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कर्माशुक्लाकृष्णं योगिनस्त्रिविधमितरेषाम्॥७॥

In Hindi:

पदपाठ : कर्माशुक्लाकृष्णम् योगिनः त्रिविधम् इतरेषाम्॥

संस्कृत में सूत्र की भूमिका : यत: —

भूमिका हिंदी अर्थ : (यतः) क्योंकि —

हिंदी में अर्थ : (योगिनः) योगी के (कर्म) कर्म (अशुक्ल-अकृष्णम्) अशुक्ल-अकृष्ण = पुण्य-पाप से रहित होते हैं, और (इतरेषाम्) योगी से अन्य पुरुषों के कर्म (त्रिविधम्) तीन प्रकार के अर्थात् शुक्ल = पुण्यात्मक, शुक्लकृष्ण = पुण्य-पापात्मक = मिश्रित, और कृष्ण = पापात्मक होते हैं॥

प्राचीन ॠषि भाष्य : चतुष्पदी खल्वियं कर्मजातिः। कृष्णा शुक्लकृष्णा शुक्लाऽशुक्लाकृष्णा चेति। तत्र कृष्णा दुरात्मनाम्। शुक्लकृष्णा बहिःसाधनसाध्या। तत्र परपीडानुग्रहद्वारेणैव कर्माशयप्रचयः। शुक्ला तपःस्वाध्यायध्यानवताम्। सा हि केवले मनस्यायत्तत्वादबहिःसाधनाधीना न परान् पीडयित्वा भवति। अशुक्लाऽकृष्णा संन्यासिनां क्षीणक्लेशानां चरमदेहानामिति। तत्राशुक्लं योगिन एव, फलसंन्यासात्। अकृष्णं चानुपादानात्। इतरेषां तु भूतानां पूर्वमेव त्रिविधमिति॥

प्राचीन ॠषि भाष्य हिन्दी अर्थ : (इयम् कर्मजातिः) यह कर्मजाति = कर्मराशि (खलु) निश्चय से (चतुष्पदी) चार प्रकार की होती है — (कृष्णा) पापात्मक कर्म, (शुक्लकृष्णा) पुण्य-पापात्मक = मिश्रित कर्म, (शुक्ला) पुण्यात्मक कर्म, (च) और (अशुक्लाकृष्णा इति) पुण्य-पाप से रहित कर्म।

(तत्र) उन चार प्रकार के कर्मों में से (कृष्णा) पापात्मक कर्मजाति (दुरात्मनाम्) दुरात्माओं = दुष्ट पुरुषों की होती है।

(शुक्लकृष्णा) पुण्य-पापात्मक = मिश्रित कर्मजाति (बहिःसाधनसाध्या) बाह्य साधनों से सम्पादित होती है; (तत्र) उसमें अर्थात् बाह्यसाधनों से होने वाले कर्मों में (परपीडानुग्रहद्वारेण एव) दूसरे प्राणियों को पीड़ा = दुःख देकर, और दूसरे प्राणियों पर अनुग्रह = दया आदि करने के द्वारा ही (कर्माशयप्रचयः) कर्माशय का संग्रह होता है।

(शुक्ला) पुण्यात्मक कर्मजाति (तपःस्वाध्यायध्यानवताम्) तप, वेद एवं मोक्ष प्रतिपादक सत्यशास्त्रों के स्वाध्याय और ध्यान करने वालों की होती है; (हि) क्योंकि (सा) वह कर्मजाति (केवले मनसि) केवल मन के (आयत्तत्वात्) आश्रित = अधीन होने से, (अबहिःसाधनाधीना) बाह्यसाधनों के अधीन न होने से, (परान्) दूसरे प्राणियों को (पीडयित्वा) दुःख देने से (न भवति) नहीं होती।

