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ततस्तद्विपाकानुगुणानामेवाभिव्यक्तिर्वासनानाम्॥८॥

In Hindi:

पदपाठ : ततः तद्विपाकानुगुणानाम् एव अभिव्यक्तिः वासनानाम्॥

हिंदी में अर्थ : (ततः) उन शुक्ल, शुक्लकृष्ण, और कृष्ण रूप त्रिविध कर्मों से (तद्विपाक-अनुगुणानाम्) उन कर्मों के फल के अनुरूप = अनुसार (एव) ही (वासनानाम्) वासनाओं की (अभिव्यक्तिः) अभिव्यक्ति होती है॥

प्राचीन ॠषि भाष्य : तत इति त्रिविधात्कर्मणः तद्विपाकानुगुणानामेवेति। यज्जातीयस्य कर्मणो यो विपाकस्तस्यानुगुणा या वासनाः कर्मविपाकमनुशेरते तासामेवाभिव्यक्तिः। न हि दैवं कर्म विपच्यमानं नारकतिर्यङ्मनुष्यवासना- भिव्यक्तिनिमित्तं सम्भवति। किन्तु दैवानुगुणा एवास्य वासना व्यज्यन्ते। नारकतिर्यङ्मनुष्येषु चैवं समानश्चर्चः॥

प्राचीन ॠषि भाष्य हिन्दी अर्थ : (ततः इति) इस सूत्र में आए ततः पद से अभिप्राय है कि (त्रिविधात् कर्मणः) त्रिविध कर्म से (तद्विपाकानुगुणानाम् एव इति) उन कर्मफलों के अनुरूप ही वासनाओं की अभिव्यक्ति होती है। (यज्जातीयस्य कर्मणः) जिस प्रकार के कर्म = पुण्य, अपुण्य, मिश्रित कर्म का (यः विपाकः) जो विपाक = जाति आदि रूप फल होता है, (तस्यानुगुणाः) उस फल = जाति आदि के अनुरूप = अनुसार (याः वासनाः) जो वासनायें (कर्मविपाकम् अनुशेरते) कर्मफल का अनुसरण करती हैं, (तासाम् एव) उन्हीं वासनाओं की ही (अभिव्यक्तिः) अभिव्यक्ति = प्रकटता होती है। (हि) क्योंकि (दैवम् कर्म) देव श्रेणी का श्रेष्ठ कर्म (विपच्यमानम्) फल देता हुआ (नारकतिर्यङ्मनुष्यवासनाभिव्यक्तिनिमित्तम्) नारकीय = निकृष्ट योनियों, तिर्यक् = पशु, पक्षी आदि योनियों, और साधारण मनुष्यों की वासनाओं की अभिव्यक्ति का निमित्त = कारण (न सम्भवति) नहीं हो सकता; (किन्तु) किन्तु (दैवानुगुणाः एव) देव = श्रेष्ठ विद्वानों के कर्मफल भोग के अनुरूप ही (अस्य वासनाः) इसकी वासनायें (व्यज्यन्ते) अभिव्यक्त होती हैं। (एवम्) इसी प्रकार (नारकतिर्यङ्मनुष्येषु च) नारक, तिर्यक् और मनुष्यों योनियों में भी (समानः चर्चः) यही सिद्धान्त होता है॥

वैदिक वृत्ति : पुरुष द्वारा त्रिविध कर्मों = शुक्ल, कृष्ण और शुक्लकृष्ण कर्मों का सम्पादन करने पर वह जन्म-मरण रूपी संसारचक्र में लगा रहता है। इस जन्म-मरण के चक्र में जीवात्मा को, उन कर्मों के फल रूप जाति, आयु और भोग की प्राप्ति ईश्वरीय व्यवस्था में होती है। अर्थात् चित्त में संचित कर्माशय के आधार पर ही पुरुष को जाति अर्थात् शरीर विशेष की प्राप्ति होती है, और उन्हीं कर्मों से उसे आयु और भोग की भी प्राप्ति होती है। अतः जीवात्मा को उसके संचित कर्माशय के आधार पर ही देव = विद्वान्, साधारण मनुष्य, तिर्यक् = पशु-पक्षी, कीट-पंतग आदि नारकीय अथवा वृक्ष आदि स्थावर योनियों की प्राप्ति होती है।

