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निर्माणचित्तान्यस्मितामात्रात्॥४॥

In Hindi:

पदपाठ : निर्माणचित्तानि अस्मितामात्रात्॥

संस्कृत में सूत्र की भूमिका : यदा तु योगी बहून्कायान्निर्मिमीते तदा किमेकमनस्कास्ते भवन्त्यथानेकमनस्का इति।

भूमिका हिंदी अर्थ : (यदा तु योगी) जब योगी उपरोक्त प्रकार से (बहून् कायान्) बहुत शरीरों को (निर्मिमीते) बनाता है (तदा) तब (ते) वे शरीर (किम्) क्या (एकमनस्काः) एक मन = चित्त = ज्ञान वाले (भवन्ति) होते हैं (अथ) अथवा (अनेकमनस्काः) अनेक मन वाले ? (इति) इस विषय में कहते हैं —

हिंदी में अर्थ : योगी (निर्माणचित्तानि) चित्त = ज्ञानों के विभिन्न स्तरों का निर्माण (अस्मिता-मात्रात्) अस्मितामात्र = आत्मस्वरूप से करता है॥

प्राचीन ॠषि भाष्य : अस्मितामात्रं चित्तकारणमुपादाय निर्माणचित्तानि करोति। ततः सचित्तानि भवन्तीति॥

प्राचीन ॠषि भाष्य हिन्दी अर्थ : (अस्मितामात्रम्) अस्मिता = आत्मस्वरूप ही (चित्तकारणम्) चित्त = ज्ञान का कारण है, (उपादाय) उससे ही योगी (निर्माणचित्तानि) विभिन्न प्रकार के चित्त = ज्ञान के स्तरों का निर्माण (करोति) करता है। (ततः) इसलिए उपरोक्त सभी प्रकार के शरीर निर्माण (सचित्तानि) पृथक्-पृथक् चित्त = ज्ञान के सहित (भवन्ति इति) होते हैं॥

वैदिक वृत्ति : इस सूत्र पर व्यासभाष्य का अनुवाद करते हुए भाष्यकारों ने अर्थ का अनर्थ कर दिया है। उनके अनुसार “योगी जब बहुत शरीरों का निर्माण करने में समर्थ होता है तो, चित्त = मन का “मूल उपादान कारण” जो कि अहंकार है, उसको लेकर वह उन शरीरों हेतु अनेक चित्तों = मनों का भी निर्माण करता है, जिससे वे सभी शरीर चित्त = मन सहित होते हैं।” व्यासभाष्य का इस प्रकार का अर्थ करते हुए वाचस्पति मिश्र और विज्ञानभिक्षु पर भोजवृत्ति का प्रभाव रहा होगा, और बाद के भाष्यकारों ने इन का अन्धानुकरण मात्र ही किया है। इस सूत्र पर भोजवृत्ति सर्वथा सिद्धान्तविरुद्ध है।

इस पाद के प्रथम सूत्र से लेकर छठे सूत्र पर्यन्त एक विशेष प्रकार की संगति है, जिसपर भाष्यकारों ने विशेष ध्यान ही नहीं दिया, अन्यथा इस प्रकार से अर्थ का अनर्थ नहीं करते। योगभाष्यकार महर्षि व्यास की एक अन्य स्वतन्त्र रचना वेदान्त सूत्र हैं, जिसमें वे लिखते हैं —

जगद्व्यापारवर्जं प्रकरणादसन्निहितत्वाच्च॥ वेदान्त० ४.४.१७॥

अर्थात् जगत्व्यापार रचना आदि कार्यों को छोड़कर मुक्तात्माओं को ऐश्वर्य प्राप्त होता है। ऐसे में उनके ऐश्वर्य की सीमा कहाँ तक है, इसके विषय में कहा है —

विकारावर्त्ति च तथा हि स्थितिमाह॥ वेदान्त० ४.४.१९॥

अर्थात् मुक्त आत्मा का ऐश्वर्य विकार = प्रकृति के विकारों में वर्त्तने वाला है, क्योंकि शास्त्र में वैसी स्थिति को बतलाया है।

जब महर्षि व्यास वेदान्तदर्शन में शास्त्रों के आधार पर यह प्रतिपादित करते हैं कि मुक्तात्मा को भी जगत्रचना रूप व्यापार का सामर्थ्य नहीं है, और वह प्रकृति के उपलब्ध विकारों के ही उपयोग अथवा प्रयोग तक सीमित रहता है; तब ऐसे में महर्षि व्यास, इस सूत्र के भाष्य में किसी योगी द्वारा “अहंकार” नामक प्रकृति के विकार से “चित्त = मन” नामक तत्त्वान्तर विकार के निर्माण का प्रतिपादन करें, यह सम्भव ही नहीं है। भूत और इन्द्रिय रूप अन्तिम कार्य पदार्थों के धर्म परिणाम का सामर्थ्य तो पुरुष में एक सीमा तक सम्भव होता है, परन्तु तत्त्वान्तर परिणाम का सामर्थ्य केवल परमात्मा में ही सम्भव है। अतः ऐसे में “निर्माणचित्तानि” और “अस्मितामात्र” इन दोनों पदों का वास्तविक अभिप्राय समझना होगा।

