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प्रवृत्तिभेदे प्रयोजकं चित्तमेकमनेकेषाम्॥५॥

In Hindi:

पदपाठ : प्रवृत्तिभेदे प्रयोजकम् चित्तम् एकम् अनेकेषाम्॥

हिंदी में अर्थ : (अनेकेषाम्) उन निर्माणचित्तों की (प्रवृत्तिभेदे) भिन्न-भिन्न वृत्तियों = ज्ञानों का (प्रयोजकम्) प्रयोजक = नियामक = संचालक (चित्तम्) चित्त (एकम्) एक ही होता है॥

प्राचीन ॠषि भाष्य : बहूनां चित्तानां कथमेकचित्ताभिप्रायपुरःसरा प्रवृत्तिरिति सर्वचित्तानां प्रयोजकं चित्तमेकं निर्मिमीते। ततः प्रवृत्तिभेदः॥

प्राचीन ॠषि भाष्य हिन्दी अर्थ : (बहूनाम् चित्तानाम्) उन बहु निर्माणचित्तों की (प्रवृत्तिः) प्रवृत्ति = व्यापार = ज्ञान रूप संचालन (एकचित्ताभिप्रायपुरःसरा) एक चित्त (= अहंकार नामक तत्त्व के विकार चित्त) के अभिप्राय पूर्वक (कथम् इति) किस प्रकार से होती है ? इसका उत्तर देते हैं — (सर्वचित्तानाम्) सभी निर्माणचित्तों का (प्रयोजकम्) प्रयोजक = संचालक = नियामक (एक चित्तम्) (योगी) पदार्थात्मक एकमात्र चित्त को ही (निर्मिमीते) नियुक्त करता है = निर्धारित करता है। (ततः) उस एक मात्र चित्त से ही (प्रवृत्तिभेदः) उन निर्माणचित्तों के ज्ञानस्तर = प्रवृत्ति में भेद होता है॥

वैदिक वृत्ति : योगी द्वारा बनाए गए बहु निर्माणचित्तों के ज्ञान का स्तर भिन्न होता है; अतः इस कारण उनमें प्रवृत्ति का भेद होता है, इन सभी प्रकार की प्रवृत्तियों का संचालन किस प्रकार से एक चित्त से होता है ? वस्तुतः यहाँ यह जानना चाहिए कि उपर्युक्त पाँचों प्रकार के निर्माणचित्त, वास्तव में द्रव्यात्मक रूप से सत्तावान् चित्त न होकर, ज्ञान के विभिन्न स्तरों का ही प्रतिनिधित्व ही करते हैं। पिछले सूत्र में यह स्पष्ट रूप से प्रतिपादित किया गया है कि ये सभी निर्माणचित्त अस्मितामात्र अर्थात् आत्मा = पुरुष द्वारा ही बनाए जाते हैं, क्योंकि ज्ञान के विभिन्न स्तरों का निर्माण करने का, प्रकृति के किसी विकार में सामर्थ्य ही नहीं है। अतः यह केवल और केवल मात्र चितिशक्ति = पुरुष ही है, जो “अस्मितामात्र” विशेषण से कहा गया है, जो कि इस कार्य को करने में समर्थ रहता है। पुरुष के लिए “अस्मितामात्र” शब्द का प्रयोग भी इस रहस्य को स्पष्ट करता है कि इस काल तक जीवात्मा को स्वरूपस्थिति की प्राप्ति नहीं हुई है, तथा चित्त ही आत्मस्वरूप में स्थित हुआ इस कार्य को करने में समर्थ होता है, क्योंकि पुरुष जब प्रकृति के बन्धनों से सर्वथा छूट जाता है तो उसे किसी निर्माणचित्त की आवश्यकता ही नहीं रहती। इन निर्माणचित्तों के सम्बन्ध में महर्षि पतञ्जलि और महर्षि व्यास यह स्पष्ट कर रहे है कि योगी इन सभी निर्माणचित्तों की प्रवृत्तियों का संचालन = नियमन अपने एक मात्र सत्तात्मक चित्त से करता है, और इस प्रकार उनके ज्ञानात्मक स्तरों में भेद रहता है और तदनुकूल वृत्ति-भेद दृष्टिगोचर होता है।

देखो, प्रथम चार प्रकार से शरीरनिर्माण में चित्त = ज्ञान के स्तर की स्थिति में अन्तर स्पष्ट रूप से देखने को मिलता है। जैसे औषधि द्वारा शरीरनिर्माण होने पर पुरुष यह ज्ञान बनाता है कि मैं पूर्व की अपेक्षा शरीर से अधिक बलवान् हो गया हूँ, अब अधिक सामर्थ्य वाले कार्यों को कर सकता हूँ, अधिक भोगों को भोग सकता हूँ, आदि-आदि; इसी प्रकार मन्त्र से अर्थात् वेदादि शास्त्रों में प्रदत्त ज्ञान को पदार्थात्मक रूप से सिद्ध करने पर व्यक्ति के चित्त = ज्ञान के स्तर में उत्कृष्टता आती है यथा मन्त्र = ज्ञान = विचार से आकाशगमन और अणिमादि को सिद्ध करने वाले पुरुष के ज्ञान का स्तर अन्य साधारण मनुष्यों से सर्वथा भिन्न और श्रेष्ठ होता है, इसमें भौतिक वैज्ञानिकों का उदाहरण देखा जा सकता है; इसी प्रकार तप से संकल्पसिद्धि की प्राप्ति होने पर योगी के चित्त = ज्ञान का स्तर और उत्तम हो जाता है और योगी अपने सत्य संकल्पों को पूर्ण करने में समर्थ होता है; और अन्त में समाधि द्वारा तो योगी अपने चित्त के सभी प्रकार के क्लेशादि को क्षीण करने में भी समर्थ होता है। इस प्रकार इन सभी प्रकार की प्रवृत्तियों = ज्ञानों का नियमन = संचालन, योगी अपने एकमात्र सत्तात्मक चित्त द्वारा करता है।

इस सूत्र पर भोजवृत्ति प्रकरण एवं सिद्धान्त विरुद्ध ही है। ऐसा प्रतीत होता है कि भोज के बाद के भाष्यकारों ने भोज से प्रभावित हो कर ऐसा अर्थ किया है। यदि योगी एक से अधिक चित्तों का अहंकार नामक तत्त्व से निर्माण करने में समर्थ होता हो, तो क्या वे चित्त इसी पुरुष के अन्तःकरण के अंग बनते हैं ? अथवा भिन्न अन्तःकरण रूप से भिन्न शरीरों के अंग होते और उन भिन्न शरीरों का संचालन करने वाला पुरुष कौन होता है ? क्योंकि एक ही पुरुष, परिच्छिन्न होने से, बहुत शरीरों में युगपत् = एक साथ उपस्थित नहीं हो सकता।

हमने यह पूर्व में सिद्ध किया है कि जात्यन्तर परिणाम से प्राप्त हुए शरीर की विभिन्न उत्कृष्ट स्थितियों को बनाना ही बहु शरीरनिर्माण है; क्योंकि पृथिवी आदि महाभूतों को लेकर स्वतन्त्र रूप से शरीर रचना भी ईश्वरीय व्यवस्था का अंग है, जो जीवात्मा के कार्य क्षेत्र में नहीं आता। अतः पूर्व सूत्र और इस सूत्र पर इस प्रकार का समस्त व्याख्यान अविद्याग्रस्त है, तथा महर्षि पतञ्जलि और महर्षि व्यास की मूल भावना से विपरीत है।