पुरुष के सूक्ष्म शरीरस्थ चित्त में उसके जन्म-जन्मान्तर के संस्कार उपस्थित रहते हैं। संस्कार का अभिप्राय है — अविद्यादि क्लेशों, शुभाशुभ-मिश्रित कर्मों और उन कर्मफलों के भोगों के अनुकूल बनने वाली वासनायें। चित्तस्थ वासनाओं को दो प्रकार की कहा गया है — (१). स्मृति रूप फल वाली और (२) जाति, आयु और भोग रूप फल वाली। पुरुष के कर्माशय से जाति, आयु, भोग रूप फल की व्यवस्था को सूत्रकार ने योगसूत्र २.१३ में कहा है। वासनाओं के स्मृति रूप फल के विषय को यहाँ इस सूत्र में स्पष्ट किया जा रहा है। स्मृति के उत्पादक संस्कारों के विषय को महर्षि व्यास ने योगसूत्र २.१३ की व्याख्या में इस प्रकार से कहा है — “क्लेशकर्मविपाकानुभवनिर्वर्तिताभिस्तु वासनाभिरनादिकालसंमूचि्र्छतमिदं चित्तं विचित्रीकृतमिव सर्वतो मत्स्यजालं ग्रन्थिभिरिवाततमित्येता अनेकभवपूर्विका वासनाः।” अर्थात् अविद्यादि क्लेशों, शुभाशुभ कर्म और उनके फलों के अनुभवों से निष्पादित वासनाओं के द्वारा अनादि काल से ग्रस्त = सम्बद्ध यह चित्त सब ओर से = सर्वथा चित्रित हुआ जैसा रहता है जैसे मछली पकड़ने वाला जाल ग्रन्थियों से व्याप्त हुआ जैसा होता है; इसी प्रकार ये वासनाएँ अनेक जन्मों की सञ्चित हुई हैं। इसी विषय में आगे कहते हैं “ये संस्काराः स्मृतिहेतवस्ता वासनास्ताश्चानादिकालीना इति।” अर्थात् जो संस्कार स्मृति के हेतु = उत्पादक हैं वे वासनायें हैं और वे वासनायें अनादि कालीन हैं।

यहाँ प्रश्न उपस्थित होता है कि जीवात्मा को प्राप्त होने वाले भिन्न-भिन्न शरीरों में कौन सी वासनायें अभिव्यक्त होती हैं ? क्या प्रत्येक प्रकार के शरीर में समस्त प्रकार की वासनायें अभिव्यक्त होती हैं अथवा उस शरीर = जाति विशेष से सम्बद्ध वासनायें ही अभिव्यक्त होती हैं ?

इस प्रश्न का उत्तर इस सूत्र में दिया गया है। महर्षि पतञ्जलि कहते हैं कि जीवात्मा को अपने कर्मों के अनुसार जिस प्रकार की जाति = शरीर विशेष की प्राप्ति होती है, उस शरीर में उसी जाति,आयु और भोग रूप फल के अनुकूल ही वासनायें अभिव्यक्त = प्रकट होती हैं, और शेष अन्य सभी वासनायें दबी रहती हैं। उदाहरणार्थ जब किसी जीवात्मा को अपने पूर्व जन्मों में संचित अभुक्त कर्माशय के आधार पर वर्त्तमान में मनुष्य का शरीर मिलता है, तो उस जीवात्मा को इस वर्त्तमान मनुष्य जन्म में भी, पूर्व में प्राप्त हुए मनुष्य जन्मों में जाति, आयु, भोगों के अनुभव से जो वासनायें उसके चित्त में संचित हुई थीं, वे वासनायें ही वर्त्तमान में इस मनुष्य शरीर की प्राप्ति होने पर प्रकट होती हैं; और शेष सभी प्रकार के शरीरों में जाति, आयु और भोगों के अनुभव से संचित हुई वासनायें चित्त में सुप्त = अप्रकट रूप से ही रहती हैं। यदि ऐसा न हो तो स्मृति-संस्कारों का ऐसा मिश्रण उस पुरुष के सन्मुख उपस्थित हो जायेगा कि जीवात्मा अपने वर्त्तमान जन्म के अनुकूल आयु और भोगों को भोगने में भी असमर्थ हो जायेगा। अर्थात् मनुष्य जन्म में इसके चित्त में मनुष्यजन्म सम्बन्धी आयु और भोगों आदि की वासनायें = उन संस्कारों की स्मृति अभिव्यक्त हो जाती है, और वर्त्तमान जन्म में पुरुष की वृत्तियों पर भी उन संस्कारों का प्रभाव पड़ता है।

इसी प्रकार पशुयोनि विशेष, जैसे कुत्ते का शरीर मिलने पर, उस कुत्ते के शरीर में, पूर्व जन्मों में प्राप्त हुए कुत्ते के शरीरों में जाति, आयु और भोगों के अनुभव से संचित हुई वासनायें प्रकट हो जाती हैं, तथा शेष अन्य सभी प्रकार के शरीरों में बनी वासनायें दबी रहती हैं। अतः इन्हीं अभिव्यक्त वासनाओं के कारण ही, वर्त्तमान में कुत्ते के शरीर में जीवात्मा की वृत्तियाँ उन वासनाओं = संस्कारों के अनुकूल एवं उनसे प्रभावित होती हैं; जैसे कि उस कुत्ते का अपने समान अन्य कुत्तों पर भौंकना, गुर्राना, हड्डियों को चूसना, चूहे-बिल्ली आदि पशुओं को मार के खाना, विभिन्न प्रकार के मलों को खाना, स्वामी के प्रति वफादार रहना, आदि कार्य स्वाभाविक रूप से होते रहते हैं, जिनके लिए उसे किसी प्रकार के प्रशिक्षण की आवश्यकता ही नहीं होती। इसी प्रकार अन्य सभी योनियों के सम्बन्ध में समझना चाहिए।

