः एव) उसी प्रकार की वृत्तियों के द्वारा ही (क्रियन्ते) उत्पन्न होते हैं = उत्पन्न किए जाते हैं; (च) और (संस्कारैः) उन संस्कारों के द्वारा (वृत्तयः इति) उसी प्रकार की क्लिष्ट और अक्लिष्ट वृत्तियाँ उत्पन्न होती हैं। (एवं) इस प्रकार (वृत्तिसंस्कारचक्रम्) वृत्ति-संस्कार रूप चक्र (अनिशम्) निरन्तर (आवर्त्तते) चलता रहता है। तब वृत्ति निरोध होने पर (तत् एवम् भूतम्) इस प्रकार का वृत्ति-संस्कार चक्र वाला (चित्तम्) चित्त (अवसिताधिकारम्) कृत कार्य हुआ = सत्त्व, रज और तम गुणों के परिणामों से रहित हुआ (आत्मकल्पेन) आत्मा के समान पवित्र (व्यवतिष्ठते) होकर रहता है (वा) तथा (शरीर छूटने पर) (प्रलयम् गच्छति इति) अपने कारण प्रकृति में विलीन हो जाता है।

वैदिक वृत्ति : योग का अर्थ चित्तवृत्ति निरोध किया गया है। महर्षि व्यास ने योगसूत्र १.४ के भाष्य में चित्त वृत्तियों के बोध का कारण, पुरुष का बुद्धि के साथ अनादि सम्बन्ध कहा है। ये चित्त वृत्तियाँ संख्या में बहुल = अनन्त होने पर भी निरोध करने योग्य हैं। अतः, चित्त वृत्तियाँ कैसी और किस प्रकार की हैं ? इस विषय में सूत्रकार कहते हैं कि वृत्तियाँ पाँच प्रकार की हैं; परन्तु भोग और अपवर्ग को प्राप्त कराने के दृष्टिकोण से ये दो प्रकार की हैं — क्लिष्ट = क्लेश सहित तथा अक्लिष्ट = क्लेश रहित। वृत्तियों के पाँच प्रकारों की व्याख्या तो सूत्रकार ने आगे की है, अतः महर्षि व्यास यहाँ वृत्तियों के क्लिष्ट-अक्लिष्ट प्रकार की व्याख्या मुख्य रूप से कर रहे हैं।

क्लिष्ट वृत्ति :— जो वृत्ति अविद्या, अस्मिता, राग, द्वेष और अभिनिवेश रूप क्लेशों के कारण से उत्पन्न हुई हो, तथा धर्म-अधर्म रूप कर्म वासनाओं और संस्कारों को उत्पन्न करती हो, वह क्लिष्ट वृत्ति है। इस तथ्य को भोज ने इस प्रकार से कहा है — अविद्या आदि क्लेशों से आक्रान्त हुई = बलवान् हुई वृत्तियाँ क्लिष्ट होती हैं। अतः महर्षि व्यास की भावना के अनुकूल महर्षि दयानन्द ने क्लिष्ट वृत्ति का अर्थ क्लेश-सहित किया है। इन वृत्तियों के कारण पुरुष अधर्म, अज्ञान, अवैराग्य आदि से ग्रस्त हो कर्म के बन्धनों में जकड़ा जाता हुआ, परमपिता परमात्मा से विमुख रहता है।

अक्लिष्ट वृत्ति :— जो वृत्ति प्रकृति-पुरुष के भेद ज्ञान को उत्पन्न करने वाली हो, तथा प्रकृति के सत्त्व, रज और तम गुणों के कार्यों का विरोध करने वाली = उन्हें रोकने वाली हो, वह वृत्ति अक्लिष्ट कहलाती है। अक्लिष्ट वृत्तियाँ क्लिष्ट वृत्तियों से सर्वथा विपरीत होती हैं अर्थात् अविद्या आदि क्लेश इनके कारण नहीं होते। क्लिष्ट वृत्तियों से पुरुष कर्म के बन्धनों में जकड़ा जाता है, उसके विपरीत अक्लिष्ट वृत्तियों में सत्त्वादि गुणों के अधिकार का भी नाश होने से, पुरुष का कर्म के बन्धनों से भी छूटना होता है। अतः महर्षि दयानन्द ने इन्हें क्लेश-रहित कहा है।