निर्माणचित्तानि — योगदर्शन में “अस्मिता” शब्द का प्रयोग १.१७, २.३, २.६, ३.४७, और ४.४ सूत्रों में हुआ है। योगूसत्र १.१७ में अस्मिता से अस्मितानुगत सम्प्रज्ञात समाधि को कहा है; २.३ तथा २.६ में अस्मिता का वर्णन क्लेश रूप में हुआ है; ३.४७ में अस्मिता से इन्द्रियों के कारण अंहकार का ग्रहण हुआ है। इस सूत्र में अस्मिता का तात्पर्य अन्वेषणीय है। वस्तुतः यहाँ सन्दर्भ यह चल रहा है कि जन्म, औषधि, मन्त्र, तप और समाधि जन्य सिद्धियाँ होती हैं। योगी पुरुष इन सभी प्रकार से स्थूलशरीर की विशिष्टस्थिति का निर्माण करने में समर्थ हो जाता है। पिछले दो सूत्रों में जात्यन्तर परिणाम कैसे होता है, इसके बारे में स्पष्ट किया गया है। इस प्रकार जाति = जन्म मिलने के उपरान्त, औषधि, मन्त्र, तप और समाधिजन्य सिद्धियों द्वारा भी योगी शरीर को विशिष्ट प्रकार से निर्माण कर सकने में समर्थ होता है, यह पिछले सूत्र की व्याख्या के अन्त में स्पष्ट कर दिया है। अतः दो से अधिक प्रकार से शरीर निर्माण सम्भव होने से महर्षि व्यास ने भूमिका में “बहून् कायान् निर्मिमीते” कहा है। उपर्युक्त पाँच प्रकार से शरीर निर्माण ही बहुकाया निर्माण है, न कि भोज द्वारा कथित कर्मफल को भोगने की इच्छा से एक साथ अनेक शरीरों की रचना करना। यहाँ यह ध्यान रखना चाहिए कि महर्षि पतञ्जलि और महर्षि व्यास दोनों ने योगी के लिए किसी ऐसी विभूति = सिद्धि का वर्णन पूरे योगशास्त्र में कहीं नहीं किया, जिससे वह प्रकृति के विकारों को लेकर शरीर रचना कर सके। दूसरी ओर महर्षि व्यास मुक्तात्मा के भी ऐश्वर्य की सीमा का प्रतिपादन, अपनी दूसरी रचना वेदान्तदर्शन में स्पष्ट रूप से कर रहे हैं। अतः योगी में अपने हेतु बहुशरीर निर्माण रूपी सामर्थ्य उपर्युक्त (= जन्म, औषधि, मन्त्र, तप और समाधि) प्रकार से तो है, अन्यथा नहीं।

योगी जब उपर्युक्त प्रकार से अपने हेतु शरीर के विशिष्ट स्तरों का निर्माण करने में समर्थ होता है, तो उन शरीरों के सन्दर्भ में उसके चित्त की स्थिति क्या होती है ? “चिती संज्ञाने” (धातुपाठ १.३२) से चित्त का अर्थ “ज्ञान” होता है। क्या इन सभी प्रकार से निर्मित शरीरों में चित्त = ज्ञान का स्तर एक ही होता है अथवा भिन्न-भिन्न होता है ? इस प्रश्न का उत्तर देते हुए महर्षि पतञ्जलि कहते हैं “निर्माणचित्तानि अस्मितामात्रात्” अर्थात् योगी अस्मितामात्र से निर्माणचित्त को करता है। यहाँ यह ध्यान रखना चाहिए कि महर्षि पतञ्जलि ने चित्त निर्माण हेतु “चित्तनिर्माणानि” नहीं कहा, क्योंकि सूत्रकार का अभिप्राय चित्तनिर्माण (= चित्तों का निर्माण) न होकर निर्माणचित्त है, जिसका अर्थ है चित्त = ज्ञान के विभिन्न स्तरों का बनाना। महर्षि व्यास ने आगे योगसूत्र ४.६ की व्याख्या में कहा है — “पञ्चविधं निर्माणचित्तं जन्मौषधिमन्त्रतपः समाधिजाः सिद्धय इति।” अर्थात् पाँच प्रकार का निर्माणचित्त होता है — जन्म, औषधि, मन्त्र, तप और समाधिजन्य पाँच प्रकार की सिद्धियाँ होने से। यदि भाष्यकार महर्षि व्यास का अभिप्राय योगी द्वारा अहंकार नामक तत्त्व से चित्त निर्माण का होता तो योगसूत्र ४.६ की व्याख्या में यह वचन व्यर्थ हो जाता। अतः जिस प्रकार योगी उपर्युक्त पाँच प्रकार से शरीर का निर्माण करने में समर्थ होता है, उसी प्रकार पाँच प्रकार से विशिष्ट चित्त = ज्ञान के स्तर का निर्माण भी योगी करता है। देखो, “निर्माणचित्तम्” पद का प्रयोग महर्षि व्यास ने योगसूत्र १.२५ की व्याख्या में भी किया है, जहाँ उसका अर्थ है सङ्कल्पमय चित्त है। अतः विभिन्न प्रकार के सङ्कल्प = ज्ञानमय चित्त ही बहु प्रकार के चित्त कहे जा सकते हैं।