(अशुक्लाऽकृष्णा) पुण्य-पाप से रहित कर्मजाति (संन्यासिनाम्) संन्यासियों की अर्थात् (क्षीणक्लेशानाम्) जिनके अविद्यादि क्लेश क्षीण हो गए हैं और (चरमदेहानाम् इति) चरम देह = अन्तिम देह वाले जीवन्मुक्तों की होती है। (तत्र) उनमें (अशुक्लम्) पुण्य-रहित कर्म (फलसंन्यासात् एव) कर्मफल का संन्यास = त्याग करने से ही, (च) और (अकृष्णम्) पाप-रहित कर्म (अनुपादानात्) शास्त्रविरुद्ध पापयुक्त कर्मों को न अपनाने से (योगिनः) योगियों की होती है।

(इतरेषाम् तु भूतानाम्) योगी से भिन्न प्राणियों की तो (पूर्वम् एव) पहले कही गई ही (त्रिविधम् इति) तीन प्रकार की कर्मजाति होती है॥

वैदिक वृत्ति : योगी का चित्त वासनाओं से रहित क्यों होता है ? क्योंकि योगी के कर्म अशुक्ल-अकृष्ण अर्थात् पुण्य-पाप से रहित होते हैं। योगी द्वारा अविद्यादि क्लेशों को क्षीण करने पर, उसके चित्त में रागद्वेषादि दोषों के न रहने से, वह कर्मफल के प्रति भी विरक्त हुआ = उनका त्याग करने से, उसके शास्त्रानुकूल कर्म भी निष्काम होते हैं; अतः कर्म अशुक्ल = पुण्य रहित होते हैं; और शास्त्रविरुद्ध कर्मों = पापों को न अपनाने से उसके कर्म अकृष्ण अर्थात् पाप रहित होते हैं। कर्मों की यह श्रेणी चरमदेह वाले योगियों की अर्थात् असम्प्रज्ञात समाधि की अवस्था तक पहुँचे हुए ऐसे योगी की होती है जो चित्तगत अविद्या को नष्ट कर, अपने कर्म-संस्कारों को भी दग्धबीज-भाव की अवस्था में पहुँचा चुका होता है।

शास्त्र में भी ब्रह्मप्राप्ति हेतु आत्मज्ञानी योगी के लिए पुण्य-पाप के त्याग का उपदेश प्राप्त होता है—

तदा विद्वान् पुण्यपापे विधूय निरञ्जनः परमं साम्यमुपैति॥ (मुण्डक० ३.१.३)

अर्थात् उस समय आत्मज्ञानी विद्वान् पुण्य-पाप दोनों को त्याग करता हुआ, निर्मल = शोक, मोह, राग, द्वेषादि से रहित हुआ परम समता को प्राप्त करता है।

यहाँ पुण्यत्याग में रहस्य यह है कि पुण्य से सुख-फल भोग की प्राप्ति होने पर परिणाम, ताप और संस्कार दुःखों का अन्त नहीं हो सकता। अतः योगी के कर्म अशुक्ल-अकृष्ण ही होते हैं। महर्षि व्यास ने इसी आशय को स्पष्ट करने हेतु वेदान्तदर्शन में “साम्पराये तर्तव्याभावात्तथा ह्यन्ये॥” (३.३.२७) कहा है, अर्थात् पाप-पुण्य दोनों का अभाव होने से परलोक में आत्मज्ञानी को पार करने योग्य कुछ भी शेष नहीं रहता।

दूसरी ओर योगी से भिन्न अन्य सभी पुरुषों के कर्म शुक्ल = पुण्यात्मक, शुक्लकृष्ण = पुण्य-पापात्मक अर्थात् मिश्रित, तथा कृष्ण = पापात्मक होते हैं। इसी कारण अन्य सभी प्रकार के पुरुषों के चित्त को वासनाओं = संस्कारों से युक्त कहा गया है। इन त्रिविध कर्मों को समझने हेतु यहाँ कर्म की परिभाषा को चित्तगत कर लेना अनिवार्य है। महर्षि दयानन्द कहते हैं — “जो मन, इन्द्रिय और शरीर से जीव चेष्टा विशेष करता है, वह कर्म कहाता है। शुभ, अशुभ और मिश्र भेद से तीन प्रकार का है।” (आर्योद्दश्यरत्नमाला, ४८)। यहाँ हम महर्षि व्यास की व्याख्या के अनुसार तीनों प्रकार के कर्मों के स्वरूप को स्पष्ट करते हैं —