इस प्रकार क्लिष्ट वृत्तियाँ कर्मसंस्कारों और वासनाओं को उत्पन्न करने वाली, जबकि अक्लिष्ट वृत्तियाँ ख्यातिविषयक तथा गुणाधिकार विरोधी होती हैं।

कभी-कभी क्लिष्ट वृत्तियों के प्रवाह में से भी अक्लिष्ट वृत्तियाँ उत्पन्न होती हैं। जैसे, अविद्यादि दोषों के कारण किये जाने वाले पाप कर्मों में निमग्न पुरुष, उनके दोष दर्शन से अथवा किसी आकस्मिक घटना के परिणामस्वरूप, उन पाप कर्मों से ग्लानि होने पर, विरक्त होता है, तो अक्लिष्ट वृत्तियाँ उत्पन्न होती हैं। यद्यपि ये वृत्तियाँ क्लिष्ट वृत्तियों के प्रवाह के मध्य में उत्पन्न होती हैं; परन्तु इनका कारण अपर-वैराग्य होने से, ये वृत्तियाँ अक्लिष्ट ही रहती हैं। इसी प्रकार क्लिष्ट वृत्तियों के छिद्रों से अर्थात् उनके मध्य आ जाने वाले विरोधी स्थलों से भी अक्लिष्ट वृत्तियाँ उत्पन्न होती हैं। जैसे कोई पुरुष क्लेशों से ग्रस्त, सांसारिक दुःखों से अत्यन्त खिन्न होता हुआ, किसी सद्गुरु / संन्यासी के वैराग्योत्पादक उपदेश से आत्ममार्ग का पथिक बन जाता है; ऐसे में क्लेशों के मध्य में, विवेकख्याति की ओर अग्रसर करने वाली, अक्लिष्ट वृत्तियाँ उत्पन्न हो जाती हैं। अतः अक्लिष्ट वृत्तियाँ तीन प्रकार से होती हैं — १. सर्वथा विशुद्ध; २. क्लिष्ट वृत्तियों के निरन्तर प्रवाह में से निकली हुई; तथा ३. क्लिष्ट वृत्तियों के छिद्रों में से बहती हुई।

इसी प्रकार अक्लिष्ट वृत्तियों के छिद्रों में से, क्लिष्ट वृत्तियाँ भी उत्पन्न होती हैं। जैसे कोई पुरुष सत्संग में वैराग्य का उपदेश सुनता हुआ, विवेकख्याति की ओर अग्रसर हो रहा होता है, उस स्थिति में अनेक ऐसे अवसर आ सकते है — जैसे कि उसके युवा पुत्र अथवा पत्नी का देहान्त हो जाना; स्वयं का किसी भंयकर रोग से ग्रस्त हो जाना अथवा दुर्घटना के कारण अंगभंग होना या किसी शारीरिक दोष से ग्रस्त हो जाना अथवा समाज में विरोधियों द्वारा दुःख दिया जाना, षडयन्त्र आदि द्वारा हानि पहुँचाया जाना, आदि-आदि, कोई स्थिति उत्पन्न होती है, तो ऐसी स्थिति में क्लिष्ट वृत्तियाँ भी उभर आती हैं। वह सोचता है कि मेरे द्वारा धर्म-मार्ग पर चलने के बाद भी ऐसे भंयकर कष्ट आए; और उन कष्टों, क्लेशों के कारण, वह आत्मकल्याण के मार्ग को छोड़ देता है। इस प्रकार अक्लिष्ट वृत्तियों के मध्य क्लिष्ट वृत्तियाँ भी उत्पन्न हो जाती हैं।