अस्मितामात्र — अगला प्रश्न है कि यह “निर्माणचित्त” कैसे बनता है ? इसका उत्तर दिया है — “अस्मितामात्रात्” अर्थात् योगी अस्मितामात्र से निर्माणचित्त को बनाता है। यहाँ अस्मिता का अर्थ सभी भाष्यकारों ने प्रकृति के विकार “अहंकार” को लिया है, जो कि प्रकरणविरुद्ध है। जब यहाँ तत्त्वान्तर रूप से चित्त निर्माण का वर्णन ही नहीं है, तो अस्मिता का अर्थ “अहंकार” कदापि संगत नहीं है। “अस्मितामात्र” का अभिप्राय योगसूत्र १.३६ की व्याख्या में महर्षि व्यास ने स्पष्ट किया है — “तथाऽस्मितायां समापन्नं चित्तं निस्तरङ्गमहोदधिकल्पं शान्तमनन्तमस्मितामात्रं भवति। अर्थात् उसी प्रकार अस्मिता = अपने आत्मस्वरूप में समापन्न = समाहित हुआ चित्त तरङ्गों से रहित = निष्कम्प समुद्र के समान शान्त, महान् = विशाल, अस्मितामात्र = आत्मस्वरूपाकार = केवल आत्मानुभूति करने वाला होता है।” महर्षि दयानन्द इसी सूत्र पर हुगली शास्त्रार्थ में कहते हैं — “तथा अस्मितामात्र अर्थात् यह मेरा स्वरूप है, ऐसा साक्षात्कार स्वरूप का ज्ञान बुद्धि को जब होता है...” अतः अस्मितामात्र का अभिप्राय है आत्मस्वरूपाकार हुआ चित्त अथवा आत्मस्वरूप।

अपने भाष्य में भोज ने भी योगसूत्र १.१७ की व्याख्या में अहंकार और अस्मिता के अन्तर को स्पष्ट किया है — “न चाहङ्कारास्मितयोरभेदः शङ्कनीयः, यतो यत्रान्तःकरणम् “अहमिति” उल्लेखेन विषयान् वेदयते, सोऽहंकारः; यत्रान्तर्मुखतया प्रतिलोमपरिणामे प्रकृति लीने चेतसि सत्तामात्राम् अवभाति, साऽस्मिता।” अर्थात् अहंकार और अस्मिता में अभेद की शंका नहीं करनी चाहिए, क्योंकि ये दोनों भिन्न वस्तु हैं, क्योंकि जिस काल में अन्तःकरण द्वारा “ मैं हूँ ”, इस अहम् भाव से ज्ञानपूर्वक अहंभावना से चित्रित हुआ चित्त विषयों का ज्ञान प्राप्त करता है, वह अहंकार है। जिस काल में बाह्यविषयों को छोड़कर अन्तर्मुखी विचार द्वारा विलोम परिणाम में बुद्धि को अपने कारण प्रकृति में विलीन हो जाने पर चित्त में सत्तामात्र की ही = पुरुष के स्वरूप की ही प्रतीति होती है, वह अस्मिता है।

इसी प्रकार अस्मितानुगत सम्प्रज्ञात समाधि हेतु “एकात्मिका संविदस्मिता” कहा है अर्थात् एक मात्र पुरुष का ज्ञान ही अस्मिता है। अतः यहाँ अस्मितामात्र का अभिप्राय - ‘‘आत्मस्वरूप’’ एवं ‘‘आत्मस्वरूप में स्थित चित्त’’ है। योगी चित्त की इस अवस्था से, उपरोक्त पाँच प्रकार से शरीर निर्माण के समान ही, पाँच प्रकार का विशिष्ट चित्त = ज्ञान का स्तर भी बना लेता है; और इस प्रकार से निर्मित चित्तों = ज्ञानों का प्रेरक = संचालक एक ही चित्त होता है, यह अगले सूत्र में प्रतिपादित किया गया है; और उससे अगले सूत्र में कहा गया है कि समाधि द्वारा निर्मित चित्त वासना रहित होने से सर्वश्रेष्ठ होता है।

अतः उपरोक्त विवरण से स्पष्ट है कि यहाँ जिस प्रकार जन्म से प्राप्त एक ही शरीर की विभिन्न स्थितियों के निर्माण का वर्णन है, उसी प्रकार एक ही चित्त के विभिन्न स्तरों के निर्माण का वर्णन है।