१. शुक्ल = पुण्यात्मक कर्म :— महर्षि व्यास कहते हैं कि तप, वेदादि सत्यशास्त्रों के स्वाध्याय और ध्यान रूप कर्म करने वाले पुरुष का कर्म शुक्ल कर्म होता है; और इस में कारण दिया है कि ये कर्म केवल मन के आश्रय होने से, बाह्यसाधनों के अधीन न होने से, दूसरे प्राणियों को पीड़ा = दुःख देने से नहीं होते। अर्थात् वेदानुकूल मानसिक कर्मों को ही पूर्णतया पुण्यात्मक कर्म कहा गया है, क्योंकि इनमें बाह्य साधनों का आश्रय न होने से दूसरे प्राणियों को पीड़ा की प्राप्ति प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से नहीं होती।

शंका — क्या शरीर से पूर्णतया पुण्यात्मक कर्म नहीं होते ? जब कि शास्त्रों में वाणी और शरीर आदि से होने वाले शुभ कर्मों का स्पष्ट निर्देश मिलता है, यथा वैदिक याग आदि का विधान, अग्निहोत्र आदि कर्मों को तो स्पष्ट रूप से कर्त्तव्य कर्मों में कहा गया है। इसी प्रकार परोपकार आदि के विषय में कहा जा सकता है। अतः ऐसे में मात्र मानसिक कर्मों को ही शुक्ल कर्मों की श्रेणी में मानना शास्त्रानुकूल प्रतीत नहीं होता।

समाधान — महर्षि व्यास ने इन मानसिक कर्मों को ही पुण्यात्मक कर्म कहने में जो कारण दिए हैं, वे इस रहस्य को स्पष्ट करते हैं — (१) ये कर्म केवल मन के आश्रय से होने से, इनसे दूसरे प्राणियों के प्रति अपकार = दोष आदि नहीं होता; तथा (२) ये कर्म बाह्य साधनों के अधीन न होने से, दूसरे प्राणियों को पीड़ा पहुँचाये बिना ही होते हैं। देखो मनुस्मृति में कहा है —

पञ्च सूना गृहस्थस्य चुल्ली पेषण्युपस्करः।

कण्डनी चोदकुम्भश्च बध्यते यास्तु वाहयन्॥ मनु॰ ३.६८॥

अर्थात् चूल्हा, चक्की, झाडू, ओखली और पानी का घड़ा, ये गृहस्थियों के पाँच हिंसा के स्थान हैं, जिनको प्रयोग में लाते हुए गृहस्थी व्यक्ति हिंसा के पापों से बध जाता है।