क्लिष्ट वृत्तियों की भी दो स्थितियाँ होती है — १. सर्वथा विशुद्ध; तथा २. अक्लिष्ट वृत्तियों के छिद्रों में से बहती हुई। यहाँ यह बात ध्यान देने योग्य है कि अक्लिष्ट वृत्तियों के निरन्तर प्रवाह से, उनके उद्गम स्थान से क्लिष्ट वृत्तियाँ नहीं निकलती; जैसे कि क्लिष्ट वृत्तियों के निरन्तर प्रवाह से, उनके उद्गम स्थान से अक्लिष्ट वृत्तियाँ निकलती है। इसमें कारण यह है कि पापों से ही ग्लानि रूप वैराग्य = अपर वैराग्य उत्पन्न होता है; पुण्यों से नहीं। अतः महर्षि व्यास ने “अक्लिष्टप्रवाहपतिताऽपि क्लिष्टाः” अर्थात् अक्लिष्ट प्रवाह पतित क्लिष्ट वृत्तियों का होना नहीं कहा।

क्लिष्ट वृत्तियों से क्लिष्ट संस्कार उत्पन्न होते हैं, और उन संस्कारों से पुनः क्लिष्ट वृत्तियाँ उत्पन्न होती हैं; इसी प्रकार अक्लिष्ट वृत्तियों से अक्लिष्ट संस्कार उत्पन्न होते हैं, और उन संस्कारों से पुनः अक्लिष्ट वृत्तियाँ उत्पन्न होती हैं। अर्थात् पाप कर्मों से पाप कर्मों के संस्कार बनते हैं, और उन पाप के संस्कारों से पुरुष पुनः पाप कर्मों से प्रेरित होता है। इसी प्रकार पुण्य कर्मों से पुण्य कर्मों के संस्कार बनते हैं, और उन पुण्य के संस्कारों से पुरुष, पुण्य कर्मों की ओर अग्रसर होता है। इस प्रकार वृत्तियों से संस्कार और संस्कारों से वृत्तियों का यह चक्र निरन्तर दिन-रात चलता रहता है। यह चक्र केवल इसी जीवन में ही नहीं चल रहा, वरन् अनन्त काल से यह चक्र प्रत्येक बार कर्म योनि = मानव योनि प्राप्त होने पर चलता आ रहा है और आगे भी अनन्त काल तक चलता चला जायेगा, जब तक कि पुरुष को स्वरूपस्थिति की प्राप्ति नहीं होती और वह अपवर्ग = मोक्ष को प्राप्त नहीं कर लेता।

अक्लिष्ट वृत्ति प्रवाह द्वारा, चित्त कृतकृत्य = कृतकार्य अर्थात् सत्त्व, रज और तम रूप गुणों के परिणामों से रहित हुआ, क्लेशों से सर्वथा रहित होकर जीवन्मुक्त दशा में, आत्मा के समान पवित्र होकर स्थित होता है तथा मोक्ष होने पर अपने मूल कारण प्रकृति में विलीन हो जाता है। यहाँ प्रश्न होता है कि चित्त की यह कृतकार्यता, वृत्ति-संस्कार-वृत्ति के निरन्तर चलते हुए चक्र में, किस प्रकार से सम्भव होगी? महर्षि पतञ्जलि ने योगसूत्र १.१२ में इसका उपाय अभ्यास और वैराग्य बताया है। अभ्यास और वैराग्य के द्वारा क्लिष्ट वृत्तियों को क्रमशः क्षीण बनाया जाता है और अक्लिष्ट वृत्तियों को प्रबल किया जाता है। अभ्यास और वैराग्य के निरन्तर सेवन से वैसे ही संस्कारों द्वारा अक्लिष्ट वृत्तियाँ, क्लिष्ट वृत्तियों को दबाकर, उनको नष्ट कर स्वयं निरन्तर प्रवाहित होने लगती है। इस प्रकार अक्लिष्ट वृत्तियों के निरन्तर प्रवाहित होने से ही पुरुष विवेकख्याति को प्राप्त होता तथा गुणों के अधिकार का विरोध करता हुआ, निर्बीज समाधि को प्राप्त कर स्वरूपस्थिति को प्राप्त हो, परमात्मा में अवस्थित होकर चरम देह वाला होता है।