यहाँ यह प्रश्न होता है कि योनि विशेष की प्राप्ति होने पर किस प्रकार की वासनायें = संस्कार अभिव्यक्त हो जाते हैं ? अर्थात् क्या उस पूर्वजन्म में कृत सभी प्रकार की कर्म वासनायें और उनसे सम्बन्धित स्मृति होती है अथवा उस शरीर में भोक्तृ-भोग्य भाव को दर्शाने वाली = जीवन यापन हेतु सामान्य वासनायें प्रकट होती हैं ?

पहले पक्ष का अभिप्राय है कि जीवात्मा को वर्त्तमान शरीर की प्राप्ति होने पर, पूर्व काल में प्राप्त उस जैसे शरीर में किए गए सभी कर्मों के संस्कारों तथा उनकी स्मृति का होना ! परन्तु यह इस वर्त्तमान शरीर = इस मनुष्य देह में ही नहीं घटता, अर्थात् हममें से किसी को भी यह स्मृति नहीं है कि मैं पहले कब और कहाँ मनुष्य बन कर उत्पन्न हुआ था और उस जीवन में कौन-कौन से कर्म किए थे ? जब पूर्व के एक जन्म की ही ऐसी स्मृति नहीं है तो पूर्व में प्राप्त जाति विशेष के अनन्त शरीरों की ऐसी स्मृति का होना असम्भव है। इस विषय में महर्षि पतञ्जलि ने योगसूत्र ३.१८ में संस्कारों में संयम से संस्कारों का साक्षात् होने से पूर्व जाति ज्ञान रूपी विभूति को कहा है। अतः ऐसी स्मृति का स्वाभाविक रूप से होना सिद्ध नहीं होता।

दूसरे पक्ष में अर्थात् उस शरीर विशेष में जीवन यापन हेतु सामान्य वासनाओं का होना — यथा पैदा होते ही भूख लगने पर रोने के संस्कार, माता के स्तन से दुग्ध पान से क्षुधा निवृत्ति होने का संस्कार, किसी प्रकार से पीड़ा होने पर रोने का संस्कार, प्रेम करने वालों से ममत्व होने का संस्कार आदि। इसी प्रकार पशु योनि विशेष प्राप्त होने पर उस-उस योनि में भोजन-छादन, जीवनयापन, प्राणरक्षा सम्बन्धी संस्कारों की अभिव्यक्ति जीवात्मा के चित्त में हो जाती है। और उन्हीं संस्कारों एवं स्मृतियों के बल पर ही जीवात्मा पशु-पक्षी आदि के शरीर में जीवनयापन करता, फल-फूल आदि का अथवा दूसरे प्राणियों को मार कर भोजन करता, प्राणभय होने पर प्राणों की रक्षा हेतु प्रयत्न करता, अन्य परजीवी = मांसाहारी प्राणियों का भोजन बनने से बचने हेतु प्रयास भी करता है। यह सब उस शरीरविशेष के समान, पूर्व काल में प्राप्त, शरीरों में भोगों और सुख-दुःख के अनुभवों के संस्कारों और उनकी स्मृति के बल पर ही होता है। जैसे वर्त्तमान जीवन में समुद्र किनारे कछुए के अण्डों से निकले नवजात बच्चे भी, वहाँ उपस्थित परभक्षी प्राणियों से मरणभय की आशंका से, अपनी प्राण-रक्षा हेतु समुद्र की ओर दौड़ लगाते हैं। ऐसी दौड़ लगाने के बाद भी लगभग सौ में से पाँच-सात बच्चे ही समुद्र के पानी तक पहुँच पाते हैं, और शेष सभी वहाँ उपस्थित दूसरे परजीवी पशुओं के भोजन बन जाते हैं। उन नवजात बच्चों में प्राणरक्षा हेतु समुद्र की ओर दौड़ने का संस्कार, उनके द्वारा पूर्व प्राप्त हुए कछुए के शरीर में संचित हुए संस्कारों के कारण ही प्रकट होता है, अन्यथा कछुए के उस नवजात बालक को सिर पर खड़ी मौत का न तो अनुभव ही हो सकता और न ही वह प्राणरक्षा हेतु ऐसा कोई प्रयत्न कर सकता है। इसी प्रकार अन्य योनियों के सम्बन्ध में भी जानना चाहिए॥