यहाँ जीवनोपयोगी कर्मों में भी बाह्यसाधनों के उपयोग से हिंसा अनिवार्य रूप से हो जाती है। तो ऐसे में महर्षि व्यास द्वारा यह वर्गीकरण पूर्णतया शास्त्रानुकूल ही है कि केवल पुण्यात्मक कर्म उपर्युक्त प्रकार के मानसिक कर्म ही होते हैं। यहाँ यह ध्यान रखना चाहिए कि महर्षि व्यास यह व्याख्यान, चित्त में संचित होने वाले कर्माशय को ध्यान में रखकर कर रहे हैं। जहाँ तक वेदानुकूल शास्त्रों में यागादि और कर्त्तव्य कर्मों में अग्निहोत्र का विधान है, वे उपर्युक्त कारणों से पुण्य-पापात्मक = मिश्रित कर्म की श्रेणी में आते हैं, क्योंकि इन याग आदि के सम्पादन हेतु, प्रयुक्त होने वाली समिधा, सामग्री तथा घृत आदि की प्राप्ति हेतु कृषि कार्य आवश्यक है, और कृषिकार्य में कुछ प्राणियों की हिंसा होने तथा अन्यों का उपकार होने से, इस को पुण्य-पापात्मक = मिश्रित कर्म की श्रेणी में ही माना गया है। अतः यज्ञ = अग्निहोत्र आदि हेतु इन पदार्थों की प्राप्ति में परोक्ष में हिंसा रूपी दोष होने से, यह भी मिश्रित कर्म की श्रेणी में जानना चाहिए; परन्तु इससे प्राणीमात्र का अत्यधिक उपकार होने से शास्त्रकारों ने, सुख की प्राप्ति हेतु इनका विधान किया है, और दैनिक अग्निहोत्र को मानव मात्र के लिए कर्त्तव्य कर्म की श्रेणी में रखा है।

२. शुक्ल-कृष्ण = पुण्य-पापात्मक कर्म :— महर्षि व्यास कहते हैं कि बाह्य साधनों से सम्पादित होने वाले कर्म पुण्य-पापात्मक = मिश्रित होते हैं। इनमें दूसरे प्राणियों को पीड़ा देकर अथवा अन्य दूसरों पर अनुग्रह = उपकार आदि करके कर्माशय का संचय किया जाता है। बाह्य साधनों से सम्पादित कर्मों से अभिप्राय बाह्य भौतिक साधनों और प्राणियों के सहयोग से होने वाले, तथा बाह्य इन्द्रियों द्वारा बाह्य विषयों की प्राप्ति हेतु होने वाले कर्म हैं। इस प्रकार के कर्मों से दूसरे प्राणियों को पीड़ा = दुःख पहुँचने से, वे कर्म पाप से बिधे हुए होते हैं; तथा दूसरे अन्य प्राणियों पर अनुग्रह = उपकार = दया आदि होने से, इन कर्मों से, पुण्य का संचय भी होता है। इस प्रकार से परपीड़ा और परानुग्रह रूप कर्म से, महर्षि व्यास ने ताप-दुःख की प्राप्ति को योग सूत्र २.१५ की व्याख्या में कहा है। इसप्रकार के कर्मों में बाह्यसाधनों से सम्पादित होने वाले शास्त्रानुकूल विहित कर्मों को यथा कृषि, व्यवसाय, भोजन, यागादि तथा मानवों के सुखभोग हेतु भौतिक साधनों के निर्माण आदि को जानना चाहिए। इस प्रकार आधुनिक औषधि विज्ञान में पशुओं पर प्रयोग से, औषधि गुणों का परीक्षण कर, उन्हें मानवोपयोगी बनाना एवं सिद्ध करना रूप कर्म, पशुओं की हिंसा आदि से युक्त होने से, मिश्रित कर्मों के उदाहरण हैं।

हम देखते हैं कि बाह्य साधनों का उपयोग किसी न किसी स्तर पर, प्रत्यक्ष अथवा परोक्ष रूप से, दूसरे प्राणियों को पीड़ा पहुँचाये बिना नहीं होता, ऐसे में बाह्यसाधनों के आश्रय से होने वाले सभी प्रकार के कर्मों को या तो मिश्रित कर्मों की श्रेणी में रखा जा सकता है अथवा पापात्मक कर्मों की श्रेणी में। यदि ये कर्म शास्त्र विहित तथा दूसरे प्राणियों का किसी प्रकार से उपकार करने वाले हैं, तो ये कर्म इस पुण्य-पापात्मक श्रेणी में आयेंगे अन्यथा इन कर्मों को पापात्मक कर्म की श्रेणी में ही जानना चाहिए।