कुछ भाष्यकारों ने पाँचों प्रकार की वृत्तियों में क्लिष्ट और अक्लिष्ट दो-दो भेद माने हैं। न तो महर्षि पतञ्जलि और न ही महर्षि व्यास का ऐसा कोई मन्तव्य है, और न तो सूत्र और न ही भाष्य में इस प्रकार का कोई संकेत ही है। क्लिष्ट वृत्ति का अर्थ महर्षि दयानन्द ने क्लेश सहित किया है और महर्षि व्यास ने ‘क्लेशहेतुकाः कर्माशयप्रचये क्षेत्रीभूताः क्लिष्टाः’ कहा है। विपर्यय वृत्ति जो विपरीत ज्ञान है उसे महर्षि व्यास ने स्पष्ट रूप से अविद्या कहा है ‘सेयं पञ्चपर्वा भवत्यविद्या’ (योगसूत्र १.८ व्यासभाष्य) और योगसूत्र २.३ में अविद्या को क्लेश कहा गया है । इस प्रकार जो वृत्ति क्लेश सहित अथवा क्लेश ही हो ऐसी वृत्ति अक्लिष्ट = क्लेश रहित अर्थात् विवेकख्याति को प्राप्त कराने वाली तथा गुणाधिकार विरोधी नहीं कही जा सकती। अतः क्लेश सहित अथवा विपर्यय वृत्ति अक्लिष्ट वृत्ति कदापि नहीं हो सकती।

भाष्यकारों द्वारा क्लिष्ट वृत्ति का अर्थ दुःख को उत्पन्न करने वाली वृत्ति, और अक्लिष्ट वृत्ति का अर्थ दुःखों को नष्ट करने वाली वृत्ति करना, व्यासभाष्य की मूल भावना को पूर्णतया प्रकट नहीं करता। अगर अक्लिष्ट का अर्थ दुःखों को नष्ट करने वाली वृत्ति भी माना जाये; तब भी विपर्यय वृत्ति को अक्लिष्ट वृत्ति कदापि नहीं कहा जा सकता। क्योंकि महर्षि गौतम ने भी “दुःखजन्मप्रवृत्तिदोषमिथ्याज्ञानानामुत्तरोत्तराऽपाये तदनन्तरापायादपवर्गः” (न्याय १.१.२) में दुःख का मूल कारण मिथ्याज्ञान कहा है। और मिथ्याज्ञान के नाश से क्रमशः दोष, प्रवृत्ति, जन्म के नाश से दुःख का नाश हो कर अपवर्ग की प्राप्ति होती है। जब दुःखों का मूल कारण ही मिथ्याज्ञान हो तब विपर्यय वृत्ति को अक्लिष्ट अर्थात् दुःखों का नाश करने वाली कैसे कहा जा सकता है ?

अतः महर्षि दयानन्द द्वारा किया गया अर्थ = क्लेश सहित और क्लेश रहित, व्यासभाष्य की भावना को सम्पूर्णतया प्रकट करता है।

इस प्रकार प्रमाणादि पाँच वृत्तियों में से विपर्यय वृत्ति अविद्या अर्थात् क्लेश होने से क्लिष्ट वृत्ति ही है। शेष चार वृत्तियों में से, जो-जो वृत्ति जब-जब क्लेशों = अविद्यादि से सम्बद्ध होगी, वह-वह वृत्ति तब-तब क्लिष्ट होगी। किसी भी वृत्ति के अक्लिष्ट होने के लिए उसका ख्यातिविषयक होना अथवा गुणाधिकार विरोधी होना आवश्यक होता है। अतः शेष चार वृत्तियों में भी जब वृत्ति अविद्यादि क्लेशों से रहित होगी, तब वह ख्यातिविषयक और गुणाधिकार विरोधी भी होने से अक्लिष्ट कहलाएगी; अन्यथा क्लेशों — अविद्या, अस्मिता, राग, द्वेष और अभिनिवेश से किसी भी प्रकार से सम्बद्ध होने वाली वृत्ति, कर्माशय को उत्पन्न करने वाली अर्थात् महर्षि गौतम के अनुसार दोष, प्रवृत्ति, जन्म को उत्पन्न कर दुःखों को प्राप्त कराने वाली होने से क्लिष्ट ही कहलाएगी।