शंका — आपने यज्ञ को मिश्रित कर्म कहा है, जबकि यज्ञ का विधान शास्त्रों में मानवमात्र हेतु किया गया है। मानव के कर्त्तव्य कर्मों में यज्ञादि के सम्पादन का स्पष्ट निर्देश है। महर्षि दयानन्द ने मानव मात्र के लिए पञ्चमहायज्ञों को कर्त्तव्य कर्म कहा है। शतपथ ब्राह्मण में “यज्ञो वै श्रेष्ठतमं कर्म” (शतपथ १.७.१.५) कहा गया है। और इसी प्रकार शास्त्र में स्वर्ग की कामना करने वाले मनुष्य के लिये यज्ञ करने का स्पष्ट निर्देश है। गृह्यसूत्रों में मानव के विभिन्न संस्कारों हेतु यज्ञ का सम्पादन अनिवार्य रूप से निर्दिष्ट है। श्रोत्रसूत्रों में अग्निहोत्र से अश्वमेघ पर्यन्त विभिन्न यज्ञों का स्पष्ट विधान है। ऐसे में विभिन्न ऋषियों द्वारा प्रतिपादित यज्ञ को मिश्रित कर्म कहना कदापि उचित ज्ञात नहीं होता।

समाधान — हमने मिश्रित कर्मों में “यज्ञ” शब्द न कहकर “याग” को कहा है, जिसका अभिप्राय द्रव्ययज्ञों से है। जबकि मात्र दव्य यज्ञों को ही यज्ञ नहीं कहा जाता। देखो, इसमें मुख्य कारण यह है कि द्रव्ययज्ञों का भी वेदानुकूल शास्त्रों में विधान किया गया है, जिससे वर्त्तमान् काल में यज्ञ शब्द “द्रव्ययज्ञों” के लिए ही रूढ हो गया है। यज्ञ शब्द “यज्” धातु से सिद्ध होता है, और उसका एक अभिप्राय “सत्यशास्त्र, सत्यधर्माचरण, सत्पुरुषों के संग से जो उत्पन्न होता है, जिसका नाम विद्या, ज्ञान और योग है, उसका नाम भी यज्ञ है।” (महर्षिदयानन्द सरस्वती, ऋग्वेद १.१.१ पर भाष्य से) यहाँ मानवीय कर्मों के दृष्टि कोण से, द्रव्य यज्ञों को ही मिश्रित श्रेणी में जानना चाहिए। जबकि जो यज्ञ का व्यापक अर्थ ऊपर दिखाया है वह तो पुण्य कर्मों की श्रेणी में आता है। देखो वेदभाष्य करते हुए महर्षि दयानन्द ने “यज्ञ” शब्द का अर्थ मात्र अग्निहोत्रादि द्रव्ययज्ञ नहीं किया, यज्ञ शब्द का अर्थ बहुत विस्तृत है, जिसमें सभी प्रकार का ज्ञान-विज्ञान, प्राणीमात्र का उपकार, तथा ईश्वरप्राप्ति हेतु योग, उपासना तक का ग्रहण होता है।

महर्षि व्यास कर्मों की उपरोक्त व्याख्या कैवल्य पाद में कर रहे हैं, यहाँ यह स्पष्ट किया जा रहा है कि कौन से कर्मों को करता हुआ योगी कैवल्य का अधिकारी बनता है, और कौन से कर्मों को करने से जन्म-मरण रूप संसारचक्र में लगा रहता है। यहाँ यह भी जानना चाहिए कि वेदादि सत्यशास्त्रों में ज्ञान को ही स्पष्ट रूप से मुक्ति का साधन कहा गया है। यथा — तमेव विदित्वाऽतिमृत्युमेति (यजु॰ ३१.१८) उस परमात्मा को जानकर मोक्ष को प्राप्त होता है; ज्ञानान्मुक्तिः (सांख्य ३.२३) ज्ञान से = विवेक साक्षात्कार से मुक्ति होती है। जबकि अग्निहोत्र आदि द्रव्ययज्ञों से मुक्ति का विधान वेदादि सत्यशास्त्रों में कहीं नहीं किया गया। इसी प्रकार महर्षि दयानन्द ने सत्यार्थ प्रकाश के नवम् समुल्लास में मुक्ति के साधनों में अग्निहोत्र आदि यज्ञों को नहीं गिना, तथा ऋग्वेदादिभाष्यभूमिका के उपासना विषय और मुक्ति विषय में अग्निहोत्र आदि यज्ञों को नहीं कहा। इस विषय में महर्षि कपिल सांख्य दर्शन में कहते हैं — “इतरलाभेऽप्यावृत्तिः पञ्चाग्नियोगतो जन्मश्रुतेः” (सांख्य ४.२२) अर्थात् (इतरलाभे अपि) यज्ञानुष्ठान से उत्कृष्ट लोक प्राप्ति में भी (आवृत्तिः) आवृत्ति = जन्मधारणार्थ लौटना होता है (पञ्चाग्नियोगतः जन्मश्रुतेः) छान्दोग्योपनिषद् ५.४.१ — ५.८.२ में पंचाग्निविद्या में पितृयान मार्ग से लौटकर जन्म लेने का वर्णन है। इसी प्रकार से बृहदारण्यकोपनिषद् में पितृयान मार्ग का वर्णन करते हुए कहा है—

अथ ये यज्ञेन दानेन तपसा लोकाञ्जयन्ति ते धूममभिसम्भवन्ति ......... ॥ बृहदा॰ ६.२.१६॥

इस कण्डिका में पितृयान मार्ग का वर्णन करते हुए कहा है कि जो कोई यज्ञ से, दान से, तप से पितृलोकादिकों को प्राप्त होते हैं वे प्रथम धौमी दशा को प्राप्त होते हैं .......।

तथा इसी प्रकार से छान्दोग्योपनिषद् में भी इष्टापूर्त्त, दान आदि कर्मों के सम्बन्ध में कहा है —

अथ य इमे ग्रामं इष्टापूर्त्ते दत्तमित्युपासते ते धूममभिसम्भवन्ति ........ ॥ छान्दो॰ ५.१०.३॥

इस कण्डिका में भी पितृयान मार्ग का वर्णन करते हुए कहा है कि जो ये ग्रामनिवासी जन ग्राम में “इष्ट” अर्थात् ज्योतिष्टोमादि वैदिक कर्म को और “आपूर्त्त” अर्थात् दान से कूप, तडाग, वाटिकादि निर्माण, दान, परोपकार आदि कर्मों को करते हैं, वे देहपात के उपरान्त प्रथम धौमीदशा को प्राप्त करते हैं ......॥ शरीरपात के उपरान्त इस मार्ग पर जाता हुआ जीवात्मा चन्द्रलोकादि को प्राप्त कर, पुनः पृथिवीलोक को प्राप्त होकर जन्म- मरण चक्र में घूमता रहता है। यह पितृयान मार्ग देवयान = मुक्तिमार्ग से भिन्न है।

अतः उपर्युक्त प्रमाणों से स्पष्ट है कि यागाानुष्ठान विवेकसाधन = मोक्षसाधन नहीं है। विवेकी के लिए एकमात्र कर्म रूप से उपादेय नहीं है। इस विषय में महर्षि मनु का भी यही मत है उन्होंने भी संन्यासी के लिए अग्निहोत्र आदि को कर्त्तव्य कर्म नहीं कहा —

प्राजापत्यां निरूप्येष्टिं सर्ववेदसदक्षिणाम्। आत्मन्यग्नीन्समारोप्य ब्राह्मणः प्रव्रजेद् गृहात्॥

अनग्निरनिकेतः स्यात् ग्राममन्नार्थमाश्रयेत्। उपेक्षकोऽसंकुसुको मुनिर्भावसमाहितः॥ (मनु॰ ६.३८,४३)

अर्थात् प्रजापति परमात्मा की प्राप्ति के निमित्त प्राजापत्येष्टि कि जिसमें यज्ञोपवीत और शिखा का त्याग किया जाता है, आहवनीय, गार्हपत्य और दाक्षिणात्य संज्ञक अग्नियों को आत्मा में समारोपित करके ब्राह्मण गृहाश्रम से ही संन्यास लेवे॥ वह संन्यासी आहवनीयादि अग्नियों से रहित और कहीं अपना स्वाभिमत घर भी न बांधे ......... बुरे मनुष्यों की उपेक्षा करता और स्थिर बुद्धि मननशील होकर परमेश्वर में अपनी भावना का समाधान करता हुआ विचरे॥ (संस्कारविधि, स्वामी दयानन्द सरस्वती)

अतः उपरोक्त प्रमाणों एवं तर्कों के आधार पर अग्निहोत्रादि द्रव्ययज्ञों को पूर्णतया शुभ कर्मों की श्रेणी में न जानकर मिश्रित कर्मों की श्रेणी में ही जानना चाहिए।

३. कृष्ण = पापात्मक कर्म :— महर्षि व्यास कहते हैं कि यह कर्मजाति दुरात्माओं की होती है। इससे अधिक कुछ नहीं कहा। जो कर्म पुण्यात्मक और मिश्रित कर्म की श्रेणी में नहीं आता उसे कृष्ण कर्म कहा जायेगा। वस्तुतः सभी प्रकार के मन, वाणी और शरीर से होने वाले शास्त्रविरुद्ध कर्म; दूसरे प्राणियों को पीड़ा पहुँचाने वाले कर्म; अकर्त्तव्य कर्म / अविहित कर्म = जिनका शास्त्रों में विधान नहीं है; तथा निषिध कर्म = जिनका शास्त्रों में निषेध है; इस श्रेणी में आते हैं। योगसूत्र २.१५ की व्याख्या में हमने द्वेषज कर्माशय, मोहजन्य कर्माशय, हिंसाजन्य कर्माशय को स्पष्ट किया है, ये सभी इसी श्रेणी के कर्म कहे जा सकते हैं। इसी प्रकार मनुस्मृति में मन, वाणी और शरीर के पापात्मक कर्मों को निम्न प्रकार से सूचीबद्ध किया गया है —

परद्रव्येष्वभिध्यानं मनसानिष्टचिन्तनम्। वितथाभिनिवेशश्च त्रिविधं कर्म मानसम्॥

पारुष्यमनृतं चैव पैशुन्यं चापि सर्वशः। असंबद्धप्रलापश्च वाङ्मयं स्याच्चतुर्विधम्॥

अदत्तानामुपादानं हिंसा चैवाविधानतः। परदारोपसेवा च शारीरं त्रिविधं स्मृतम्॥ मनु॰ १२.५-७॥

अर्थात् मानसिक कर्मों में से तीन अधर्म हैं — (१) परद्रव्यहरण अथवा चोरी का विचार, (२) लोगों का बुरा चिन्तन, मन में द्वेष, ईर्ष्या करना और (३) मिथ्या निश्चय करना॥ वाचिक अधर्म चार हैं — (१) पारुष्य अर्थात् कठोरभाषण, (२) अनृत = झूठ बोलना, (३) पैशुन्य अर्थात् चुगली करना, और (४) असम्बद्ध प्रलाप अर्थात् जानबूझकर लांछन या बुराई बनाकर बात को उड़ाना॥ शरीरिक अधर्म तीन हैं — (१) चोरी, (२) हिंसा अर्थात् सब प्रकार के क्रूर कर्म तथा (३) व्यभिचार आदि कर्म अर्थात् परस्त्री अथवा परपुरुष से सम्बन्ध करना॥

इन सब को तथा वेदादि सत्यशास्त्रों से विरुद्ध, उनमें निषिद्ध तथा अविहित (= जिनका विधान नहीं), सभी प्रकार के कर्मों को पापात्मक कर्म ही जानना चाहिए।

महर्षि मनु निश्रेयस् कर्मों का कथन करते हुए कहते हैं —

यथोक्तान्यपि कर्माणि परिहाय द्विजोत्तमः। आत्मज्ञाने शमे च स्याद्वेदाभ्यासे च यत्नवान्॥

एतद्धि जन्मसाफल्यं ब्राह्मणस्य विशेषतः। प्राप्यैतत्कृतकृत्यो हि द्विजो भवति नान्यथा॥ मनु॰ १२.९२-९३॥

अर्थात् श्रेष्ठ द्विज उसके लिए विहित अन्य यज्ञादि कर्मों को (संन्यासी की अवस्था में) छोड़कर भी परमात्मज्ञान, इन्द्रियसंयम और वेदाभ्यास में प्रयत्नशील रहे अर्थात् इनको किसी भी अवस्था में न छोड़े॥१॥ ये तीनों कर्म द्विजों के, विशेषतः ब्राह्मण के जन्म को सफल बनाने वाले हैं। द्विज व्यक्ति इनका पालन करके कृतकृत्यता प्राप्त करता है, अन्य प्रकार से नहीं॥२॥

इस सूत्र में महर्षि व्यास द्वारा प्रतिपादित तप, स्वाध्याय और ध्यान तीनों ही कर्म महर्षि मनु द्वारा प्रतिपादित इन्द्रियसंयम, वेदाभ्यास और परमात्मज्ञान ही हैं; और योगी द्वारा इन तीनों को भी निष्काम होकर करना, कर्त्तव्य रूप से विहित है।

उपरोक्त विवेचन से स्पष्ट है कि योगी को इन तीनों प्रकार की कर्मजाति का परित्याग करते हुए केवल अशुक्ल-अकृष्ण कर्मजाति को ही अपनाना चाहिए; अन्यथा उसका चित्त वासना युक्त रहने से, उसे जन्म-मरण के अनवरत चक्र से मुक्ति मिलना असम्भव है॥

हिंदी में टिप्पणी : महर्षि दयानन्द ने अपने वेदभाष्य में यज्ञ से क्रियाकौशल (ऋ० १.१०.४), विद्वत्सत्कार, सत्सङ्ग, शुभगुण (ऋ० १.१.१, ३.२१.१), शिल्पविद्या (ऋ० १.३.१०), धर्मव्यवहार (ऋ० ७.११.५), धर्मार्थकाममोक्षव्यवहार (ऋ० १.१६४.५०), मानसिक ज्ञानयज्ञ (यजु॰ ३१.१५), कर्मोपासनाज्ञान (ऋ० २.५.८), रागद्वेषरहित न्याय दया (ऋ० ३.१.२२), विद्यावृद्धि व्यवहार (ऋ० ४.३४.६), अध्ययनाध्यापन (ऋ० ४.३३.३), सत्यजनकव्यवहार (ऋ० ५.८७.९), परोपकार (ऋ० ६.१०.६), ज्ञानक्रियामययज्ञ (ऋ० १.९३.६), अध्ययन उपदेश व्यवहार (ऋ० ४.३४.३), सत्यव्यवहार (ऋ० ४.३७.२), सन्ध्योपासनादि सत्कर्म (ऋ० ६.१४.२), विद्वत्सङ्ग (ऋ० ७.२१.१), विद्याविज्ञानप्रचार (ऋ० १.८३.५), सत्कर्मानुष्ठान (ऋ० ६.२४.६), विद्याप्रचार (ऋ० ५.५.२), योग (यजु॰ ७.११), विद्याप्रचार (यजु॰ ७.११), विज्ञानशिल्प (यजु॰ ५.१७, ४.९), सत्यभाषणादिव्यवहार (यजु॰ १८.६), धर्मपालन (यजु॰ १८.४), योगाभ्यासादि (यजु॰ २२.३३), शमदमादियुक्तेन योगाभ्यास (यजु॰ १८.११), आदि का ग्रहण किया है।